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सांप्रदायिक ताम-झाम है, देशभक्ति का नारा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा। लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।

देशभक्ति का नारा : 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2019) में पहला वोट पडऩे तक ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक और रिकार्ड कायम कर चुके थे। वह स्वतंत्र भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री बन गये हैं, जिनके खिलाफ आदर्श चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन की सबसे ज्यादा शिकायतें चुनाव आयोग तक पहुंची हैं। ताजातरीन शिकायत, महाराष्ट्र में लातूर (Latur in Maharashtra) में अपने भाषण में प्रधानमंत्री के वोट के लिए बालाकोट में कार्रवाई (Action in balakote) करने वाले वायु सैनिकों की और पुलवामा के शहीदों (Martyrs of Pulwama) की दुहाई का सहारा लेने की है। याद रहे कि यह प्रधानमंत्री द्वारा चुनाव आयोग (Election commission of India) के इस स्पष्ट निर्देश का भी उल्लंघन था कि चुनावी या के लिए, सेना या सैनिकों की तस्वीर तक तक का इस्तेमाल वर्जित है।

होली के फौरन बाद, जब नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने (Election Campaign) का अपना आखिरी और निर्णायक धावा शुरू किया, तभी यह साफ हो गया था कि विकास के सभी दावे और वादे हशिए पर धकेले जा चुके हैं। अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संघ, भाजपा और एनडीए, सबसे बढक़र पाकिस्तान-विरोधी तथा एक हद तक कश्मीर-विरोधी भी, अंध-राष्ट्रवाद के सहारे ही, चुनाव की वैतरणी पार करने की कोशिश करने जा रहे हैं। वास्तव में यह तो फरवरी के मध्य में हुए पुलवामा के आतंकी हमले और उसके दो हफ्ते बाद, पाकिस्तान के भीतरी हिस्से में बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के कथित प्रशिक्षण शिविर पर हवाई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बने वातावरण में, अपने चुनाव प्रचार-पूर्व के चुनाव प्रचार अभियान में ही, सबसे बढक़र खुद मोदी द्वारा गढ़े गए नैरेटिव में ही स्पष्ट कर दिया गया था। इस नैरेटिव में मोदी को भारत के खिलाफ आतंकी हमले करने वालों को ‘‘घर में घुसकर मारने’’ वाला, छप्पन इंच की छाती वाला हीरो बनाकर पेश करने की कोशिश की जा रही थी, जिसने कुछ ऐसा किया था जो करने की मोदी से पहले आया कोई प्रधानमंत्री सोच भी नहीं सकता था।

देशभक्ति का नारा : पुलवामा से लेकर बालाकोट तक हरेक सवाल को उन्मत्त राष्ट्रवाद के डंडे से पीटा जा रहा

दूसरी ओर, इसी नैरेटिव में विपक्ष को, मोदी की ऐसी साहसिक देशभक्तिपूर्ण कार्रवाई का विरोधी और वास्तव में राष्ट्रविरोधी तथा पाकिस्तान-समर्थक तक बनाकर पेश करने की कोशिश की जा रही थी। इस नैरेटिव में, पुलवामा से लेकर बालाकोट तक और वास्तव में उसके बाद भी, सैन्य बलों से लेकर मोदी सरकार तक की करनियों तथा अकरनियों पर किए जाने वाले हरेक सवाल को, पाकिस्तान और आतंकवादियों की हिमायत करार देकर, उन्मत्त राष्ट्रवाद के डंडे से पीटा जा रहा था। इसी पृष्ठभूमि में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ से अपना आखिरी चुनावी धावा शुरू करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ‘‘सपूत चाहिए या सबूत चाहिए’’ का झूठा वैपरीत्य गढऩे के जरिए, उन्मत्त राष्ट्रवाद के ताप को और बढ़ा दिया। वास्तव में बाद की सभाओं में प्रधानमंत्री मोदी बालाकोट के हवाई हमले के जवाब में, अगली सुबह पाकिस्तानी वायु सेना की कार्रवाई का जवाब देने की कोशिश में अपने विमान समेत पाकिस्तान की सीमा में गिर पड़े, वायु सेना के पाइलट अभिनंदन की ‘स्वदेश वापसी’ की चिंताओं को भी, ‘देशविरोधी अपराध’ बना देने की हद तक चले गए।

बेशक, संघ-भाजपा जोड़ी के हाथों में उन्मत्त राष्ट्रवादी दुहाई, वह भी आतंकवाद/ पाकिस्तान विरोध से परिभाषित राष्ट्रवादी दुहाई, सांप्रदायिक रंग लिए बिना नहीं रह सकती थी। इस चुनाव में भाजपा इस मामले में कोई कसर नहीं छोड़ सकती है। इसलिए, चुनाव प्रचार के इस अंतिम चरण में एनआरसी के बहाने, घुसपैठ से खतरे की खुलेआम बहुसंख्यक सांप्रदायिकतावादी दुहाई से लेकर, राम मंदिर तक की दुहाइयों तक को, ‘मोदी है, तभी देश सुरक्षित है’ की पुकारों के साथ जोड़ा जा रहा था। उनके सांप्रदायिक तरकश में, समझौता एक्सप्रैस आतंकी विस्फोट के मामले में एनआइए अदालत द्वारा जाने-माने आरएसएस कार्यकर्ता, असीमानंद समेत, चारों आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिए जाने के बाद, ‘हिंदुओं को आतंकवादी बताया’ के फर्जी आहत-भाव प्रदर्शन का जहरबुझा तीर और जोड़ दिया गया। पर शुरू में यह जिम्मा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तथा उत्तर प्रदेश के भजापायी मुख्यमंत्री, आदित्यनाथ समेत मोदी-इतर भाजपा नेताओं ने ही संभाल रखा था। इसलिए, शुरू में ऐसा लग रहा था कि भाजपा ने इस बार के चुनाव प्रचार के लिए अपना कार्य-विभाजन तय कर लिया है।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यत: या कम से कम शुरूआत में, पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद और सुरक्षा की दुहाई पर ही फोकस करेंगे, ताकि अपनी सरकार के पांच साल के प्रदर्शन पर जनता को जवाब ही नहीं देना पड़े, जबकि अन्य भाजपा नेता, इस राष्ट्रवादी दुहाई के सांप्रदायिक पहलुओं को चमकाएंगे। लेकिन, मादी राज के पांच साल के रिकार्ड से जनता की नाराजगी की चुनौती के सामने, यह सुविधाजनक श्रम विभाजन, प्रचार के इस चरण का पहला हफ्ता तक पार नहीं कर पाया और नरेंद्र मोदी ने खुद ही, अपनी कथित राष्ट्रवादी दुहाई के हिंदूवादी चेहरे को स्पष्ट करने का जिम्मा संभाल लिया।

अचरज की बात नहीं है कि खुद ने इसकी शुरूआत, महाराष्ट्र में वद्र्घा की अपनी सभा से की। शायद महाराष्ट्र में उन्हें दूसरे राज्यों से कुछ ज्यादा ही इसकी जरूरत होगी। आखिरकार, पिछले पांच साल में अपनी पुरानी सहयोगी, शिव सेना के साथ, खुद मोदी-शाह की भाजपा के रिश्तों में जितनी कडुआहट तथा टकराहट बनी रही थी, उसके बाद अब गठजोड़ कर के चुनाव लडऩे को जरूरी सिद्घ करने के लिए, उन्हें इन दरारों को छुपाने के कुछ तो पलस्तर चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने वद्र्घा में जमकर इस सांप्रदायिक दलील को उछाला कि समझौता एक्सप्रैस, मक्का मस्जिद, अजमेर शरीफ, मालेगांव आदि, आतंकवादी हमलों के मामले में, खुद को बताने वाले आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई, ‘हिंदुओं का अपमान’ करने, उन्हें ‘कलंकित करने’ का अपराध बल्कि पाप ही थी। और हिंदुओं को यह अपराध करने वालों को माफ हर्गिज नहीं करना चाहिए और इस चुनाव में उन्हें इस अपराध की उपयुक्त सजा देनी चाहिए! प्रधानमंत्री ने बड़ी चतुराई से इसे कांग्रेस अध्यक्ष, राहुुल गांधी के वायनाड से भी चुनाव लडऩे के फैसले को सांप्रदायिक रंग देने से जोड़ दिया। उन्होंने दावा किया कि अपने इसी हिंदूविरोधी पाप के लिए, हिंदुओं की नाराजगी से डरकर, कांगे्रस अध्यक्ष ने एक ऐसी सीट की शरण ली है, जहां बहुसंख्यक, अल्पसंख्या में हैं!

बेशक, यह प्रधानमंत्री के खुल्लमखुल्ला धर्म की दुहाई के सहारे वोट मांगने का मामला था, जिसकी ओर विभिन्न विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग का ध्यान भी खींचा है। फिर भी, सीधे प्रधानमंत्री मोदी के खुलकर हिंदुत्व की दुहाई का सहारा लेने का यह सिलसिला यहीं रुकना तो दूर, सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित रहने वाला भी नहीं है। इस चुनाव में सब कुछ झोंकने की नरेंद्र मोदी की बौखलाहट को, खुल्लमखुल्ला हिंदुत्ववादी दुहाई तक जाना ही था। यह दूसरी बात है कि जनता की नाराजगी के सामने, मोदी को इस चुनावी सीजन में शुरू में ही अपना कथित ब्रह्मास्त्र चलाना पड़ गया है। याद रहे कि 2014 के चुनाव के अपने लंबे प्रचार अभियान के लगभग आखिर में ही नरेंद्र मोदी ने, अपने कथित ‘गुजरात मॉडल’ के पूरक के रूप में, ‘गुलाबी (मांस) क्रांति’ के लिए पिछली सरकार पर सांप्रदायिक हमले के हथियार का सहारा लिया था। लेकिन, चुनाव हाथ से फिसलता देख रही मोदी-शाह जोड़ी के लिए ऐसी नफासत किस काम की? अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने रफाल सौदे पर अपने निर्णय पर पुनर्विचार का दरवाजा ही खोल दिया है, सत्ताधारी जोड़ी बदहवासी में बहुसंख्यकवादी उन्मत्त राष्ट्रवाद की दुहाई पर और ज्यादा निर्भर हो जाएगी। भाजपा के घोषणापत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा के जाप के साथ, राम मंदिर से लेकर समान नागरिक संहिता, धारा-370 व नागरिकता संशोधन विधेयक आदि के योग ने, इसका इशारा भी कर दिया है। फिर भी लगता नहीं है कि की कॉकटेल का नशा वाकई इतना चढ़ेगा कि लोग मोदी राज से अपनी शिकायतों को भूल जाएंगे और उसकी वापसी के लिए बजट दबा आएंगे।

0 राजेंद्र शर्मा

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