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राजीव गांधी की हत्या का मतलब भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर हमला

Rajiv Gandhi

राजीव गांधी के बहाने (पुरानी पोस्ट जरूरी बात)

जगदीश्वर चतुर्वेदी

फ़ेसबुक पर जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की राजीव गांधी पर पोस्ट पढ़कर लगा कि हमारे मध्यवर्ग में एक तबक़ा ऐसा पैदा हुआ है जो मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक संवेदनाओं के मामलों में एकसिरे से अमानवीय हो चुका है या जैसी करनी-वैसी भरनी की मनोदशा का शिकार है।

राजीव गांधी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, वे लंकाई तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के हाथों मारे गए, उनकी लिट्टे मरजीवड़ों ने हत्या की थी। इस हत्या की किसी भी रुप में हिमायत सही नहीं है।

राजीव गांधी की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं है। वह राजनीतिक हत्या है। हत्यारों ने ख़ास मंशा और उद्देश्य को ध्यान में रखकर हत्या की थी। यह भारत के प्रधानमंत्री की हत्या है। यह हत्या ऐसे समय में की गई जब भारत लिट्टे की आतंकी मुहिम से श्रीलंका में जूझ रहा था। आतंकी गिरोह के हाथों हमारे प्रधानमंत्री का मारा ज़ाना मार्कण्डेय साहब को क्यों नहीं दिखा ? लिट्टे के ख़िलाफ़ भारत ने यदि श्रीलंका में अभियान न चलाया होता तो आज वह समूचे एशिया में वह सबसे ताक़तवर आतंकी संगठन होता। लिट्टे को नेस्तनाबूद करने बाद ही हम श्रीलंका में शांति स्थापित करने में मदद कर पाए।

हमारे देश के राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे आरंभ में आतंकी संगठनों की भावी रणनीतियाँ भाँप नहीं पाते। यही स्थिति भिण्डरावाले के संदर्भ हुई और यही स्थिति लिट्टे के संदर्भ में हुई। भारतीय राजनेता आतंकी या पृथकतावादियों की हर राजनीतिक गतिविधि को अपने तात्कालिक वोट बैंक के फ़ायदे और नुक़सान के आधार पर तय करते रहे हैं। फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर में मोदी यही चाल चल रहे हैं। जबकि भिण्डरावाले और लिट्टे के प्रसंग में यह रणनीति पूरी तरह पिट चुकी है। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक सभी का आरंभ में आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति सॉफ़्ट रवैय्या था। इसका ख़मियाज़ा इन दोनों नेताओं को जान गँवाकर भुगतना पड़ा। इसका यह अर्थ नहीं है कि इन दोनों नेताओं की आतंकियों के द्वारा की गयी हत्या जायज़ है।

इसके विपरीत हमें देखना चाहिए कि राजीव की हत्या का मतलब क्या है ? राजीव की हत्या का मतलब है भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर हमला। आज का दिन राजीव गांधी से हिसाब माँगने का दिन नहीं है बल्कि राजीव गांधी के हत्यारों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करने का दिन है। काटजू साहब बाक़ी किसी दिन राजीव गांधी की करनी का हिसाब कांग्रेस से माँग लीजिए, लेकिन खुदा के वास्ते आज के दिन बख़्श दीजिए।

लोकतंत्र में प्रधान और हाशिए के अंतर्विरोध में अंतर करना चाहिए। हम यह देखें कि आतंकी संगठन लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुट हैं या नहीं ? लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाने की बजाय काटजू साहब तो राजीव गांधी पर हमले कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है संप्रभु राष्ट्र के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री की हत्या के पीछे कार्यरत राजनीतिक मंशा को काटजू जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति नहीं समझ पाया !

हमें कारण खोजना चाहिए कि जस्टिस काटजू से चूक क्यों हुई ? असल में इन दिनों संकीर्ण फलक पर रखकर देखने की हवा चल रही है, हम अपनी पीड़ा और अपने नज़रिए को ही प्यार करते हैं उसके आगे देख ही नहीं पाते। इस तरह बम राजीव गांधी की हत्या को ठीक से समझ ही नहीं पाएँगे, इसे निजी या सामाजिक हानि लाभ के राजनीतिक व्यवहारवाद से भी समझ में नहीं आएगी। इसे लोकतांत्रिक नज़रिए से देखने की ज़रूरत है।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता पर किया गया हमला थी और सारे देश ने एकजुट होकर उसका प्रतिवाद किया था। आज हम यह सबक़ लें कि आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति नरम रुख़ नहीं अपनाएँगे। राजीव गांधी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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