जनता के हक में हर आवाज अब राष्ट्रद्रोह है और जनता का उत्पीड़न, शोषण और दमन, नरसंहार देशभक्ति है

श्मशानघाट और कब्रिस्तान का नजारा खेतों खलिहानों और छोटे कारोबार में सर्वव्यापी हैं। जनपक्षधर ताकतों में अभूतपूर्व बिखराव है। महाराष्ट्र का सच यूपी समेत बाकी देश का सच बन जाये तो हमें ताज्जुब नहीं... ...

हाइलाइट्स
  • श्मशानघाट और कब्रिस्तान का नजारा खेतों खलिहानों और छोटे कारोबार में सर्वव्यापी हैं।
  • गांधी की पागल दौड़ के विमर्श के बदले अब राममंदिर का स्वराज रामराज्य है और मुक्तबाजार स्वदेश है।
  • डान डोनाल्ड ट्रंप की रंगभेदी प्रतिमा की हमारे धर्मस्थलों में देवमंडल के अवयव में प्राण प्रतिष्ठा हो गयी है।

 

पलाश विश्वास

अभी आलेख लिखने से पहले समाचारों पर नजर डालने पर पता चला कि महाराष्ट्र के पालिका चुनावों मे हाल में भाजपा से अलग होने के बाद शिवसेना मुंबई में बढ़त पर है,  जहां भाजपा दूसरे नंबर पर है। बाकी महाराष्ट्र में भाजपा की जयजयकार है और कांग्रेस का सफाया है।

बहुजन चेतना,  बामसेफ,  क्रांति मोर्चा,  अंबेडकर मिशन,   रिपबल्किन राजनीति के मामले में महाराष्ट्र बाकी देश से आगे है। इस नीले झंडे की सरजमीं पर शिवाजी महाराज की विरासत अब विशुध पेशवाराज है। भगवाकरण के तहत केसरिया सुनामी भी वहां सबसे तेज है।

इसी बीच दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में फिर भगवा तांडव का नजारा है और यूपी में चरणबद्ध मतदान में अब कब्रिस्तान या श्मशानघाट चुनने की बारी है।

उत्पादन प्रणाली तहस-नहस है क्योंकि भारत का सत्तावर्ग को उत्पादन के बजाय मार्केटिंग में ज्यादा दिलचस्पी है। चूंकि उत्पादन श्रम के बिना नहीं हो सकता,   जाहिर है कि उत्पादन के लिए मेहनतकशों के हकहकूक का ख्याल भी पूंजीवादी विकास के लिए रखना अनिवार्य है।

दूसरी ओर,  मार्केटिंग में मेहनतकशों के हकहकूक का कोई मसला नहीं है। हमारी मार्केंटिंग अर्थव्यवस्था में इस लिए सारे श्रम कानून खत्म हैं और रोजगारीकी कोई गारंटी अब कहीं नहीं है। उत्पादन में पूंजी और जोखिम के एवज में मुनाफा के बजाय फ्रैंचाइजी,  शेयर और दलाली से बिना कर्मचारियों और मेहनतकशों की परवाह किये तकनीकी क्रांति के जरिये मुनाफा का मुक्त बाजार है यह रामराज्य।

कारपोरेट पूंजी के हवाले देश के सारे संसाधन और अर्थव्यवस्था है। जाहिर है सर्वत्र छंटनी का नजारा है। मुक्तबाजार के समर्थक सबसे मुखर मीडिया में भी अब कारपोरेट पूंजी का वर्चस्व है और वहां भी मशीनीकरण से दस कदम आगे आटोमेशन और रोबोटीकरण के तहत छंटनी और बेरोजगारी संक्रामक महामारी लाइलाज है। फिरभी भोंपू,  ढोल,  नगाडे़ का चरित्र बदलने के आसार नहीं हैं।

श्मशानघाट और कब्रिस्तान का नजारा खेतों खलिहानों और छोटे कारोबार में सर्वव्यापी हैं।

भुखमरी,  बेरोजगारी,  मंदी,  बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं के लिए क्रय क्षमता से महाबलि सत्ता वर्ग और उनका मौकापरस्त पढ़ा लिखा समझदार ज्ञानी संपन्न मलाईदार तबका जाहिर है मोहताज नहीं है। वित्तीय प्रबंधन और राजकाज के नीति निर्धारक तमाम बगुला भगत,  झोला छाप विसेषज्ञ इसी तबके के हैं और भारतीय समाज में पढ़े लिखे ओहदेदार तबके का नेतृ्त्व जाति,  धर्म,  नस्ल क्षेत्र,  पहचान में बंटी जनता का नया पुरोहिततंत्र है और बहुसंख्य बहुजन जनता इसी नये पुरोहित तंत्र के शिकंजे में फंसी है।

नवधनाढ्य इस सत्तावर्ग को हिंदुत्व के कारपोरेट एजंडे और नरसंहारी मुक्तबाजार में अपनी संतान संतति का पीढ़ी दरपीढ़ी आरक्षित भविष्य नजर आता है।

जाहिर है कि मुक्तबाजार के खिलाफ कोई आवाज राजनीति में नहीं है तो समाज में साहित्य में,  संस्कृति,  कला विधा माध्यमों में भी नहीं है।

है तो माध्यमों पर बाजार और कारपोरेट पूंजी के कार्निवाल विज्ञापनी प्रायोजित पेइड वर्चस्व के कारण उसकी कही कोई गूंज नहीं है।

जनपक्षधर ताकतों में अभूतपूर्व बिखराव और दिशाहीनता है।

महाराष्ट्र का सच यूपी समेत बाकी देश का सच बन जाये तो हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सभी लोग कमोबेश मुक्तबाजार के बिछाये शतरंज के दस दिगंत कुरुक्षेत्र में भगवा कारपोरेट एजंडे के तहत जनता के अस्मिताबद्ध,  जाति बद्ध,  धर्म नस्ल क्षेत्र आधारित बंटवारे के इस खेल में जाने अनजाने शामिल हो गये हैं,  जिसमें जीत या हार चाहे किसी की हो,  आखिर में अर्थव्यवस्था,  उत्पादन प्रणाली और आम जनता की मौत तय है।

खेती,  कारोबार,  उद्योगों की हम पिछले 26 साल से सिलसिलेवार चर्चा करते रहे हैं। लेकिन जनता तक हमारी आवाज पहुंचने का कोई माध्यम या सूत्र बचा नहीं है। कोई मंच या संगठन या मोर्चा हमारे लिए बना या बचा नहीं है जहां हम उत्पीड़ित,  वंचित,  मारे जा रहे बेगुनाह इंसानों की चीखों की गूंज बन सकें।

आम जनता को अर्थव्यवस्था समझ में नहीं आती और अपने भोगे हुए यथार्थ का विश्लेषण करने की फुरसत रोज रोजदम तोड़ रही उनकी रोजमर्रे की बिन दिहाड़ी बेरोजगार मेहनतकश भुखमरी की जिंदगी में नहीं है।

गांधी की पागल दौड़ के विमर्श के बदले अब राममंदिर का स्वराज रामराज्य है और मुक्तबाजार स्वदेश है। डान डोनाल्ड ट्रंप की रंगभेदी प्रतिमा की हमारे धर्मस्थलों में देवमंडल के अवयव में प्राण प्रतिष्ठा हो गयी है।

मार्क्सवाद,   लेनिनवाद,   माओवाद,   समाजवाद जैसे रंगबिरंगेवाद विवाद की आम जनता में कोई साख बची नहीं है। विचारधाराें चलन से बाहर है और सर्वव्यापी आस्था का अंध राष्ट्रवाद हिंदुत्व की कारपोरेट सुनामी है। जनता के हक में हर आवाज अब राष्ट्रद्रोह है और जनता का उत्पीड़न,  शोषण औरदमन,  नरसंहार देशभक्ति है।

 

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