बसपा की जाति की राजनीति ने हिंदुत्व को कमज़ोर करने की बजाये उसे मज़बूत ही किया !

बसपा की जाति की राजनीति अवसरवादिता, सिद्धान्हीनता, दलित हितों की उपेक्षा और भ्रष्टाचार का शिकार हो कर विफल हो चुकी है. अतः इस परिपेक्ष्य में दलितों को अब एक नए रैडिकल राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता है...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स
  • दलित राजनीति की विफलता और विकल्प
  • बसपा के पतन के लिए आज नहीं तो कल मायावती को जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी

एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंटहाल में उत्तर प्रदेश के चुनाव ने दर्शाया है कि दलित राजनीति एक बार फिर बुरी तरह से विफल हुयी है. इस चुनाव में बहुमत से सरकार बनाने का दावा करने वाली दलितों की तथाकथित बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 403 में से केवल 19 सीटें ले कर तीसरे नंबर पर रही है. यद्यपि 2009 (लोक सभा) और 2012 (विधान सभा) चुनाव में इस पार्टी का अवसान बराबर दिखाई दे रहा था, परन्तु 2014 के लोक सभा चुनाव में इसका पूरी तरह से सफाया हो गया था और इसे एक भी सीट नहीं मिली थी. इसी तरह 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में भी लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 23% पर पहुँच गया है। यद्यपि बसपा सुप्रीमो मायावती ने बड़ी चतुराई से इस विफलता का मुख्य कारण ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी बता कर अपनी जिम्मेदारी पर पर्दा डालने की कोशिश की है, परन्तु उनकी अवसरवादिता, भ्रष्टाचार, तानाशाही, दलित हितों की अनदेखी और जोड़तोड़ की राजनीति के हथकंडे किसी से छिपे नहीं हैं. बसपा के पतन के लिए आज नहीं तो कल उन्हें जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी.

दलित राजनीति की विफलता का यह पहला अवसर नहीं है. इससे पहले भी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया इसी प्रकार की विफलता का शिकार हो चुकी है. जब तक यह पार्टी डॉ. आंबेडकर की विचारधारा का अनुसरण करती रही, तब तक यह फलती फूलती रही, परन्तु जैसे ही यह नेताओं के व्यक्तिवाद, अवसरवाद और मुद्दाविहिनता का शिकार हुयी, इसका पतन शुरू हो गया और अब यह खंड खंड हो चुकी है. पूर्व में उत्तर प्रदेश में भी इस पार्टी की शानदार उपलब्धियां रही हैं. 1962 में उत्तर प्रदेश में इस पार्टी के 4 सांसद और 8 विधायक थे तथा 1967 में इसका एक सांसद और 10 विधायक थे. उसके बाद इसका विघटन शुरू हो गया.  उस दौरान पार्टी का एक प्रगतिशील एजंडा था और यह संघर्ष और जनांदोलन में विश्वास रखती थी. इस पार्टी ने ही 1964 में 6 दिसंबर से देशव्यापी भूमि आन्दोलन शुरू किया था. इस आन्दोलन में 3 लाख से अधिक आन्दोलनकारी गिरफ्तार हुए थे और तत्कालीन कांग्रेस सरकार को इसकी सभी मांगें माननी पड़ी थीं, जिस में भूमि आवंटन मुख्य मांग थी.

इसके बाद कांग्रेस ने इसके नेताओं की व्यक्तिगत कमजोरियों का लाभ उठा कर तथा उन्हें पद तथा अन्य लालच देकर तोड़ना शुरू कर दिया. परिणामस्वरूप 1970 तक आते आते यह पार्टी कई टुकड़ों में बंट गयी और आज इसके नेता व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अलग अलग पार्टियों से समझौते करके अपना पेट पाल रहे हैं.

अब अगर उत्तर भारत ख़ास करके उत्तर प्रदेश में बसपा के उत्थान को देखा जाये तो यह एक तरीके से आरपीआई के पतन की प्रतिक्रिया का ही परिणाम था.

कांशीरामजी ने आरपीआई के अवशेषों पर ही बसपा का नवनिर्माण किया था.

वास्तव में शुरू में आरपीआई के अधिकतर कार्यकर्ता ही इसमें शामिल हुए थे और दलितों के मध्यवर्ग का इसे बड़ा सहयोग मिला था. 1993 में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से इसे बड़ी सफलता मिली थी और सपा बसपा की सरकार बनी थी.

उस समय दलितों, पिछड़ों और मुसलामानों का एक शक्तिशाली गठबंधन बना था और इसका सन्देश पूरे भारत में गया था. परन्तु दुर्भाग्य से कुछ निजी स्वार्थों के कारण यह गठबंधन जल्दी ही टूट गया.

इस परिघटना की सबसे घातक बात यह थी कि इसमें दलितों की घोर विरोधी पार्टी भारतीय जनता पार्टी से समर्थन लिया गया था. इसके बाद भी इसी प्रकार दो बार फिर भाजपा से गठजोड़ किया गया, जोकि मायावती के व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए तो ठीक था परन्तु दलित हितों के लिए घातक था. इससे दलितों में एक दिशाहीनता का विकास हुआ और वे दोस्त और दुश्मन का भेद करना भूल गए. जिस ब्राह्मणवादी विचारधारा से उनकी लड़ाई थी उसी से उन्हें दोस्ती करने के लिए आदेशित किया गया.

बाद में मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, बदमाशों, माँफियायों और दलित उत्पीड़कों के हाथों बेच दिया जिनसे उनकी लड़ाई थी.

कभी भी अपना दलित एजंडा घोषित नहीं किया बसपा ने

यद्यपि बसपा चार बार सत्ता में आई, परन्तु उसने कभी भी अपना दलित एजंडा घोषित नहीं किया. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि तथाकथित दलित सरकार तो बनी परन्तु दलितों के सशक्तिकरण के लिए कोई भी योजना लागू नहीं की गयी. इसके फलस्वरूप दलितों का भावनात्मक तुष्टिकरण तो हुआ और उनमें कुछ हद तक स्वाभिमान भी जाग्रत हुआ परन्तु उनकी भौतिक परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं आया है.

सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना -2011 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण भारत में 56% परिवार भूमिहीन हैं जिन में से लगभग 73% दलित तथा 79%  आदिवासी परिवार हैं. ग्रामीण दलित परिवारों में से 45% तथा आदिवासियों में से 30% परिवार केवल हाथ की मजदूरी करते हैं. इसी प्रकार ग्रामीण दलित परिवारों में से 18.35% तथा आदिवासी परिवारों में 38% खेतिहर हैं. इस जनगणना से एक यह बात भी उभर कर आई है कि हमारी जनसँख्या का केवल 40% हिस्सा ही नियमित रोज़गार में है और शेष 60% हिस्सा अनियमित रोज़गार में है जिस कारण वे अधिक समय रोज़गारविहीन रहते हैं.

सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना से यह भी उभर कर आया है कि ग्रामीण क्षेत्र में दलितों की दो सबसे बड़ी कमजोरियां हैं: एक है भूमिहीनता और दूसरी है केवल हाथ का श्रम.

दलितों को कमज़ोर तथा आश्रित बना कर रखना मायावती की राजनीति का हिस्सा

यह बड़े खेद की बात है कि यद्यपि मायावती उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्य मंत्री रही हैं, परन्तु उन्होंने 1995 के काल को छोड़ कर दलितों को न तो भूमि आवंटन किया और न ही ज़मीनों पर कब्ज़े ही दिलवाए. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि ग्रामीण दलित आज भी भूमि मालिकों पर मजदूरी, टट्टी पेशाब तथा जानवरों के लिए घास- पट्ठा के लिए आश्रित हैं. इस कमजोरी के कारण वे अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का भी प्रभावी ढंग से प्रतिकार नहीं कर पाते. ऐसा लगता है कि शायद दलितों को कमज़ोर तथा आश्रित बना कर रखना मायावती की राजनीति का हिस्सा रहा है.

यह देखा गया है कि जब से देश में नवउदारवादी नीतियाँ लागू हुयी हैं, तब से दलित इसका सबसे बड़ा शिकार हुए हैं. कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश की कटौती का सबसे बुरा असर दलितों पर ही पड़ा है. 

देश में रोज़गार सृजन की गति में गिरावट भी दलितों के लिए बहुत घातक सिद्ध हुयी है. निजीकरण के कारण सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी निष्प्रभावी हो गया है. परन्तु मायावती ने दलितों पर पड़ने वाले इन दुष्प्रभावों को पूरी तरह से नज़रंदाज़ किया है.

दरअसल मायावती भी दलितों के साथ उसी प्रकार की राजनीति करती रही है जैसीकि मुख्यधारा की पार्टियाँ करती आई हैं. उसने भी दलितों को स्वावलंबी बनाने तथा उनका सशक्तिकरण करने की बजाये केवल प्रतीकों की राजनीति करके अपने वोट बैंक के तौर पर ही देखा है.

मायावती के इस रवैये के कारण भी दलितों का उससे मोहभंग हुआ है.

बसपा की जाति की राजनीति ने हिंदुत्व को कमज़ोर करने की बजाये उसे मज़बूत ही किया है जिसका लाभ भाजपा ने उठाया है. इसी कारण वह दलितों की कई उपजातियों को हिंदुत्व में समाहित करने में सफल हुयी है.

यह भी विदित है कि जाति जोड़ने की नहीं बल्कि तोड़ने की प्रक्रिया है.  अतः जाति की राजनीति की भी यही परिणति होना स्वाभाविक है. बसपा के साथ भी यही हुआ है.

एक तरफ जब यह बात जोरशोर से प्रचारित की गयी कि बसपा मुख्यतया चमारों और जाटवों की पार्टी है तो दलितों की अन्य उपजातियों का प्रतिक्रिया में जाना स्वाभाविक था. पिछले कई चुनावों  से यही होता आया है. उत्तर प्रदेश में दलितों की अधिकतर उपजातियां बसपा से अलग हो कर भाजपा, सपा तथा कांग्रेस की तरफ चली गयी हैं. कुछ हद तक जाटव और चमार वोट भी बसपा से अलग हो गया है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि उत्तर भारत में बसपा की जाति की राजनीति अवसरवादिता, सिद्धान्हीनता, दलित हितों की उपेक्षा और भ्रष्टाचार का शिकार हो कर विफल हो चुकी है. अतः इस परिपेक्ष्य में दलितों को अब एक नए रैडिकल राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता है. यह विकल्प जातिहित से ऊपर उठकर वर्गहित पर आधारित होना चाहिए ताकि इसमें सभी वर्गों के समान परिस्थितियों वाले कुदरती दोस्त लोग बिना किसी जातिभेद के शामिल हो सकें. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इस दिशा में पहल की है. आप इसके संविधान, नीतियों एवं कार्यक्रमों के बारे में www.aipfr.org पर विस्तार से पढ़ सकते हैं.

 

 

 

 

 

 

 

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