क्या बहुजन नेता ट्रंप से भी प्रेरणा लेंगे!

बहुजन नायक-नायिकाओं ने अगर ओबामा की बजाय दक्षिण अफ्रीका के जैकब जुमा को मॉडल बनाया होता, आज न तो उनके खुद का भविष्य संकटग्रस्त होता और न ही सामाजिक न्याय की राजनीति की स्थिति करुणतर होती।...

अतिथि लेखक
क्या बहुजन नेता ट्रंप से भी प्रेरणा लेंगे!
will Bahujan leader take inspiration from Trump
हाइलाइट्स

सामाजिक न्याय की राजनीति का सफ़र जिस उम्मीद से शुरू हुआ था, उसे याद करें तो इन मूर्तियों का इस तरह गिरना और नष्ट होना तकलीफ देता है

 

-एच. एल. दुसाध

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का प्रचार धीरे-धीरे तुंग की ओर पहुँच रहा है। इनमें पूरे देश की निगाहें उस यूपी पर टिकी हुईं हैं, जहां से देश की राजनीति को दिशा मिलती है। यूपी चुनाव में विकास, भ्रष्टाचार, धर्मनिरपेक्षता, बिजली, सड़क और पानी इत्यादि वे तमाम मुद्दे हैं, जिन पर यहां विगत एक दशक से चुनाव लड़ा जा रहा है। पारम्परिक मुद्दों की भीड़ में अगर कोई मुद्दा यहां गायब है,  तो वह सामजिक न्याय का मुद्दा है। हालांकि संघ प्रचारक मनमोहन वैद्य के आरक्षण विरोधी बयान के बाद सामाजिक न्याय के मुद्दे की गरमाने की सम्भावना भी उजागर हो गयी थी। किन्तु वैसा हुआ नहीं, यह फुस्स होकर रह गया है। अवश्य ही मायावती इसे तूल देने का प्रयास कर रही हैं, किन्तु आधे-अधूरे मन से। ऐसे में यूपी चुनाव में सामाजिक न्याय का मुद्दा प्रायः पृष्ठ में चला गया है जिससे बहुत से लोग विस्मित हैं कि ऐसा कैसे हो गया!। इसका जवाब शायद 15वीं लोकसभा चुनाव परिणाम पर मशहूर पत्रकार दिलीप मंडल के ‘मंद पड़ने लगी है सामाजिक न्याय की राजनीति’ शीर्षक से छपे लेख के निम्न अंश में छिपा है-

     ‘वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में हिंदी पट्टी के दो महत्वपूर्ण राज्यों बिहार और यूपी की राजनीति की एक हकीकत जाहिर हो गयी है। लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती और यूपी में सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद मुलायम सिंह यादव –ये सभी महारथी इस चुनाव में चमक खो चुके हैं।

इसके साथ ही भारतीय राजनीति व्यवस्था में वंचित समूहों की हिस्सेदारी बढ़ाने की जो प्रक्रिया लगभग 20 साल पहले शुरू हुई थी, उस मॉडल के नायक-नायिकाओं का निर्णायक रूप से पतन हो चुका है। हालाँकि यह सब एक दिन में नहीं हुआ है लेकिन अब वह समय है , जब इनके पतन और विखंडन की प्रक्रिया पूरी हो रही है।

H LDusadhसामाजिक न्याय की राजनीति का सफ़र जिस उम्मीद से शुरू हुआ था, उसे याद करें तो इन मूर्तियों का इस तरह गिरना और नष्ट होना तकलीफ देता है।

यह एक सपने के टूटने की दास्तान है। यह सपना था भारत को बेहतर और सबकी हिस्सेदारी वाला लोकतंत्र बनाने का और देश के संसाधनों पर खासकर वंचित सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी दिलाने का। ’

    अगर कोई भी व्यक्ति उपरोक्त पंक्तियों को ध्यान से देखेगा तो उसे आज यूपी के चुनावी माहौल में सामाजिक न्याय की राजनीति की करुणतर स्थिति पर जरा भी विस्मय नहीं होगा। क्योंकि 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद सामाजिक न्याय का जो मुद्दा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आया, वह 20 वर्ष पूरा होते-होते 2009 के 15वीं लोकसभा चुनाव में ही फीका पड़ चुका था। उस चुनाव में सामाजिक न्यायवादी नेताओं के चरित्र में जो बदलाव आया वह आज तक अटूट है।

मंडल के बाद के डेढ़-दो दशकों के चुनावों में सामाजिक न्याय का मुद्दा पर शीर्ष पर रहने के दौरान सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों के साथ-साथ सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि में दलित-पिछड़ों के आरक्षण का मुद्दा जोर-शोर से उठाया जाता रहा,  किन्तु 15 वीं लोकसभा में उसकी जगह ‘गरीब सवर्णों के आरक्षण ‘ने ले लिया।

सत्ता में आने पर गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा, यह आशवासन देने में माया-मुलायम, लालू-पासवान ने एक दूसरे से होड़ लगाया। इस क्रम में उन्होंने पारम्परिक सामाजिक न्याय की जगह 2009 में एक अभिनव सामाजिक न्याय की अवधारणा को जन्म दिया। यह सारी कवायद उन्होंने खुद की छवि जाति-मुक्त नेता के रूप प्रतिष्ठित करने के लिए किया। जाति-मुक्त दिखने के लिए ही उन्होंने 2009 में ही तिलक , तराजू  और तलवार। । भूराबाल साफ़ करो इत्यादि नारों से पूरी तरह पल्ला झाड़ने की कोशिश किया। यह सब शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक –राजनीतिक-धार्मिक –शैक्षिक इत्यादि )पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये भारतीय समाज के विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न वर्ग के खिलाफ उछाले गए वे नारे थे जिनसे सामाजिक अन्याय के खात्मे की उम्मीद जगी थी। यही वे नारे थे जिसने लोहिया और कांशीराम के सपनों को साकार करने का ख्वाब दिखाने वाले नेताओं को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया था। बहरहाल  सामाजिक न्याय की राजनीति के मंद पड़ने की जो प्रक्रिया 2009 में लगभग पूरी हो गयी, उसके पृष्ठ में अन्यतम कारक बने थे बराक ओबामा, इस पर बहुतों को शायद यकीन नहीं होगा, किन्तु यह हकीकत है।

    15वीं लोकसभा के पूर्व से ही बहुजनों के प्रबल समर्थन से पुष्ट सामाजिक न्याय के नायक-नायिकाओं में यह विश्वास पनपने लगा था कि वे प्रधानमन्त्री भी बन सकते हैं। और जब वे प्रधानमन्त्री बनने की सम्भावना पर विचार करने लगे,  उन्हीं दिनों अमेरिका की राजनीति में एक चमत्कार घटित हुआ।

अमेरिका में कभी जिन कालों का पशुवत इस्तेमाल कर मानवता को शर्मसार किया गया था,  उन्हीं नर-पशुओं में से किसी की संतान बराक हुसैन ओबामा को नवम्बर,  2008 में वहां का राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

दुनिया के सर्वाधिक अधिकारविहीन समुदाय के किसी व्यक्ति का दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का राष्ट्राध्यक्ष बनना,  शेष विश्व के साथ भारत के बुद्धिजीवियों को भी रोमांचित किया। तब अतिशय उत्साह में आकर कुछ बुद्धिजीवियों ने यह सवाल उछाल दिया कि जब अमेरिका में अत्यंत अवहेलित तबके का कोई व्यक्ति वहां का राष्ट्रपति बन सकता है तो भारत के उपेक्षित जातियों में से कोई यहां का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकता!

उन्होंने भारत में ओबामा के उदय की सम्भावना के साथ-साथ कुछ ऐसे चेहरे भी चिन्हित कर दिए जो ओबामा बन सकते थे। कहना न होगा आम लोगों की भांति ओबामेनिया की गिरफ्त आये बहुजन नायक –नायिका सचमुच में ओबामा बनने का सपना देखने लगे। यह सपना ही उनके चाल-चलन में ऐसा बदलाव ला दिया जिससे वे आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं ।

   ओबामा एक ऐसे देश में राष्ट्रपति बने थे जहां का शासक वर्ग वहां का गोरा समुदाय है, जिसकी कुल आबादी में हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है और वे खुद 28 प्रतिशत आबादी वाले उस वंचित अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं, जिसमें उनके समुदाय(कालों) की आबादी                  प्रतिशत है। ऐसे में ओबामा के लिए जरूरी था कि वह बहुसंख्य गोरों का समर्थन जय करने के लिए वंचित अल्पसंख्यक समुदाय(रेड इंडियंस, हिस्पैनिक्स, कालों और एशियन पैसिफिक मूल के लोगों) की बेहतरी का मुद्दा जोर-शोर से न उठायें तथा अपने आचरण में ऐसा बदलाव लायें जिससे बहुसंख्य गोरे खुश रहें।

कहना न होगा ओबामा ने 2008 में बहुसंख्य गोरे मतदाताओं को संतुष्ट करने में कोई कमी नहीं किया । अमेरिकी शासक वर्ग का समर्थन जीतने के लिए जो काम अल्पसंख्यक समुदाय के बराक ओबामा ने किया वही काम भारत के शासक वर्ग (सवर्णों) का समर्थन पाने के लिए बहुजन समाज के नायक - नायिकाओं ने करना शुरू किया।

 फलतः लोकसभा चुनाव -2009 में सामाजिक न्यायवादियों में बहुजन समाज(दलित, आदिवासी, पिछड़े और उनसे धर्मान्तरित तबकों) के हितों की अनदेखी और शासक सवर्ण वर्ग का समर्थन पाने की जो होड़ मची, वह आज तक बरक़रार है।

वास्तव में बहुजन नायक-नायिकाओं ने अगर ओबामा की बजाय दक्षिण अफ्रीका के जैकब जुमा को मॉडल बनाया होता, आज न तो उनके खुद का भविष्य संकटग्रस्त होता और न ही सामाजिक न्याय की राजनीति की स्थिति करुणतर होती।

    2009 में जिन दिनों  भारत में लोकसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थीं, उन्हीं दिनों उस दक्षिण अफ्रीका के भी संसदीय चुनाव की तैयारियां चल रही थीं, जिसकी भारत से काफी साम्यता है। भारत में जैसे यहां के शासक वर्ग(सवर्णों) का शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है,  वैसे ही दक्षिण अफ्रीका के 9-10 प्रतिशत गोरों हर क्षेत्र में 80-90 प्रतिशत प्रभुत्व रहा। 2009 में जैसे माया-मुलायम , लालू-पासवान शक्ति के समस्त स्रोतों से वंचित 85 प्रतिशत आबादी की नुमाइन्दगी कर रहे थे , वैसे ही ‘अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस’ के जैकब जुमा अपने देश की 90 प्रतिशत शक्तिहीन आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। किन्तु चुनाव में अपने देश के शासक वर्ग के हितों की परवाह न कर, जुमा ने वंचित आबादी के हितों की इकतरफा हिमायत की । चूंकि चुनाव में जीत बहुसंख्य लोगों से समर्थन से मिलती है इसलिए दक्षिण अफ्रीका के उस चुनाव में अनपढ़ जुमा द्वारा वंचित बहुसंख्य आबादी के हितों की उग्र हिमायत रंग लायी और उन्हें संसद में विपक्ष के 47 मतों के मुकाबले 277 मत मिले।

इस तरह जैकब जुमा ने 2009 में बहुसंख्य आबादी के हितों की इकतरफा हिमायत कर चुनावी सफलता का एक नया इतिहास रचा।

चुनावों में बहुसंख्य आबादी के हितों की उग्र हिमायत कर कम संसाधनों और तमाम प्रतिकूलताओं में भी बड़ी विजय हासिल की जा सकती है, दक्षिण अफ्रीका के जैकब जुमा के बाद खुद ओबामा के देश के डोनाल्ड ट्रंप ने दिखा दिया है।

    डोनाल्ड ट्रंप कोई पेशेवर राजनीतिज्ञ नहीं, एक ऐसे सफल व्यापारी हैं, जो अपनी रंगीन मिजाजी के साथ महिलाओं व वंचित नस्लों के प्रति असभ्य आचरण के लिए कुख्यात रहे। राजनीति से व्यापारी ट्रंप का इतना ही नाता रहा कि वह रिपब्लिकन पार्टी को समय-समय पर चंदा देते रहे। वही ट्रंप जब रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के रूप में डेमोक्रेटिक पार्टी की मंझी हुई राजनीतिक शख्सियत हिलेरी क्लिंट के खिलाफ चुनाव में उतरे, किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। मीडिया तो आखरी वोट पड़ने तक बुरी तरह उनके खिलाफ फिजा बनने में मुस्तैद रही। किन्तु देश-दुनिया और मीडिया की कड़ी आलोचना के बीच ट्रंप अपना सारा ध्यान-ज्ञान अपने देश के बहुजनों (70 प्रतिशत आबादी वाले गोरों ) के हित में एजेंडा सेट करने में लगाये रखे। उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे को अमेरिकी बहुजन ने अपने हित पाया और 8 नवम्बर, 2016 को जब चुनाव परिणाम सामने आया, पाया गया कि व्यापारी ट्रंप अपने प्रतिद्वंदी हिलेरी क्लिंटन के मुकाबले आधी धनराशि खर्च करके दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गए हैं।

क्या ओबामा बनने के चक्कर में सामाजिक न्याय की राजनीति तथा खुद का सर्वनाश करने वाले बहुजन नायक-नायिका डोनाल्ड ट्रंप से भी कुछ प्रेरणा लेंगे!

(  लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)                            

 

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