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साहित्य का कोना। कहानी, व्यंग्य, कविता व आलोचना. Literature Corner. Story, satire, poetry and criticism. साहित्य, कला, संगीत, कविता, कहानी, नाटक, व्यंग्य… और अन्य विधाएं, Literature, art, music, poetry, story, drama, satire … and other genres.

आचार्य जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ : हिंदी के प्रथम छंद शास्त्री और हिंदी के सर्वप्रथम ‘महामहोपाध्याय’

biography of acharya jagannath prasad 'bhanu'

आचार्य जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ की जीवनी | Biography of Acharya Jagannath Prasad ‘Bhanu’ हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के प्रारंभिक वर्षों में साहित्य नियमन के तीन अंग (three parts of literary regulation), भाषा, व्याकरण और साहित्य शास्त्र के नेतृत्व की बागडोर मूल रूप से ‘द्विवेदी… गुरू… भानु’ की महत्त्रयी के हाथों में रही। भारतेन्दु काल में आधुनिक समीक्षा (Modern Review …

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हाँ! वो माँ ही तो थी

mona agarwal

वो माँ ही तो थी, जो तुरपती रहती थी, अपना फटा पल्लू बार-बार, ताकि हम पहन सकें, नया कपड़ा, हर त्यौहार। वो माँ ही तो थी, जो खा लेती थी, बासी रोटी चुपचाप, ताकि टिफ़िन हम ले जा सकें फ़र्स्ट क्लास॥ वो माँ ही तो थी, जो सो जाती थी गीले गद्दे पर हर बार, ताकि नींद हमारी ना टूटे …

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दलित अस्मितावाद और हिंदुत्व दोनों के साझे दुश्मन गांधी ही क्यों?

bhimrao ambedkar ek jeevani by jaffrelot christophe in hindi

Book review : Bhimrao Ambedkar Ek Jeevani by Jaffrelot Christophe in Hindi अंबेडकर पर ज़्यादातर भाववादी लेखन दिखता है। जिसकी दिक़्क़त है कि वो समझ से ज़्यादा भक्तिभाव उत्पन्न करता है, जो अपने से बड़ी भावनाओं के राजनीतिक उभार के दौर में बहुत आसानी से उसमें समाहित हो जाता है। यहाँ तक कि अगर सत्ता किसी समुदाय के जनसंहार की …

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अशोक भौमिक : प्रसिद्ध चित्रकार और चित्रकला के इतिहासकार

book review

Ashok Bhowmik: Famous painter and historian of painting अशोक भौमिक देश के प्रसिद्ध चित्रकार हैं और चित्रकला के इतिहासकार भी। यह उनकी सदाशयता है कि हम जैसे मामूली इंसान भी उनके दोस्तों में शामिल हैं। अशोक भौमिक का स्तंभ ‘चित्रकला और मनुष्य’ अपनी पत्रिका में उनका स्तंभ चित्रकला और मनुष्य हम नियमित छाप नहीं सकते, फिर भी दशकों की मित्रता …

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मीर तक़ी ‘मीर’ और आत्मकथा लेखन की चुनौतियां

jagdishwar chaturvedi

Mir Taqi ‘Mir’ and the Challenges of Writing Autobiography इन दिनों आत्मकथा पर बहुत बातें हो रही हैं,लेखक-लेखिकाएं आत्मकथा लिखने में व्यस्त हैं, आत्मकथा की परंपरा और विधागत संस्कारों को अधिकतर आत्मकथा लेखक जानते ही नहीं हैं, उनके आत्मकथा लेखन में निजी जीवन इस कदर छाया हुआ है कि आपको लेखक का समकालीन समाज और इतिहास नजर ही नहीं आएगा। …

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बाबू जगजीवनराम के सामने अंबेडकर को खड़ा करने का संघी षड़यंत्र जिसे कांशीराम ने अंजाम दिया !

jagjivan ram and his leadership important book on the relationship between jagjivan ram and ambedkar

‘जगजीवन राम और उनका नेतृत्व’ इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद की बाबू जगजीवनराम पर किताब बाबू जगजीवन राम पर बहुत कम किताबें हैं। अक्सर, दलित राजनीतिक विमर्श डॉ अंबेडकर तक ही केंद्रित रह जाने के कारण 1937 से 1987 तक  संसदीय राजनीति में किसी न किसी अहम ज़िम्मेदारी में रहने के बावजूद सचेत तौर पर उन्हें इग्नोर किया जाता है, जिसकी एक …

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तू तुलसी मेरे आँगन की हो गयी…

mona agarwal

मेरे पैरों में डालकर बेड़ियाँ, वे कहते हैं, गर्व से, कि पायलें आज चाँदी की हो गयीं। और हाथों में पहनाकर हथकड़ियाँ, वे कहते हैं, चुपके से, कि चूड़ियाँ काँच से सोने की हो गयीं॥ और जो पहनाई नाक में, एक चुन्नी, बड़े चाव से, चुपके से मेरे, खुद ही हँस पड़े खिलखिलाकर कि ये भी पत्थर से हीरे की …

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समता, बंधुता और शांति का पैरोकार हो रंगमंच !

Manjul Bhardwaj

Theater should be an advocate of equality, fraternity and peace! 27 मार्च, विश्व रंगमंच दिवस पर | March 27, on World Theater Day in Hindi  समता,बंधुता और शांति का पैरोकार हो रंगमंच, पर ऐसा हो नहीं रहा। रंगमंच सत्ता के वर्चस्व का माध्यम भर रह गया है और रंगकर्मी उसकी कठपुतलियाँ जो रंगकर्म के मूल उद्गम के ख़िलाफ़ है। रंगकर्म …

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परंपरा के अध्ययन के निर्जीव अकादमिक ढाँचे की भेंट चढ़ा रमेश कुंतल मेघ का ग्रंथ मध्ययुगीन रस-दर्शन और समकालीन सौन्दर्यबोध

ramesh kuntal megh

Arun Maheshwari on Ramesh Kuntal Megh (‘बनास जन‘ पत्रिका का 52वां अंक हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वयोवृद्ध आलोचक, सौन्दर्य चिंतक श्री रमेश कुंतल मेघ के कृतित्व पर केंद्रित एक मूल्यवान विशेषांक है जिसका संपादक जाने-माने आलोचक श्री प्रदीप सक्सेना ने किया है। इस अंक का शीर्षक रखा गया है – ‘मेघ : सौन्दर्य चिंतन के वातायन‘। ‘बनास जन’ के इस अंक …

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बोलियों का साहित्य कहाँ गायब हो गया?

literature and culture

Where did the literature of dialects disappear? बांग्ला में दो तरह की भाषा प्रचलित रही है। बंकिम चंद्र की तत्सम संस्कृतमुखी बांग्ला (Bankim Chandra’s Tatsam Sanskritmukhi Bangla) और जनभाषा, जो लोग बोलते हैं। बांग्लादेश का समूचा साहित्य लोक संस्कृति में रचे बसे जनपदों की बोलियां हैं। जैसे हम हिंदी के संत साहित्य में पाते हैं। बृज भाषा, अवधी, मैथिली, बुंदेलखंडी …

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विश्वनाथ प्रताप सिंह : राजनीति की कूटनीति में असहज एक संवेदनशील व्यक्तित्व

book review

Book Review of The Disruptor: How Vishwanath Pratap Singh Shook India Book by Debashish Mukerji in Hindi | देबाशीष मुखर्जी की पुस्तक द डिसरप्टर: हाउ विश्वनाथ प्रताप सिंह शुक इंडिया की समीक्षा हिंदी में विश्वनाथ प्रताप सिंह जिन्हें अधिकांश लोग वीपी सिंह के नाम से जानते हैं, वह 7 अगस्त 1990 के बाद से भारत के उन चुनिंदा राजनेताओं में …

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‘जीते जी इलाहाबाद’ : जहां जमुना के छलिया जल जैसे इलाहाबाद के सत्य से आँखें दो-चार होती हैं !

arun maheshwari

Arun Maheshwari on Mamta Kalia’s book on Allahabad ममता कालिया की किताब ‘जीते जी इलाहाबाद’ की समीक्षा दो दिन पहले ही ममता कालिया जी की किताब ‘जीते जी इलाहाबाद’ हासिल हुई और पूरी किताब लगभग एक साँस में पढ़ गया। इलाहाबाद का 370 रानी मंडी का मकान। नीचे प्रेस और ऊपर रवीन्द्र कालिया-ममता कालिया का घर ; नीचे पान की …

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श्रीमद्भगवद्गीता से क्या सीखा ?

jagdishwar chaturvedi

What did you learn from Shrimad Bhagavad Gita? मथुरा में जिस परिवेश और परिवार में जन्म हुआ वहाँ ‘आस्था’ ख़ासकर सनातनी धार्मिक आस्थाएँ बड़ी प्रबल थीं। इन आस्थाओं को कब और कैसे जीवनशैली और संस्कारों में समायोजित कर दिया गया। यह मैं नहीं जानता। हमारा सनातनी हिन्दू परिवार था। खान-पान, जीवन शैली, संस्कार आदि के क्षेत्र में पुराने रिवाज़ों का …

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संस्कृत काव्यशास्त्र की समस्याएं

jagdishwar chaturvedi

काव्यशास्त्र की प्रमुख समस्या क्या है? काव्यशास्त्र की प्रमुख समस्या है नए अर्थ की खोज। नए अर्थ की खोज के लिए आलोचकों ने रूपतत्वों को मूलाधार बनाया, जबकि वास्तविकता यह है कि नया अर्थ रूप में नहीं समाज में होता है। रूप के जरिए नए अर्थ की खोज के कारण संस्कृत काव्यशास्त्र भाववादी दर्शन की गिरफ्त में चला गया। इसके …

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दुनिया का निराला कवि नामदेव ढसाल जिसने संभ्रांत कविता को मारने का काम किया

namdeo dhasal

विश्व कवि नामदेव ढसाल के जन्मदिन पर विशेष लेख | Special article on the birthday of world poet Namdev Dhasal विश्व कवि नामदेव ढसाल का जन्म 15 फरवरी, 1949 को महाराष्ट्र के पुणे के निकट हुआ था. दलित आन्दोलनों के इतिहास में डॉ. आंबेडकर और कांशीराम के बीच की कड़ी ढसाल की पहचान वैसे तो मुख्य रूप से कवि के …

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लपूझन्ना : उस्ताद और शागिर्द की एक खूबसूरत कहानी

book review

पुस्तक समीक्षा एक उस्ताद के लिए उसके शागिर्द की तरफ़ से लिखी खूबसूरत कहानी है लपूझन्ना। लेखक अपने बचपन की याद अब तक नहीं भुला सके हैं और उन यादों में लेखक का ख़ास दोस्त भी है, ये वो ख़ास दोस्त है जो हम सब की ज़िंदगी में कभी न कभी तो रहा ही है और उसको हम हमेशा याद …

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ये लोकतंत्र और मरतंत्र की दूरी है

Literature, art, music, poetry, story, drama, satire ... and other genres

एक कपड़ा है एक रंग है पर फिर भी बड़ी दूरी है साब ये जाति, छुआ-छूत नहीं ये नए ज़माने की दूरी है साब ये थाली और पत्तल की दूरी है ये रेशम और खादी की दूरी है साब एक चमड़ा है एक रंग है पर मिट्टी और रेते के घर की दूरी है साब ये जाति, छुआ-छूत नहीं ये …

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शूल होते तो गिला भी क्या था/ चुभ रहे हैं कमल के फूल हमें

kailash manhar

कैलाश मनहर की चार गीतिकाएँ :– **************** (एक) ***** आदमी  वो कि  मौत में भी  ज़िन्दगी देखे ज़िन्दगी वो कि रंजो ग़म में भी खुशी देखे बढ़  रहा हो  ज़ुल्मतों का  ज़ोर  चौतरफ़ा नज़र  वही  जो  अँधेरों  में   रौशनी  देखे लगे  हैं  सूखने   दरिया-ए-मुहब्बत   सारे कोई तो  हो कि जो  सूखे में भी नमी देखे खुला-खुला रहे  आकाश उड़ानों के …

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दिहाड़ी मजदूर को भी बिना दलाली के काम नहीं मिल रहा : गांव पर विमर्श करती किताब

book review

पलाश विश्वास के लिखे प्राक्कथन को पढ़ने से पता चलता है कि किताब में मास्साब की रचनाधर्मिता को समग्रता से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यहां पाठकों को यह भी मालूम पड़ेगा कि मास्साब यह किताब कैंसर होने के बावजूद लिख रहे थे और किताब का उद्देश्य उनके कृषि विमर्श को समग्रता में राष्ट्रव्यापी संवाद के लिए प्रस्तुत …

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चल ना वहाँ …

paiband ki hansi

चल ना वहाँ … उम्र जहाँ से शुरू की थी उसी मोड़ पर रूक कर देखेंगे कितने ? मोड़ आवाज़ देते हैं पीठ के पीछे चल ना वहाँ जहाँ गया वक्त छलावे सा छलेगा उन दिनों की बातें सुनता करता इक चाँद साथ चलेगा चल ना वहाँ वो गाँव वो मुहल्ला वो कच्चा मकान नुक्कड़ पर छोटी सी चाय की …

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मिर्जा ग़ालिब (पहला एपिसोड) : वर्चुअल युग में दस्तम्बू के मूल्यांकन से जुड़े नए सवाल

mirza ghalib (1st episode) new questions related to the assessment of dastambu in the virtual era.

मिर्जा ग़ालिब (पहला एपिसोड) : वर्चुअल युग में दस्तम्बू के मूल्यांकन से जुड़े नए सवाल। प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी का संवाद Mirza Ghalib (1st episode) : New questions related to the assessment of Dastambu in the virtual era. Dialogue of Professor Jagdishwar Chaturvedi in Hindi दस्तम्बू क्या है? मिर्ज़ा गालिब की डायरी में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का चित्रण. गालिब को …

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