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जलवायु परिवर्तन भारत में असमानता अंतर को बढ़ा देगा – क्लाइमेट ट्रेंड्स

जलवायु परिवर्तन भारत में असमानता अंतर को बढ़ा देगा – क्लाइमेट ट्रेंड्स

Climate change will widen the inequality gap in India

नई दिल्ली, 30 नवंबर 2018: दिल्ली स्थित एक जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कम आय वाले क्षेत्रों में उच्च आय वाले क्षेत्रों की तुलना में प्राकृतिक आपदाओं से लोगों के मरने की आशंका सात गुना अधिक है, और घायल होने या विस्थापित होने की आशंका छह गुना अधिक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अकेले 2018 की केरल बाढ़ ने 2017 की संयुक्त सभी बाढ़ घटनाओं की तुलना में अधिक नुकसान पहुंचाया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हालिया सूखे और बाढ़ के आर्थिक और सामाजिक परिणाम गम्भीर रहे हैं, और इस तरह के मौसम की चरम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ने का अनुमान है।

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की आपदा जोखिम में कमी रिपोर्ट ( UN disaster risk reduction report), जो कम और उच्च आय वाले देशों में आर्थिक नुकसान की तुलना करती है, के हवाले से कई तथ्य सामने रखती है।

यह विश्लेषण कल लैंसेंट काउंटडाउन द्वारा जारी उस रिपोर्ट के काफी नजदीक है, जो दर्शाती है कि पिछले चार वर्षों में 200pc से अधिक भारतीय लू और कड़ी गर्मी (heatwave) से मारे गए और भारत जलवायु परिवर्तन के गंभीर दुष्परिणाम झेलने वाले देशों में से एक है।

सरकारी आंकड़ों के आधार पर हालिया एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत में प्रत्येक वर्ष 5,600 लोग, या पांच व्यक्ति प्रति मिलियन, चरम मौसम की घटनाओं के परिणामस्वरूप मर जाते हैं, जो प्राकृतिक कारणों से सभी आकस्मिक मौतों का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।

रिपोर्ट के मुताबिक मरने वालों की यह संख्या और अधिक हो सकती है क्योंकि सूखा के कारण होने वाली मौतों को इसमें शामिल नहीं किया गया है। उदाहरणार्थ 2015-16 में 330 मिलियन लोग सूखा से प्रभावित थे।

अगस्त 2017 में मानसून की भारी बारिश से पूरे भारत, बांग्लादेश और नेपाल में बाढ़ की वजह से कम से कम 1,200 मौतें हुईं। उत्तरी भारत में चार राज्य बाढ़ से बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए थे, जिसने 805,183 घरों को नुकसान पहुंचाया और 18 मिलियन लोगों को प्रभावित किया।

भारत की अर्थव्यवस्था गर्मी के मानसून पर काफी निर्भर है, जो वार्षिक वर्षा का लगभग 70% है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन से मौसम का पैटर्न बदलता है, भारत में पानी की अनिश्चितितता बढ़ती जाती है।

भारत के 600 मिलियन लोगों को पहले से ही गंभीर पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग के अनुसार, भारत के 54% कुओं के भूजल में गिरावट आई है, और 21 शहरों में 2020 के अंत तक भूजल के समाप्त हो जाने की आशंका से 100 मिलियन लोगों प्रभावित होने का अनुमान है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स (climate Trends) की निदेशिका आरती खोसला ने “हस्तक्षेप” के साथ बात करते हुए कहा कि केरल की बाढ़ ने एक आपदा के रूप में आम जनता का ध्यान खींचा है, जिससे केरल में लगभग बीस हजार करोड़ रुपए की क्षति हुई। सूखे से लेकर अतिवर्षा, कड़ी गर्मी की घटनाओं से अब तक के किसी सबसे बड़े घोटाले से ज्यादा नुकसान पहुंचा है, इसे जनता और राजनीतिज्ञों दोनों को समझने की आवश्यकता है। 

आरती खोसला ने कहा कि विश्व मौसम संगठन (World Met Organisation) के हाल ही में जारी आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि पिछले चार वर्ष दुनिया के सबसे गर्म वर्ष थे। इसी अवधि में 200pc अधिक भारतीय हीट वेव्स की चपेट में थे।

अत्यधिक निराशा के साथ आरती खोसला ने कहा कि लगता नहीं है कि दुनिया जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण हेतु तापमान के लक्ष्य को हासिल करने के सही ट्रैक पर है।

अंग्रेजी में विस्तृत समाचार इस लिंक पर पढ़ सकते हैं –

climate change will widen the inequality gap in india

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