ये योगी की जीत नहीं, उस भारत की हार है जो गांधी को नहीं मारता

योगी आदित्यनाथ को बसपा और सपा दोनों ही सरकारों ने संरक्षित किया। योगी कोई अचानक प्रकट हुए राजनीतिज्ञ नहीं हैं जैसा कि मीडिया और लिबरल बुद्धिजीवी तबका समझ रहा है। वह अपने आप में एक पूरा तंत्र हैं ...

योगी आदित्यनाथ को बसपा और सपा दोनों ही सरकारों ने संरक्षित किया...

शाहनवाज आलम

भारत जैसे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राजनीतिज्ञ का ‘फायर ब्रांड’ जैसी उपमा से सम्बोधित किया जाना जितना सामान्य नजरिए से स्वीकृत किया जाता है, वह उतना ही एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बतौर हमारी असामान्य कमजोरी को जाहिर करता है। मसलन, जब हम योगी आदित्यनाथ या उन जैसे राजनीतिज्ञ को ‘फायर ब्रांड’ मान लेते हैं, तो इससे यही जाहिर होता है कि हमारी न्यायिक और प्रषासनिक व्यवस्था उनके संविधान विरोधी भाषणों को या तो नजरअंदाज करके उनके हौसले को बढ़ाती है या वे ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देकर भी बहुत आसानी से कानून के शिंकजे से बच जाने की महारत रखते हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘फायर ब्रांड’ नेता का उत्पन्न होना उसकी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं ज्यादा तंत्र की स्वैच्छिक विकलांगता को दर्शाता है।

वहीं ऐसे किसी भी राजनीतिज्ञ का लोकप्रिय होना और लगातार चुनाव जीतना यह भी साबित करता है कि हमारा निर्णायक बहुमत संविधान विरोधियों से कितना प्रेम करता है। इसीलिए एक डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के बतौर जिसने योगी आदित्यनाथ को लम्बे समय तक फॉलो किया है और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवायियों का हिस्सा रहा है, मेरे लिए ‘फायर ब्रांड’ योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बन जाना, भाजपा और संघ की उपलब्धि से कहीं ज्यादा उनको संरक्षण देने वाले विपक्षी दलों और उन्हें ‘वॉक ओवर’ देने वाली न्यायपालिका की उपलब्धि है।

मसलन, मेरी फिल्म ‘सैफ्रन वॉरः ए वॉर अगेंस्ट नेशन’ में शामिल योगी आदित्यनाथ के आजमगढ़ में 2008 में दिए गए भाषण जिसमें वो एक के बदले 10 लोगों की हत्या का आह्वान कर रहे हैं, का एक हिस्सा तीन दिनों के अंदर 3 लाख लोगों ने देखा है। उनका यह भाषण पहले भी मीडिया में बहस का विषय बनता रहा है। लेकिन यह जानना हमारे तंत्र की स्वैच्छिक विकलांगता को साबित करने के लिए क्या काफी नहीं होगा कि फिल्म के निर्माताओं शाहनवाज आलम, राजीव यादव और लक्ष्मण प्रसाद द्वारा जब 20 मार्च 2009 को मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग व 23 मार्च 2009 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तर प्रदेश को भाषण की मूल रिकार्डिंग की सीडी समेत प्रार्थना पत्र प्रेषित कर उनसे आदित्यनाथ व रमाकांत यादव के विरुद्ध धारा 125 रिप्रेजेन्टेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951 एवं अन्य विधिक प्राविधानों के अन्तर्गत एफआईआर दर्ज कराने की मांग की गई तो दूसरी तरफ से कोई रिस्पांस ही नहीं मिला। जिसके बाद हम लोगों ने मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष रखा। तब योगी आदित्यनाथ जिस वीडियो को कई अवसरों पर अपना मान चुके हैं, उस पर तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) आजमगढ़ ने 16 अप्रैल 2009 को अपना पक्ष रखते हुए ऐसे किसी आपत्तिजनक भाषण के दिए जाने से ही इंकार कर दिया। इतना ही नहीं उल्टे उन्होंने भाषण के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने एवं आपराधिक श्रेणी में न आने व आवेदकों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर मनगढ़ंत साक्ष्य तैयार किए जाने की बात कहते हुए आवेदन पत्र को झूठा व निराधार बता दिया।

यह भी जानना महत्वपूर्ण होगा कि इसी भाषण में योगी आदित्यनाथ ने हाईकोर्ट के हवाले से इस झूठे तथ्य को भी प्रसारित किया था कि उसने अपने एक फैसले में राज्य सरकर से यह पूछा है कि हिंदू लड़कियां ही मुस्लिम लकड़ों के साथ क्यों भागती हैं। इस तरह उन्होंने हाईकोर्ट के झूठे उद्धरण के जरिए मुसलमान महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा को जायज ठहराने का प्रयास किया। लेकिन, अदालत ने इस भाषण की सीडी और उनके भाषण के ट्रांस्क्रिप्ट मुहैया कराने के बावजूद इस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि यह खुद न्यायपालिका के अपमान का मजबूत उदाहरण था।

यानी उनके जिस भाषण पर लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं या जिसे वे खुद वाजिब ठहरा चुके हैं, उस भाषण के अस्त्तिव को ही प्रशासन नकार चुका है।

यहां यह याद रखना जरूरी होगा कि ऐसे अपराध में 3 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है।

जाहिर है किसी के ‘फायर ब्रांड’ नेता बनने में उसकी वाकपटुता या विभाजक शब्दों और मुहावरों के उसके चुनाव की क्षमता से कहीं ज्यादा श्रेय ऐसी भाषा पर अंकुष लगाने के लिए जिम्मेदार तंत्र की आपराधिक भूमिका को जाता है।

इसी तरह, अगर हम उनके खिलाफ दायर मुकदमों की नवईयत को देखें तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। मसलन, 27 जनवरी 2007 की रात गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर योगी आदित्यनाथ ने विधायक राधामोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की मेयर अंजू चौधरी की मौजूदगी में हिंसा फैलाने वाला भाषण देते हुए ऐलान किया कि वो ताजिया नहीं उठने देंगे और खून की होली खेलेंगे। जिसके लिए उन्होंने आस-पास के जिलों में भी अपने लोगों को कह दिया है।

इस भाषण के बाद भीड़ ‘कटुए काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे’ के नारों के साथ मुसलमानों की दुकानें फूंकती आगे बढ़ती चली गई।

इसके बाद गोरखपुर, देवरिया, पडरौना, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में योगी के कहे अनुसार ही मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई। लेकिन इस पूरे प्रकरण, जिसमें मुसलमानों की करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ, उसमें मायावती सरकार में पुलिस अधीक्षक से एफआईआर दर्ज करने का पार्थना पत्र बेमानी साबित हुआ। जिसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं परवेज परवाज और असद हयात द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट पिटीशन दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई, लेकिन अदालत ने उसे खारिज करते हुए सेक्षन 156 (3) के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया। जिसके बाद सीजेएम गोरखपुर की कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए गुहार लगाई गई। जिस पर कुल 10 महीने तक सुनवाई चली और अंततः मांग को खारिज कर दिया गया। जिसके खिलाफ फिर हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल हुआ। तब जाकर इस मामले में एफआईआर दर्ज हो पायी।

यहां यह जानना रोचक होगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी आत्मकथा ‘मेरे बहुजन संघर्ष का सफरनामा’ के भाग 1 में लिखा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिख कर कहा था कि योगी आदित्यनाथ की गतिविधियां राष्ट्रविरोधी हैं जिस पर रोक लगनी चाहिए।

जाहिर है मायावती अपनी आत्मकथा में तो यह लिख सकती थीं लेकिन उनके राज में योगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए किसी को भी कम से कम दो बार हाईकोर्ट जाना पड़ता था।

वहीं इस एफआईआर के दर्ज होने के बाद योगी के साथ सहअभियुक्त अंजू चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और जांच पर स्टे ले लिया। जिसके बाद 13 दिसम्बर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने अंजू चौधरी की एसएलपी को खारिज कर दिया और जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सीबीसीआईडी की इस जांच के लिए अखिलेश यादव सरकार ने अपने जांच अधिकारी को अनुमति ही नहीं दी और मामला वहीं का वहीं पड़ा रहा।

यहां 2007 में पडरौना शहर और रजानगर में हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा का उदाहरण भी देखा जाना चाहिए जिसमें मुसलमान दुकानदारों की गुमटियों को न सिर्फ पूरी तरह जला दिया गया बल्कि उनकी जगह रातों रात हिंदू दुकानदारों को बैठा दिया गया और इसे तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा तक मानने से इंकार कर दिया।

जाहिर है, योगी आदित्यनाथ को बसपा और सपा दोनों ही सरकारों ने संरक्षित किया।

दरअसल, योगी कोई अचानक प्रकट हुए राजनीतिज्ञ नहीं हैं जैसा कि मीडिया और लिबरल बुद्धिजीवी तबका समझ रहा है। वह अपने आप में एक पूरा तंत्र हैं जो लम्बे समय से काम कर रहे हैं और जिनके पास अपनी सेना, न्यायतंत्र, मीडिया और अपना प्रषासनिक अमला है, या उनके लोग इन अमलों में षामिल हैं। जो सिर्फ और सिर्फ योगी के प्रति निष्ठावान है। इसीलिए जब गोरखनाथ मंदिर से हमने ‘योगी जी की सेना चली’ नाम की सीडी खरीदी और उसके एक गाने को आपत्तिजनक बताते हुए एक वामपंथी नेता ने जब गोरखपुर में प्रेस कांफ्रेंस किया तब चंद मिनटों के अंदर ही न सिर्फ वो सीडी मार्केट से गायब हो गई बल्कि हमें भी जितना जल्दी हो षहर से निकल जाने का सुझाव दिया जाने लगा। गौरतलब है कि इस एल्बम के एक गाने जिसका इस्तेमाल हमने अपनी फिल्म में भी किया है में देवरिया के मोहन मुंडेरा कांड जिसमें 76 मुसलमानों के घर मस्जिद में लगे माईक को निकाल कर दिए गए योगी के भाषण के बाद हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकताओं ने जला दिया था, का श्रेय लिया गया था। जबकि कोर्ट में हिंदू युवा वाहिनी इस घटना में अपनी संलिप्तता से इंकार करती रही है। गीत के बोल थे ‘घेर के मारल गइलें विधर्मी घरवा गईल फुंकाए.... हिंदू युवा वाहिनी के सपना साकार हो जाई’। 

इसीलिए जब लोगों ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई दी तो मुझे उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों, जांच अधिकारियों, उन्हें बचाने वाले जजों, उनके खिलाफ खबरों को छुपाने वाले पत्रकारों, गैरभाजपाई मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेष यादव सब के प्र्रति नाइंसाफी पर बहुत दया आई। आखिर योगी की सफलता में इनके योगदान को क्यों भुला दिया गया? इन्हें क्यों नहीं बधाई दी गई?

दरअसल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि योगी आदित्यनाथ एक ऐसी राजनीतिक और सांस्कृतिक परिघटना की उपज हैं जो भारतीय राष्ट्र राज्य के साथ-साथ ही विकसित हुआ है और अपने मूल में हर उस मूल्य का सिर्फ प्रतिलोम ही नहीं रहा है जिसका दावा भारतीय राज्य औपचारिक तौर पर करता है बल्कि उसके घोषित मान्यताओं को नकारने और उसके महान लक्ष्यों को बदल देने के लिए हमेषा तत्पर भी रहता रहा है। सबसे अहम कि यह परिघटना इतनी स्वाभाविक मान ली गई है कि इसे कहीं से भी नुकसानदायक तो दूर असामान्य तक मानने को लोग तैयार नहीं हैं। इसीलिए किसी सामान्य व्यक्ति के लिए जिस तरह योगी का एक ‘फायरब्रांड’ नेता होना स्वीकार्य है उसी तरह उसके लिए यह जानकारी भी परेशान करने वाली नहीं है कि गांधी जी की हत्या में गोरखनाथ पीठ की ही रिवल्वर का इस्तेमाल हुआ बताया जाता है या खुद दिग्विजय नाथ गांधी जी की हत्या के आरोप में जेल जा चुके हैं या बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में राम की मूर्तियां रखने के एक आरोपी दिग्विजय नाथ भी थे। इसीलिए भारतीय राष्ट्र राज्य के अस्त्तिव में आते ही भारत के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने वाली जो दो नियामक घटनाएं हुईं- महात्मा गांधी की हत्या और बाबरी मस्जिद में मूतियों का रखा जाना, उसके आरोपी भौतिक केंद्र के सर्वेसर्वा का सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने का एक स्पष्ट अर्थ है। यह उस भारत की हार है जो महात्मा गांधी की हत्या नहीं करता या जो बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में मूर्ति नहीं रखता। इसीलिए योगी के हेट स्पीचके समर्थकों को उन भाषणों में एक नए भारत के निर्माण का संकल्प दिखता है। वही संकल्प जो गोडसे ने गांधी पर गोली चलाने से पहले या 1949 की 22-23 दिसम्बर की रात को बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखते हुए लोगों ने लिया होगा।

इसीलिए, सिद्धार्थनगर में ‘हिंदू चेतना रैली’ को सम्बोधित करते हुए हिंदू युवा वाहिनी के एक बड़े नेता ने जब योगी और महिला नेताओं की उपस्थिति में मंच से मुस्लिम महिलाओं के कंकालों को कब्रिस्तानों से निकाल कर उनके साथ बलात्कार करने का आह्वान किया या जब उनके एक नेता ने मुसलमानों से वोट देने का अधिकार छीन लेने की बात की तब वहां मौजूद भीड़, मीडिया और पुलिसकर्मियों का उत्साह  देखकर मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मैं कुछ नया देख रहा हूं। उन्हें देखकर यही महसूस हुआ कि ये बात वो शायद बहुत दिनों से कहना चाहते थे, लेकिन किसी दबाव में वे ऐसा नहीं कह पा रहे थे।

मेरी फिल्म के एक विजुअल में इस भाषण पर एक पुलिसकर्मी का माथे पर भगवा पट्टा लपेटे और हाथ में फरसा लिए हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता में रूपांतरित होना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं लगता। यही इस रूपातंरण का सबसे खतरनाक पहलू है।

हां, यहां मुझे उस समान जेहनियत वाली भीड़ में उस असामान्य आदमी की जरूर याद आती है जिसने सिद्धार्थनगर की उस सभा में अपने हम उम्र बच्चों के साथ दौड़ भाग करते 8-10 साल के लड़के को उसके मुस्लिम होने की वजह से वहां से भगाने का विरोध करते हुए अपने एक योगी भक्त कार्यकर्ता से ऐसा नहीं करने को कहा था कि ‘लईका ह खेले द’।

मैं उसके बारे में अक्सर सोचता हूं कि क्या वह अब भी ‘अपने’ को बचा पाया होगा या औरों की तरह हो गया होगा?

इसीलिए जब 2 अप्रेल को इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यक्रम में बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के माननीय न्यायधीषों के साथ पूरे सूबे भर के जजों के सामने बैठेंगे तो उसे भी शायद एक सामान्य घटना ही माना जाए और शायद जजों का एक बड़ा हिस्सा उनके पैर छू कर उनसे आशार्वाद भी ले, जैसा कि गोरखपुर में अधिकतर सरकारी नौकरों को करने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। उन्हें इससे शायद ही फर्क पड़े कि योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कई मामलों में उन्हें जल्दी ही फैसला भी सुनाना है और आरोपी के साथ सार्वजनिक या गुप्त तौर पर नजर आना नैतिक तौर पर गलत है।

लेकिन जब ऐसा हो रहा होगा तब मुझे अपने एक पत्रकार दोस्त के दिवंगत पिता की याद बार-बार आएगी, जो आजमगढ़ में जज थे और जिनकी मृत्यु कोर्ट परिसर में आए हार्ट अटैक से इसलिए नहीं टल सकी कि उन्होंने एक वकील की अपने स्कूटर से अस्पताल छोड़ देने की पेशकश को मानने से इंकार कर दिया था। उन्हें एक जज का किसी वकील के स्कूटर से अपनी जान बचाने के लिए भी अस्पताल जाना नैतिक तौर पर गलत लगा था।

      (शाहनवाज आलम, योगी आदित्यनाथ की आतंकी और साम्प्रदायिक गतिविधियों पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म सैफ्रन वॉर के सहनिर्माता हैं)

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।