लोग कोस रहे हैं/ यह विकृत मानसिकता वालों का कृत्य है/ मगर मै पूछती हूँ क्या केवल यही सत्य है ??

रेप के मौसम नहीं होते.. उम्र-वुम्र ठिकाने भी नहीं... मंदिर-वंदिर, मस्जिद-वस्जिद, घर-रिश्तेदारी, इराने-वीराने किसी भी कारण ..किसी बहाने ..

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अँधियारे पाख की इक कविता है जिसने चाँद बचा रक्खा है ..

डॉ. कविता अरोरा शुक्ल पक्ष फलक पर ढुलकता चाँद ...टुकड़ी-टुकड़ी डली-डली घुलता चाँद ...सर्दी ..गरमी ..बरसात ..तन तन्हा अकेली रात ...मौसमों के सफ़र प

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kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

देश नशे में है .. अफीम की खेती ही फूलेगी फलेगी…तमाशा ख़त्म हुआ ..चलो बजाओ…ताली…

महीनों से चल रहा मेला उखड़ने लगा.. खर्चे-वर्चे, हिसाब-विसाब, नफ़े-नुक़सान के कुछ क़िस्से कौन सा घाट किसके हिस्से... अब बस यही फ़ैसला होगा... बंदर बाट

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kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

तुम मनाओ 15अगस्त…./ मैं अफ़सोस मनाऊँगी…./  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस…..

तुम मनाओ 15अगस्त..../ मैं अफ़सोस मनाऊँगी..../  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस..... डॉ. कविता अरोरा हाँ हमने मान लिया.... हम रिश्ते नहीं..महज़..जिस्म ह

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kavita Arora डॉ. कविता अरोरा

यूँ तो मुझे ….. खुद छूना था उसे … छू ..भी लेती …. पर क्या करूँ ….

डॉ. कविता अरोरा कल शाम छत पर ... बारिशों के रूके पानी में शफ़क घोल रहीं थी अपने रंग ... कि मैंने कलाई थाम लीं ... फँसा दी साँझ की गुलाबी उँगलियों

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