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क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश को सच को छिपाने की बीमारी है ?

फासीवाद के आगमन का क्लासिक संकेत

-अरुण माहेश्वरी

भारत के मुख्य न्यायाधीश पर संसद में महाभियोग के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में कल जो हुआ उससे फिर एक बार यही पता लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में अभी जो चल रहा है, उसमें काफी कुछ अस्वच्छ और अस्वस्थ है। और, इन सबके मूल में दूसरा कोई नहीं, खुद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा है।

दीपक मिश्रा को सच को छिपाने और गलत कामों में शामिल होने की पुरानी आदत है, इसके कुछ प्रमाण सामने आने के बाद से ही प्रकट रूप में यह सिलसिला शुरू हुआ और इसके साथ ही उनके इस्तीफे की मांग भी उठने लगी। सीबीआई के पास ओड़ीसा हाईकोर्ट के एक जज की टेलिफोन पर बातचीत का पूरा लेखा उपलब्ध है, जो प्रेस में भी आ चुका है, जिसमें वह जज लखनऊ स्थित एक ट्रस्ट, प्रसाद एडुकेशन ट्रस्ट के मेडिकल कालेज के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च जज से आदेश निकलवा देने की सौदेबाजी कर रहा था। सीबीआई के लिये यह प्रमाण काफी था जिसके आधार पर वह दीपक मिश्रा पर एफआईआर करके जांच शुरू कर सकती थी। लेकिन मोदी सरकार ने न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर को हर प्रकार के संदेह से परे रखने के लिये इस मामले की जांच करने के बजाय सीबीआई के हाथ लगे इन सबूतों का प्रयोग दीपक मिश्रा को ही पिंजड़े का तोता बनाने और उनके जरिये अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने में शुरू कर दिया।



उधर दीपक मिश्रा ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सबसे पहले तो खुद पर लग रहे आरोपों की जांच को खुद ही रोक दिया और फिर मोदी कंपनी से जुड़े सभी संवेदनशील मामलों को मोदी की पसंद और मुट्ठी के जजों को देना शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की खुली आपत्ति के बावजूद जज लोया की संदिग्ध हत्या के मामले को खुद के नेतृत्व की बेंच में लेकर उपलब्ध तथ्यों की बिना जांच किये इस मामले पर आगे और जांच की जरूरत से इंकार कर दिया और इस प्रकार अमित शाह को इस अपराध से मुक्त कर दिया।

इसी बीच दीपक मिश्रा पर ओड़िशा में सरकार से एक जमीन का हथियाने के लिये झूठा शपथपत्र दाखिल करने का मामला भी सामने आया।

इन तमाम तथ्यों, दीपक मिश्रा की गर्दन सरकार के हाथ में फंसे होने की सचाई और उनकी दूसरी मनमानियों को देखते हुए भारत में विपक्ष की सभी पार्टियों ने यह जरूरी समझा कि न्यायपालिका की स्वच्छता को बनाये रखने के लिये ही इस न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हटाना होगा। इसी उद्देश्य से विपक्ष ने मिल कर राज्य सभा में उनके विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया। लेकिन, कानून और संसदीय मर्यादाओं के प्रति पूरी तरह से बेपरवाह मोदी और उनके कठपुतले, राज्य सभा के अध्यक्ष वैंकय्या नायडू ने विपक्ष के नोटिश पर बिना विचार किये एक दिन में उसे खारिज कर दिया।

वैंकय्या नायडू के इस असंवैधानिक कदम के खिलाफ ही कांग्रेस दल के दो सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जिस पर सुप्रीम कोर्ट के द्वितीय वरिष्ठतम न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने एक दिन सुनवाई की और दूसरे दिन ही इस मामले की आगे सुनवाई के लिये पांच जजों की एक संविधान पीठ का गठन कर दिया गया।

कल (8 मई को) सुप्रीम कोर्ट में जब संविधान पीठ के सामने कांग्रेस के सांसदों की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने पहला सवाल उठाया कि इस संविधान पीठ का गठन किस आदेश के आधार पर किया गया है ? क्या न्यायाधीश चेलमेश्वर ने ऐसा करने का कोई न्यायिक फैसला सुनाया था ? अन्यथा और किसने और कैसे इसका गठन किया है ? सुप्रीम कोर्ट के नियम के अनुसार पांच सदस्यों की संविधान पीठ के गठन के लिये किसी न्यायिक फैसले का होना जरूरी है। इसे सिर्फ प्रशासनिक निर्णय से गठित नहीं किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश के पास बेंच गठन करने का प्रशासनिक अधिकार होता है, वह न्यायिक अधिकार नहीं है।

मजे की बात यह है कि पांच जजों की इस संविधान पीठ को सुशोभित कर रहे जजों के पास इतना सा भी नैतिक बल और ईमानदारी नहीं थी कि वे इस पीठ के गठन के पीछे के फैसले के बारे में याचिकाकर्ता को अवगत करा दें, जबकि किसी भी मामले से जुड़े हर न्यायिक फैसले की जानकारी को पाना हर याचिकाकर्ता का मूलभूत संवैधानिक अधिकार होता है। उन्होंने कपिल सिब्बल को इस जानकारी को देने से साफ इंकार कर दिया। और, सिब्बल ने इसी आधार पर अपनी याचिका वापस ले ली क्योंकि मामले से जुड़े किसी भी न्यायिक फैसले के बारे में अंधेरे में रह कर उनके लिये अपनी दलीलें पेश करना मुमकिन नहीं था। मुख्य न्यायाधीश के दिमाग के फितूर की उपज इस महान संविधान पीठ ने तत्काल याचिका को खारिज कर न्यायपालिका की नैतिकता के बजाय दीपक मिश्रा की रक्षा के अपने पवित्र कर्त्तव्य का पालन किया !



यह सब देख कर यही लगता है कि आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च पद पर ऐसा व्यक्ति बैठा हुआ है जिसका खुद किसी प्रकार की पारदर्शिता पर विश्वास नहीं है और दुर्भाग्य से वह मोदी की तरह के एक तुगलक के हाथ का गुलाम भी है। संसदीय जनतंत्र के रास्ते फासीवाद के उदय की परिस्थिति का यह एक क्लासिक संकेत है।

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