जो विपक्ष समीक्षा बैठक नहीं कर सकता वो भाजपा को कैसे रोक लेगा

हम कह सकते हैं कि अपने अंदर अधिनायकवादी प्रवृत्ति रखने वाली भाजपा ही मौजूदा दौर की सबसे लोकतांत्रिक ढांचे वाली पार्टी है। हां, यहां यह आरोप लगाया जा सकता है कि भाजपा में कुछ भी बिना आरएसएस की मर्जी के...

शाहनवाज आलम

देश के सबसे बड़े राज्य में भाजपा की जीत के बाद जिस गम्भीर चिंतन, आत्मालोचना और रणनीति की जरूरत इस देश की सेक्यूलर जमातों को भाजपा विरोधी पाटिर्यों से थी, उसपर कोई भी दल खरा उतरता नहीं दिख रहा है। जो भाजपा की जीत को लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के खिलाफ मानने वाले जनसमूह को और भी निराश करने वाला है।

मसलन, इस चुनावी हार के बाद सपा की कार्यकारिणी बैठक की खबरें सिर्फ यही बता पाईं कि अखिलेश यादव और शिवपाल यादव में बैठक के दौरान कोई बातचीत नहीं हुई, तो बसपा का सांगठनिक ठांचा ऐसा है कि वहां किसी समीक्षा बैठक की कोई गुंजाईश ही नहीं है।

हां, इस चुनाव परिणाम के बारे में बसपा का अधिकृत स्टैंड यही कहा जा सकता है कि वह इसे इवीएम की गड़बड़ी की देन मानती है। जो चुनाव की तकनीकी समीक्षा तो कही जा सकती है नीतिगत या रणनीतिक नहीं। वहीं कांग्रेस में भी इसपर कोई समीक्षा नहीं की गई है। सिवाय इसके कि चुनाव हारने के बाद एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी तो वहीं राहुल गांधी ने इसे बहुत बुरा परिणाम नहीं माना।

यानी चुनाव के बाद की जो सबसे बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी किसी भी पार्टी के लिए होनी चाहिए, वो विपक्ष की किसी भी पार्टी में नहीं दिखी। जबकि भाजपा में अपनी जीत और हार दोनों ही स्थितियों में नियमित अंरताल पर समीक्षा बैठक करने का चलन अभी तक न सिर्फ बना हुआ है बल्कि वह पार्टी संचालन में सबसे महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। इस तरह हम कह सकते हैं कि यदि वाम दलों को छोड़ दिया जाए तो विपक्ष में कोई भी ऐसी पार्टी नहीं बची है जिसमें हार के कारणों पर कोई गम्भीर चितंन करने की परम्परा या प्रवृत्ति भी बची है।

जाहिर है भाजपा और भाजपा विरोधी दलों के बीच का यह फर्क दो राजनीतिक आदर्शों के बीच का फर्क है और यही फर्क भाजपा को अपने विरोधी दलों पर मनोवैज्ञानिक तौर पर बढ़त प्रदान करता है।

दरअसल, जब विपक्ष इतनी बड़ी हार के बाद भी कोई समीक्षा बैठक नहीं करता तब उससे जनता के बीच यही मैसेज जाता है कि या तो इनके पास भविष्य की कोई योजना नहीं है या अपनी कमियों को स्वीकार कर पाने की क्षमता नहीं है या फिर इनमें इतना लोकतांत्रिक साहस भी नहीं है कि ये अपने शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठा सकें।

सबसे अहम कि इससे यह मैसेज भी जाता है कि इन दलों का जनता से सिर्फ चुनावी रिश्ता है। वो उसके प्रति चुनाव हारने के बाद किसी तरह की जवाबदेही नहीं महसूस करते। वहीं दूसरी ओर भाजपा नियमित तौर पर समीक्षा बैठकें करती है जिससे जनता को लगता है कि यह सिर्फ चुनाव लड़ने वाली मशीन नहीं है, बल्कि जनता के प्रति औरों से ज्यादा जवाबदेह है, इसलिए ज्यादा लोकतांत्रिक भी है। उसकी बैठकों से निकलने वाले निणर्यों में जनता की दिलचस्पी इस वजह से भी रहती है कि ये चौंकाने वाले भी हो सकते हैं जबकि सपा या कांग्रेस या राजद कि किसी कार्यकारिणी बैठक या समीक्षा बैठक में ऐसा कुछ भी नहीं निकल कर आता जो जनता को चौंकाने वाला हो। जनता को पहले से मालूम होता है कि ये इन पार्टियों पर काबिज परिवारों की आपसी बैठक है।

इस तरह, हम कह सकते हैं कि अपने अंदर अधिनायकवादी प्रवृत्ति रखने वाली भाजपा ही मौजूदा दौर की सबसे लोकतांत्रिक ढांचे वाली पार्टी है। हां, यहां यह आरोप लगाया जा सकता है कि भाजपा में कुछ भी बिना आरएसएस की मर्जी के नहीं होता, जो बिल्कुल सही भी है। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि उसका यह रिमोट उसे दिशा भी देता है। उसे सेक्यूलर भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की वैचारिकी देता है। विपक्षी दलों के किस मुखिया के पास समाज को अच्छा या बुरा कोई भी स्वप्न देने या वैचारिकी देने की क्षमता है? इसीलिए जनता का एक बड़ा हिस्सा भाजपा पर संघ के नियंत्रण को बुरा नहीं मानता। वहीं चूंकि गांधी परिवार या मुलायम सिंह यादव का परिवार अपनी पाटिर्यों को कोई स्पष्ट वैचारिक दिशा दे पाने में सक्षम नहीं हैं इसलिए जनता इनकी खुद की पार्टियों पर उनके नियंत्रण को भी लोकतंत्रविरोधी मानती है।

दरअसल, भाजपा विरोधी दलों को यह समझना होगा कि बिना वैचारिक दिशा और सैद्धांतिक लक्ष्य के सिर्फ चुनावी तालमेल से भाजपा को नहीं हराया जा सकता है। और अगर कभी कभार भाजपा को हराने में वे सफल भी हो जाएं तो भी इससे संघ परिवार नहीं हारने जा रहा है। क्योंकि संघ एक वैचारिक संगठन है, उसके पास जनता के एक बड़े हिस्से को दिखाने के लिए ‘हिंदू राष्ट्र’ का सपना है। जबकि विपक्ष के पास जनता को दिखाने के लिए कोई भी सपना नहीं है। उसके पास कोई भी राष्ट्रीय कहे जाने लायक लक्ष्य नहीं है।

इसलिए अगर भाजपा विरोधी दलों में सचमुच भाजपा की चुनौती से देश को बचाने की इच्छाशक्ति है तो उन्हें सबसे पहले तो अपने हार की खुले दिल से समीक्षा करनी होगी। लेकिन यह इच्छाशक्ति कितनों में बची है?

शाहनवाज आलम

      (स्वतंत्र लेखक, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार, और राजनीतिक कार्यकर्ता)

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।
क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?