उत्तरप्रदेश : ज़रूरतों और सुरक्षा के लिए वोट

अतिथि लेखक

-इरफान इंजीनियर

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं। समाजवादी पार्टी, जिसे यह उम्मीद थी कि कांग्रेस के साथ उसके गठबंधन से अखिलेश यादव एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बन सकेंगे, के स्वप्न धूल में मिल गए हैं। चुनाव के पहले अखिलेश यादव अपने पारिवारिक विवाद में विजयी हुई थे। उन्होंने अपने चाचा शिवपाल यादव को किनारे कर दिया था और उनके पिता को मजबूर होकर पार्टी की बागडोर उन्हें सौंपनी पड़ी थी। सपा-कांग्रेस गठबंधन ने विकास के नाम पर वोट मांगे।

पारंपरिक रूप से सपा, मुसलमानों और यादवों के वोटों पर निर्भर रही है। अखिलेश को उम्मीद थी कि उन्हें यादवों और मुसलमानों के अलावा, युवाओं के एक तबके का समर्थन भी हासिल हो सकेगा। उन्हें लग रहा था कि विद्यार्थियों को लैपटॉप बांटने और राज्य में आपात स्थिति के लिए निःशुल्क एंबुलेंसों की सेवा उपलब्ध करवाने जैसे जनकल्याण कार्यक्रमों से उन्हें चुनाव में लाभ होगा।

भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में सपा के विकास के दावों का मखौल बनाया और ज़ोर देकर कहा कि केवल वह ही उत्तरप्रदेश का विकास कर सकती है।

भाजपा में स्पष्ट श्रम विभाजन था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी युवाओं को आकर्षित करने के लिए विकास के एजेंडे की बातें कर रहे थे।

प्रधानमंत्री ने अपने जुमलों से लोगों की महत्वाकांक्षाएं जगाईं। उन्होंने बार-बार यह कहा कि सपा सरकार विकास के मोर्चे पर असफल सिद्ध हुई है और उनकी पार्टी, राज्य को विकास की राह पर ले जाएगी। उन्होंने रोज़गार के अवसरों के सृजन, औद्योगिक निवेश व आधारभूत संरचना के विकास में सरकार की असफलता को रेखांकित किया।

इसके समानांतर, भाजपा और आरएसएस के कट्टर नेता मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने के लिए हर संभव प्रयास करते रहे।

भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने दावा किया कि हिन्दुओं को शामली जिले के मुस्लिम-बहुल कैराना कस्बे से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा क्योंकि मुस्लिम आपराधिक गिरोह उनसे ज़बरन वसूली करते थे।

साक्षी महाराज बार-बार यह कहते रहे कि मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर बहुत अधिक है और इसके कारण देर-सबेर उनकी आबादी हिन्दुओं से ज्यादा हो जाएगी।

संगीत सोम और सुरेश राणा, मुसलमानों पर गोवध करने का आरोप लगाते रहे और यहां तक कि उन्होंने दादरी में मोहम्मद अखलाक को पीट-पीटकर जान से मार देने की घटना को भी उचित ठहराया। वे यह भी कहते थे कि मुसलमान युवक, हिन्दू लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते हैं और उन्हें अपने प्रेमजाल में फंसा कर मुसलमानों की आबादी को बढ़ाने में योगदान देते हैं।

भाजपा नेताओं ने मुंहज़बानी तलाक और समान नागरिक संहिता के मुद्दों का इस्तेमाल भी मुसलमानों का दानवीकरण करने के लिए किया। भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे को भी पुनर्जीवित करने की कोशिश की।

मुसलमानों के दानवीकरण के कारण, उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है।

उत्तरप्रदेश में सबसे बड़ी संख्या में सांप्रदायिक दंगे होते आए हैं और कोई भी चुनाव नज़दीक आने पर उनकी संख्या में तेज़ी से वृद्धि होती है। राज्य के मुज़फ्फरनगर में 2013 में हुए दंगों में 64 लोग मारे गए थे और लगभग डेढ़ लाख मुसलमानों को अपने घर से बेघर होना पड़ा था।

सन 2016 में देश भर में सांप्रदायिक हिंसा में आठ लोगों की जानें गईं। इनमें से छह उत्तरप्रदेश में मारे गए। पिछले साल देश में हुईं सांप्रदायिक हिंसा की 62 घटनाओं में से 18 उत्तरप्रदेश में हुईं। यह किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा थीं। इनमें से अधिकांश घटनाएं पश्चिमी उत्तरप्रदेश में हुईं।

सांप्रदायिक हिंसा ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सामाजिक तानेबाने को छिन्नभिन्न कर दिया है। जाट और मुसलमान, जो लंबे समय से मिलजुल कर रहते आए थे, एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं।

भाजपा नेताओं पर दंगे भड़काने और हिंसक भीड़ का नेतृत्व करने के आरोप भी हैं। मुज़फ्फरनगर के सिलसिले में संगीत सोम और बिजनौर में हुए दंगों के सिलसिले में इस्मारिया चौधरी पर आरोप हैं।

भाजपा नेता बार-बार यह कहते हैं कि मुसलमान, हिन्दुओं के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। ऐसा कर भाजपा ने स्वयं को ‘हिन्दू हितों’ के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया और वह सभी जातियों और वर्गों के हिन्दुओं का समर्थन हासिल करने में कामयाब रही। भाजपा को जातिगत ऊँचनीच से कोई परेशानी नहीं है। वह हिन्दुओं के जातिगत पदक्रम और उच्च जातियों के वर्चस्व को बनाए रखना चाहती है। जाहिर है कि ऐसा कर वह दलितों और ओबीसी के दमित वर्गों की समानता की लड़ाई को कमजोर कर रही है।

बसपा ने दलितों और मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से उसने 98 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए। उत्तरप्रदेश में विधानसभा की 403 सीटे हैं। इस तरह बसपा के मुसलमान उम्मीदवारों का प्रतिशत लगभग 24 था, यद्यपि राज्य में मुसलमान, कुल आबादी का केवल 18 प्रतिशत हैं।

पश्चिमी उत्तरप्रदेश की यात्रा

सीएसएसएस की एक टीम ने 4-5, फरवरी 2017 को पश्चिमी उत्तरप्रदेश की यात्रा कर यह समझने का प्रयास किया कि विभिन्न पार्टियां वहां किस तरह अपना समर्थन जुटाने के लिए काम कर रही हैं और इससे विभिन्न समुदायों के अंतर्संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

इस यात्रा का उद्देश्य चुनावी सर्वेक्षण करना नहीं था और ना ही हम चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करना चाहते थे। हमने विभिन्न जातियों और समुदायों के लोगों के समूहों से बातचीत की और यह पता लगाने की कोशिश की कि वे किस आधार पर यह तय करेंगे कि वे किस पार्टी को वोट दें।

मुसलमानों में उतनी ही विविधता है, जितनी कि किसी अन्य समुदाय में

जल्दी ही हमें यह स्पष्ट हो गया कि मुसलमान एकसार समुदाय नहीं हैं और ना ही वे एकतरफा मतदान करते हैं। न तो मुसलमानों ने पिछले चुनाव में वोट बैंक के रूप में अपना मत दिया था और ना ही इस चुनाव में वे ऐसा करने वाले थे। मुसलमानों में उतनी ही विविधता है, जितनी कि किसी अन्य समुदाय में। वे जातिगत व वर्गीय आधारों पर विभाजित हैं। उनकी राजनैतिक पसंद, उनके धर्म पर नहीं बल्कि उनकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है।

पिछले चुनाव में शामली जिले के थाना बावना विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के सुरेश राणा चुनाव जीते थे। इस क्षेत्र में मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत लगभग 55 है। मुस्लिम मत राष्ट्रीय लोकदल के अब्दुल वारिस खान और समाजवादी पार्टी की किरण पाल के बीच विभाजित हो गए। मुस्लिम मतदाता जातिगत आधार पर भी बंटे हुए हैं। मुसलमानों की राजपूत, जाट और गुर्जर बिरादरियां हैं।

मुसलमानों और जाटों से बातचीत करने पर हमें ऐसा लगा कि वे 2013 के दंगों की स्मृतियों को अपने दिल से निकाल देना चाहते हैं।

जाटों का कहना था कि भाजपा नेताओं ने उन्हें गुमराह किया था। उन्होंने दोनों समुदायों के नजदीकी रिश्तों की याद दिलाई।

उन्होंने कहा कि वे पीढ़ियों से एक-दूसरे के घरों में विवाह समारोहों, अंतिम संस्कारों और त्यौहारों में हिस्सा लेते आए हैं और उनके सांझा सांस्कृतिक मूल्य हैं। इनमें शामिल हैं महिलाओं को पर्दे में रखना (पर्दा अलग-अलग तरह का हो सकता है), गांव के अंदर शादी न करना और महिलाओं को सीमित स्वतंत्रता देना। दोनों समुदाय कृषकों के सामने उपस्थित समस्याओं के बारे में एकमत थे।

जाट, सरकारों द्वारा किसानों की उपेक्षा और विशेषकर नोटबंदी से दुःखी थे। उनके लिए मूल मुद्दा यह है कि उन्हें उनकी फसल की उचित कीमत मिलती है या नहीं। उनका यह कहना था कि पिछले दो-तीन वर्षों में उनकी आय में बहुत कमी आई है और इस कारण वे कर्जे चुकाने में असमर्थ हैं। ऐेसे में उनका कर्ज माफ करने के नारे से आकर्षित होना स्वाभाविक है।

जिन मुसलमानों से हमने बातचीत की वे भी, कम से कम चुनाव तक, साम्प्रदायिक विवाद के मुद्दे को परे रखना चाहते थे। जाटों की तरह वे भी इस प्रचार से सहमत नहीं थे कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को दूरगामी लाभ होंगे। हमने मुसलमानों के दो समूहों से बात की - पहला राजपूत मुसलमानों का और दूसरा दलित मुसलमानों का। राजपूत, राष्ट्रीय लोकदल के पक्के समर्थक थे और चाहते थे कि इस पार्टी के अच्छे दिन वापिस आएं। उनका कहना था कि इसके लिए जाटों और मुसलमानों की एकता जरूरी है।

सपा-कांग्रेस गठबंधन के समर्थकों की संख्या भी कम नहीं थी। उनका कहना था कि अखिलेश सरकार ने राज्य का विकास किया है। जब हमने उनसे इस बाबत अधिक जानकारी चाही तो उन्होंने लैपटाप बांटे जाने, अच्छी सड़कों के निर्माण, बिजली की आपूर्ति की व्यवस्था में सुधार और निःशुल्क एंबूलेंस सेवा की चर्चा की।

गरीब और मजदूर वर्ग के मुसलमान, बसपा के साथ खड़े दिखे।

बसपा को दलितों की पार्टी माना जाता है और इसलिए ऊँची जाति के राजपूत मुसलमान उसके साथ जुड़ने को तैयार नहीं नजर आए। जब साम्प्रदायिक स्थितियां सामान्य रहती हैं तब राजपूत मुसलमान, जाटों और हिन्दू राजपूतों के साथ खड़े दिखते हैं। साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने पर वे पिछड़े मुसलमानों के नजदीक आ जाते हैं।

हमने सैनी और राजपूत जैसे ऊँची जातियों के हिन्दुओं से भी बातचीत की। उनके लिए चुनाव के मुद्दे जाटों और मुसलमानों से अलग थे। उनका कहना था कि चूंकि सपा सरकार का नेतृत्व मुख्य रूप से पूर्वी उत्तरप्रदेश से आता है इसलिए इस पार्टी की सरकार ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश की उपेक्षा की। नौकरियां पाने वालों में अधिकांश पूर्वी उत्तरप्रदेश के यादव और मुसलमान थे। सरकारी ठेकों में भी सत्ताधारी परिवार के सदस्यों ने जमकर कमाई की जबकि पश्चिमी उत्तरप्रदेश के निवासियों को कोई लाभ नहीं हुआ। उनका कहना था कि राज्य सरकार ने उनके साथ अन्याय किया।                     

युवा मतदाता, शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण को अपने लिए समस्या बता रहे थे। उनका कहना था कि आरक्षण उच्च जातियों के युवाओं के साथ भेदभाव है। वे चाहते थे कि आरक्षण का आधार केवल आर्थिक होना चाहिए। वे भाजपा के समर्थक नजर आए। उनका कहना था कि भाजपा की सरकार में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के नेताओं का दबदबा होगा और इसलिए इस क्षेत्र को फायदा होगा। इनमें से किसी भी समूह ने न्याय या समानता की बात नहीं की। वे सभी यह कह रहे थे कि सपा सरकार में उनके साथ भेदभाव हुआ और इसलिए भाजपा सरकार में पूर्वी उत्तरप्रदेश के साथ भेदभाव होना चाहिए। उनकी बातों का लब्बोलुआब यह था कि पहले सपा और उसके साथी दलों के नेताओं ने लाभ उठाया और अब उनकी बारी है।

उन्होंने यह भी कहा कि नोटबंदी एक अच्छा कदम था यद्यपि इससे कुछ समय तक लोगों को तकलीफ हुई। उनकी यह स्पष्ट मान्यता कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार, आतंकवाद और कालेधन में कमी आएगी।

निष्कर्ष

लोगों से हमारी बातचीत के आधार पर हमें लगा कि कोई जाति या समुदाय वोट बैंक नहीं है। सभी जातियों और समुदायों में विविधताएं हैं और उनकी राजनैतिक पसंद, धार्मिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों पर निर्भर करती है। केवल धर्म यह निर्धारित नहीं करता कि कोई व्यक्ति किस पार्टी को वोट देगा। जिन तीन कारकों की लोगों की राजनैतिक पसंद के निर्धारण में भूमिका होती है वे हैं-आवश्यकताएं, लालच व सुरक्षा। जिन लोगों की मूल आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं वे सरकारी कल्याण योजनाओं पर निर्भर रहते हैं। देश में गरीबों की संख्या इतनी अधिक है कि कोई भी सरकार उनकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती। दलित, आदिवासी व भूमिहीन उन पार्टियों या व्यक्तियों का साथ देते हैं जिनके बारे में उन्हें ऐसा लगता है कि वे सरकार से मदद पाने में उनकी सहायता कर सकते हैं।

जिन लोगों की मूल आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं वे और धन और विशेषाधिकार चाहते हैं। वे उन उम्मीदवारों को वोट देते हैं जो उनकी दृष्टि में उन्हें आर्थिक रूप से संपन्न बनाने में उनकी मदद कर सकते हैं। जातिगत व साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार व वे लोग जो सुरक्षा बलों की ज्यादतियां भुगतते हैं, उनके लिए सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है। वे उस पार्टी या नेता को वोट देते हैं जो उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देता है।

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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