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Kavita Arora

सुलह की कोशिशों में रात भर इक चाँद भटकता है…..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

यह सितम्बर के गीला-सीला दिन.. फ़लक को भरमाये.. बादलों की पोटली में कुछ-कुछ धूप लटकाये… शाम को ढलकर.. हौले-हौले चलकर.. जब क्षितिज की ड्योढ़ी पर पसरता है.. बालों से बारिशें …

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मेरे शहर की/ तरक़्क़ी का यह मंज़र/ किसके हिस्से में आता है

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

काली रात की बस से उतरा रौशनी का छिटका, सहर की चिल्ल पौं, ट्रकों के हॉर्न की आवाज़ में भी बेसुध…बे खटका… वो रोड के डिवाइडर पर औंधे मुँह पड़ा …

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झुमके वाली बरेली से गहरा नाता रहा उन मुंशी प्रेमचंद का जिन्होंने बताया था बहुत से हिन्दू कर्बला में हुसैन के साथ थे

Munshi Premchand

मुंशी प्रेमचंद जयंती स्‍पेशल Munshi Premchand Jayanti Special बरेली, 31 जुलाई 2019. आज उपन्यास सम्राट और हिंदी कहानी के पुरोधा, प्रगतिशील साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुंशी प्रेमचंद की जयंती …

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अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न हैं किसी सूखे गुलाब की तरह

Munshi Premchand

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए। सवाल यह है कि किताबों ने क्या दिया मुझको ? अफ़सोस किताबों के लिखने वाले भी किताबों के सफ़हों में दफ़्न …

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लोग कोस रहे हैं/ यह विकृत मानसिकता वालों का कृत्य है/ मगर मै पूछती हूँ क्या केवल यही सत्य है ??

रेप के मौसम नहीं होते.. उम्र-वुम्र ठिकाने भी नहीं… मंदिर-वंदिर, मस्जिद-वस्जिद, घर-रिश्तेदारी, इराने-वीराने किसी भी कारण ..किसी बहाने .. कहीं भी हो सकता है … चस्का है, लत है हिन्दुस्तान …

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अँधियारे पाख की इक कविता है जिसने चाँद बचा रक्खा है ..

डॉ. कविता अरोरा शुक्ल पक्ष फलक पर ढुलकता चाँद …टुकड़ी-टुकड़ी डली-डली घुलता चाँद …सर्दी ..गरमी ..बरसात ..तन तन्हा अकेली रात …मौसमों के सफ़र पर मशरिक़ से मगरिब डोलता है ..निगाहों-निगाहों …

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देश नशे में है .. अफीम की खेती ही फूलेगी फलेगी…तमाशा ख़त्म हुआ ..चलो बजाओ…ताली…

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

महीनों से चल रहा मेला उखड़ने लगा.. खर्चे-वर्चे, हिसाब-विसाब, नफ़े-नुक़सान के कुछ क़िस्से कौन सा घाट किसके हिस्से… अब बस यही फ़ैसला होगा… बंदर बाट होगी काट छाँट होगी… बस …

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धूल भरे मौसमों की ख़ुमारी पर दो बूँद की बारिश….

Ishq

धूल भरे मौसमों की ख़ुमारी पर दो बूँद की बारिश…. सौंधी महक से बौराई.. फ़िज़ां में…. शबनमी अल सुबहा के जोगिया लशकारे.. दरख़्तों के चेहरों से सरकते हैं.. तो.. अलसाये …

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तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस…..

kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस….. डॉ. कविता अरोरा हाँ हमने मान लिया…. हम रिश्ते नहीं..महज़..जिस्म हैं… जिस्म…. बग़ैर फ़र्क़ कि उम्र क्या …

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