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खेती के लिये जीरो बजट : उन्हें गांधी समझना मुश्किल, जिन्होंने स्वदेशी को तिलांजलि देकर गांधी से मतलब केवल सफाई में देखा

‘जीरो बजट खेती’ जिसका नामकरण अब सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती हुआ है, आज पूरे देश में चर्चा का विषय बनी है। खेती के लिये यह एक अच्छा संकेत है। समाज में खुला विचार मंथन एक जरूरी प्रक्रिया है। खासकर जब खेती और किसानी की समस्या का समाधान करने में कारपोरेट परस्त सरकारें असफल हुई है और उनकी लूट करने के लिये उन्हें कारपोरेट घरानों के हवाले कर रही है, तब अपने बचाव के लिये किसान को खुद ही निर्णय करने पडेंगे, अन्यथा आने वाले दिन उनके लिये और कठिन हो जायेंगे। खेती पद्धति में हो रहे परिवर्तन (Changes in farming method) के संदर्भ में केवल किसान ही नहीं पूरे समाज को सोचना होगा और निष्पक्षता से पडताल करनी होगी कि देश और किसान के हित में क्या है?

Consideration on improving traditional farming for the country’s food security

देश की खाद्य सुरक्षा के लिये पारंपरिक खेती में सुधार पर विचार किये बिना हरित क्रांति (Green revolution) के द्वारा रासायनिक खेती (Chemical farming) को बढ़ावा देना देश और किसान दोनों के विरुद्ध साबित हुआ है। यह उन नीतियों का परिणाम है जिसके द्वारा उत्पादन वृद्धि के लिये किसानों को प्राकृतिक खेती से रासायनिक खेती अपनाने के लिये बाध्य किया गया।

एक तो रासायनिक खेती के कारण किसान के आदान लागत में काफी बढ़ोत्तरी हुई। लेकिन उत्पादन बढ़ने के बावजूद उत्पादन वृद्धि के कारण फसलों के दाम गिरने से उसका फायदा किसानों को नहीं मिला। उलटा बहु फसली खेती एक फसली खेती में रूपांतरित होने से जैव विविधता (Biodiversity) खतरे में पड़ी जिससे परिवार का पोषण करने वाली वैविध्यपूर्ण फसलें मिलना बंद हुईं।

दूसरा खेती में आदान और पोषक आहार के लिये किसान बाजारावलंबी हुआ, जो उसकी लूट बढ़ाने का कारण बना और तीसरा रासायनिक खेती ने भोजन की थाली और पीने के पानी में जहर पहुंचा दिया। जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पडा है। रासायनिक खेती के कारण सिंचाई के लिये पानी का इस्तेमाल बडे पैमाने पर बढ़ा है।

Organic farming for alternative farming

जैसे-जैसे पूरी दुनिया में जहर मुक्त अन्न की मांग (Demand for poison free food) उभरने लगी, रासायनिक खेती के विकल्प ढूंढना जरूरी हो गया। वैकल्पिक खेती के लिये जैविक खेती सामने आयी। देश भर की एनजीओ ने इसके लिये मेहनत की। जीरो बजट खेती (Zero Budget Farming in hindi) ने भी किसानों का ध्यान आकर्षित किया। यह सभी रासायनिक खेती का विकल्प (option of Chemical farming) देने का काम कर रहे हैं।

अमीरों की विषमुक्त भोजन की चाहत ने भी इस काम को और गति दी है। आज पूरे समाज में रासायनिक खेती को हद्दपार करने के लिये सैद्धांतिक सहमति है और सरकार के समर्थन के बिना किसान स्वयंस्फूर्ति से उस पर अमल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

आज पारंपारिक प्राकृतिक खेती की जगह ऐसी खेती पद्धति अपनाने की जरूरत है, जो पारंपारिक प्राकृतिक खेती में सुधार के साथ देश के खाद्य सुरक्षा और उत्पादन बढ़ाने की रासायनिक खेती की चुनौती को स्वीकार करने में सक्षम हो। साथ ही खेती में आदान लागत में लूट करने वाले बाजारावलंबन से उसे मुक्ति मिले। किसान परिवार के सन्मान पूर्वक जीवन के लिये खेती में उचित श्रम मूल्य मिले और पूरे समाज को जहर मुक्त थाली मिल सके। जिसे हम ‘नई प्राकृतिक खेती’ कह सकते हैं।

The strongest side of natural farming

प्राकृतिक खेती का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि वह समाज को जहर मुक्त आहार का भरोसा देती है। जो लोगों के अच्छे स्वास्थ के लिये जरूरी है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक खेती के लिये जरूरी खाद और कीटनाशकों का उपयोग समाप्त होने से वह आदान लागत में बाजार द्वारा होने वाली किसानों की लूट को कम करती है। साथ ही सिंचाई के लिये पानी की अनावश्यक खपत को भी रोकती है।

लेकिन किसानों को यह समझना होगा कि अगर प्राकृतिक खेती यह दावा करती है कि वैकल्पिक खेती पद्धति अपनाने से रासायनिक खेती से ज्यादा उत्पादन होगा और उससे किसान की आय बढ़ेगी, तो वह सही नहीं है। जहर मुक्त बाजार में प्राकृतिक खेती की उपज को अधिक दाम मिलने से किसानों को आज थोड़ा आर्थिक लाभ हो रहा है, लेकिन अगर देश के सभी किसान प्राकृतिक खेती अपनाते हैं तब अधिक मिलने वाले दाम नहीं मिल पायेंगे और फिर यह मंत्र सभी फसलों के लिये लागू भी नहीं होता।

यह भी समझना होगा कि जब तक जहर मुक्त फसलों की ज्यादा कीमत पाना ही किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने का मंत्र है, तबतक जहर मुक्त खेती और जहर मुक्त थाली गरीबों के लिये नहीं हो सकती। वह यह मान सकते हैं कि जिनको दो वक्त का खाना नसीब नहीं है और जो मृत्यु आने तक दिन गिन-गिनकर जीते हैं, उनके लिये खाने में जहर मायने नहीं रखता। फिर उन्हें अमीरों के लिये काम करने का आरोप सहना पड़ेगा।

प्राकृतिक खेती को किसानों के लिये आर्थिक दृष्टि से लाभकारी बताना जहर मुक्त आहार की अपरिहार्यता के कारण किसानों को प्राकृतिक खेती की तरफ प्रेरित करने के लिये की गई चालाकी है। अगर सचमुच अमीरों को जहर मुक्त अन्न खाकर बीमारियों से बचना है तो उन्हें यह समझना होगा कि इस प्रकार के चालाकी से ज्यादा दिन काम नहीं चलने वाला है। किसान अपने परिवार की बलि चढ़ाकर आज तक जो करते आया है अब वह नहीं करेगा। इसलिये अमीरों को किसान को सन्मान पूर्वक जीवन प्राप्त करने के लिये किये जा रहे संघर्ष में शामिल होना होगा तभी उन्हें जहर मुक्त भोजन मिल पायेगा।

जिस तरह के ईमानदार लोग जैविक खेती के काम में लगे हैं, यह कहना अन्यायपूर्ण होगा कि जैविक खेती को रासायनिक खेती के विकल्प में खड़ा करने की कारपोरेटी योजना में उनकी हिस्सेदारी थी। लेकिन जैविक खेती में कारपोरेट ने अपना बड़ा इनपुट बाजार खड़ा कर लिया है, इसे नकारा नहीं जा सकता है। इससे जैविक खेती से आगत लागत घटने का दावा खारिज हो जाता है।

जैविक खेती द्वारा जहर मुक्त थाली को भी जीरो बजट खेती चुनौती दे रही है कि जैविक खेती रासायनिक खेती से अधिक विषैली है। इसकी जांच होनी चाहिये। जैविक खेती विषैली नहीं है, यह उन्हें ही सिद्ध करना होगा जो इसका दावा कर रहे हैं। अगर वह यह सिद्ध नहीं कर पाये तब जैविक खेती का जहर मुक्त थाली का दूसरा दावा भी खारिज हो जाता है।

केवल नाम के कारण जीरो बजट खेती का विरोध करने वालों का कहना है कि खेती जीरो बजट में नहीं हो सकती और यह सच्चाई है कि जीरो बजट खेती में आगत लागत जीरो नहीं हो सकती। लेकिन अपने निकट की चीजों का इस्तेमाल करके आगत के लिये बाजार की चीजों का इस्तेमाल रोककर आदान लागत को कम करके और आंतर फसलों द्वारा आदान लागत की भरपाई करके उसे जीरो तक पहुंचाने का काम जीरो बजट खेती करती है। वह किसानों को कारपोरेटी बाजारपर निर्भर रहने से बचाती है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि परमाणु बम एक क्रूर संहारक अस्त्र है। लेकिन ग्रीन हाउस इफेक्ट (Green house effect) उससे अधिक भयंकर इस अर्थ में है कि उससे पैदा जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि संपूर्ण सजीव सृष्टि के साथ साथ पृथ्वी को भी नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक रूप से उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसेस का पृथ्वी पर संतुलन रखने के लिये प्रकृति सक्षम है। लेकिन मनुष्य के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण पैदा ग्रीन हाउस इफेक्ट मनुष्य के विनाश का कारण बना है। उसके लिये मुख्यत: औद्योगीकरण जिम्मेदार है। खेती में भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण होने वाले ग्रीन हाउस इफेक्ट को रोकना जरूरी है।

प्राकृतिक खेती के संपूर्ण समर्थन के बावजूद हमे यह स्वीकार करना होगा कि केवल खेती की पद्धति में बदलाव से किसान की आर्थिक स्थिति में सुधार संभव नहीं है। किसानों की दुर्दशा का प्रमुख कारण खेती में किसानों के श्रम का शोषण और बाजार द्वारा किसानों की लूट है। यह पूर्ण रूप से आर्थिक नीतियों में सुधार का मसला है। आर्थिक नीतियों में सुधार लाकर ही किसानों को सन्मान पूर्वक जीवन प्राप्त हो सकता है। इसलिये किसानों को ‘नई प्राकृतिक खेती’ अपनाने के साथ साथ शोषणकारी नीतियों को बदलने के लिये संघर्ष जारी रखना होगा।

गलत दावों के कारण सरकार को जिम्मेदारी से भागने और चालाकी करने का मौका मिल जाता है। जनता ने भी उन्हें विश्वास दिलाया है कि झूठ बोलकर भी सत्ता प्राप्त की जा सकती है। इसलिये उन्हें प्राकृतिक खेती से किसान की आय दुगनी करने का झूठा दावा करते समय डर नहीं लगा। खाद्य सुरक्षा के लिये उत्पादन वृद्धि की जरूरत का सरकारी दावा भी प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि कृषि भूमि को गैरकृषि कृषि कार्य के लिये हरदिन किसानों से जमीन छीनने और निर्यात प्रधान कृषि उत्पादन के लिये नीतियां बनाने से खाद्यान्न सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा इसकी उन्हें चिंता नहीं है। बीटी टैक्नोलॉजी का स्वास्थ्य पर बुरा परिणाम (Bt technology has bad health consequences) संभव है यह जानकर भी वह छिपे रास्ते से बीटी को प्रवेश देकर जहर मुक्त अन्न देने का दावा करती है।

All about Zero budget in Hindi

प्राकृतिक खेती के लिये सरकार ने जीरो बजट रखा है। उसे प्रोत्साहित करने के लिये सब्सिडी का कोई प्रावधान नहीं किया है। लेकिन बजट में 80 हजार करोड रुपयों की रासायनिक सब्सिडी दी गयी है। जिसमें 53 हजार करोड रुपयें यूरिया सब्सिडी है। साथ ही मेडिकल काउंसिल की रिपोर्ट को आधार बनाकर कृषि मंत्री द्वारा लोकसभा में यह सिद्ध करने का प्रयास कि पंजाब में कैंसर के लिये रासयनिक खेती जिम्मेदार नहीं है, रासायनिक उद्योग के दबाव में साजिश का हिस्सा लगता है। जब कैंसर का निश्चित कारण विज्ञान के पास नहीं है, तब मेडिकल काउंसिल क्यों साबित करना चाहती है कि पंजाब में बढ़ते कैंसर का कारण थाली और पानी के द्वारा शरीर में जहर पहुंचना नहीं है।

सरकार की नियत साफ नहीं है। पिछले पांच वर्ष में सरकार ने खेती और किसानों के लिये जो घोषणाएं की थी, उसका पालन नहीं किया और दोबारा चुनकर आने के बाद पहले बजट भाषण में उसपर अमल करने के लिये दिशा या योजना प्रस्तुत नहीं की। उन्होंने किसान को फसलों के दाम में हो रहे नुकसान के लिये अंतर राशि देने या न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर खरीद को रोकने के लिये कानून बनाने का अपना वचन नहीं निभाया।

खेती में तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिये कि नहीं यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। भले ही जो लोग तकनीक का उपयोग कर मोबाईल पर रात दिन टिक टिक करते रहते हैं, उन्हें किसानों को तकनीक का उपयोग नहीं करना चाहिये यह कहने का नैतिक अधिकार ना हो। लेकिन तकनीक जब किसानों के शोषण के लिये इस्तेमाल हो रही हो और उसके माध्यम से कारपोरेट खेती का जाल बिछाने के खेल का हिस्सा बन गई हो तब अपने बचाव के लिये किसान को उसका विरोध और बहिष्कार करना आवश्यक हो जाता है। इसीलिये बीटी और दूसरी ऐसी तकनीक का विरोध किसान के लिये जरूरी है।

लोगों के लिये केवल उसी तकनीक का उपयोग उचित है जो उनकी पहुंच में है। जो तकनीक उपयोगकर्ता के पहुंच से दूर है वह हमेशा लूट का कारण बनी रहेगी। इसलिये जो शोषणकारी व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं, उनके लिये स्थानीय तकनीक के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

आजादी के आंदोलन में चरखा केवल धागा बनाने का यंत्र नहीं था। वह देश के गरीब जनता को रोजगार देकर उनकी आमदनी बढ़ाने, उन्हें पेटभर रोटी खिलाने और वस्त्र देने की योजना के साथ साथ जिसके आधार पर अंग्रेजी साम्राज्य खडा था, उन मैनचेस्टर मिलों द्वारा होने वाली लूट को रोककर अंग्रेजी साम्राज्य को दी गई चुनौती थी। इसलिये चरखा राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गया।

ठीक उसी तरह ‘नई प्राकृतिक खेती’ अपनाकर मोंसैंटो एंड बेअर जैसी कारपोरेट कंपनियों के द्वारा किसानों की हो रही लूट रोकना, कारपोरेट खेती को रोकना और उसके माध्यम से कारपोरेटी साम्राज्यवाद को चुनौती देना संभव है। जीरो बजट खेती उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह समझना आवश्यक है कि जो लोग कारपोरेटी लूट के लिये देश के दरवाजे खोलकर खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं, उनका राष्ट्रवाद एक पाखंड है। वैसे भी उन्हें गांधी समझना मुश्किल है जिन्होंने स्वदेशी को तिलांजलि देकर गांधी से मतलब केवल सफाई में देखा है।

विवेकानंद माथने

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