यह इस दौर की सबसे बड़ी अफवाह है कि राजनीति ‘विकास’ के लिए की जाती है

यह सपा-बसपा की राजनीति की स्वाभाविक मौत है... सपा और बसपा की यह स्थिति सामाजिक न्याय के नाम पर हुए सामाजिक अन्याय का भी परिणाम है।...

यह इस दौर की सबसे बड़ी अफवाह है कि राजनीति ‘विकास’ के लिए की जाती है
Politics of development
हाइलाइट्स
  • सवर्णवादी राजनीति का हथियार है ‘विकास’  
  • यह सपा-बसपा की राजनीति की स्वाभाविक मौत है...
  • सपा बसपा की हर गलती का लाभ संघ उठाता चल रहा था
  • सपा और बसपा की यह स्थिति सामाजिक न्याय के नाम पर हुए सामाजिक अन्याय का भी परिणाम है।

शाहनवाज आलम

उत्तर प्रदेश चुनाव में सपा और बसपा को जनता द्वारा बुरी तरह नकार दिए जाने से सामाजिक न्याय की अवधारणा के साथ 90 के शुरूआती दौर से शुरू हुई एक राजनीतिक धारा का अंत हो चुका है। हालांकि इस राजनीति के पुरोधा इसे इनकम्पबैंसी फैक्टर या इवीएम धांधली बता कर इस सच्चाई को नकारने की कोशिश में हैं लेकिन हकीकत यही है कि यह उनकी राजनीति की स्वाभाविक मौत है। अगर आगामी चुनावों में सपा और बसपा का कोई उभार होता भी है तो अब वो उन वैचारिक और सैद्धांतिक बुनियादों पर नहीं होगा जिसके दावे के साथ यह खड़ी हुई थीं। बल्कि वह अब सामान्य चुनावी उलटफेर ही ज्यादा होगी।

दरअसल, सपा और बसपा की यह मौत अचानक नहीं हुई है बल्कि 90 के उत्तरार्ध में ही इन्हें इस स्थिति में पहुंचाने वाले रोग के जीवाणु लग गए थे। यह रोग था अपने घोषित राजनीतिक लक्ष्य के बजाए ‘विकास’ के पीछे भागने की सनक। जिसे 90 के मध्य में सूबे की सियासत में निर्वासन में चल रहे सवर्ण तबके ने एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया था, क्योंकि तब वो पिछड़ों और दलितों की राजनीति को जातिवाद कहकर बहुत दिनों तक खारिज नहीं कर सकते थे।

उस दौर में राष्ट्रीय राजनीति पर तेजी से उभरती भाजपा ने इसे यूपी और बिहार में अपनी सम्भावनाओं के मद्देनजर नई दलाल पूंजी से संचालित और वस्तुतः सवर्ण वर्चस्व वाली मीडिया के जरिए प्रसारित करना शुरू किया था।

“विकास” शब्द के इर्द-गिर्द एक ऐसा माहौल रचा गया, जिसमें सामाजिक न्याय या आरक्षण का समर्थन करने का मतलब ही ‘विकास’ विरोधी होना माना जाने लगा। इसे इतने आक्रामक ढंग से रखा जाने लगा कि आपको इन दोनों में से किसी एक को ही चुनना है।

इस तरह अपनी जमीन खो चुकी सवर्ण राजनीति को इस जुमले ने उसके सबसे बुरे दौर में जमीन हथियाने में काफी मदद की। वहीं इस दौरान सपा और खास कर बसपा के अपने मिशनरी राजनीति से पीछे हटने और सर्वग्राही होने के प्रयास में कथित सवर्ण जातियों की पसंदीदा पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाने और फिर सवर्ण जातियों के उसमें प्रवेश ने जहां बसपा के अंदर ‘विकास’ के पैरोकारों को स्पेस देना शुरू कर दिया। वहीं सपा के अपने मूल जातिगत जनाधार के एक गुंडा फोर्स में तब्दील होते जाने को संघ और मीडिया के एक बड़े हिस्से ने ‘जातिवाद’ का परिणाम बताया। जिसके चलते सपा की राजनीति को जातिवादी, गुंडावादी के साथ ही ‘विकास’ विरोधी भी माना जाने लगा। तर्क दिया गया कि कानून-व्यवस्था की बदहाल स्थिति में कोई भी यहां निवेष नहीं करना चाहता।

वहीं, इस पूरे परिघटना में जहां सवर्ण राजनीति ‘विकास’ के सहारे अपने पुनरोत्थान के प्रयास में लगी थी वहीं सामाजिक न्याय के राजनीतिक धारा के अंदर भी ‘विकास’ के जुमले ने टूटन पैदा करनी शुरू कर दी। क्योंकि सपा और बसपा सरकारों और सांगठनिक ढाँचों में पिछड़ों और दलितों की सिर्फ कुछ ऊपरी जातियों के वर्चस्व के चलते इन वर्गों की अन्य जातियों ने भी इसे अपने साथ छलावा और विषुद्ध तौर पर जातिवाद के बतौर ही देखा। इन जातियों ने भी सपा और बसपा के सामाजिक न्याय के नाम पर दिए जाने वाले धोके को ‘विकास’ की आड़ में खारिज करना शुरू कर दिया। उनके लिए यह एक अच्छा ‘रामबाण’ इसलिए भी था कि उनके पास अपनी कोई राजनीति नहीं थी जिसके कारण इनके वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई राजनीतिक मुहावरा भी नहीं था। वहीं ये ‘विकास’ उन्हें आसानी से सवर्ण राजनीति के दायरे में भी प्रवेश दिला सकने की गरंटी देती थी। भाजपा ने इसी वोट बैंक पर बहुत पहले से ही काम करना शुरू कर दिया था।

इस तरह सपा और बसपा की यह स्थिति सामाजिक न्याय के नाम पर हुए सामाजिक अन्याय का भी परिणाम है।

वहीं इस प्रक्रिया में ‘विकास’ यानी डेवेलपमेंट किस चालाकी से ‘प्रगति’ यानी प्रोग्रेस का स्थानापन्न बन गया इसे किसी ने गौर ही नहीं किया। जबकि यही वह कारक था जिसने इस पूरे संक्रमण को आर्थिक आधार मुहैया कराया।

गौरतलब है कि इसके पहले राजनीतिक दल और नेता देश को प्रगति, जो कि एक समोवेशी अर्थ के साथ ही सैद्धांतिक दिशा भी रखता है, के पथ पर ले जाने का दावा और वादा करते थे। लेकिन जैसे ही नई आर्थिक नीतियों के साथ आई आवारा पूंजी का राजनीतिक और सामाजिक दखल बढ़ा समोवेशी संदर्भ सिकुड़ने लगे। इसी क्रम में ‘प्रगति’ की जगह अब ‘विकास’ का इस्तेमाल किया जाने लगा। अब आर्थिकी की कोई सामाजिक जवाबदेही नहीं रह गई थी और कम से कम उसका कोई जनपक्षधर या सामाजिक न्यायवादी लक्ष्य तो बिल्कुल ही नहीं रह गया था।

इस समझदारी ने सड़क, पानी, बिजली, पार्कों के निमार्ण जैसे मूलभूत और मुख्यतः प्रशासनिक संदर्भों से जुड़े सवालों को शासन यानी राजनीति के सवालों के बतौर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। जिसके चलते तेजी से शासन का प्रशासनीकरण होने लगा। ऐसे में अगर कोई नेता भले ही सवर्णवादी हो तब भी उसे ‘विकास’ के नाम पर पिछड़े और दलित वर्गों का वोट मिलने में कोई कठिनाई नहीं रह गई थी।

इस तरह ‘विकास’ का जीवाणु सामाजिक न्याय के महान लक्ष्य से न सिर्फ इन राजनीतिक दलों को बल्कि उनके सामाजिक जनाधारों को भी खा रहा था।  

वहीं एक सीमा के बाद आई सामाजिक लक्ष्यविहीनता ने भी पिछड़ों और दलितों को सपा और बसपा से दूर करने में अहम भूमिका निभाई। मसलन, अपने शुरूआती दौर में पिछड़ों और दलितों के सामाजिक उत्थान या उनकी बराबर हैसियत की प्राप्ति में तो सपा और बसपा की भूमिका थी। जिसके चलते ये जातियां सर उठाकर और सम्मान से चलने लायक हो गईं और सत्ता के केंद्र में भी आ गईं। लेकिन पिछले डेढ़ दशक से ये दोनों पार्टियां अपने जातिगत जनाधारों को भी कोई नया सामाजिक लक्ष्य नहीं दे पाईं या यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि वे दे ही नहीं सकती थीं। इसीलिए पिछले कई चुनावों से हम बसपा और सपा नेतृत्व द्वारा खुद को प्रधानमंत्री बनाने का भौंडा और नितांत व्यक्तिवादी नारा दिये जाते देख रहे हैं।

जाहिर है, ये सिर्फ व्यक्तिगत लालसा का ही परिणाम नहीं है बल्कि उससे कहीं ज्यादा अपने जनाधारों को राजनीतिक-सामाजिक तौर पर कोई बड़ा सामूहिक लक्ष्य न दे पाने का भी परिणाम है।

मायावती के अंदर तो लक्ष्यहीनता के साथ एक और बड़ी समस्या यह रही कि उन्होंने अपने मिजाज को ही सामाजिक न्याय के अनुरूप नहीं ढाला और सामंती तौर तरीकों जैसे नेताओं से पैर छुआने, अपने पास किसी को भी जूता पहन कर खड़े नहीं होने देने में ही दलितों की अस्मिता की संतुष्टि ढ़ूढती रह गईं। जबकि ये सब अब उनके जनाधार को इतना आकर्षित नहीं कर पा रहा था कि उन्हें वोट दे दे।

वहीं खास तौर से सपा ने इस वक्फे में एक ऐसा राजनीतिक झुंड पैदा कर दिया जिसमें स्कॉर्पियो, सफेद कुर्ता पैंट, गले में सोने की सिक्कड़, कमर में रिवाल्वर इस सामाजिक न्याय की पहचान बनती गई। जाहिर है इसने न सिर्फ अपने ही संवेदनशील हिस्से की सहानुभूति खोई बल्कि आम मतदाताओं में भी इसके खिलाफ माहौल बनना शुरू हो गया। हालांकि सपा नेतृत्व की दिक्कत ये थी इसे चाह कर भी नहीं खत्म किया जा सकता था क्योंकि विचारशून्यता के कारण यही सपा की संचालक शक्ति थी।

इसीलिए हमने बार-बार मुलायम सिंह यादव को अपनी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों तक को फटकारते देखा लेकिन कभी कार्रवाई करते नहीं देखा।

सपा की गुंडागर्दी के कारण पनपे सामाजिक गुस्से का लाभ उठाते हुए सवर्ण जातियों और उसके प्रतिनिधि संघ परिवार ने ‘अच्छे लोगों’ के हाथों में शासन दिए जाने का तर्क समाज में प्रसारित किया। हालांकि ऐसे किसी भी प्रचारक से बात करते वक्त इसको बहुत आसानी से समझा जा सकता था कि किसी समुदाय के राजनीतिक दबंग तबके की गुंडागर्दी को यह पूरे पिछड़े और दलित समाज की गुंडागर्दी और आरक्षण के परिणाम के बतौर पेश कर रहा है और उसके ‘अच्छे लोगों’ का मतलब सवर्णों से है।

इस तरह सपा बसपा की हर गलती का लाभ संघ उठाता चल रहा था

वहीं इस संगठित अफवाह तंत्र ने पिछले लम्बे समय से ‘मुसलमान रहित विकास’ की जो सैद्धांतिकी रची थी उसने भी इन जातियों में मुसलमान वोट पर निर्भरता वाली सपा और बसपा की राजनीति को खारिज करने का तर्क दे दिया। हालांकि इसके लिए भाजपा और संघ से कहीं ज्यादा जिम्मेदार सपा और बसपा खुद थीं, क्योंकि उन्होंने अपने जातिगत जनाधारों को मुसलमानों से वोट और नोट लेना तो सिखाया था, उनमें धर्मनिरपेक्षीकरण की कोई प्रक्रिया नहीं चलाई थी।  

ब्यूरोक्रेसी और अखिलेश के इर्द-गर्द रहने वालों ने उनकी नादानी और सामाजिक समीकरणों को नहीं समझ पाने की कमजोरी का भी खूब लाभ उठाया और उन्हें ‘विकास’ के पिच पर धकेल दिया। वो यह नहीं समझ पाए कि भाजपा के ‘विकास’ के ढ़ाल के पीछे सपा से कहीं ज्यादा जातियों के सोशल इंजीनियरिंग का काम चल रहा है। हालांकि, भाजपा के लिए अपने इस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को दुनिया से छुपा ले जाना आसान था क्योंकि इसे संघ को करना था। वहीं अपनी नई ‘छवि’ निर्माण के चक्कर में वे अपने पिता की सामाजिक समीकरण की पूंजी ही लुटाते रहे। वह समझ ही नहीं पाए कि उनकी ‘विकास’ गाथा को सुनने के लिए जो भीड़ इकठ्ठी हो रही है वो एक व्यूह रचना का हिस्सा है। उन्हें वहां से वोट नहीं मिलने वाला।

ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई करके लौटे अखिलेश यादव यह समझ ही नहीं पाए कि भारत के किसी भी दल- कांग्रेस, साम्यवादी दल, संघ परिवार, रिपब्लिकन पार्टी, जनसंघ, जनता पार्टी, भाजपा, बसपा, डीएमके या एआईएडीएमके का निमार्ण ‘विकास’ के लिए नहीं हुआ है। बल्कि ऐतिहासिक जरूरतों और मुख्तलिफ समाजी समूहों और वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हुए हैं।    

दरअसल विकास की पूरी राजनीति ही अस्मिताओं और सामाजिक न्याय की राजनीति को खत्म करने के वृहत षडयंत्र का हिस्सा है। यह इस दौर की सबसे बड़ी अफवाह है कि राजनीति ‘विकास’ के लिए की जाती है। सपा और बसपा इसे नहीं समझ पाईं और भाजपा ने इसे सबसे बेहतर तरीके से समझा। इसीलिए योगी आदित्यनाथ सिर्फ हिंदुत्व के ही प्रतीक नहीं हैं वह ‘विकास’ के शिकार हुए सामाजिक न्याय की राजनीति के भी प्रतीक हैं।

           (शाहनवाज आलम, लेखक, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार, और राजनीतिक कार्यकर्ता)

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