Breaking News
Home / हस्तक्षेप / आपकी नज़र / कम्युनिस्ट दल जब तक हिंदी का महत्व नहीं समझते, वे हिंदी क्षेत्र में संकट में रहने को अभिशप्त हैं
भाकपा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, CPI, Communist Party of India,

कम्युनिस्ट दल जब तक हिंदी का महत्व नहीं समझते, वे हिंदी क्षेत्र में संकट में रहने को अभिशप्त हैं

कम्युनिस्ट दल जब तक हिंदी का महत्व नहीं समझते, वे हिंदी क्षेत्र में संकट में रहने को अभिशप्त हैं

जगदीश्वर चतुर्वेदी

कम्युनिस्ट पार्टी के लोग राष्ट्रभाषा हिंदी और कम्युनिकेशन की हिंदी में अंतर नहीं समझते। वे हिंदी के सवाल को राष्ट्रभाषा के सवाल के रूप में ही देखते और उसके प्रति अ-लोकतांत्रिक आचरण करते हैं। हिंदी कम्युनिकेशन की सबसे प्रभावशाली भाषा है। यह साधारण किंतु महत्वपूर्ण बात वे आज तक समझ नहीं पाए हैं। साधारण सी बात से इस उपेक्षा को समझ सकते हैं,

माकपा के पास विशाल प्रकाशन संगठन है जिसने महत्वपूर्ण किताबें अंग्रेजी ,बंगला और मलयालम में छापी हैं। लेकिन हिंदी को ये लोग प्रकाशन योग्य भाषा ही नहीं समझते। चंद किताबें हिन्दी में इन्होंने प्रकाशित की हैं। कई भाषाओं में टीवी चैनल भी हैं लेकिन हिंदी में कोई चैनल नहीं है, यह तो नेट प्रचार का दवाब है जिसके कारण कुछ वेबसाइट वे चला रहे हैं,लेकिन उनका फ्लो और सामग्री इतनी कम है कि बस कुछ कहने को मन नहीं करता।

भारत के लोकतंत्र के लिए कैंसर है अंग्रेजी

English is Cancer for India’s democracy

भारत में अंग्रेजी मजदूर किसान की भाषा नहीं है बल्कि देशज भाषाएं उसके भाषा जगत की मालिक हैं। इसी तरह भारत के लोकतंत्र की भाषा अंग्रेजी नहीं है, लोकतंत्र जिंदा है देशज भाषाओं के बल पर, अंग्रेजी तो भारत के लोकतंत्र के लिए कैंसर है।

वाम शासन में हिंदी से सौतेला व्यवहार

Under the rule of the Left front half-hearted behavior with Hindi

बंगाल में पश्चिम बंग हिंदी अकादमी का गठन वाम शासन में हुआ और उसके लिए एक भी कर्मचारी या अधिकारी की स्वतंत्र तौर पर वाम शासन ने नियुक्ति नहीं की। दैनिक दिहाड़ी पर चपरासी था, डेपुटेशन पर गवर्नमेंट कॉलेज के शिक्षक को अकादमी का सचिव बनाकर रखा जाता था, हम लोगों ने अनेक बार मुख्यमंत्रीद्वय ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य से स्थायी कर्मचारियों की मांग की लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। जबकि बंगला, उर्दू, नेपाली अकादमी के पास कई स्थायी कर्मचारी थे, इन सबका बजट भी हिंदी अकादमी से कई गुना ज्यादा था। यह है भेदभाव।

Communication in Hindi and communist

महान कम्युनिस्ट नेता ए.के.गोपालन ने देश की व्यापक यात्राएं कीं, वे मथुरा भी आए, शहर के अंदर नुक्कड़ सभा की, लेकिन वे मलयालम में बोले। अब सोचो किसको मथुरा में मलयालम समझ में आई होगी!!

काश, हिंदी की सार्वजनिक संप्रेषण महत्ता कम्युनिस्ट नेता समझ पाते तो कम्युनिस्ट आंदोलन की राष्ट्रीय इमेज एकदम भिन्न होती।

हिंदी का प्रश्न राष्ट्रभाषा से नहीं, बल्कि वृहत्तर समाज के साथ संप्रेषण से जुड़ा है।

ईएमएस नम्बूदिरीपाद कई दशक दिल्ली में रहे लेकिन हिंदी में भाषण देना न सीख पाए।

जबकि गैर हिंदीभाषी राज्य से आने वाले अधिकांश कांग्रेसियों ने हिंदी सीखी और जमकर भाषण भी हिंदी में दिए।

वर्तमान समय में हिंदी का महत्व और कम्युनिस्ट

The Importance of Hindi at Present Time and the Communist

कम्युनिस्ट दलों में जब तक हिंदी राष्ट्रीय संप्रेषण की भाषा नहीं बनती तब तक वे हिंदी क्षेत्र में संकट में रहने को अभिशप्त हैं।

केरल में बड़े से बड़ा वाम नेता और बुद्धिजीवी जब सार्वजनिक भाषण देता है तो मलयालम में ही बोलता है। यही स्थिति कमोबेश बंगाल के वाम की है लेकिन अभागी हिंदी अभी भी वाम का इंतजार कर रही है।

भाषा का सवाल अभिव्यक्ति से जुड़ा है, सफल अभिव्यक्ति देशज भाषा में होती है। अंतर समझना हो तो योगेन्द्र यादव के हिंदी भाषण के साथ तुलना करके देख लो, यादव ज्यादा संप्रेषणीय है!

क्या यह ख़बर/ लेख आपको पसंद आया ? कृपया कमेंट बॉक्स में कमेंट भी करें और शेयर भी करें ताकि ज्यादा लोगों तक बात पहुंचे

 



About हस्तक्षेप

Check Also

Lalit Surjan ललित सुरजन। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व साहित्यकार हैं। देशबन्धु के प्रधान संपादक

साठ साल का देशबन्धु

एक अच्छा अखबार निकालने की शर्त है कि उसमें गलतियां न हों और यह बड़ी हद तक  कंपोजिंग विभाग में कुशल सहयोगी होने पर निर्भर करता है।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: