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यूपी में संघ-भाजपा के इस कदर मजबूत होने में ‘सैफई साम्राज्य’ का कितना योगदान?

 

उर्मिलेश

यूपी में सांप्रदायिक-विद्वेष और विभाजन की भरपूर कोशिश के बावजूद यह न तो 'हिन्दुत्वा' की जीत है और न सामाजिक न्याय-बहुजन आंदोलन की हार है। यूपी में 'सैफई साम्राज्य' हारा है, संकीर्ण-व्यक्तिवाद का 'मायालोक' हारा है। !

भाजपा की प्रचंड जीत मोदी-शाह के कौशल, आक्रामक प्रचार, हर तरह की 'कलाबाजी' और जबर्दस्त 'मीडिया-प्रबंधन' के अलावा गैर यादव-पिछड़ों और गैर जाटव-दलितों में संघ-भाजपा की उल्लेखनीय घुसपैठ का नतीजा है। रेडियो और टीवी का भाजपा ने अभूतपूर्व फायदा उठाया। यूपी चुनाव की भाजपा-जीत पर एक अच्छा शोधग्रंथ लिखा जाना चाहिये।

इस बात का आकलन किया जाना चाहिए कि यूपी में संघ-भाजपा के इस कदर मजबूत होने में 'सैफई साम्राज्य' का कितना योगदान है?

Urmileshमुलायम के 'अमर-कारपोरेट कनेक्शन' और घृणित परिवारवाद ने सामाजिक न्याय आंदोलन का कितना नुकसान पहुंचाया? इस बात की एक हद तक प्रशंसा हुई, जब अखिलेश ने अमर आदि से रिश्ता तोड़ा। लेकिन सामाजिक न्याय से तो उन्होंने पहले ही किनारा कर लिया। उनके पांच साल के शासन में ऐसे क्या काम हुए, जिन्हें हम सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कोई बड़ा कदम कहें? उनके सलाहकारों और अंगरेजी प्रेस के एक हिस्से ने उन्हें भ्रम में डाल दिया कि अब वह सर्व-समाज के सर्व स्वीकार्य नेता हैं, इसलिए सिर्फ 'विकास-विकास' की बात करें, वह पीएम मैटेरियल जो हैं! इसके चलते पिछड़ी जातियों का बड़ा हिस्सा उनसे अलग होकर भाजपा से जा मिला। उनमें बड़े हिस्से की बुनियादी जरूरतें सुपर एक्सप्रेस हाइवे या मेट्रो या शापिंग माल नहीं थीं। वे रोजगार, आवास, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नया पाने चाहते थे।

अभी यूपी में ग्रामीण क्षेत्रों में 52 फीसद बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने को अभिशप्त हैं। इसके लिए उनके अभिभावकों को मोटी रकम चुकानी पड़ती है। और परिवारवाद, क्या कहने हैं, पिता, चाचा और कुछ और परिजनों से दूरी बनाकर अखिलेश ने अपनी सांसद पत्नी को पार्टी में दूसरे नंबर की सबसे बड़ा नेता(स्टार कैंपेनर) बना दिया! पिछड़ी या अन्य उत्पीड़ित जातियों से कोई प्रमुख नेता सामने नहीं आ सका।

भाजपा में दूसरे नंबर के स्टार कैंपेनर थे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह। सपा में कौन था दूसरे नंबर पर, मुख्यमंत्री जी की धर्मपत्नी! भाड़ में गया सामाजिक न्यायवाद, साये की तरह साथ रहा परिवारवाद।

उर्मिलेश, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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