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अरुण माहेश्वरी

अरुण माहेश्वरी, प्रसिद्ध वामपंथी चिंतक हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

अरुंधति रॉय और डॉ. राम विलास शर्मा की आँखों से गांधी और अंबेडकर देखना

अरुंधति रॉय की किताब 'एक था डॉक्टर और एक था संत', (Arundhati Roy's book Ek Tha Doctor Ek Tha Sant)

विमर्शमूलक विखंडन और कोरी उकसावेबाजी में विभाजन की रेखा बहुत महीन होती है अरुंधति रॉय की किताब 'एक था डॉक्टर और एक था संत', (Arundhati Roy's book Ek Tha Doctor Ek Tha Sant) की समीक्षा

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बैंकिंग प्रणाली पर संकट और हमारी दिशाहीन सरकार

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

अकर्मण्य अधिकारी सरकार को कुछ न करने की जो दलीलें दे रहे हैं, वे वास्तव में पूरी अर्थ-व्यवस्था को तबाही के रास्ते पर धकेल देने की सिफ़ारिश कर रहे हैं।

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भारतीय अर्थव्यवस्था : अमरीका देख रहा है भारत को वेनेज़ुएला बनाने की सारी सामग्री इकट्ठी हो चुकी हैं

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था : अमरीका देख रहा है भारत को वेनेज़ुएला बनाने की सारी सामग्री इकट्ठी हो चुकी हैं

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शुद्ध रूप से एक विधवा की प्रेम कथा है, प्रणय-प्रेम गाथा है मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘मल्लिका’

Manisha Kulshreshtha's novel 'Mallika'

दरअसल, सच्चा और अकूत प्रेम ही ऐसे प्रणय आख्यानों के सत्य की अनंतता का स्रोत होता है। उसमें कथा को मिथकीय और साथ ही नाटकीय रूप देने की क्षमता होती है।

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‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ : एक फासिस्ट और नाजी परिकल्पना, जिसने मनुष्यता को सिवाय तबाही और बर्बादी के कुछ नहीं दिया

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ : एक फासिस्ट और नाजी परिकल्पना, जिसने मनुष्यता को सिवाय तबाही और बर्बादी के कुछ नहीं दिया

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एक पूर्वाग्रह-ग्रस्त अव्यवस्थित विचार-बुद्धि के उदाहरण राम चंद्र गुहा

आज के टेलिग्राफ़ में रामचंद्र गुहा का लेख (Ramchandra Guha’s article in the Telegraph) है – ‘शाश्वत बुद्धिमत्ता’ (Timeless Wisdom)। इस लेख के मूल में है 14 वीं सदी के अरबी विद्वान इब्न खल्दुन का एक कथन (statement of Ibn Khaldun) जिसमें वे कहते हैं कि ‘राजनीतिक वंश परंपरा में …

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मार्क्सवाद सर्वशक्तिमान है

Karl Marx

मार्क्स की शिक्षाएं पूंजीवाद के तमाम झंडाबरदारों को हमेशा अपने पर लटक रही तलवार की तरह सताती रहती हैं।

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वाम नेतृत्व को अपना खोल पलटने की ज़रूरत है

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

1996 और 2008 भारतीय वामपंथ के इतिहास (History of Indian Left) में सर्वनाश के ऐसे बिंदु रहे हैं, जिनकी समीक्षा से मिलने वाली शिक्षा इसीलिये किसी काम की नहीं है क्योंकि वैसे मौक़े फिर कभी आने वाले नहीं है।

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मार्क्सवादी प्रगतिशीलों की वैचारिक विक्षिप्तता : जातिवादी अस्मिताएँ पूंजीवाद के विरुद्ध कभी संघर्ष के मजबूत आधार नहीं बन सकतीं

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

बहुलता के हुड़दंगी परिदृश्य में से तानाशाही के सही प्रत्युत्तर की तलाश लखनऊ के हिंदी के आलोचक वीरेन्द्र यादव (Hindi critic Virendra Yadav) की फेसबुक टाइमलाइन पर 22 मई को श्री लक्ष्मण यादव की एक पोस्ट पर हमारी नजर पड़ी जिसमें उन्होंने लिखा था — “Virendra Yadav ने एक पोस्ट …

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एग्जिट पोल के संकेत उनकी सच्चाई से कहीं ज़्यादा अवसादकारी हो सकते हैं

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

हमारे जैसे जिन सब लोगों ने यह उम्मीद लगाई थी कि इस बार के चुनाव में मोदी शासन से मुक्ति बिल्कुल संभव होगी, एग्जिट पोल (Exit Polls) से उन सबमें स्वाभाविक रूप से  गहरी निराशा पैदा हुई है। हम जैसों के एक बड़े हिस्से में 2014 के वक़्त भी कम …

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2019 चुनावी परिदृश्य पर एक शुद्ध दार्शनिक चर्चा : मोदी की बुरी हार सुनिश्चित है

Why Modi Matters to Indias Divider in Chief

इस बार के चुनाव का सत्य पूरी तरह से मोदी विरुद्ध खड़ा है। उनकी पराजय का स्वरूप कितना बड़ा और गहरा होगा, इसका चुनाव परिणाम के पहले कोई सटीक अनुमान नहीं लगा सकता है। लेकिन उनकी बुरी हार सुनिश्चित है।

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विद्या-भंजकों का प्रदर्शन; यह बंगाल की अस्मिता पर भाजपा का हमला है

Chittorgarh: BJP chief Amit Shah addresses during a public meeting in Chittorgarh, Rajasthan, on Dec 3, 2018

कल अमित शाह (Amit Shah) जब मध्य कोलकाता के धर्मतल्ला (Dharmatullah of central Kolkata) से उत्तरी कोलकाता में विवेकानंद के निवास (residence of Vivekananda in North Kolkata) तक ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ रवाना हुए उसी समय यह साफ़ नजर आ रहा था कि यह चुनावी रोड शो …

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गुंडई के बल पर बंगाल विजय का दिवस्वप्न देख रही भाजपा बुरी तरह से फँस गई है, खाता भी न खुलेगा

Why Modi Matters to Indias Divider in Chief

बंगाल में चुनाव पर एक सामान्य चर्चा A general discussion on election in Bengal –अरुण माहेश्वरी बंगाल में चुनाव के परिणामों (Election results in Bengal) के बारे में लिखने की कोई इच्छा न होते हुए भी एक बात कहने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ कि यहाँ बीजेपी …

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हताश मोदी भाजपा के बुरे दिनों का संकेत देने लगे हैं

Narendra Modi An important message to the nation

इस चुनावी प्रतियोगिता के अंत के बाद देश की सभी सेकुलर ताक़तों को मिल कर मोदी जैसी भारत-विरोधी सांप्रदायिक ताक़तों को भारत की राजनीति से हमेशा के लिये दूर करने के संकल्प के साथ अपने निर्णय लेने होंगे।

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एक अशिक्षित नेतृत्व से भारत को मुक्त करने का समय आ गया है

Narendra Modi An important message to the nation

मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपने संघी साथियों की खास नजर के दायरे से, उनकी दी हुई अंधता, अज्ञता और अन्यों के प्रति घृणा और नफ़रत के भाव से अलग नहीं हो पाए हैं।

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चौथे राउंड के बाद चुनाव परिणामों के सटीक अनुमान का एक सूत्र जो ऑटिज्म पीड़ित चौकीदार को कर देगा बेहोश !

Narendra Modi An important message to the nation

दी को तमाम धाँधलियों की अनुमति देने के बावजूद यदि चुनाव आयोग किसी भी चरण में, चुनाव परिणामों के बाद भी, इस पूरे चुनाव को ही खारिज करने की हिम्मत नहीं रखता है तो वह मोदी के लिये मददगार साबित नहीं हो सकता

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आज की ये 4 बड़ी खबरें जिन्हें पढ़कर कोई भी भला आदमी सिहर उठेगा कैसे मोदी ने पूरे भारत को सड़ा दिया है

Narendra Modi An important message to the nation

भारत की अभी क्या स्थिति है (What is the situation of India), इसे आज के ‘टेलिग्राफ़’ (Telegraph India) की ख़बरों से जाना जा सकता है। चारों ओर झूठ और धोखाधड़ी का ऐसा साम्राज्य हो गया है कि देश की सभी सर्वोच्च और पवित्र माने जाने वाली संस्थाएँ पूरी तरह से …

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साफ़ दिखाई देने लगी है मोदी की पराजय… मोदी की सूरत बदहवासी में कैसी दिखाई देने लगी है !

Narendra Modi An important message to the nation

गली गली में शोर है’ के प्रत्युत्तर में मोदी का ‘मैं भी चौकीदार’ मैं ही चौकीदार की आत्म-स्वीकृति बन चुका है। मोदी ने फिर एक बार शुद्ध झूठ के आधार पर अपने को ग़रीब चौकीदार दिखाने की जो कोशिश की है, उसे उनके पैसे वाले मित्रों ने ही खुद को चौकीदार घोषित करके ध्वस्त कर दिया है।

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कुछ भी कर लो, 2019 में मोदी की हार मुमकिन ही नहीं सुनिश्चित है

Narendra Modi new look

फेसबुक (Facebook) पर मित्र शम्भुनाथ शुक्ल (Shambhunath Shukla) जी ने 'नया इंडिया' (Naya India) अखबार में वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास (senior journalist Harishankar Vyas) की एक लंबी टिप्पणी यह कहते हुए साझा कि कि मैं 'नया इंडिया' के निष्कर्ष से सहमत नहीं हूँ, लेकिन चुनाव में वोटर के नज़रिये को समझने में हरिशंकर व्यास ने अब तक कभी ग़लती तो नहीं की। व्यास की इस टिप्पणी का शीर्षक था — 'माया, प्रियंका, ममता, तेजस्वी, केजरी जून में होंगे आईसीयू में'। इसमें हरिशंकर जी ने दलील दी है कि मोदी (Modi) जिस प्रकार के अंध-राष्ट्रवाद (blind-nationalism) के तूफान से अपने विरुद्ध भ्रष्टाचार की चर्चाओं (discussions of corruption) को मोड़ दे रहे हैं, उसे देखते हुए यदि विपक्ष की ताकतें एकजुट नहीं होती है तो वे सभी बुरी तरह से पराजित होगी।

इस पर हमने वहीं एक टिप्पणी की कि “इस विश्लेषण को तभी सही माना जा सकता है जब हम यह मान ले कि नरेंद्र मोदी कोरी हिंदुत्ववादी लहर पर सवार हो कर जीते थे; जब हम यह भूल जाएं कि दस साल के मनमोहनसिंह के शासन से व्यवस्था-विरोधी माहौल और भ्रष्टाचार के भारी कांडों से बनी हवा के कारण मोदी की जीत संभव हुई थी; और हम यह भी भूल जाएं कि एड़ी चोटी का पसीना एक कर देने के बाद भी मोदी-शाह गुजरात चुनाव से शुरू हुए अपने पतन को रोक पाने में पूरी तरह से विफल साबित हो रहे हैं। यह सच है कि आगामी चुनाव में मोदी की निश्चित पराजय को इतिहास की एक सबसे बुरी हार में बदलना चाहिए और इसके लिये विपक्ष की एकजुटता जरूरी है।”

इस पर एक और मित्र अनुराग भारद्वाज ने लिखा कि “आप कह रहे हैं मोदी बाई डिफ़ॉल्ट हारेंगे ही?”

मैंने इसके जवाब में विस्तार से जाने के बजाय सिर्फ इतना लिखा — “पक्का”।

दरअसल, यह एक अनोखा दार्शनिक मामला है। किसी खो चुकी चीज को फिर से पूरी तरह से पाने की कोशिश की असंभवता और उससे जुड़ी विसंगतियों का मामला।

मोदी की हाल की एक के बाद एक, तमाम पराजयों की श्रृंखला यह बताने के लिये काफी है कि भारत के लोगों ने अपने भाव जगत में 2014 के मोदी को खो दिया है। अब उसे लौटाने की कोशिश का मतलब है एक खोई हुई वस्तु को खोजना, गुमशुदा चीज की तलाश। यह व्यक्ति के साथ वस्तु के संबंध को (subject-object relation को) नया आयाम देता है। किसी भी वस्तु को इस प्रकार फिर से खोज निकालने की कोशिश में खुद ही ताल बिगड़ जाता है। खोई हुई वस्तु से पुरानी यादें जुड़ी होती है और जब उसे फिर से खोजा जाता है तो उस पर बीते हुए पल को लौटाने के असंभव की छाया पड़ जाती है। इस तलाश में आदमी को जो मिलता है वह कभी भी हूबहू पुरानी चीज नहीं हो सकता है। और यहीं से व्यक्ति-वस्तु संबंध में एक मूलभूत तनाव का प्रवेश हो जाता है।

अर्थात जो खोजा जा रहा होता है, वह वह नहीं होता है जो मिलने वाला होता है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक तौर पर आदमी को वह तब कहीं और, किसी अन्य में दिखाई देने लगता है। जैसा कि अब लोगों को राहुल गांधी में दिखाई देने लगा है। गुजरात के बाद से लेकर विगत पांच राज्यों के चुनावों तक की राजनीतिक परिघटना यही बताती है।

 खोई हुई वस्तु की तलाश ही आदमी में उस वस्तु से एक मूलभूत दूरी पैदा करती जाती है। यह दूरी उस वस्तु के बारे में पहले बन चुकी काल्पनिक अवधारणा के आधार पर तय होती है। मोदी की दैव पुरुष समान पूर्व धारणा ही लोगों को मोदी से अधिक से अधिक दूर करने, उन्हें फेंकू समझने का एक बुनियादी कारण भी है।

इसी सूत्र से न सिर्फ anti-incumbancy के पहलू के पीछे के सच की व्याख्या की जा सकती हैं, बल्कि किसी भी व्यक्ति के द्वारा अपने बारे में पैदा की गई झूठी अपेक्षाओं के निश्चित दुष्परिणामों की नियति को भी समझा जा सकता है।

अस्तित्ववादी दार्शनिक किर्केगार्द कहते हैं कि आदमी हमेशा अतीत के दोहराव की अपेक्षा रखता है, लेकिन वह कभी पूरी नहीं होती क्योंकि दोहराव और स्मृति में मूलभूत विरोध होता है। स्मृतियों में बैठी हुई काल्पनिक धारणा को संतुष्ट करना असंभव होता है।

मोदी का गणित जब एक बार बिगड़ गया है तो आज 2014 का मोदी ही आज के मोदी का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है। मोदी का अपने को हिंदू 'हृदय-सम्राट' और 'दिव्य पुरुष' दिखाना ही उनके लिये महंगा पड़ेगा। फ्रायड ने खोई हुई चीज को पाने की लालसा से पैदा होने वाली निराशा की जिस ग्रंथी की बात कही थी, आज मोदी के संदर्भ में लोगों को वही बेहद परेशान करेगी। आज के मोदी को अपने सिर पर बैठाना अब उनके लिये असंभव होगा। अंध-राष्ट्रवादी विभ्रमकारी प्रचार भी मोदी को फिर से पाने की जनता की कोशिश से पैदा होने वाली निराशा को रोक नहीं पायेगा।

इसीलिये मेरा मानना है कि 2019 में मोदी की हार सुनिश्चित है। वह पराजय कितनी बड़ी होगी, यह उनके खिलाफ महागठबंधन की सफलता के अनुपात पर निर्भर करेगा।  

—अरुण माहेश्वरी

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क्यों फिसल रहे हैं अमित शाह के पैर और मोदी की जुबान

Modi go back

क्यों फिसल रहे हैं अमित शाह के पैर और मोदी की जुबान

Amit Shah's feet and Modi's slip of tongue

उफ्फ ये फिसलनें !

-अरुण माहेश्वरी

चंद रोज पहले ‘वाशिंगटन पोस्ट’ (Washington Post) ने हिसाब लगा कर बताया था कि ट्रंप ने अपने शासन के पिछले 558 दिनों में कुल 4229 बार झूठी बातें कही हैं। अर्थात् प्रतिदिन 7.6 झूठ।

झूठ बोलने की कला में तो ट्रंप से कई मील आगे हैं मोदी

Modi is miles ahead of the trump in the art of lying

इस तथ्य के सामने आने पर ही स्वाभाविक रूप से हमारा ध्यान हमारे मोदी जी की ओर गया। इतना तो हम दावे के साथ कह सकते हैं कि झूठ बोलने की कला में तो ये ट्रंप से कई मील आगे हैं। भारत की राजनीति में मोदी अपनी झूठों की वजह से ही तो अद्वितीय हैं। जब अमेरिका से ट्रंप की झूठों की गिनती आई, तभी हमने बिना गिने ही समझ लिया कि मोदी चूंकि ट्रंप से दुगुना झूठ बोलते हैं, इसीलिये रोज के हिसाब से कम से कम पंद्रह झूठ तो जरूर बोलते ही है।

Why are people like Modi and Trump so lie?

लेकिन हम सोच रहे थे कि आखिर मोदी और ट्रंप जैसे लोग इतना झूठ बोलते क्यों हैं ? और, वे अटकते नहीं, धड़ल्ले से बोलते हैं ! लगता है जैसे हमेशा झूठ बोलना ही इनकी फितरत है ! इसे मनोविश्लेषण में जुबान का फिसलना, slip of tongue कहते हैं और इस प्रकार की फिसलनों से भी विश्लेषक रोगी के मनोविज्ञान को समझने के सूत्र हासिल किया करते हैं।

कहा जाता है कि जिस विषय में आदमी पारंगत नहीं होता, लेकिन अपने को उसी विषय के महापंडित के रूप में पेश करना चाहता है, तब वह अक्सर अपने बोलने की सामान्य गति की तुलना में कहीं ज्यादा तेज गति से बोलने लगता है। अर्थात् यहां उसकी कामना वास्तव में अपने ज्ञान का परिचय देने के बजाय अपनी धाक जमाने की ज्यादा होती है। और यह कामना स्वयं में आदमी के ज्ञान का विपरीत ध्रुव है। आदमी जिस मामले का जितना कम जानकार होता है, उसी मामले में वह अधिक अस्वाभाविक तेजी से बोलता है और, कहना न होगा, उसकी जुबान फिसलने लगती है। वह विषय के बजाय अपनी धाक की कल्पनाओं में खो जाता है। विषय की मर्यादाओं से मुक्त होकर ही वह अपने कल्पनालोक का आनंद ले पाता है। समझने लगता है कि उसके अंदर से तो साक्षात सत्य बोलता है।

Jack Lacan on slip of tongue

जॉक लकान के शब्दों में,

‘इस प्रकार सच और अपने कल्पनालोक के बीच के दोलन में ही उसकी जुबान फिसला करती है।’ झूठ बकना उसका स्वभाव हो जाता है।

ट्रंप और मोदी के साथ बिल्कुल यही बीमारी लगी हुई है। संसदीय जनतंत्र में काम करने का इनका कोई बाकायदा राजनीतिक प्रशिक्षण नहीं है।

ट्रंप रीयल इस्टेट का बड़ा कारोबारी, साम-दाम-दंड-भेद से सौदे पटाने और मौज-मस्ती का जीवन जीने वाला अपने दायरे में एक प्रकार का माफिया सरदार रहा है। तो वहीं, हमारे मोदी भी शुरू में आरएसएस की तरह के हिटलर-पूजक संगठक की अफवाहबाजी के प्रमुख काम के एक संगठक थे। बाद में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर भी उन्होंने पूरे चौदह साल 2002 के जनसंहार को संगठित करने और उसके कानूनी परिणामों को सम्हालने की अपराधी करतूतों में ही मुख्य तौर पर पूरे किये। इसी समय केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार के प्रति जनता के मोहभंग ने उन्हें देश का प्रधानमंत्री बना दिया और यहीं से उनमें अपनी सर्वज्ञता की धाक जमाने का भूत सवार हो गया। सत्ता पर आने के साथ ही वे इतना अधिक ‘मन की बात’ कहने लगे कि शांति से अपने ज्ञान और पद के बीच संतुलन बनाने की कोशिश तक करने की जरूरत नहीं महसूस की। उनके लिखित बयानों में भी धड़ल्ले से झूठ का प्रयोग होता है।

अब तो लाइलाज हो चुका है मोदी का बकबक का मर्ज

बहरहाल, मोदी का यह बकबक का मर्ज अब तो लाइलाज हो चुका है। अब तो जनता नामक हकीम लुकमान ही उन्हें रास्ते पर लायेगा। लेकिन हाल ही में भाजपा के उनके ही अभिन्न अंग अमित शाह में जुबान की फिसलन का यह रोग एक नये रूप में, शरीर की फिसलन के रोग के रूप में सामने आया है। वे जानते है कि वे प्रधानमंत्री तो हैं नहीं, जिनकी जुबान का मूल्य होता है। उनका मूल्य है उनके शरीर से, भाग-दौड़ की उनकी सामर्थ्य से।

मोदी विदेशों में सैर-सपाटों के बाद देश में अपनी धाक के लिये जहां अस्वाभाविक तेज गति से बकबक करते हैं, वहीं अब अमित शाह अस्वाभाविक तेजी से देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में दौड़ने लगे हैं। जितना इन्हें अपनी जमीन खिसकती दिखाई दे रही है, इनकी चाल-ढाल की गति उतनी ही तेज हो जा रही है। और अब उनकी चाल का संतुलन भी बिगड़ने लगा है।

पिछले दो दिनों में अमित शाह मिजोरम में प्लेन की सीढ़ियों से और मध्य प्रदेश में सभा मंच से उतरते हुए लड़खड़ा कर गिर चुके हैं।

मोदी जी की जुबान और शाह के पैरों के फिसलने में पता नहीं क्यों, हमें एक अजीब सी संगति दिखाई दे रही है। दोनों का संपर्क उनकी बिगड़ती मनोदशा से जुड़ा हुआ लगता है।

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trump tells lies on friday saturday and sunday obama tells lies on tuesday wednesday and thursday both said i loved yesterday what day is today, lie said by modi to farmer in 2014 election

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चुनावी मोड में मोदी : अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

Election Mode Modi chunavi mod men Arun Maheshwari चुनावी मोड में मोदी : अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

चुनावी मोड में मोदी : अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

'चुनावी मोड' में जनतंत्र-प्रेमियों का दायित्व

अरुण माहेश्वरी

कल ही 'एबीपी न्यूज' चैनल पर पुण्य प्रसून वाजपेयी कह रहे थे — मोदी अब चुनावी मोड में आ चुके हैं। इसे सही रूप में कहा जाए तो आरएसएस चुनावी मोड में आ गया है। अर्थात्, अब आगे, 2019 तक इनका जो भी प्रकट होगा, मोदी जो बोलेंगे, आंकड़ें देंगे, विरोधियों के लताड़ेंगे और थोथे उपदेश देंगे, सब चुनावी होंगे, एक काल विशेष की जरूरतों के लिये। इन सबका सब कुछ संघोनुकूल हो, जरूरी नहीं है। इसमें बहुत कुछ ऐसा भी होगा जो संघमति वालों के शुद्ध संसार की नजर में पतनशील होगा। मसलन् मोदी मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की बात कर सकते हैं, तो भारत की विविधता में एकता की बात भी कह सकते हैं और किसानों, मजदूरों की सेवा की बात कर सकते हैं। संघमति के शुद्ध मानदंडों पर ये सब पतनशील बाते हैं। कमजोर तबकों की सेवा तो संघमति में पूरी तरह से निषिद्ध है। जैसे हिटलर ने सिर्फ यहूदियों के सफाये का नहीं, देश के सभी अपंगों, बीमार और वृद्ध लोगों को भी गैस चैंबरों के सुपुर्द किया था।

संघ की तात्विकता नाजीवाद है।

हिटलर की 'माइन कैंफ' (आत्मजीवनी) ही नाजियों के बाइबल की तरह इनकी भी गीता है। अर्थात्, जब हम संघमति कहते हैं तो उसका तात्पर्य होता है — मूढ़मति, विनाशमति और सांप्रदायिक मति आदि के योग से निर्मित फासिस्ट-नाजी मति।

क्या मतलब है चुनावी मोड में मोदी' का

दरअसल, 'चुनावी मोड में मोदी' का मतलब होता है संघ जगत के बाहर के एक नये जगत का मोदी। शुद्ध रूप से संघी भुवन से बाहर, उसकी तात्विक विशेषताओं से किंचित भिन्न प्रकट रूपों का मोदी। तत्वमीमांसा में प्राणी के मूल तत्व का हर नया प्रकट रूप उसकी पतनशीलता को दर्शाता है।

चुनावी मोड का मोदी और ट्रौल

तो यह जो चुनावी मोड का मोदी है, कहना न होगा, संघ संसार से अलग इसका अपना एक स्वतंत्र जगत होगा। यह ऑनलाइन गुंडे कहे जाने वाले ट्रौल और खास प्रकार के भक्तों का जगत होगा। चुनावी मोड के मोदी को उनका यही जगत बिल्कुल सही रूप में समझेगा और इसके कामों का असली रूप जाहिर करेगा। इसीलिये, अगर आपको चुनावी मोड के मोदी को जानना है तो उसके ट्रौल जगत के भीतर की तमाम हलचलों को जानना होगा, आपको इस चुनावी मोड के मोदी का मूल रूप समझ में आ जाएगा।

अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ बचा नहीं

इस दौरान इनकी भाषणबाजियों से लेकर भाव-भंगिमाओं तक पर सबकी नजर रहेगी। इनके मर्म को पकड़ने के लिये ही इन पर विचार किया जाएगा। और जब यह विचार-विश्लेषण होगा, इस चुनावी मोड के मोदी के पीछे का पूरा घटना प्रवाह तेजी से सामने आने लगेगा। उनके पूरे काल की समस्याओं से नये सिरे से सामना होगा। दुखों-कष्टों को भूल कर जीने वाले आम आदमी के जख्म फिर एक बार हरे होंगे। दैनंदिन जीवन का यथार्थ लोगों के सर पर चढ़ कर बोलेगा। और इनकी प्रतिक्रिया में मोदी और उनका ट्रौल जगत जो तमाम नाटक करेगा, उनसे उनके हर आने वाले दिन की हरकतों को पहले से ही भापा जा सकेगा। क्या कहा था, क्या किया ! अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ नहीं बचा है। कहना न होगा, आगे उनकी रोजमर्रे की जुमलेबाजी ही उनकी वह सामयिकता होगी, जिसके छद्म को भेद कर रोज इनकी फासीवादी तात्विकता को उघाड़ा जाएगा।

विपक्ष की राजनीति का स्वरूप इन रोजमर्रे के विश्लेषणों और मोदी-संघ की दिशा-दशा पर निर्भर करेगी। उसकी राजनीतिक सिद्धांतवादिता भी इसी प्रकार नये सैद्धांतिक निष्कर्षों के लिये जगह छोड़ेगी। जो ऐसा नहीं करेंगे, वे राजनीति के बाहर के तत्व होंगे। मान लिया जाएगा कि अभी के राजनीतिक घटना-क्रम में उनका कुछ भी दाव पर नहीं है। अन्यथा, इसमें अब कोई शक नहीं है कि हर जनतंत्रप्रेमी और देशभक्त भारतीय के लिये आगे का पूरा साल हर दिन मोदी-संघ और उनके ट्रौल-भक्त जनों के सारे छद्मों को पूरी शक्ति के साथ खोल कर भारत को फासीवाद-नाजीवाद के पंजे से मुक्ति की लड़ाई का साल होना चाहिए।   

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फिर पाकिस्तान की शरण में भाजपा-आरएसएस ! जिन्ना ने एक पाकिस्तान बनाया ये भारत के टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ेंगे

Asylum of Pakistan BJP RSS in shelter of Pakistan

अरुण माहेश्वरी

जब भी कोई महत्वपूर्ण चुनाव आता है, भाजपा-आरएसएस के लोग भारत को छोड़ पाकिस्तान पर पिल पड़ते हैं। पैसठ साल पहले आरएसएस के बारे में अमेरिकी अध्येता जे ए कुर्रान( जूनियर) ने अपने शोध-प्रबंध का अंत इसी बात से किया था कि ‘भारत में आरएसएस का भविष्य काफी हद तक पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों पर निर्भर है’। यह इस बात का भी संकेत था कि आरएसएस अपनी राजनीति के लिये हमेशा किसी न किसी रूप में पाकिस्तान के विषय को उठाने का काम जरूर करता रहेगा।

अब जैसे-जैसे 2019 करीब आ रहा है और लोग मोदी सरकार की निकम्मई पर उसे रात-दिन कोसने लगे हैं तथा खुद मोदी सबको एक भाषणबाज विदूषक नजर आने लगे हैं, भारत के मुद्दों को छोड़ कर संघियों का पाकिस्तान-केंद्रित प्रचार तेज होता जा रहा है।

अभी वे पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति मोहम्मद अली जिन्ना की एक तस्वीर पर भिड़े हुए हैं। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के एक कक्ष में सालों से लगी हुई तस्वीर पर।

यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ कहते हैं कि भारत को तोड़ने वाले जिन्ना की कोई तस्वीर इस देश में नहीं होनी चाहिए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी ‘आज तक’ में दिए गए एक साक्षात्कार में आदित्यनाथ की बात को अनुमोदित किया है।

अब इनसे कोई पूछे कि भारत में द्वि-राष्ट्रवाद और पाकिस्तान बनाने का पहला प्रस्तावक कौन था ? जिन्ना ने तो 1940 में पाकिस्तान की बात कही थी, लेकिन इसके दो साल पहले, 1938 में ही हिंदू महासभा की एक सभा में उसके नेता सावरकर ने द्वि-राष्ट्र का सिद्धांत पेश कर दिया था। सावरकर के बारे में सब जानते हैं कि कालापानी की सजा से छूटने के लिये उन्होंने अंग्रेजों से लिखित तौर पर माफी मांगी थी और अंग्रेजो के हित में काम करने का मुचलका भी दिया था। इसके विपरीत जिन्ना ने कभी अंग्रेजों को उनकी चाकरी का मुचलका नहीं दिया था। उल्टे एक बैरिस्टर के नाते उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बाल गंगाधर तिलक का मुकदमा सफलता के साथ लड़ा था।

इसीलिये अंग्रेजों के दलाल सावरकर के इन वंशधरों को कभी अंग्रेज अधिकारियों की तस्वीरों, मूर्तियों और उनके नाम पर महत्वपूर्ण इमारतों और स्थलों के नामकरण पर आपत्ति नहीं होती है। सिर्फ किसी भी मुसलमान के नाम को देख कर ये उस पर पिल पड़ते हैं !

कहना न होगा, ये लोग जिस पथ के पथिक हैं, इनका वश चले तो अपने आका पश्चिमी साम्राज्यवादियों के इशारे पर ये भारत के टुकड़े-टुकड़े करके छोड़ेंगे। जिन्ना ने एक पाकिस्तान बनाया, ये हर प्रदेश को हिंदुस्तान-पाकिस्तान बना डालेंगे।

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#DeMonetisation – गहरी मंदी आयेगी, मंदी का अर्थ उस अनुपात में अर्थ-व्यवस्था की हत्या

Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

#DeMonetisation - गहरी मंदी आयेगी, और मंदी का अर्थ ही है उस अनुपात में अर्थ-व्यवस्था की हत्या अरुण माहेश्वरी पी चिदंबरम ने बिल्कुल सही कहा है कि नये नोट छापने में जो पंद्रह से बीस हज़ार करोड़ का ख़र्च होगा, सरकार इस क़दम से अगर उतनी आमदनी नहीं कर सकती है तो इस क़दम से राष्ट्र को सीधा नुक़सान होगा। सरकार अगर यह उम्मीद करती है कि लोग दो सौ प्रतिशत पैनल्टी देने के लिए बैंकों में अपना काला धन जमा करेंगे तो वह मूर्खों के स्वर्ग में वास कर रही है। तब सवाल उठता है कि सरकार को आमदनी कैसे होगी ? सालों पहले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स ने जर्मनी के ऐसे ही एक संदर्भ में कहा था कि करेंसी बदलने से नहीं, अर्थ-व्यवस्था को लाभ होता है रोज़गार बढ़ाने से। जर्मनी में भी तब कुछ इसी प्रकार का बहाना बनाया गया था कि यहूदियों की काली अर्थ-व्यवस्था को रोकने और फ्रांस और इंग्लैंड से आने वाली नक़ली मुद्रा पर क़ाबू पाने के लिये यह क़दम उठाया जा रहा है। कीन्स ने कहा था कि जब किसी सरकार की विश्वसनीयता कम होने लगती है तभी वह इस प्रकार के झूठे और दिखावटी काम किया करती है। According to the great economist John Maynard Keynes, “There is no subtler, no surer means of overturning the existing basis of society than to debauch the currency. The process engages all the hidden forces of economic law on the side of destruction, and does it in a manner which not one man in a million is able to diagnose.” कहना न होगा, सरकार का इस प्रकार अचानक लगभग 90 प्रतिशत करेंसी को बदलने का फ़ैसला करेंसी को शुद्ध करने से कहीं ज्यादा उसे बर्बाद करने का फ़ैसला साबित होगा, क्योंकि यह अर्थ-व्यवस्था में करेंसी की भूमिका को तात्कालिक तौर पर इस प्रकार व्याहत करेगा जिसका असर काफी दिनों तक अर्थ-व्यवस्था पर पड़ेगा। इससे इतनी गहरी मंदी आयेगी, जिससे आसानी से निकलना मुश्किल होगा। और मंदी का अर्थ ही है उस अनुपात में अर्थ-व्यवस्था की हत्या। भारत में रोज़गारों की स्थिति के बारे में विश्व बैंक का मानना है कि ऑटोमेशन के चलते आने वाले एक दशक में भारत में रोज़गारों में काफी कमी आएगी। इसके लगभग 70 प्रतिशत तक कम होने की आशंका है। मोदी सरकार के विमुद्रीकरण की तरह के क़दम इस प्रक्रिया को बेहद तेज़ करने वाले क़दम साबित होंगे। अर्थात जिस ख़तरे का अंदाज दस साल में किया जा रहा है, वह चंद सालों में ही प्रत्यक्ष होने लगेगा। Save

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