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Rajeev mittal राजीव मित्तल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
राजीव मित्तल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

बिहार में स्वास्थ्य विभाग को कालाजार रोग.. चमकी से मरने वाले बच्चे गरीब ही क्यों हैं

नई दिल्ली, 17 जून, 2019। वरिष्ठ पत्रकार राजीव मित्तल नं लंबे समय तक बिहार में पत्रकारिता की है। मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से बच्चों की मौत (Children’s death due to Chamki fever in Muzaffarpur) पर सत्ताधारी दल के नेताओं के संवेदनहीन बयानों के बीच उन्होंने एक एफबी पोस्ट में अपनी एक पुरानी रिपोर्ट का हवाला देते हुए गरीबों के खिलाफ सरकार और स्वास्थ्य माफिया के संबंधों की पड़ताल की है। आप भी पढ़ें श्री मित्तल की निम्न पोस्ट –

काफी बड़ी रिपोर्ट है इसलिए धैर्य मांगती है..

बिहार में स्वास्थ्य विभाग को कालाजार रोग..मरीज अब गया तब गया..

मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत के बारे में हमारे नेता या मंत्री ग़लत नहीं बोल रहे कि ऐसी मौतें तो वहां हर साल होती हैं..लेकिन इन नेता और मंत्रियों की संवेदनहीनता अब उस मुकाम पर पहुँच गयी है कि कोई बच्चों को लीची से मार रहा है..तो कोई प्राकृतिक आपदा बता रहा है..तो कोई बहुत बड़ा एक्सपर्ट बन चुनाव की थकावट (जिसमें खुद ईश्वर भी शामिल है) बता रहा है..लेकिन इनमें से कोई भी शख्स गरीब की ज़िन्दगी और मौत को उस सच्चाई से नहीं जोड़ रहा हैं जो इस देश दिल और दिमाग में पैठ चुकी है..

जी हाँ इस देश का गरीब और टिड्डी क्यों हैं और क्यों नहीं हैं के कोई मायने ही नहीं..इसी सोच को करीब दस पहले उस बीमारी से जोड़ा था जो ज़मीन से ढाई फुट ऊँचा उड़ रहे मच्छर की वजह से होती थी..और जिसके चलते केवल उत्तर बिहार में ही बीसवीं सदी में कम से कम एक लाख इंसान तो मरा ही होगा..

तो पहले यह रिपोर्ट पढ़ लें जो मुजफ्फरपुर प्रवास के आखिरी दिनों में वहां के फिजिशियन डॉक्टर निशिन्द्र किंजल्क के साथ महीने भर बैठकी कर लिखी थी..उसके बाद उस रिपोर्ट पर बात होगी, जो शतक मार चुकी बच्चों की मौतों की आशंका को ले कर डॉक्टर किंजल्क ने छह साल पहले नीतीश सरकार को भेजी थी, जो दीमक कब की चाट चुकी होंगी..

तो दोस्तों, हो सकता है जो मैं आपके सामने रखने जा रहा हूँ आप में से कइयों ने पढ़ लिया हो लेकिन आज के हालात को समझने में इसे दोबारा पढ़ लेंगे तो बेहतर होगा..

बताया जाता है कि पिछली शताब्दी के शुरू में दो अंग्रेज जाड़ा लग कर आये बुखार की चपेट में आ गये और उनके शरीर पर काले-काले चकत्ते पड़ गये.. तभी से नाम पड़ गया काला जार..

1937 तक यह महामारी पचास हजार इन्सानों की जान ले चुकी थी..उस समय बंगाल इस रोग का सबसे बड़ा गढ़ था..

1939 में डॉ. ब्रह्मचारी ने यूरिया इस्थुरिबिन नामक दवा से कालाजार को खदेड़ने की ठानी.. इस दवा की छह सुईं देने से ही मरीज ठीक होने लगे.. इसने 1950 तक संजीवनी का काम किया..

आजादी के बाद मलेरिया उन्मूलन के लिये सरकार की ओर से बड़े पैमाने पर डीडीटी छिड़काव अभियान शुरू हुआ.. अभियान में कालाजार का खात्मा भी शामिल था..

960 तक डीडीटी छिड़काव ने देश भर में मलेरिया और असम, बिहार और बंगाल में कालाजार को काफी हद तक काबू में कर लिया.. लेकिन जब अंतिम चोट करने का वक्त आया तो बिहार का शासनतंत्र गाफिल हो गया.. जबकि इस दौरान बंगाल और असम अपने-अपने क्षेत्रों को सील कर डीडीटी का छिड़काव करवाते रहे..

बिहार में उस समय बरती गयी लापरवाही का खामियाजा आज भी पूरा उत्तरी इलाका भुगत रहा है..

पहले कम से कम कर्तव्यनिष्ठा का नाटक तो खेल लिया जाता था, आज उसकी जगह शुद्ध रूप से कफ़न चोरी ने ले ली है..

70 के दशक की शुरुआत में डीडीटी के ड्रम कालाबाजार में पहुंचाये जाने लगे और छिड़काव कागजों पर टंकने लगा.. और 1974 आते-आते उत्तरी बिहार 1937 वाले हालात में पहुंच गया.. अब कालाजार का हमला सर्वाधिक विनाशकारी था.. शुरुआत हुई वैशाली और मुजफ्फरपुर जिलों से.. फिर इस महामारी ने किनारा पकड़ा गंडक, बागमती, कोसी और कमला नदियों का और तेजी से पूरे क्षेत्रों में फैलती चली गयी..

तब तक बिहार की राजनीति भी कुत्सित हो चली थी.. किसी भी दल की सरकार में कालाजार से लड़ने की मंशा ही नहीं रह गयी थी…. रहा प्रशासन, तो उसे खुद की जेब भी भरनी थी और मंत्री-नेता को भी हिस्सा देना था.. इसलिये आजाद भारत के तीसवें साल में बिहार में हुआ कालाजार का प्रादुर्भाव डॉक्टरों की अंधी कमाई का, अफसरों की मक्कारी का और नेतागिरी में तरावट लाने का अहम जरिया बन गया..

तब से सरकारी योजनाओं के अंधकूप में इस महामारी के उन्मूलन के नाम पर अरबों रुपया उडेले गए..

विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को ने डॉलरों की बरसात की लेकिन गरीब के शरीर पर पड़ने वाले काले चकत्ते और गहराते गए..

उस दौरान उत्तर बिहार के किसी गांव में एक छंटाक डीडीटी का छिड़काव नहीं हुआ.. जबकि पिछले तीन साल में करोड़ों रुपये की डीडीटी गोदामों में पड़ी रह गयी या उसे बेच कर पैसा बनाया गया, या जिसके ट्रकों पर लदे ड्रम के ड्रम लुटते रहे..

2004 की बाढ़ के बाद की महामारियों से बचाव के लिये मुजफ्फरपुर जिले के 16 प्रखंडों के एक-एक स्वास्थ्य केन्द्र को छिड़काव के लिये दी गयी डीडीटी की मात्रा थी सौ ग्राम.. दुनिया भर में कालाजार से सर्वाधिक प्रभावित मुजफ्फरपुर जिले में इस सौ ग्राम डीडीटी का स्प्रे पांच हजार घरों में करना था, जो पांच घरों के लिये भी नाकाफी रहती..

अब आएं कालाजार रोगियों को मरने न देने वाली उन दवाओं पर, जिनको धकियाते हुए इंसान की चमड़ी को कोयले सा काला कर देने वाले फ्लेबोटोमस या सी-सी फ्लाई नाम का मच्छर नदी-तालाब के किनारे की बालू के ढूहों से उछाल मार कर ढाई से छह फुट की ऊंचाई तक उड़ रहा होता.. जिसके डेनों पर मिसाइल की तरह लदे होते लेइशमनिया और डोनोवनाई नाम के विषाणु..

चालीस-पचास के दशक में हजारों मरीजों की जान बचाने वाली डॉ. ब्रह्मचारी की दवा यूरिया इस्थुरिबिन सरकारी लापरवाही के चलते आगे चल कर अपना असर खो बैठी क्योंकि कालाजार के मच्छर ने उससे लड़ने की ताकत हासिल कर ली थी.. अगर पचास के दशक में इसका और डीडीटी का इस्तेमाल पूरी ईमानदारी से हुआ होता तो फ्लेबोटोमस का सफाया तभी गया होता.. जिसके लिए आधी से ज़्यादा सदी और लगी.. अरबों रुपये बरबाद हुए और हज़ारों मरीज काल के मुहं में चले गए..

सबसे बड़ी बात यह कि यूरिया इस्थुरिबिन की सुईं ने कालाजार का इलाज करते हुए अपनी तरफ से और कोई रोग पैदा नहीं किया.. सुलभ तो थी ही, जेबकतरी भी नहीं थी.. जबकि आगे आने वाली दवाओं ने कालाजार रोगियों को एक से एक घातक बीमारियों की सौगात दे डाली, निर्माता कम्पनियों को करोड़पति बना दिया और डॉक्टरों के नर्सिंगहोम खुलवा दिये..

बाद के दशकों में इस महामारी के हमलों ने एक-एक बार में हजारों की जान ली.. मरीजों की संख्या 20 लाख से ऊपर पहुंच गयी और मरने वाले कम से कम तीस फीसदी..

80 के दशक में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रयासों से एक दवाई सामने आयी पेंटामिडाइन, जिसकी सुईं लगवाये मरीजों में हर दूसरा व्यक्ति मधुमेह का शिकार हो गया..तब सरकार ने अपनी तरफ से इसकी खरीद रोक दी थी लेकिन तब तक इस दवा ने उत्तरी बिहार की निजी या सरकारी चिकित्सा व्यवस्था को भष्ट बनाने में अपना पूरा योगदान दे दिया था..

जैसे शराब बंदी में जहरीली दारू का मार्केट बढ़ जाता है और पीने वाले बेभाव मरते हैं उसी तरह बंदिश लग जाने के बाद बरास्ते नेपाल पेन्टामीडीन की तस्करी बढ़ गयी..दाम-एक वायल पांच सौ रुपये में.. इसकी तस्करी में तेजी आने का एक कारण और रहा कि उत्तरी बिहार एड्स का भी भरपूर उपजाऊ इलाका है, जिसके मरीज को आमतौर पर सबसे पहले न्यूमोसिस्टिस कैरिनी न्यूमोनिया होता है, जो फेफड़ों के इन्फेक्शन से संबंधित है..इसमें भी पेन्टामीडीन ही काम करती है..इस तरह पेन्टामीडीन और फिजिशयन-दोनों के दो-दो हाथों में लड्डू..

इस दवा की असुलभता ने इसका एक जबरदस्त कारोबारी गुण पेश किया है.. पांच सौ रुपये वाली इस दवा की खाली शीशी पचास रुपये में आसानी से बिक जाती.. बस उस पर रैपर अपनी जगह मौजूद रहे.. उस खाली शीशी में पानी भर कर भी बेचा जाये तो 200 रुपये तो कहीं नहीं गये..10 से 40 दिन तक इस दवा की सुईं लगवाना जरूरी.. इस तरह न जाने कितने फटेहाल रोगियों को डॉक्टरों के दलाल कम पैसे के नाम पर पेन्टामीडीन की जगह डिस्ट्रिल्ड वाटर की सुईं लगवाते रहे..

दूसरी दवा सोडियम एन्टीमनी कलकत्ता की एक कम्पनी बनाती थी.. कुछ साल बाद मुजफ्फरपुर के एक बाहुबली ने भी इसकी फैक्टरी लगा ली.. इस दवा का एक वायल सौ रुपये का.. एक वायल में 30 मिलीलीटर दवा होती.. कोर्स 300 मिलीलीटर अर्थात 10 वायल का.. पूरा कोर्स 20 से 40 दिन में हो जाना जरूरी था.. खेल यहीं से शुरू होता..

पहले सरकारी अस्पताल हाल.. वहां कालाजार के मरीजों की भारी-भरकम संख्या को देखते हुए रोगियों की छोटी-छोटी यूनिट बना दी जातीं.. मसलन सौ रोगी हुए तो बीस-बीस की पांच यूनिट बना कर उन्हें पांच डॉक्टर के हाथों में सौंप दिया कि तुम जानो तुम्हारा काम जाने..

अस्पताल में सोडियम एन्टीमनी की मारामारी मची ही रहती.. दवा आयी तो सबसे बड़ा हाथ मारता, लाठी और भैंस के सिद्धांत पर चलते हुए वो डॉक्टर, जिसका साला या बहनोई मंत्री या बड़ा नेता हो.. और जो भूमिहार या ब्राह्मण हुआ तो क्या कहने.. कोटे से ज्यादा मिली दवा का इस्तेमाल वह अपने निजी क्लीनिक में आये रोगियों पर करता..

यह तो हुई सरकारी डॉक्टर की कमाई..

सरकारी अस्पताल का खेल और ज्यादा भयानक.. वहां का कम्पाउंडर मरीज को कभी भी पूरी खुराक की दवा भरकर सुईं नहीं लगाता था.. अगर एक बार में छह मिलीलीटर दवा मरीज के शरीर जानी है तो वह पचास फीसदी भी हो सकती है और 25 भी.. बाकी का काम पानी से चल जाता..

दूसरे, इस दवाई की वायल 30 मिलीली. की ही बनायी जा रही होती, इसके चलते रोगी या उसके परिजनों को यह दवाई खरीदने के लिये हर थोड़े दिनों में पैसों का जुगाड़ करना पड़ता ही पड़ता.. जब हुआ तो सुईं लगवा ली, नहीं हुआ तो कोर्स टूट गया, यानी कालाजार का वजूद उतने ही परिमाण में कायम..

सोडियम एन्टीमनी भी पेन्टामीडीन की तरह कम घातक नहीं थी..इसका इस्तेमाल करने वाले के ह्दय में सूजन आ जाती और शरीर में शुगर की मात्रा कम हो जाती.. सरकारी अस्पतालों में इसकी सप्लाई अक्सर एक्सपायरी डेट करीब आने पर की जाती..जहां पहुंचते-पहुंचते वो डेट भी निकल जाती.. ऊपर से आदेश आता..कि इसे नष्ट कर दिया जाये, पर ऐसा होता नहीं था.. सरकारी अस्पताल वालों के जरिये दवा बनाने वाली स्थानीय कम्पनी ही कौड़ियों के भाव खरीद कर, वायल की शीशियों पर नया रैपर लगा कर फिर बाजार में उतार देती..

कालाजार की तीसरी दवा फंगीजोन गुर्दों के लिए बेहद घातक..महंगी भी बहुत.. इसका 7-10 दिन का कोर्स 5 से 15 हजार रुपये तक का बैठता.. एड्स रोग के फंगल इन्फैक्शन में भी इसी की सुर्इं लगती.. जिसके चलते इसकी मांग ज्यादा रही..

इस रोग में एकमात्र खाने की गोली थी इम्पेविडो, जो एक विदेशी कम्पनी बनाती थी..इसे बाजार में काफी जोर-शोर से उतारा गया, लेकिन यह इस कदर नामुराद साबित हई कि साढ़े आठ हजार रुपये फूंकने और 28 दिन तक नियमित खाने के बाद भी परिणाम शून्य ही रहा..

कालाजार उन्मूलन के नाम पर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कुछ इसलिये नहीं हुआ क्योंकि इस बीमारी के लपेटे में था भारत का केवल बिहार राज्य..

इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक इस बीमारी के उन्मूलन को लेकर चार शोध केन्द्र चल रहे थे..मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पटना और वाराणसी..

मुजफ्फरपुर इस बीमारी का मुख्य केन्द्र लेकिन वहां के मेडिकल कॉलेज में तब तक पीजी की पढ़ाई भी नहीं, न ही वहां किसी तरह के शोध का कोई साधन है.. शहर में वाराणसी मेडिकल कॉलेज के सहयोग से कालाजार ट्रीटमेंट सेंटर जरूर चल रहा था.. दरभंगा में कुछ ठोस काम हुआ, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया..

कुल मिला कर यह एक छोटी सी झलक है हमारी स्वास्थ्य सेवा और घातक रोगों की तासीर के एक ही होने की.. फर्क बस इतना है कि रोग का फलसफा है-मारो और डॉक्टर जेब पर हाथ फेरते हुए बुदबुदाता है- मरने दो। सरकारी स्तर पर राहत व बचाव के बजाये जा रहे नगाड़े कैसे भी रोग के लिये शहनाई से ज्यादा कुछ नहीं..

बिहार का सामाजिक तानाबाना कालाजार के मच्छर फ्लेबोटोमस की सवर्णवादी सोच के बेहद अनुकूल.. इसी के चलते वह समाज के सबसे धकियाये मुसहर समुदाय का जानी दुश्मन बना हुआ है.. दवा बनाने वाली कम्पनियां भी सवर्णों के हाथों में, तो स्वास्थ्य सेवा में सवर्णों का बोलबाला..कुल मिला कर कालाजार सवर्णवादी व्यवस्था की उस राक्षसी प्रवृति का द्योतक बन गया, जो आजादी के साठ साल बाद भी बिहार के जर्रे-जर्रे में लहलहा रही थी..

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