कांशीरामवाद पर हेडगेवारवाद की निर्णायक विजय   

भाजपा की वर्तमान सफलता मोदी–शाह से बढ़कर हेडगेवारवाद की विजय है. कैसे! इसे जानने के लिए 1925 के दिनों के पन्ने पलटने पड़ेंगे....

अतिथि लेखक

एच. एल. दुसाध

  यूपी विधानसभा चुनाव की विस्मयकारी विजय के बाद नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और अमित शाह की रणनीति की भूरि-भूरि चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है. लोग अब मोदी की तुलना इंदिरा गाँधी से करने लगे हैं. आज उनके करिश्मे से अभिभूत ढेरों लोग अभी से ही उन्हें 2019 लोकसभा चुनाव का विजेता घोषित करने लगे हैं. लेकिन भारी अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि मोदी की प्रशंसा में पंचमुख राजनीति के पंडितों में कोई भी भाजपा की चौंकाने वाली सफलता के पृष्ठ में हेडगेवार की चर्चा नहीं कर रहा है, जबकि ऐसा किया जाना जरूरी था. कारण, भाजपा की वर्तमान सफलता मोदी–शाह से बढ़कर हेडगेवारवाद की विजय है. कैसे! इसे जानने के लिए 1925 के दिनों के पन्ने पलटने पड़ेंगे.      

   1925 के पूर्व दिनों में हालात बड़ी तेजी से ब्राह्मणों के विरुद्ध होने लगे थे. उन दिनों अग्रणी ब्राह्मण विद्वान लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में ब्राह्मणों को विदेशी प्रमाणित करने की होड़ तुंग पर पहुँच चुकी थी. 1922 में सिन्धु-सभ्यता के सत्यान्वेषण ने भारत में प्राचीनतम विदेशागत लोगों के आगमन की पुष्टि कर दी थी. उधर सिन्धु सभ्यता के सत्यान्वेषण और ज्योतिबा फुले के आर्य –अनार्य सिद्धांत से प्रेरित ई. व्ही. रामास्वामी नायकर पेरियार दक्षिण भारत में आर्य-द्रविड़ सिद्धांत का प्रचार कर ब्राह्मण सत्ता के विनाश की आधारशिला तैयार करना शुरू कर चुके थे. इस दौरान ब्रिटेन में 30 वर्ष से ऊपर की महिलाओं के मताधिकार का कानून पास हो चुका था.

इन सारे हालातों पर किसी की सजग दृष्टि थी तो बंगाल की ‘अनुशीलन समिति’, जिसमें शूद्रातिशूद्रों का प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध था, के पूर्व सदस्य डॉ. हेडगेवार की. उन्हें यह अनुमान लगाने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि अग्रेजों के चले जाने के बाद भारत में भी संसदीय प्रणाली लागू होगी, जिसमें विशिष्टजन ही नहीं, भूखे-अधनंगे दलित-पिछड़ों को भी वोट देने, अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलेगा. वोटाधिकार मिलने पर दलित-आदिवासी और पिछड़े और चाहें जो कुछ भी करें, अंततः तिलक-नेहरु इत्यादि द्वारा विदेशी प्रमाणित किये गए ब्राह्मणों को वोट तो नहीं ही देंगे. इसी चिंता से ही, जिन दिनों देश के दूसरे नेता आजादी की जंग लड़ रहे थे, उन्होंने आजाद भारत के ब्राह्मणों के हित में मुस्लिम-विद्वेष और हिन्दू-धर्म-संस्कृति के उज्जवल पक्ष के प्रचार-प्रसार के जरिये विशाल हिन्दू समाज बनाने में खुद को निमग्न किया.

उन्होंने अपनी प्रखर मनीषा से यह जान लिया था कि जो दलित-पिछड़े हिन्दू-धर्म के अनुपालन के नाम पर सदियों से पशुवत जिंदगी जीते रहे हैं, उन्हें जब मुस्लिम विद्वेष और हिन्दू-धर्म के नाम पर उद्वेलित किया जायेगा, वे आसानी से हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकृत हो जायेंगे. और जब असंख्य जातियों में बंटे लोग हिन्दू के नाम पर ध्रुवीकृत होंगे, नेतृत्व स्वतः ही ब्राहमणों के हाथ में चला जायेगा. इसी सोच के तहत उन्होंने विशाल हिन्दू समाज बनाने के लिए 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी.

डॉ.हेडगेवार से यह गुरुमंत्र पा कर संघ अरसे से चुपचाप काम करता रहा. किन्तु मंडल रिपोर्ट के बाद जब दलित-पिछड़ों के हाथ में सत्ता के जाने के आसार दिखा, संघ ने अपने तीन दर्जन आनुषांगिक संगठनों के साथ मिलकर राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया. इस आन्दोलन में संघ परिवार ने बाबर की संतानों के प्रति वंचित जातियों में वर्षों से संचित अपार नफरत और राम के प्रति दुर्बलता का जमकर सद्व्यवहार किया. परिणाम सबको मालूम है. इस आन्दोलन को दूर से निहारते रहने वाले ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दू-ध्रुवीकरण की नैया पर सवार होकर केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए.

राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन की सफलता के बाद संघ परिवार चुनाव दर चुनाव विकास की आड़ में प्रधानतः हिन्दू ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता दखल की मंजिलें तय करता गया. बहरहाल संघ संस्थापक की दूरगामी परिकल्पना को किसी ने समझा तो वह थे कांशीराम.

   कांशीराम ने जब सार्वजानिक जीवन में प्रवेश कर भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का अध्ययन किया तो उन्हें विशाल ‘हिन्दू समाज’ के विपरीत ‘बहुजन समाज’ बनाने से भिन्न कोई उपाय नजर नहीं आया.

उन्होंने डॉ.हेडगेवार के फार्मूले से यह जान लिया कि अगर हिन्दू धर्म-संकृति के उज्जवल पक्ष और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत के जरिये वंचित जातियों को हिन्दू के नाम पर गोलबंद कर नेतृत्व यदि ब्राह्मण व सवर्णों के हाथ में थमाया जा सकता है तो हिन्दू –धर्म –संस्कृति के अंधकार पक्ष अर्थात वर्ण व्यवस्था की वंचना और व्यवस्था के लाभान्वित वर्ग के खिलाफ वंचितों को आक्रोशित कर विशाल बहुजन समाज बनाया जा सकता है. ऐसा होने पर सत्ता की बागडोर अवश्य ही दलित-आदिवासी –पिछडों या इनसे धर्मान्तरित लोगों के हाथ में थमाई जा सकती है.

हालांकि कांशीराम ने यह कभी कबूल नहीं किया कि उन्होंने हेडगेवार का अनुसरण किया है, लेकिन उनकी कार्य प्रणाली में उसकी झलक मिलती है. चूंकि कार्य प्रणाली एक होने के बावजूद ‘विशाल हिन्दू-समाज ‘और ‘बहुजन समाज‘ दो विपरीत ध्रुव हैं, इसलिए उनका उल्टा फार्मूला ही एक दूसरे के खिलाफ रास आता है. यही कारण है कि भारतीय समाज का लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद जब कांशीराम ने 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ (आल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनरिटीज इम्प्लायज फेडरेशन) नामक अपंजीकृत, गैर-धार्मिक, गैर-आन्दोलानात्मक और गैर-राजनीतिक संगठन बनाया, तो हेडगेवार जिस आर्य-अनार्य सिद्धांत से अपने समाज को बचाना चाहते थे, उसको प्रधानता देने से वे खुद को रोक नहीं पाए.

हाँ! डॉ.हेडगेवार और कांशीराम ने अपने-अपने सपनों के भारत निर्माण के जो वैचारिक संगठन तैयार किया उनमें एक ही साम्यता रही कि दोनों ही घोषित तौर पर अराजनैतिक संगठन रहे, पर मूल मकसद राजनीतिक रहा.

इस मकसद को हासिल करने के लिए संघ जहां वंचितों की धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण पर सक्रिय रहा, वहीँ बामसेफ वर्ण-व्यवस्था के वंचितों की जाति चेतना पर.

संघ जहां अल्पसंख्यकों,विशेषकर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को हथियार बनाया, वहीँ बामसेफ शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक –धार्मिक-शैक्षिक )पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ बहुजनों को संगठित करने का हर मुमकिन प्रयास किया.

हां, बामसेफ ने भी संघ की तर्ज पर जागृति जत्था, बामसेफ सहकारिता, समाचार पत्र एवं प्रकाशन, संसदीय संपर्क शाखा, विधिक सहयोग एवं सलाह, विद्यार्थी, युवक, महिलाएं, औद्योगिक श्रमिक, खेतिहर श्रमिक इत्यादि जैसे कई विंग स्थापित किये. इनके जरिये ही कांशीराम ने योजनाबद्ध तरीके से पहले दलितों की जाति चेतना का राजनीतिकरण किया जो धीरे-धीरे पिछड़ों और अल्पसंख्यकों तक में प्रसारित हो गयी. इसके फलस्वरूप मंडल उत्तर काल में सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील होने के लिए बाध्य हुए.

यह कांशीराम की जाति चेतना की रणनीति का ही कमाल था कि तमाम राजनीतिक दल, जिनमें संघ का राजनीतिक संगठन भाजपा भी है, नेतृत्व गैर-ब्राह्मणों, विशेषकर पिछड़ों के हाथ में देने के लिए बाध्य हुए.

  बहरहाल सवर्णवादी दलों की लाचारी दीर्घ स्थाई न हो सकी. कारण, जाति चेतना के चलते क्षत्रप बने बहुजन समाज के नेता 2009 आते-आते अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सवर्णपरस्ती की राह पकड़ लिए. अब उनमें सवर्णों के खिलाफ बहुजनों को ध्रुवीकृत करने का जज्बा ही नहीं रहा. इस कारण बहुजन नेतृत्व ‘भूरा बाल..’तिलक तराजू.. इत्यादि जैसे उन नारों से तौबा कर लिया, जो बहुजनों की जाति चेतना के राजनीतिकरण में प्रभावी रोल अदा किया करते थे. किन्तु घोषित तौर पर विकास की बात करनेवाले संघवादी डॉ.हेडगेवार के फार्मूले से कभी डिगे नहीं. इसलिए उनका धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण से कभी विचलन नहीं हुआ. यही कारण है 2014 से हेडगेवारपंथी हिंदी पट्टी की राजनीति में नए सिरे से छाते चले  गए.बहुजनों के सौभाग्य से अरसे बाद लालू प्रसाद यादव ने 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में जाति चेतना के राजनीतिकरण का रिस्क लिया और रास्ता दिखाया कि जाति चेतना के जरिये साधू-संतों और लेखकों तथा मीडिया और धनपतियों के प्रबल समर्थन से पुष्ट करिश्माई मोदी को शिकस्त दी जा सकती है.

  लालू यादव ने जिस तरह अपने प्रबल प्रतिद्वंदी नीतीश कुमार से गंठजोड़ कर मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा सम्बन्धी बयान को पकड़कर जाति चेतना की राजनीति को तुंग पर पहुँचाया, वैसे हालात यूपी में बने थे. किन्तु बहुजन हित की बजाय अपने मान-अभिमान को प्राथमिकता देने वाले मायावती और अखिलेश यादव ने शक्तिशाली भाजपा के खिलाफ गंठबंधन से तौबा किया ही, मोहन भागवत की भांति ही संघ के मनमोहन वैद्य ने आरक्षण पर बयान देकर जो अवसर स्वर्णिम अवसर सुलभ कराया, उसका सद्व्यहार करने कोई रूचि नहीं लिया.

खासतौर से संघ के मनमोहन वैद्य के बाद सपा की अपर्णा यादव के आरक्षण विरोधी बयान ने मायावती के समक्ष तो दोहरा अवसर सुलभ करा दिया था. किन्तु वह इसका सद्व्यहार करने आधे-अधूरे मन से आगे बढ़ी, जिसका परिणाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.

बहरहाल यूपी में भाजपा की हैरतंगेज विजय के बाद लगता है कि हेडगेवारवाद ने कांशीरामवाद पर निर्णायक विजय हासिल कर ली है. लेकिन ऐसा नहीं है. यदि सामाजिक न्यायवादी दल संगठित होकर इमानदारी से दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मातरित तबकों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों सहित सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया, ज्ञान-उद्योग और पौरोहित्य इत्यादि तमाम क्षेत्रों में संख्यानुपात में भागीदारी की मांग उठायें तो इससे जाति चेतना का वह सैलाब उठेगा जिसके सामने धार्मिक चेतना पर निर्भर राजनीति तिनके की भांति बह जाएगी. पर लाख टके का सवाल है कि बहुजन नेतृत्त्व क्या कांशीरामवाद को नए सिरे से धार देने की दिशा में आगे बढ़ेगा!

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।
क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?