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आउषवित्ज़ से दादरी तक : क्या बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर मार डाला जाएगा ?

„Kulturkritik findet sich der letzten Stufe der Dialektik von Kultur und Barbarei gegenüber: nach Auschwitz ein Gedicht zu schreiben, ist barbarisch, und das frisst auch die Erkenntnis an, die ausspricht, warum es unmöglich ward, heute Gedichte zu schreiben.“ – Theodor Adorno

“सांस्कृतिक आलोचना संस्कृति और बर्बरता के द्वंद्व के आख़िरी पायदान पर है : आउषवित्ज़ (ऑश्वित्ज़) के बाद एक कविता लिखना बर्बरता है, और यह इस ज्ञान को भी कुतरता है कि आज कविता लिखना क्यों असंभव हो गया है.”

जर्मन दर्शन शास्त्री थेओडोर आडोर्नो ने 1949 में ये शब्द कहे थे, जिन्हें 1951 में प्रकाशित किया गया. बाद में अपने वक्तव्य को नर्म बनाते हुए कई बार उन्होंने कहा कि यह कविता के ख़िलाफ़ कोई फ़ैसला नहीं, बल्कि संस्कृति की भूमिका पर विमर्श का अंग है.

सांस्कृतिक विमर्श आख़िरकार सामाजिक यथार्थ के सामने आत्मसमर्पण करता है, जहां आलोचना भी भागीदारी में सिमटकर हैवानियत का हिस्सा बन जाती है.

ख़ासकर कवियों ने आडोर्नो के वक्तव्य के खिलाफ़ जमकर मोर्चा लिया. पेटर रुयुमकोर्फ़ ने तंज़ के साथ सवाल किया कि क्या आउषवित्ज़ के बाद आडोर्नो को पढ़ा भी नहीं जा सकता है ? कुर्ट ड्रावर्ट ने अपनी कविता में कहा कि आउषवित्ज़ के बाद हमारे पास सिर्फ़ कविता ही रह गई है.

लेकिन आडोर्नो के वक्तव्य में समाज में संस्कृति की भूमिका (Role of culture in society) पर बुनियादी रूप से प्रश्नचिह्न लगाया गया है, जिस पर सोचना ज़रूरी है : हैवानियत जब संस्कृति को पूरी तरह से दखल में ले लेती है, तब संस्कृति का परचम उठाना क्या हैवानियत की संस्तुति नहीं है ?

यह एक विकट समस्या तो है. कुछ भी कहने के लिये पैरों के नीचे ज़मीन चाहिए, और वह ज़मीन हैवानियत की ज़मीन है. आप बुद्धिजीवियों की हत्या पर बोलते हो तो दादरी मुंह बाये खड़ा हो जाता है; जब आप दादरी के बारे में बोलते हो तो देश के लाखों निवासियों को पराया बनाकर शिविरों में ठूंस देने का सवाल झांकता है. एक के बारे में बोलना बाक़ी के बारे में ख़ामोशी सा है. और सबके बारे में एकसाथ बोलने के लिये हमारे कंधे कमज़ोर हैं, सुनने वाले अभी तक सुनने को तैयार नहीं हैं.

इतिहास का अंत नहीं था ऑश्वित्ज़ (आउषवित्ज़) Auschwitz was not the end of history

लेकिन अपनी वैध आलोचना में आडोर्नो एक बात भूल गए : आउषवित्ज़ इतिहास का अंत नहीं था. अमरीकी रेड इंडियनों का विनाश इतिहास का अंत नहीं था, काले अफ़्रीकियों को गुलाम बनाकर अमरीका ले जाना भी इतिहास का अंत नहीं था. उनके साथ करवट लेते हुए इतिहास नये रास्ते पर गया, वे आजतक प्रभुत्व के तबकों के मांस में कांटे की तरह चुभ रहे हैं.

आउषवित्ज़ एक पैरान्थेसिस है, जहां से कोई रास्ता तो नहीं निकलता, ढक्कन से उसे बंद भी नहीं किया जा सकता, लेकिन उसकी सुध लेते हुए, उसे नकारते हुए इतिहास के पिटारे से नया रास्ता निकलता है. हमेशा की तरह लड़खड़ाते हुए, गिरते और उठ खड़े होते हुए वह आगे बढ़ता है.

भारत की ओर देखा जाय. क्या सारे देश में आमसंहार के ज़रिये कुछ समुदायों को ख़त्म कर दिया जाएगा ? क्या बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर मार डाला जाएगा ? लाखों निवासी पराये बनकर शिविरों में हैं. उन्हें कहां भेजा जाएगा ? क्या आउषवित्ज़ की औकात है ?

मुझे पता नहीं क्या होगा. लेकिन कुछ भी हो, उसके खिलाफ़ बोलना बंद नहीं किया जा सकेगा. भाषा रहेगी, संस्कृति रहेगी. उन्हें दखल में लेने की सारी कोशिशों के बावजूद वे प्रतिरोध का स्रोत बनकर ज़िन्दा रहेंगी, फलती-फूलती रहेंगी.

उज्ज्वल भट्टाचार्या

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