गोवा, मणिपुर में भयानक राजनीतिक डाकेजनी

जिस ‘नए भारत’ की नींव पड़ने का दावा किया है, उसमें राज्यपालों की मदद से और खरीद-फरोख्त के जरिए, ऐसे ही जनता के जनादेश पर पानी फेरा जा रहा होगा...

 

विधानसभाई चुनाव : कुछ जीत, कुछ लूट !

0 राजेंद्र शर्मा

उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड में हाल में हुए विधानसभाई चुनाव में भाजपा की अभूतपूर्व जीत की कहानी को, उसकी सत्ता की हवस ने कम से कम राजनीतिक-सवैधानिक नैतिकता के स्तर पर डस लिया लगता है। यह वाकई सिर्फ विडंबनापूर्ण ही नहीं बल्कि दु:खद भी है कि विधानसभा चुनाव के ताजातरीन चक्र के बाद, सबसे पहले सरकार न तो उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड में बनी है, जहां भाजपा को अभूतपूर्व तीन-चौथाई बहुमत मिला है और न पंजाब में, जहां कांग्रेस ने दो-तिहाई बहुमत हासिल कर, अकाली-भाजपा गठजोड़ को करारी शिकस्त दी है।

चुनाव के इस चक्र के बाद सबसे पहले गोवा में भाजपा के मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी है, जबकि इस राज्य की जनता ने इस चुनाव में स्पष्टï रूप से भाजपा की सरकार को ठुकराया था और उसके खिलाफ फैसला सुनाया था। उसके अगले ही रोज, मणिपुर में भी ऐसे ही भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार को शपथ दिलायी गयी है, जबकि गोवा की ही तरह इस राज्य में भी भाजपा, विधानसभाई शक्ति में कांग्रेस पार्टी से काफी पीछे ही रह गयी थी।

पंजाब में मजबूर भाजपा

Forced BJP in Punjab

दोनों राज्यों में चुनाव में अपनी स्पष्ट हार को सत्ता पर कब्जे के लिहाज से जीत में तब्दील करने के बाद ही भाजपा, उत्तराखंड तथा उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की कसरत सही मानों में शुरू कर रही होगी। हां! पंजाब में जरूर अकाली-भाजपा गठजोड़ के तीसरे नंबर पर धकेल दिए जाने के बाद भाजपा ने कम से कम फिलहाल सत्ता से बाहर बैठने का जनादेश स्वीकार कर लिया लगता है।

            इस तरह अचरज की बात नहीं है कि विधानसभा चुनाव के ताजा चक्र और खासतौर पर उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड की अभूतपूर्व जीत के बाद, भाजपा द्वारा आयोजित ‘‘अभिनंदन’’ आयोजन में अपने संबोधन में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी व नेताओं में ‘जीत के भार से विनम्रता’ आने का जो दावा और वादा किया था, उनके दूसरे अनेकानेक दावों तथा वादों की तरह बिल्कुल खोखला साबित हुआ है।

चुनाव (जीत) चुराने’’ की नंगी जोड़-तोड़

The unwise junk to steal the election (win)

जैसा कि हमने शुरू में ही इशारा किया, ठीक उसी सयम जब प्रधानमंत्री इस जीत से ‘नए भारत’ की नींव पड़ने और अपनी पार्टी में ‘और विनम्रता’ आने के दावे कर रहे थे, उनकी अपनी पार्टी के नेतागण, खुद उनके ही इशारे पर, जहां भी दांव लग जाए येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाने की सर्वभक्षी हवस का परिचय देते हुए, गोवा और मणिपुर में, कांग्रेस नेता पी चिदंबरम के शब्दों का सहारा लें तो, ‘‘चुनाव (जीत) चुराने’’ की नंगी जोड़-तोड़ में लगे हुए थे।

इन दोनों राज्यों में राजभवन में बैठाए गए भाजपायी नेताओं ने हर कीमत पर अपनी पार्टी की सेवा करने की जैसी तत्परता दिखाई है, उसके साथ जुडक़र यह जोड़-तोड़ सत्ता पर डाकेजनी का ही मामला बन जाती है।

            अचरज की बात नहीं है कि गोवा के मामले में कांग्रेस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा है।

याद रहे कि इससे पहले, अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड में दलदबल के जरिए और राज्यपालों की मदद से, अपनी सरकार थोपने की भाजपा की ऐसी ही कोशिशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को बाकायदा हस्तक्षेप करना पड़ा था।

उत्तराखंड में तो अदालत के हस्तक्षेप के बाद, बाकायदा कांग्रेस की सरकार की बहाली भी हुई थी।

हालांकि, मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री मनोनीत किए जाने और उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई किए जाने के दिन ही शाम में शपथ दिलाए जाने के राज्यपाल के निर्णय पर सीधे-सीधे रोक नहीं लगायी, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय के अड़तालीस घंटे में यानी बृहस्पतिवार की सुबह विधानसभा में बहुमत का फैसला कराए जाने के निर्णय के बाद, राज्यपाल का उक्त फैसला अवहनीय हो जाता है।

याद रहे कि राज्यपाल ने पर्रिकर को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने के लिए पंद्रह दिन का समय देने का भी फैसला लिया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पलट दिया। यह दूसरी बात है कि सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले के बाद भी भाजपा, पर्रिकर को सदन में बहुमत के फैसले से पहले ही मुख्यमंत्री बनवाने पर बजिद बनी रही। आखिर, वह अच्छी तरह से जानती है कि बहुमत साबित करने की तलवार सिर पर लटकी होने के बावजूद, अपना दावेदार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाना, अल्पमत को बहुमत में तब्दील करने में कितना मददगार हो सकता है। इसके बाद भी भाजपा अगर गोवा विधानसभा में जरूरी संख्या दिखाने में नाकामयाब रहती, तो ही अचरज की बात होती।

भाजपा ने सौदे से संख्या का जुगाड़ किया

मुख्यमंत्री के रूप में पर्रिकर के साथ, भाजपा के दो विधायकों के अलावा गोवा फारवर्ड के सभी तीन तथा एमजीपी के दो विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों को भी मंत्रिपद की शपथ दिलाए जाने से, इसका भी अंदाजा लग जाता है कि भाजपा ने किस सौदे से संख्या का जुगाड़ किया है। अल्पमत को जोड़-तोड़ से बहुमत में तब्दील करने की यही कहानी मणिपुर में भी दोहरायी जाने वाली है।

गोवा में भयानक राजनीतिक डाकेजनी

जाहिर है कि गोवा के मामले में यह राजनीतिक डाकेजनी इसलिए और भी भयानक हो जाती है कि 2017 के विधानसभाई चुनाव में गोवा की जनता ने साफ तौर पर भाजपा के खिलाफ जनादेश दिया है। एक तिहाई से भी कम वोट और 40 सदस्यों की विधानसभा में सिर्फ 13 सीटें देकर गोवा की जनता ने साफ तौर पर इस चुनाव में भाजपा को राज्य में सत्ता से बाहर करने का ही इरादा जताया है। पिछली भाजपायी सरकार के मुख्यमंत्री की दोनों सीटों पर हार और सात मंत्रियों की भी चुनाव में हार, इसी सचाई को और बलपूर्वक रेखांकित करती है। इसके ऊपर से गोवा की जनता ने भाजपा की प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को 17 सीटें देकर, स्पष्टï रूप से उसके पक्ष में फैसला भले न सुनाया हो, फिर भी उसके प्रति कम से कम भाजपा से ज्यादा झुकाव तो दिखाया ही है।

बेशक, जनादेश के व्यापक अर्थों में देखें तो मणिपुर की जनता के त्रिशंकु विधानसभा के चुनाव में उसी तरह से पिछली कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनादेश देखा जा सकता है। हालांकि, इस तथ्य को भी नहीं भुलाया जा सकता है कि मणिपुर में भी साठ सदस्यीय विधानसभा में 28 सीटें हासिल कर कांग्रेस पार्टी, 21 सीटें हासिल करने वाली अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा से बहुत आगे ही नहीं रही है, अपने बूते बहुमत से भी तीन ही सीटें पीछे रही है।

दोनों ही मामलों में स्पष्ट रूप से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आने के बाद और उसका मुकाबला किसी चुनाव-पूर्व गठबंधन से न होने के चलते, सरकार बनाने का पहला मौका कांग्र्रेस को ही मिलना चाहिए था, जैसी कि केंद्र-राज्य संबंधों पर विचार के लिए गठित सरकारिया आयोग की दो-टूक सिफारिश थी और आगे चलकर पंछी आयोग ने जिसकी पुष्टिï की थी।

            लेकिन, जनतंत्र और जनादेश के तकाजों को ताक पर रखकर भाजपा के किसी भी तरह से गोवा में दोबारा पर काबिज होने के लिए कमर कसे होने का पता तो तभी चल गया था, जब चुनाव नतीजे आते-आते खुद भाजपा अध्यक्ष, अमित शाह ने इसका एलान कर दिया था कि गोवा में और मणिपुर में भी, भाजपा सरकार बना लेगी।

इन तिकड़मों के संघ-भाजपा में शीर्ष स्तर से संचालित होने का सबूत पेश करते हुए, भाजपा संसदीय दल की चुनाव के फौरन बाद हुई बैठक के बाद, यह एलान किया गया था कि जिन पांच राज्यों में चुनाव हुआ था उनमें से सिर्फ गोवा के मामले में अपवादस्वरूप, भाजपा विधायक दल के नेता तथा उसकी ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम हाथों-हाथ तय कर दिया गया था और यह नाम था, रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर का।

उत्तरप्रदेश तथा उत्तराखंड में तीन-चौथाई बहुमत से जीत के बावजूद, विधायक दल का नेता सबसे पहले अगर गोवा के मामले में ही तय किया गया तो इसीलिए कि छोटी पार्टियों तथा विधायकों की खरीद-फरोख्त के लिए, ‘नेता’ के सवाल पर स्पष्टता बहुत जरूरी होती है।

आखिरकार, विभिन्न रूपों में समर्थन की कीमत उसके जरिए ही तो वसूली जानी है। इस तरह, जिस गोवा में जनता ने स्पष्ट रूप से भाजपायी सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया था, वहीं भाजपा ने जैसे जनादेश को अंगूठा दिखाते हुए, सबसे पहले अपनी सरकार बनाकर दिखाई है।

ये कौन से ‘नए भारत’ की नींव डाल रहे मोदी ?

            जाहिर है कि इस सबने भाजपा की जीत की नैतिक चमक को तो काफी फीका कर ही दिया है। यह इसके बावजूद है कि खासतौर पर इलैक्ट्रोनिक मीडिया के बड़े हिस्से ने दो राज्यों में चुनाव में हार के बावजूद सत्ता हथियाने के लिए भाजपा की इस बेशर्म जोड़-तोड़ को, कांग्रेस के लद्दड़पन के मुकाबले उसकी राजनीतिक ‘तेजी’ का मामला बनाकर, उसकी कामयाबी का ही साक्ष्य बनाने की कोशिश की है।

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ने विधानसभाई चुनाव के वर्तमान चक्र से जिस ‘नए भारत’ की नींव पड़ने का दावा किया है, उसमें राज्यपालों की मदद से और खरीद-फरोख्त के जरिए, ऐसे ही जनता के जनादेश पर पानी फेरा जा रहा होगा। लेकिन, यह नया भारत होगा या सत्ता पर कांग्रेस की इजारेदारी के जमाने का साठ और सत्तर के दशकों का पुराना भारत!                                              0

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