यूपी में योगी राज के निहितार्थ

मोदी, जो कहते हैं उससे ठीक उल्टा कर के दिखाने के माहिर हैं। इसीलिए, अचरज की बात नहीं है कि उन्होंने ‘‘नये भारत’’ के निर्माण की बतकही करते-करते, अचानक योगी आदित्यनाथ के सिर पर उप्र का ताज रख दिया......

0 राजेंद्र शर्मा

नरेंद्र मोदी, जो कहते हैं उससे ठीक उल्टा कर के दिखाने के माहिर हैं। इसीलिए, अचरज की बात नहीं है कि उन्होंने ‘‘नये भारत’’ के निर्माण की बतकही करते-करते, अचानक योगी आदित्यनाथ के सिर पर उत्तर प्रदेश का ताज रख दिया है। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद बार-बार यह सवाल पूछा जा रहा है और खुद भाजपा के अनेक हिस्सों समेत विभिन्न हलकों से यह सवाल पूछा जा रहा है कि आदित्यनाथ क्यों? अपनी उग्र और मुखर हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक छवि के साथ आदित्यनाथ ही क्यों?

इस सवाल में अक्सर यह संकेत छुपा रहता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगियों समेत 325 सीटों की अभूतपूर्व सफलता के बाद और खुद प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर लड़े गए चुनाव में ऐसी सारी उम्मीदों से बड़ी सफलता के बाद, उनके राजनीतिक वजन में और भारी बढ़ोतरी होने के बावजूद, उन्होंने आदित्यनाथ का ही चुनाव क्यों किया?

वास्तव में इसमें शुरू में ही कम से कम इतना तो और जोड़ा ही जा सकता है कि ऐसा तो हर्गिज नहीं है कि संघ-मोदी जोड़ी को देश के सबसे ज्यादा आवादी वाले और राजनीतिक रूप से अति-महत्वपूर्ण राज्य का प्रशासन, आदित्यनाथ के हाथों में सोंपे जाने की संभावित समस्याओं का अनुमान ही नहीं हो। वर्ना आदित्यनाथ के दाएं-बाएं, दो-दो उप-मुख्यमंत्रियों को नहीं लगाया गया होता--केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा।

इसी प्रकार अब तक के भाजपा के दो-दो राष्ट्रीय प्रवक्ताओं--श्रीकांत शर्मा तथा सिद्धार्थनाथ सिंह--को मंत्रिमंडल में शामिल करा, उन्हें पहले ही दिन मंत्रिमंडल की ओर प्रवक्ता घोषित नहीं कराया गया होता।

इसलिए, हजार सवालों का एक सवाल यह कि इस चुनाव के संभावित खतरों को जानते हुए भी, आदित्यनाथ को क्यों चुना गया?

यहां इतना और जोड़ दें कि आदित्यनाथ के आमतौर पर बागी तेवरों के बावजूद और उनके मुख्यमंत्री बनाए जाने के पक्ष में लखनऊ में भाजपा मुख्यालय पर हुए प्रदर्शनों के बावजूद, यह मानना बहुत मुश्किल है कि मुख्यमंत्री पद पर किसी और को बैठाए जाने की सूरत में, उनकी नाराजगी के डर की उनके राज्याभिषेक के फैसले में कोई खास भूमिका रही होगी।

                क्यों के सवाल के दो ही संभावित उत्तर नजर आते हैं, जो वास्तव में इतने घनिष्ठï रूप से आपस में जुड़े हुए हैं कि उन्हें एक भी माना जाता है। पहला यह कि योगी आदित्यनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी छवि नजर आती है।

यह सच है कि नरेंद्र मोदी की तरह आदित्यनाथ आरएसएस के प्रचारक नहीं रहे हैं। वास्तव में उनके रिश्ते शायद आरएसएस से तो कम किंतु भाजपा से ज्यादा, असहज से ही रहे हैं। कथित हिंदुत्व परिवार में अपनी मुखर उपस्थिति के बावजूद, आदित्यनाथ ने भाजपा में अपनी स्वायत्त सी स्थिति ही बनाए रखी है, जिसका एक तत्व उनके आशीर्वाद से अलग ‘युवा हिंदू वाहिनी’ का गठन तथा संचालन है।

वास्तव में भाजपा/आरएसएस द्वारा औपचारिक रूप से उन्हें ‘हिंदू महासभा’ से आया हुआ भी बताया जाता है, जबकि वास्तव में उनके धार्मिक-राजनीतिक पिता, महंत अवैद्यनाथ का ही हिंदू महासभा से कोई रिश्ता रहा होगा तो रहा होगा।

आदित्यनाथ तो अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी के रूप में, भाजपा के टिकट पर ही गोरखपुर से पांच चुनाव से लोकसभा के लिए चुने जाते रहे हैं।

यानी संघ परिवार के साथ आदित्यनाथ का रिश्ता, मजबूती से उसका हिस्सा रहते हुए भी, एक हद तक स्वायत्त बने रहने का है। और इस स्वायत्तता का आधार अपने लिए,  खासतौर पर भाजपा के साथ रहते हुए भी, उसके मुकाबले ज्यादा मुखर, उग्र हिंदुत्ववादी छवि गढ़े जाने में है। यह वह जगह है जगह है जहां कोई नेता न सिर्फ संघ परिवार में अपनी अलग तथा मजबूत जगह बना रहा होता है बल्कि वह संघ परिवार के वर्तमान संतुलन को भी उग्रतर हिंदुत्व की दिशा में धकेलने वाला दबाव बना रहा होता है।

इसीलिए, अचरज नहीं कि नरेंद्र मोदी को आदित्यनाथ में, 1990 के आखिरी वर्षों का नरेंद्र मोदी नजर आता हो, जिसने नयी सदी के आरंभ में गुजरात में मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद, भाजपा तथा उसके राज को उग्रतर हिंदुत्व के रास्ते पर आगे बढ़ाते हुए, वाघेला-केशुभाई के जमाने के हल्के केसरिया रंग से पीछा छुड़ाया था और एक हद तक आरएसएस से भी लड़ते हुए, पीछा छुड़ाया था। नरेंद्र मोदी को आदित्यनाथ में, अपना गुजरात का तजुर्बा उत्तर प्रदेश में दोहराने का साधन नजर आया लगता है।

                दूसरा उत्तर, जो इसके साथ जुड़ जाता है, 2019 के आम चुनाव की तैयारी का है, जिसकी ओर कई टिपपणीकारों ने इशारा भी किया है। नरेंद्र मोदी, जो चौबीसो घंटे और हफ्ते के सातों दिन चुनाव-अभियान में ही रहने वाले नेता हैं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में, अगले आम चुनाव के तकाजों का ध्यान नहीं रख रहे होंगे, तो ही आश्चर्य की बात होगी। और उत्तर प्रदेश के विधानसभाई चुनाव में, विकास की सारी बतकही के जरिए जिस तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तथा हिंदुत्ववादी गोलबंदी का सहारा लिया गया है, उसे देखते हुए यह समझना जरा भी मुश्किल नहीं है कि 2019 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में पिछले दो चुनावों का अपना शानदार प्रदर्शन दोहराने के लिए नरेंद्र मोदी की भाजपा को, सबसे बढक़र सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की जरूरत होगी। और ऐसे ध्रुवीकरण के बने रहने तथा वास्तव में सुदृढ़ीकरण की गारंटी, योगी आदित्यनाथ से बढ़कर और कौन कर सकता है? याद रहे कि हाल के विधानसभाई चुनाव में भाजपा की झाडूमार सफलता के बावजूद, 2014 के आम चुनाव के मुकाबले उसे मत प्रतिशत में 2 फीसद से ज्यादा की गिरावट ही हुई है। भाजपा का मत प्रतिशत 42.3 फीसद से घटकर, 39.7 फीसद के करीब रह गया है। अगले दो साल में और केंद्र व राज्य, दोनों के स्तर पर एंटी-इन्कंबेंसी के चलते, भाजपा के मत फीसद में आ सकने वाली गिरावट की रोकथाम के लिए अभी से उपाय करना जरूरी था।

                लेकिन, मामला सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ही नहीं है।

अस्सी के दशक के अंतिम वर्षों से मंडल-कमंडल की टकराहट की जो केंद्रीयता शुरू हुई थी उसे पलटते हुए, नरेंद्र मोदी की भाजपा इस चुनाव में और वास्तव में आम तौर पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में, मंडल और कमंडल का विरल योग करने में कामयाब रही है।

बेशक, कमंडल यानी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने ही भाजपा की जातिवादी सोशल इंजीनियरिंग के लिए विचारधारात्मक आधार मुहैया कराया है, जिसके बिना भाजपा सवर्णों के नेतृत्व में, गैर-जाटव दलितों तथा गैर-यादव पिछड़ों का ऐसा कारगर जातिगत गठबंधन खड़ा कर ही नहीं सकती थी। योगी आदित्यनाथ इस गठजोड़ के दोनों ही तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं: अपनी उग्र हिंदुत्ववादी छवि में कमंडल का भी और एक ठाकुर महंत के नाते, सवर्ण सामाजिक-धार्मिक वर्चस्व का भी।

मुस्लिम, जाटव तथा यादवविरोध के बल पर की गयी इस गोलबंदी और भाजपायी सोशल इंजीनियरिंग में, सवर्ण वर्चस्व का तत्व महत्वपूर्ण है।

यह संयोग ही नहीं है कि हाल के विधानसभाई चुनाव में भाजपा के 86 फीसद, टिकट ऊंची जातियों और गैर-जाटव दलितों तथा गैर-यादव ओबीसी को गए। इतना ही नहीं वास्तव में भाजपा ने 48.6 फीसद टिकट सवर्णों को दिए थे जबकि ओबीसी को सिर्फ 24.4 फीसद टिकट दिए गए थे। इस बार चुने गए तमाम विधायकों में भी 44.3 फीसद सवर्ण हैं यानी 2012 के मुकाबले 12 फीसद ज्यादा और 1980 के बाद सबसे ज्यादा। दूसरी ओर विधानसभा में मुसलमानों के बाद, अन्य पिछड़े वर्ग के विधायकों के हिस्से में ही सबसे ज्यादा कमी हुई है। विधानसभा में कुल मिलाकर ओबीसी का हिस्सा 27 फीसद से घटकर 25.6 फीसद रह गया है। चुने गए भाजपा विधायकों में सवर्ण विधायक 48.2 फीसद हैं, जबकि गैर-यादव ओबीसी कुल 23 फीसद ही हैं। निचले ओबीसी, जिनका कुल आबादी में 27 फीसद है, इस चुनाव में भी कुल 28 सीटों के साथ हाशिए के हाशिए पर ही पड़े रहे हैं। मोटतौर पर इसी अनुपात में योगी मंत्रिमंडल में कुल 25 अगड़ी जातियों के मंत्री हैं, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग से एक उपमुख्यमंत्री तथा छ: कैबिनेट मंत्रियों समेत कुल 16 मंत्री बनाए गए हैं और अनुसूचित जातियों से दो कैबिनेट मंत्रियों समेत कुल पांच मंत्री बनाए गए हैं और नाम के वास्ते, राज्य मंत्री के रूप में एक मुस्लिम चेहरा भी रखा गया है। अचरज नहीं कि इस सोशल इंजीनियरिंग में भाजपा ने एक मौर्य उपमुख्यमंत्री को प्रतिसंतुलित करने के लिए, ठाकुर मुख्यमंत्री के साथ, एक ब्राह्मïण उपमुख्यमंत्री भी लगाया गया है।

आदित्यनाथ, ऐसी सोशल इंजीनियरिंग के लिए स्वाभाविक चेहरा हैं।

                क्या आदित्यनाथ के रूप में दूसरे नरेंद्र मोदी का उभार शुरू हो गया है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन, इतना तय है कि नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में इसका ही प्रयोग कर रहे हैं। आदित्यनाथ का राज्याभिषेक, इसी रास्ते पर महत्वपूर्ण कदम है।

याद रहे कि विकास के जनप्रिय वादों से अलग, नरेंद्र मोदी के विकास के मॉडल का, इस तजुर्बे से कोई झगड़ा भी नहीं है। गुजरात का अनुभव इसका गवाह है।                                                    0

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