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चोटी कट और पैलेट गन नहीं हो सकता जम्मू-कश्मीर समस्या का हल – प्रो. भीम सिंह 

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के मुख्य संरक्षक प्रो. भीमसिंह ने भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद को एक अतिवाश्यक पत्र में लिखा है कि ‘‘जम्मू-कश्मीर के एक करोड़ पैंतीस लाख लोग 70 सालों से अराजकता के माहौल से गुजर रहे हैं और ना ही उनकी परेशानियों का कोई हल दिखायी देता है। इस समस्या के लिए कौन जिम्मेदार है, कौन नहीं। इसका फैसला तो इतिहास करेगा–आने वाला समय करेगा, परंतु इस समस्या के हल के लिए पैंथर्स पार्टी की बड़ी सोच के साथ और लोगों की बेहतरी और खुशहाली के लिए यह सुझाव देना चाहती है कि भारतीय संसद को आगामी सत्र में एक सीधा प्रस्ताव करे कि पूरे देश में एक झंडा होगा–तिरंगा, कन्याकुमारी से कश्मीर तक, एक संविधान होगा और जम्मू-कश्मीर के निवासियों को भारतीय संविधान में दिये गये सभी मौलिक अधिकार शेष देश के नागरिकों की समान प्राप्त होने चाहिए। यह समस्या का एक हल है ना कि चोटी काटने या पैलेट गन या जेलों में बंद करने से।‘‘।

प्रो.भीमसिंह, जो अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार समिति के संरक्षक भी है और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दशकों से सड़क से सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर संघर्ष करते आ रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से पुरजोर अपील की है कि वे अनुच्छेद 370 में दिये हुए अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करके अनुच्छेद 370 के खंड (3) में दिये हुए विशेष प्रावधान को बेमानी घोषित करें, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 370 में कोई भी संशोधन भारत के राष्ट्रपति कर सकते हैं, यदि उस समय की यानि 1950 में जो संविधान सभा जम्मू-कश्मीर की शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की अध्यक्षता में बनायी गयी थी, उसकी सलाह लेने के बाद अनुच्छेद 370(3) के इस प्रावधान में संशोधन कर सकते थे। 1957 में जम्मू-कश्मीर संविधान लागू हुआ और संविधान सभा का कानूनी अस्तित्व खत्म हो गया। इस समस्या का हल भारत के राष्ट्रपति भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 370 में संशोधन करने का राष्ट्रपति को जो अधिकार है अपनेआप कर सकते हैं, इसमें भारतीय संसद की भी भूमिका नहीं है।

प्रो.भीमसिंह ने अपने पत्र में राष्ट्रपति से पुरजोर अपील की है कि वे राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलाकर इस समस्या के हल के लिए सभी राष्ट्रीय दलों का समर्थन हासिल कर सकते है। यही एक रास्ता है-जम्मू-कश्मीर में भटकी हुई जंगल की आग और अराजकता को खत्म करने का। यही रास्ता है-जम्मू-कश्मीर के लोगों को शांति और मानवाधिकार के साथ पूरे देश के नागरिकों की तरह जीने का मौका मिलेगा।

   

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