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ब्लड कैंसर से पीड़ित 60 वर्षीय मरीज़ को फोर्टिस गुरुग्राम में मिला नया जीवन

मरीज़ का सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट (bone marrow transplant) हुआ, बहन ने दीं स्टेम कोशिकाएं (Stem cell)

रांची, 02 अगस्त 2019 . फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम (Fortis Memorial Research Institute, Gururgram) के डॉक्टरों ने रांची के 60 वर्षीय मरीज़ श्री लाल मणि महतो का सफलतापूर्वक उपचार किया जो क्रोनिक मायलोमानोसाइटिक ल्यूकेमिया, (Chronic myelomonocytic leukemia) (सीएमएमएल) से पीड़ित थे, जो ब्लड कैंसर का ही एक प्रकार है जिसकी कोई निश्चित दवा उपलब्ध नहीं है (chronic myelomonocytic leukemia treatment)। मरीज़ को बुखार, कम हीमोग्लोबिन, वजन कम होने और कम होते प्लेटलेट्स की शिकायत के साथ फोर्टिस गुरुग्राम में लाया गया था। डॉ. राहुल भार्गव, निदेशक, हेमेटोलॉजी एंड बीएमटी, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम और उनकी टीम ने मरीज़ का सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया।

श्री लाल मणि महतो को अग्रिम स्तर के ब्लड कैंसर की शिकायत के साथ अस्पताल लाया गया था। उन्हें अग्रिम स्तर के कैंसर के लिए कीमोथेरेपी (Chemotherapy for advance level cancer) दी गई।

श्री महतो का वज़न काफी तेज़ी से कम होने लगा। इस बीमारी के कारण का पता नहीं था, रांची में एक डॉक्टर से सलाह लेने पर पता चला कि उन्हें खून का नुकसान हो रहा था, लेकिन उसका कारण पता नहीं चल सका।

मरीज़ के खून का स्तर नियंत्रित करने के लिए उन्हें फोलिक एसिड (Folic acid) दिया गया लेकिन मरीज़ की स्थिति और खराब होने लगी। जल्द ही हर 20 दिन में उनके ब्लड ट्रांसफ्यूजन की प्रक्रिया (Blood Transfusion Process,) भी शुरू कर दी गई।

रांची में कई डॉक्टरों से सलाह लेने के बाद उन्हें ब्लड कैंसर का पता चला। उनकी समस्या का एकमात्र समाधान बोन मैरो ट्रांसप्लांट था। उन्हें डॉ. राहुल भार्गव के पास लाया गया जिन्होंने सफलतापूर्वक सर्जरी की।

Blood cancer is difficult to detect

डॉ. राहुल भार्गव, निदेशक, हेमेटोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम ने कहा,

“ब्लड कैंसर का पता चलना मुश्किल है, दूसरी बात यह कि एक बार पता चलने पर भी कोई दवा नहीं है और बीएमटी ही एकमात्र उपाय है। बीएमटी की प्रक्रिया शुरू की गई, आरबीसी, डब्ल्यूबीसी और प्लेटलेट्स को शरीर से बाहर निकाला गया। मरीज़ नवजात शिशु की तरह हो गया और उनमें संक्रमण का खतरा बढ़ गया। ऐसी स्थिति में मरीज़ को स्थिर करना एक चुनौती है। एक अन्य शरीर से स्टेम सेल को मरीज़ के शरीर में स्थानांतरित किया गया और सफल ट्रांसप्लांट के लिए शरीर का इसे स्वीकार करना ज़रूरी होता है।“

डॉ. राहुल भार्गव ने कहा

“जहां तक बात डोनर की है तो इसमें कोई जोखिम नहीं होता है। डोनर को सिर्फ 300 मिली ब्लड स्टेम सेल दान करना होता है और इसमें डरने की कोई बात नहीं होती। मरीज़ बहुत ही भाग्यशाली थे, क्योंकि आम तौर पर डोनर मैच 30 फीसदी होता है लेकिन इस मामले में बहन और भाई का मैच 100 फीसदी रहा। डोनर को डोनेशन के अगले ही दिन डिस्चार्ज कर दिया गया। मरीज़ को अस्पताल से सफलतापूर्वक डिस्चार्ज किया जा चुका है और वह सामान्य जीवन जी रहे हैं।”

मरीज़ श्री महतो ने कहा,

“जब मैं फोर्टिस आया था तो मुझ में बहुत कम उम्मीद थी। मुझे हर 20 दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूज़न कराना पड़ता था। मेरा परिवार मुझे हर दिन कमज़ोर होते देख रहे थे और मैं इस बारे में कुछ नहीं कर सकता था। जब डॉ. भार्गव ने मुझे उम्मीद दी कि बीएमटी के बाद मैं पहले की ही तरह अपना जीवन जी सकूंगा, तो मुझे यह चमत्कार लगा। मेरी छोटी बहन के स्टेम सेल मैच हो गए और मेरी ज़िंदगी बच गई। जब मैं आईसीयू में था तो मेरी स्थिति बेहद गंभीर थी और मेरा परिवार आस छोड़ रहा था। फोर्टिस गुरुग्राम में डॉ. राहुल भार्गव की ओर से किया जा रहा सतत उपचार ही था जिसकी वजह से मैं आज सेहतमंद हूं और आसानी से अपनी रोज़ाना के काम कर पा रहा हूं।”

डॉ. ऋतु गर्ग, ज़ोनल निदेशक, एफएमआरआई ने कहा,

“यह अस्पताल में आए सबसे चुनौतीपूर्ण मामलों में से एक था जिसमें मरीज़ को अग्रिम स्तर के कैंसर के साथ लाया गया था जो बहुत ही दुर्लभ है। इस मामले में कई जटिलताएं थीं और सर्जरी के बाद मरीज़ को स्थिर करना बहुत बड़ी उपलब्धि थी। मरीज़ की स्थिति जीवन के लिए घातक हो सकती थीं हालांकि चूंकि इस मामले पर बहुत ही अच्छे से नज़र रखी गई इसलिए ऐसी स्थिति से सफलतापूर्वक बचा जा सका। एफएमआरआई ऐसी जटिलताओं का सामना करने के लिहाज़ से सभी सुविधाओं से भरपूर है। अस्पताल में रक्त संबंधी सभी समस्याओं से निपटने के लिए व्यापक टीम और आधुनिक प्रौद्योगिकी की मदद ली जाती है। इस मामले से पता चलता है कि हम विभिन्न विशेषज्ञताओं की ओर से सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।”

यह समस्त जानकारी एक विज्ञप्ति में दी गई है।

About chronic myelomonocytic leukemia in Hindi

यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (US National Library of Medicine National Institutes of Health पर) उपलब्ध जानकारी के मुताबिक क्रोनिक मायलोनामोसाइटिक ल्यूकेमिया (सीएमएमएल) एक क्लोनल हेमटोपोइएटिक स्टेम सेल डिसऑर्डर है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2008 के हेमेटोपोएटिक ट्यूमर के वर्गीकरण द्वारा मायलोइडिसप्लास्टिक / मायलोप्रोलिफेरेटिव नियोप्लाज्म (myelodysplastic/myeloproliferative neoplasm) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह परिधीय रक्त (peripheral blood) में पूर्ण मोनोसाइटोसिस- absolute monocytosis (> 1 × 10 L / एल) की विशेषता है जो कम से कम 3 महीने तक बनी रहती है।

निदान:

सीएमएमएल का निदान (The diagnosis of CMML) अस्थि मज्जा में मॉर्फोलोजिक, हिस्टोपैथोलॉजिक और क्रोमोसोमल असामान्यताओं के संयोजन पर रहता है (combination of morphologic, histopathologic and chromosomal abnormalities in the bone marrow)। अन्य मायलोप्रोलिफेरेटिव नियोप्लाज्म और संक्रामक / ऑटोइम्यून स्थितियों को बाहर करना महत्वपूर्ण है जो मोनोसाइटोसिस का कारण बन सकते हैं।

 

 

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