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राजा का नहीं दोष गुसाईं!!! अकेले नहीं हैं राजा और येदियुरप्पा

सत्ता के गलियारों
में बड़ी कंपनियों के बीच टेंडर और लाइसेंस हासिल करने के लिए उठा पटक चलती ही रहती
है। इस उठापटक का एक फायदा राष्ट्र को यह होता है कि कॉरपोरेट घराने (Corporate
houses) और उनका बंधक कॉरपोरेट
मीडिया
(Corporate media)
एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए घोटालों के राज उगलते रहते हैं। अब अगर रतन
टाटा कह रहे हैं कि बिना रिश्वत के काम नहीं होता तो टाटा को यह भी बताना चाहिए कि
उन्होंने कौन-कौन से टेंडर और
लाइसेंस
(Tender and license)
रिश्वत देकर हासिल किए? हालांकि
टाटा और बिरला दोनों ही अंग्रेजी हुकूमत के समय से इन ठेका पट्टाराज में चल रहे
भ्रष्टाचार की उपज हैं। उनकी अगली कड़ी अंबानी और अनिल अगवाल और रेड्डी बंधु है। इसीलिए कारपोरेट मीडिया केवल ए राजा (A
Raja) पर पर चर्चा कर रहा
है लेकिन राजा को पैदा करने वाले पूंजीपतियों और अफसरशाहों के योगदान पर चर्चा
करने से कतरा रहा है। हालांकि अगर कायदे से इस घोटाले की परतें उघाड़ी जाएं तो इसकी
तह में राजग मिलेगा क्योंकि वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में निजी टेलीकॉम कंपनियों
को लाइसेंस फ़ीस व्यवस्था से राजस्व साझेदारी की व्यवस्था में बदलने की अनुमति दी
गई थी। तब सभी टेलीकॉम कंपनियों (Telecom
companies)
ने मिलकर नीति बदलवा
दी। लिहाजा भुगता देश के खजाने ने और राष्ट्रवादी भाजपा ने राष्ट्र का खजाना लूटने
का रास्ता खोलकर राजा के जन्म का रास्ता साफ कर दिया।

लेकिन जहां तक
राजनीति में भ्रष्टाचार का सवाल है, राजा न पहले हैं और न आखिरी। ऐसा भी नहीं है कि जिनके मामले
सामने नहीं आए हैं उनके ईमानदार होने की कोई गारंटी दी जा सकती हो। क्या जरूरी है
जिनके मामले आज नहीं खुले कल भी उनके मामले नहीं खुलेंगे या जिनके मामले नहीं
खुलेंगे वह दूध के धुले ही होंगे।

ऐसा भी नहीं है कि
राजा के यह कारनामे एकदम सामने आए हों। बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इनकी
जानकारी रही ही होगी। बीते वर्ष 21 अक्टूबर को एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी जिसमें
दूर संचार विभाग के अज्ञात अधिकारियों व्यक्तियों/ कंपनियों पर सरकार को धोखा देने
का आरोप लगाया गया और कहा गया कि स्पेक्ट्रम (Spectrum) को बिना नीलामी किए सस्ती दर पर बेचा
गया। अगले ही दिन सीबीआई (CBI)
ने दूर संचार विभाग के अधिकारियों के ठिकानों पर छापे मारे। जब विपक्ष ने संचार
मंत्री ए राजा के इस्तीफे की मांग की तो प्रधानमंत्री ने कह दिया कि कोई घोटाला
हुआ ही नहीं है।

दरअसल कांग्रेस राजा
के खिलाफ कुछ भी करने से इसलिए डर गई क्योंकि राजा ने कह दिया था कि जो कुछ हुआ वह
मंत्रिमंडलीय समिति की जानकरी में था और  लाइसेंस मुद्दे की प्रक्रिया की पूरी जानकारी प्रधानमंत्री को
दे दी गई थी।

राजा का बाजा बजाने
पर उतारू भाजपा कर्नाटक में स्वयं भ्रष्टाचार का लंबा खेल खेलने लगी। मुख्यमंत्री बी.एस.
येदियुरप्पा
(Bs Yeddyurappa) का  भूमि
घोटाले में नाम आने के बावजूद भाजपा न केवल बेशर्मी से उनका बचाव कर रही है बल्कि
उनको ईमानदार होने का प्रमाणपत्र भी जारी कर रही है।

अब येदियुरप्पा उस
भूमि को सरकार को वापस करने का वादा कर रहे हैं जिसको उनके परिजन डकार गए थे। आरोप
है कि मुख्यमंत्री ने एक कंपनी को भूमि आवंटित की जिसमें उनके दो पुत्र भागीदार
हैं।

येदियुरप्पा ने
स्वीकार किया है कि उनके बेटों, बेटी, दामाद, बहन और उनके बेटे व बहू को आवासीय और औद्योगिक प्लॉट्स आवंटित
किए गए हैं। उन्होंने यह कहते हुए अपना बचाव किया कि उनके पूर्ववर्ती सरकारों ने
भी ऐसा किया है।

पूर्व प्रधानमंत्री
एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली जनता दल (सेक्यूलर) ने मुख्यमंत्री बी.एस.
येदियुरप्पा पर 5,000
करोड़ रुपये के भूमि आवंटन का आरोप लगाते हुए लोक आयुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई
कि 180 एकड़ भूमि सरकार के कब्जे से मुक्त कर मुख्यमंत्री के परिजनों में आवंटित की
गई। शिकायत 580 पन्नों में की गई है।

सवाल यह है कि क्या
नैतिकता के आधार पर राजा का बाजा बजाने वाली भाजपा स्वयं अनैतिक कार्यों में लिप्त
नहीं है
? इतना ही नहीं  करोड़ों रूपए के खनन घोटाले में संलिप्त
कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं के खिलाफ भाजपा ने न तो कोई कार्रवाई की बल्कि पूरा
भाजपा नेतृत्व रेड्डी बंधुओं के सामने दण्डवत प्रणाम करता रहा।

इससे पहले भी उत्तर
प्रदेश मे जब भाजपा की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे तो भाजपा सरकार ने
साध्वी ऋतंभरा के एक ट्रस्ट को अरबों रूपए की कीमत वाली जमीन मात्र एक रूपए बीघा
में बेच दी थी। बाद में काफी हंगामा होने पर यह जमीन वापस की गई।

दरअसल भाजपा आरएसएस
के नेता इन्द्रेश कुमार के आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने के प्रकरण से जनता
का ध्यान हटाने के लिए पहले राष्ट्रमंडल खेल और आदर्श हाउसिंग सोसायटी में व्याप्त
भ्रष्टाचार के मामलों पर कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास
किया लेकिन जब राष्ट्रमंडल खेलों के घोटालों में भाजपा नेता सुधांशु मित्तल
और आदर्श घोटाले की लपटें भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तक पहुंचने लगीं तो
उसने निशाना राजा को बनाया लेकिन कर्नाटक की आग से भाजपा कैसे निकलेगी?

घोटालों ओर राजनीति
का चोली दामन का साथ स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही रहा है। सबसे पहले घोटाले
का पर्दाफाश तत्कालीन प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू के दामाद फिरोज गांधी ने ही
किया था और हरिदास मूंदड़ा के खिलाफ संसद में आवाज उठाई थी। इस घटना से पं नेहरू की
सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था और तत्कालीन वित्त मंत्री को त्यागपत्र
देना पड़ा था। 1957 में हुए इस घोटाले को घोटाला युग का सूत्रधार कहा जा सकता है।
इससे पहले आजादी के तुरन्त बाद जीप घोटाला भी हुआ था और उस समय ब्रिटेन में भारत
के उच्चायुक्त कृष्णा मेनन के ऊपर इस घोटाले को लेकर उंगलियां उठी थीं। तब से चला
सिलसिला 1980 में तेल कुंआ घोटाला, 1982 में अंतुले प्रकरण, फिर चुरहट लाटरी कांड जिसमें कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह पर भी
उंगलियां उठी थीं, नब्बे
के दशक में शेयर घोटाला, चारा
घोटाला, हवाला कांड, नरसिंहाराव का सांसद रिश्वत कांड, अब्दुल करीम तेलगी का स्टाम्प घोटाला, तहलका का रक्षा सौदा भंडाफोड़ से होता
हुआ मधु कोड़ा से नीतीश कुमार तक होता हुआ अशोक चव्हाण, ए राजा और येदियुरूप्पा तक जा पहुंचा
है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुखराम को आय से अधिक संपत्ति के मामले में दिल्ली की
तीस हजारी अदालत ने तीन साल की सजा सुनाई व दो लाख रूपए का जुर्माना भी सुनाया।
लेकिन उन्हें सजा भुगतने के लिए जेल नहीं जाना पड़ा क्योंकि अदालत ने पचास हजार
रूपये के निजी मुचलके पर उन्हें जमानत दे दी। बारह साल तक चले इस केस में अदालत
में यह साबित हो गया था कि नरसिम्हाराव सरकार में संचार मंत्री रहते हुए सुखराम ने
ठेके देते वक्त भ्रष्टाचार किया था। सीबीआई ने उनके घर छापा मारकर 3 करोड़ 61 लाख
रूपये पकड़े थे। तब सुखराम ने इन रूपयों को पार्टी का चंदा बताया था, लेकिन
कांग्रेस द्वारा इस धन से पल्ला झाड़ लेने के कारण सुखराम मुसीबत में पड़ गए थे। बाद
में पं. सुखराम हिमाचल में कांग्रेस से बदला लेने के लिए भाजपा के साथ हो गए थे और
भाजपा की सरकार उनके आशीर्वाद से ही चली।

बताया जाता है कि
सुखराम राजनीति में कदम रखने से पहले मंडी के स्कूल में क्लर्क थे। ए राजा इन्हीं
सुखराम और भाजपा के मैनेजर प्रमोद महाजन के मंत्रालयी वारिस हैं।

झारखण्ड के पूर्व
मुख्यमंत्री कोड़ा का मामला इस मामले में अद्भुत है कि उनके प्रकरण से यह राज उजागर
हो गया है कि कुछ दिनों का मुख्यमंत्री किस तरह चुटकियों में अरबों रूपया बना सकता
है। मात्र डेढ़ दशक पहले एक ठेका मजदूर की हैसियत से अपने कैरियर की शुरूआत करने
वाले कोड़ा शुरू में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े और उसके चरित्रवान (संघ और
चरित्रवान?) कार्यकर्ता रहे। बाद
में भाजपा के टिकट पर विधायक चुन लिए गए। जब राज्यसभा चुनाव में उन्होंने क्रॉस
वोटिंग की तो भाजपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। लेकिन तब तक चतुर सुजान
कोड़ा भारतीय राजनीति की कमजोर नब्ज को पहचान चुके थे। वह निर्दलीय चुनाव लड़ गए और
चुनकर आए। उनके भाग्य ने पलटा खाया और भाजपा को उन्हीं कोड़ा की शरण में जाकर सरकार
बनानी पड़ी जिन्हें उसने कुछ दिन पहले ही बाहर का रास्ता दिखाया था। कोड़ा ने अपनी
पूरी कीमत भाजपा से वसूली और समय आने पर अपने पुराने अपमान का बदला अर्जुन मुंडा
की सरकार गिराकर ले लिया। कांग्रेस ने उनका सहयोग किया और कोड़ा ने निर्दलीय विधायक
की हैसियत से मुख्यमंत्री बनने का कीर्तिमान स्थापित किया।

बोफोर्स तोप घोटाले
का जिन्न भी दो दशक से भारतीय राजनीति का पीछा करता आ रहा है। हालांकि इसमें स्व.
राजीव गांधी के दामन पर जो दाग पड़े थे अब वह धुल चुके हैं और इस मुद्दे को उठाने
वाले स्व. वीपी सिंह भी अपने जीवन के अंतिम क्षणों में ऐसा आरोप लगाने के लिए एक
तरह से अपराधबोध का इजहार करने लगे थे। लेकिन क्वात्रोची को बचाने की कोशिशें करने
पर कांग्रेस बार-बार सवालों के घेरे में आ जाती है। पूर्व विदेश मंत्री कुंवर नटवर
सिंह भी वोल्कर समिति की रिपोर्ट आने के बाद इराक को तेल के बदले अनाज के घोटालें
में घिर चुके हैं।

इनेलो नेता ओमप्रकाश
चौटाला भी सीबीआई की नजर में लगभग 2000 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं और इनकी
सरकार में शिक्षक भर्ती घोटाले के आरोप लग चुके हैं। इसी तरह पंजाब के मुख्यमंत्री
प्रकाश सिंह बादल भी भ्रष्टाचार के मामलों में फंस चुके हैं। उन पर भी कई स्थानों
पर होटल और अवैध संपत्ति जमा करने के आरोप हैं। जबकि उनके प्रतिद्वन्दी पूर्व
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह भी ऐसे ही आरोपों का सामना कर रहे हैं।

राजद सुप्रीमो लालू
प्रसाद यादव का चारा घोटाला तो काफी चर्चा में रहा। इस केस में कई लोगों को सजाएं
हो चुकी हैं और लालू को कब सजा होती है देखना पड़ेगा।

इसी तरह राममनोहर
लोहिया के समाजवाद के थोक विक्रेता मुलायम सिंह यादव भी आय से अधिक संपत्ति के
मामलों का सामना कर रहे हैं। उनके मामले में भी कई दिलचस्प मोड़ आए। वही सीबीआई
जिसने उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी, यूपीए सरकार को सपा के समर्थन के
बाद कहने लगी कि अब मुकदमा चलाने की कोई जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं वह विश्वमोहन
चतुर्वेदी जिन्होंने अदालत में मुलायम सिंह को घसीटा था, अब स्वयं अदालत से गैर
हाजिर चल रहे हैं।

इसी तरह मुलायम सिंह की
धुर विरोधी मायावती भी ताज कोरीडोर मामले और आय से अधिक संपत्ति के मामलों का
सामना कर रही हैं।

इसी तरह अनुसूचित
जाति आयोग के अध्यक्ष सरदार बूटा सिंह के सुपुत्र स्वीटी सिंह एक ठेकेदार से तीन
करोड़ रूपए की रिश्वत मांगने पर पकड़े गए।

तमिलनाडु की पूर्व
मुख्यमंत्री जयललिता भी अकूत संपत्ति की मालकिन हैं। वह तांसी भूमि घोटाले में
फंसी। लेकिन एक तकनीकी फॉल्ट के कारण सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गईं। बताया जाता है
कि जब उनकी मां की मृत्यु हुई थी तब उनके पास अपनी मां का अन्तिम संस्कार करने के
लिए पैसे नहीं थे लेकिन जब उनके दत्तक पुत्र का विवाह हुआ और उनके धर पर छापे में
उनके गहने और कपड़े पकड़े गए तो सारी दुनिया ने आश्चर्य से अपनी अंगुली दांतो तले
दबा ली।

उत्तर प्रदेश के
परिवहन मंत्री रामअचल राजभर भी आरोपों के घेरे में हैं। बताया जाता है कि
अम्बेडकरनगर बार एसोसिएशन ने राजभर की संपत्तियों की सीबीआई जांच कराने का अनुरोध
करते हुए एक याचिका दायर करके कहा है कि राजभर किसी समय साइकिल पर घूम-घूमकर चूहा
मार दवा बेचा करते थे ऐसे में उनके पास अकूत संपत्ति कहां से आ गई?

एनडीए सरकार में एक
वेबसाइट तहलका डॉट कॉम ने रक्षा सौदों में दलाली का भंडाफोड़ किया था। जिसमें
तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज, उनकी सखी और समता पार्टी अध्यक्षा जया जेटली व भाजपा अध्यक्ष
बंगारू लक्ष्मण फंसे थे। लेकिन एनडीए सरकार ने बहुत निर्लज्जता के साथ सीबीआई को
यह जांच करने का आदेश दे दिया कि तहलका की यह स्टिंग आपरेशन करने की मंशा क्या थी? इतना ही नहीं सीबीआई ने तहलका के
पत्रकारों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में वन्य जीवों का अवैध शिकार करने का मुकदमा
कायम कर दिया था। बाद में कारगिल शहीदों के लिए ताबूत खरीदने में घोटाले के आरोप
भी एनडीए सरकार पर लगे थे।

इस कड़ी मे एक और
चौंकाने वाला नाम माकपा की केरल इकाई के सचिव पी विजयन का है। अभी तक यह धारणा थी
कि वामपंथी दलों के नेताओं में नैतिकता है और वह ऐसे कारनामों में लिप्त नहीं रहते
हैं। लेकिन विजयन ने इस मिथक को तोड़ा है।

इसी तरह माकपा सांसद
नीलोत्पल बसु का एनजीओ भी सवालों के घेरे में है।

विगत लोकसभा में
सांसदों का कैश फॉर क्वैरी कांड की गूंज भी काफी तेज रही। एक निजी टीवी चैनल के
स्टिंग ऑपरेशन में कई सांसद पैसा लेकर संसद में सवाल पूछते पकड़े गए। लेकिन
तत्कालीन लोकसभा अधयक्ष सोमनाथ चटर्जी के कड़े रुख के बाद संसद ने इन सांसदों की
सदस्यता रद्द कर दी। इसमें भी एक दिलचस्प पहलू यह है कि बसपा के एक सांसद राजाराम
पाल जो इस कांड में अपनी सदस्यता गंवा बैठे थे वर्तमान सदन में कांग्रेस के माननीय
सदस्य हैं। इसलिए भ्रष्टाचार की इस गंगा में डुबकी लगाने वाले हर दल के सदस्य हैं।
यह सत्ता का चरित्र है। राजा का नहीं दोष गुसाईं!!!

अमलेन्दु उपाध्याय

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