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Kabir कबीर

‘वर्ण-संघर्ष’ के सिवा कुछ नहीं था बुद्ध और ब्राह्मण का संघर्ष

नोट – प्रसिद्ध दलित चिंतक  कॅंवल भारती का यह आलेख “कबीर का ब्राह्मण से संवाद” September 4, 2012 को हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुआ था

ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहिं।

उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउ वेदा माँहि।।

(क.ग्र. पृष्ठ 28)

कहु पाँडे कैसी सुचि कीजै।

सुचि कीजै तौ जनम न लीजै।।

(वही, पृष्ठ 129)

ब्राह्मण के साथ कबीर का अत्यन्त तीखा संवाद है। उसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे एक महासंग्राम था कबीर और ब्राह्मण के बीच। क्या यह महासंग्राम नेतृत्व को लेकर था? यदि हाँ, तो नेतृत्व की यह लड़ाई किस क्षेत्र में थी? ब्राह्मण हिन्दू धर्म, समाज और सत्ता तीनों का अगुवा था। क्या कबीर उससे यह अगुवाई छीनना चाहते थे? अवश्य ही ऐसा नहीं था। ‘ना हिन्दू और ना मुसलमान’ चेतना के कबीर को ब्राह्मण के हिन्दुओं का नेतृत्व करने पर कोई ऐतराज नहीं था। वह शाक्तों, शैवों, वैष्णवों, सिद्ध – योगियों का भी नेतृत्व कर रहा था, इससे भी उन्हें कोई समस्या नहीं थी। उन्हें समस्या इस बात को लेकर थी कि ब्राह्मण दलित जातियों का भी नेता बन रहा था।

ब्राह्मण का ‘हिन्दू देव’ बना रहना ठीक था, पर कबीर उसे ‘भू-देव’ नहीं बनने देना चाहते थे।

आठवीं-नौवीं सदी में शंकराचार्य हुए, जिन्हें ब्राह्मणों ने ‘जगदगुरु’ की पदवी दी। यह पदवी उनके बाद भी चलती रही, न केवल कबीर के समय में, बल्कि वह आज भी चल रही है। ब्राह्मण उन्हें सम्पूर्ण जगत का गुरु मानते थे, जिनमें सम्पूर्ण हिन्दुओं के साथ-साथ दलित जातियों को भी उसमें शामिल कर लिया गया था। इसलिये कबीर ने सबसे पहला प्रहार इसी धरणा पर किया।

उन्होंने कहा-

ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहिं।

उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउ वेदा माँहि।।

(वही, पृष्ठ 28)

यहाँ ‘साधु’ कबीर ने अपने निर्गुणधर्मी साधुओं को कहा है। यह साखी ‘जगदगुरु’ की पदवी का भी खण्डन करती है।

यद्यपि 15वीं सदी में किसी जगदगुरु शंकराचार्य की उपस्थिति का पता नहीं चलता, पर यह एक धारणा थी, जिसे मनु ने हिन्दुओं के मनों में स्थापित किया था कि ब्राह्मण सारे संसार का गुरु है।

कबीर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ब्राह्मण की विश्व गुरु की धारणा को खण्डित कर दिया था।

यहाँ यह सवाल उठाया जा सकता है कि बुद्ध और सिद्धों ने भी ब्राह्मण का खण्डन किया है।

इस प्रसंग में दो बातें समझने की हैं। पहली, यह कि बुद्ध द्विज श्रेणी में आते हैं और सिद्धों में केवल सरहपाद ने ब्राह्मण का खण्डन किया है, जिनके ‘ब्राह्मण’ वर्ण का होने पर विवाद है। बुद्ध ने ब्राह्मण का खण्डन क्षत्रिय को उसके स्थान पर स्थापित करने के लिये किया था। उन्होंने वर्ण व्यवस्था का खण्डन नहीं किया था, बल्कि उसे गुण-कर्म के आधार पर स्वीकार किया था।

‘धम्मपद’ में ‘ब्राह्मण बग्ग’ में कहा गया है कि ‘‘माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण किसी को मैं ब्राह्मण नहीं कहता। यदि वह धन सम्पन्न है, तो केवल ‘भो-वादी’ है। मैं ब्राह्मण उसे कहता हूँ, जो अपरिग्रही और त्यागी है।’’ (26/14) किन्तु, इसी ‘वग्ग’ में बुद्ध, ठीक मनु के शब्दों में यह भी कहते हैंµ ‘‘ब्राह्मण पर प्रहार नहीं करना चाहिये। जो ब्राह्मण को मारता है, उसे धिक्कार है।’’ (26/7)

अतः बुद्ध और ब्राह्मण का संघर्ष ‘वर्ण-संघर्ष’ के सिवा कुछ नहीं था।

क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच ऐसे वर्ण-संघर्ष को डा. आंबेडकर ने अपनी रचनाओं में काफी रेखांकित किया है। (वाघमय, खण्ड-7, अ.-11) यद्यपि सरह का ब्राह्मण होना प्रमाणित नहीं होता, पर विद्वान उन्हें ब्राह्मण ही मानते हैं। ब्राह्मण के खण्डन में उनका यह दोहा मिलता हैµ

ब्रम्हणेति य जानन्तहि भेउ।

एवइ पढिअउ ए च्चड वेउ।।

(दो.को., पृष्ठ 2)

अर्थात्- ब्राह्मण चारों वेद यों ही पढ़ लेता है, उसका अर्थ नहीं जानता।

यह ब्राह्मण का खण्डन नहीं है, बल्कि इसमें सरह यह कहते हैं कि ब्राह्मण वेदों को अर्थ के साथ नहीं पढ़ता, इसलिये धर्म-अधर्म को नहीं जानता। अतः न तो बुद्ध और न सिद्ध सरह ही ब्राह्मण की सर्वश्रेष्ठता, सर्वोच्चता और गुरुता का खण्डन करते हैं। यह कबीर ही हैं, जो जन्मना ही नहीं, कर्मणा भी, ब्राह्मण की गुरुता को स्वीकार नहीं करते।

कबीर के ठीक पाँच सौ साल बाद इतिहास अपने को दोहराता है, जब कबीर की भाषा में डॉ. आंबेडकर ब्राह्मण की श्रेष्ठता को चुनौती देते हैं। (वाघमय, खण्ड-14, दे. प्रस्तावना)

क्हा जाता है कि कबीर के समय में हिन्दुओं के नेता रामानन्द थे। वे बनारस में भक्ति आन्दोलन के अगुवा थे। उनके सम्बन्ध में हिन्दी के विद्वानों ने खूब कहानियाँ गढ़ी हैं, यथा वे जाति-पाँति नहीं मानते थे और जाति का ख्याल किये बिना उन्होंने शूद्रों को भी भक्ति-साधना में दीक्षित किया था। ऐसी कहानियाँ इन विद्वानों ने कबीर को उनका शिष्य बताने के लिये गढ़ी हैं।

हकीकत यह थी कि रामानन्द जाति-पांति के न केवल कट्टर समर्थक थे, वरन् उसका पालन भी करते थे। वे अछूत की छाया से भी बचकर रहते थे। इसका प्रमाण हमें ‘भक्त कल्पद्रुम’ में ही मिलता है, (पृष्ठ 316) जिसमें कहा गया है कि जब रामानन्द ने यह सुना कि कबीर स्वयं को उनका चेला बता रहा है, तो उन्होंने उसे पकड़वा कर बुलाया और परदा डलवा कर कबीर से बात की कि उन्होंने कब उसे अपना चेला बनाया है? (प्रवर, पृष्ठ 31)

दरअसल ब्राह्मण के रूप में कबीर का संवाद रामानन्द से ही हुआ है। यह उसी तरह का विचारोत्तेजक संवाद है, जैसा कि बीसवीं सदी में गाँधी के साथ डॉ.. आंबेडकर का हुआ था। यदि हम कबीर-ब्राह्मण संवाद को दृष्टि में रखकर आंबेडकर गाँधी विवाद का अध्ययन करेंगे, तो सचमुच हमें इतिहास की पुनरावृत्ति होती हुई प्रतीत होती है।

कबीर ने रामानन्द को गुरु मानने से इनकार किया था। इसका अर्थ है, कबीर ने दलित जातियों की ओर से उनके नेतृत्व को चुनौती दी थी। इस तथ्य को समझने के लिये कबीर की इस साखी पर विचार करने की जरूरत हैµ

साषत ब्राम्हण जिनि मिलै, बैसनौ मिलौ चंडाल।

अंक माल दै भेंटिये, मानूँ मिलै गोपाल।।

(क.ग्र., पृष्ठ 28)

डा. युगेश्वर के ‘कबीर समग्र’ में यह साखी कुछ परिवर्तन के साथ इस प्रकार मिलती है –

साकट ब्रह्मण मत मिलौ, वैष्णव मिलौ चंडाल।

अंग भरे भरि भेंटिये, मानो मिलै दयाल।।

(क.स., पृष्ठ 492)

इन दोनों साखियों में, शब्दान्तर के बावजूद अर्थ में भिन्नता नहीं है।

कबीर कहते हैं, शाक्त ब्राह्मण से मत मिलो, पर यदि वैष्णव चण्डाल मिल जाये, तो उसे गले लगालो। यहाँ शाक्त ब्राह्मण और वैष्णव चाण्डाल दो अलग-अलग व्यक्ति हैं, अर्थात् वह ब्राह्मण, जो शाक्त हो गया है और वह चाण्डाल, जो वैष्णव हो गया है। शाक्त के साथ कबीर की कोई सहानुभूति नहीं है, पर उस वैष्णव के साथ है, जो मूलतः चाण्डाल है। उसे गले लगाना है, उसे बदलना है, क्योंकि वह नाम का वैष्णव है, उसकी जाति और संस्कृति चाण्डाल की ही है। उसके साथ व्यवहार भी चाण्डाल जैसा होता है।

वैष्णव चाण्डाल की पृष्ठभूमि यह थी कि कबीर की निर्गुणधारा के विरुद्ध रामानन्द ने सगुण को ही निर्गुण और निर्गुण को ही सगुण बनाकर नयी धारा चलायी और यह दिखाने के लिये कि वह जात-पांत नहीं मानते हैं, उन्होंने कुछ चाण्डालों को वैष्णव बनाया। उन्हें दीक्षा देने की उनकी विधि भी विचित्र थी। वह ब्राह्मणों को तो विधि पूर्वक मन्दिर में मंत्रोच्चार के साथ दीक्षा देते थे, पर चाण्डालों को उन्होंने मन्दिर के बाहर खड़ा कर के एक फर्लांग दूर से कहा, बोलो ‘राम-राम’, जब चाण्डालों ने बोल दिया, ‘राम-राम’ तो रामानन्द ने कहा, जाओ, तुम्हारी दीक्षा हो गयी, तुम वैष्णव हो गये। लेकिन, समाज में वे चाण्डाल ही बने रहे और वही सामाजिक स्तर बना रहा, जो पहले था।

वैष्णव चाण्डाल की इस व्याख्या के लिये मैं इतिहासविद प्रो. ओमराज का ऋणी हूँ, जिसे उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘कबीर और समकालीन इतिहास’ के दूसरे खंड में प्रस्तुत किया है।

यदि आधुनिक उदाहरण देना हो, तो ‘वैष्णव चाण्डाल’ की तुलना बीसवीं सदी की उस घटना से की जा सकती है, जिसमें गाँधी ने दलित जातियों को ‘हरिजन’ बनाने का उपक्रम किया था। ‘वैष्णव चाण्डाल’ और ‘हिन्दू हरिजन’ दोनों ही प्रतिक्रान्ति की घटनाएँ हैं। ये दोनों घटनाएँ दलितों को हिन्दू फोल्ड में रखने के उपक्रम थे, वैष्णव के रूप में भी और हरिजन के रूप में भी। दलित नायकों ने इन दोनों का ही खण्डन किया। कबीर ने दलितों को धोखा देने वाले ऐसे कपटी गुरुओं की पोल खोली। उन्होंने ऐसे गुरुओं से दलितों को सावधन किया। उन्होंने कहा कि गुरु तो वह है, जो (चाण्डाल को भी) ब्रह्म बना दें। यथाµ

जा गुरु ते भ्रम ना मिटै, भ्रांति न जीव की जाय।

गुरु तो ऐसा चाहिए, देई ब्रह्म बनाय।।

(वही, पृष्ठ 227)

जैसे बीसवीं सदी में अज्ञानता वश दलित गाँधी के बहकावे के आकर ‘हरिजन’ बन गये थे, उसी प्रकार पन्द्रहवीं सदी में रामानन्द के अज्ञानता के प्रचार में आकर बहुत से शूद्र उनके शिष्य होकर पत्थर पूजने लगे थे। पर कबीर की दृष्टि में वह दलितों की मुक्ति का मार्ग नहीं था। उन्होंने कहा-

गुरु को तो गम्य नहीं, पाहन दिया बताय।

सिख सोधे बिन सेइया, पारि न पहुँचा जाय।।

(वही)

कबीर ने ऐसे गुरुओं से सावधान किया था, जो एजेन्ट के रूप में घर-घर दीक्षा देने के लिये घूम रहे थे। यथाµ

गुरुवा तो घर घर फिरै दीक्षा हमारी लेहु।

कै बूडो कै ऊछलौ, टका पर्दनी देहु।।

(वही, पृष्ठ 228)

ये घर-घर घूमने वाले ब्राह्मण वैसे ही थे, जैसे बीसवीं सदी में दयानन्द और गाँधी के एजेन्ट दलितों को हिन्दू और गाँधी-भक्त बनाने के लिये उनकी बस्तियों में घूमते थे। डॉ.. आंबेडकर ने, दलितों को इन एजेन्टों से सावधान किया था। (वाघमय, खण्ड-16) कबीर कहते हैं कि ये गुरु दलितों को आवागमन का भय दिखाते थे और उससे मुक्ति के लिये उन्हें अपने पंथ की दीक्षा देते थे। कबीर ने उन्हें झूठा गुरु कहा। यथा –

झूठे गुरु के पक्ष को तजत न कीजै बार।

पार न पावै शब्द का भरमें बारम्बार।।

साँचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय।

चंचलते निश्चल भया, नहिं आवै नहिं जाय।।

(वही)

कबीर ने ब्राह्मण से पहला संवाद इसी आवागमन को लेकर किया।

ब्राह्मण जनता को वैकुण्ठ के नाम से भ्रमित करता था। कबीर ने उनसे पूछा, क्या तुम खुद भी जानते हो, बैकुण्ठ कहाँ है? वह कितने योजन दूर है, यह तक तो तुम्हें मालूम नहीं। सिर्फ बातों में ही बैकुण्ठ बखानते हो। कहने-सुनने से कैसे विश्वास हो, पहले वहाँ स्वयं जाकर तो दिखाइए? यथा –

चलन चलन सबको कहत है, नाँ जानौं बैकुंठ कहाँ है?

जोजन एक प्रमिति नहिं जानै, बातन ही बैकुंठ बखानै।।

कहै सुनें कैसे पतिअइये, जब लग तहाँ आप नहिं जइये।।

(वही, पृष्ठ 536)

शूद्रों को दूर से ‘राम’ बोलकर दीक्षा देने का दिखावा करने वाले पंडितों की कबीर खूब खबर लेते हैं। जब उन्हें ब्राह्मणों के इस पाखण्ड की खबर मिली, तो उन्होंने अपने ‘साध-सत्संग’ में कहा- पंडित झूठी बहस करते हैं, जैसे खांड़ कहने से मुँह मीठा नहीं हो जाता, वैसे ही राम कहने मात्र से दुनिया को मुक्ति नहीं मिल जाती है। केवल आग कहने से पैर नहीं जलता, जल कहने से प्यास नहीं बुझ जाती, भोजन कहने से भूखे का पेट नहीं भर जाता है, अगर ऐसा होने लगता, हर कोई मुक्त हो जाता। आदमी के साथ तोता भी हरि का नाम बोलता है, पर वह हरि का प्रताप नहीं जानता है और यदि एक बार वह पिंजड़े से निकलकर जंगल में उड़ जाये, तो दुबारा हरि भी नहीं बोलता। ऐसे पंडितों को शूद्रों से रंच मात्र भी प्रेम नहीं है, मनुष्यों से प्रेम किये बिना कोई सन्त नहीं हो सकता। वे एंसे सन्तों का उपहास करते हैं। यथाµ

पंडित वाद बदंते झूठा।

राम कह्याँ दुनियाँ गति पावै, खाँड कह्याँ मुख मीठा।।

पावक कह्याँ पाव जे दाझैं, जल कहि त्रिषा बुझाई।

भोजन कह्याँ भूष जे भाजै, तौ सब कोई तिरि जाई।।

नर कै साथि सूवा हरि बोलै, हरि परताप न जानै।

जो कबहूँ उडि़ जाई जंगल में, बहुरि न सूरतै आनै।।

साची प्रीति बिषै माया सूँ, हरि भगतानि सूँ हासी।

कहै कबीर प्रेम नहीं उपज्यौ, बाँध्यो जमपुरि जासी।।

(वही, पृष्ठ 542)

रामानन्दी ब्राह्मण की कथनी और करनी में अन्तर था। वह दोमुंही था, एक मुँह से राम-नाम जपता था, तो दूसरे मुँह से वर्णव्यवस्था का समर्थन करता था। इस प्रकार, उसके मुँह में राम था, तो बगल में छुरी थी। वह स्वयं को ऊँचे कुल और वर्ण का पूज्य प्राणी मानता था, शरीर और मस्तक पर तरह-तरह के तिलक लगाकर अन्य मनुष्यों से भिन्न भेष बनाए रहता था और शेष सभी को अपने से निम्न कुल और वर्ण का मानकर अहंकार में अकड़ा रहता था। ऐसे ब्राह्मणों से कबीर का तीखा संवाद हुआ। उन्होंने इन ब्राह्मणों से तर्क करते हुए सवाल किया – ‘तुम किस आधार पर वर्ण के सिद्धान्त को मानते हो? यदि यह ईश्वर ने बनाया है, तो जन्म से ही तुम्हारे माथे पर तीन डंडियाँ (रेखाएँ) बनी हुई क्यों नहीं हैं ? ये डंडियाँ तो तुम स्वयं अपने हाथ से खींचते हो। जिस वीर्य से मनुष्य की उत्पत्ति होती है, वह कहाँ से आया? उसमें वर्ण-अवर्ण (माया, भ्रम) कैसे और कहाँ से आ गया?

फिर, कबीर ही जवाब देते हैं, जिसने शरीर (पिण्ड) दिया है, उसी ने वीर्य दिया है। इसलिये न कोई उच्च है और न कोई नीच।

उन्होंने सवाल किया- अगर तुम ब्राह्मण हो और यह समझते हो कि ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए हो, तो फिर अन्य मार्ग से पैदा क्यों नहीं हुए? यह ब्राह्मण को निरुत्तर कर देने वाला तर्क था। इसलिये कबीर ने कहा, कोई छोटा नहीं है, छोटा वह है, जिसके मुँह में राम नहीं है। ये ऐसे प्रश्न हैं, जो कबीर से पहले किसी ने ब्राह्मण से नहीं पूछे थे। यथा –

जै पै करता बरण बिचारै, तौ जनमत तीनि डांडि किन सारै।।

उतपति ब्यंद कहाँ थैं आया, तो धरी अरु लागी माया।।

नहिं को ऊँचा नहिं को नीचा, जाका प्यंड ताही का सींचा।।

जे तूँ बाभन बभनी जाया, तो आँन बाट ह्नै काहै न आया।

कहै कबीर मधिम नहीं कोई, जो मधिम जा मुखि राम न होई।।

(वही, पृष्ठ 542)

यह संवाद यहीं नहीं रुका, बल्कि ब्राह्मणों के धर्म, दर्शन, सामाजिक व्यवहार और आचरण तक जाता है।

ब्राह्मण वेदान्ती और सनातनी दोनों थे, किन्तु वर्णाश्रम को दोनों मानते थे। वे केवल वर्ण-विचार से ही नहीं, जाति-विचार से भी ग्रस्त थे। वे स्वयं को शुद्ध और दूसरों को अशुद्ध समझते थे, जबकि दलित जातियाँ तो उनके लिये अछूत हीं थीं। वे ब्राह्मण धर्म-शास्त्रों के हवाले से वर्णव्यवस्था और जातिवाद को न्यायोचित ठहराते थे। बीसवीं सदी में इसी आधार पर महात्मा गाँधी ने वर्णव्यवस्था को धर्म सम्मत और न्याय संगत ठहराया था। इसके खंडन में डॉ.. आंबेडकर ने महात्मा गाँधी से लम्बा संवाद (पत्राचार) किया था। कबीर ने भी यह खण्डन ब्राह्मण को सम्बोधित करके किया था। उन्होंने शुद्धता पर सवाल उठाया –

कहु पाँडे सुचि कवन ठाँव, जिहि घरि भोजन बैठि खाऊँ।

माता जूठा पिता पुनि जूठा, जूठे पफल चित लागे।।

जूठा आंगन जूठा जाँनाँ, चेतहु क्यूँ न अभागे।।

अन्न जूठा पाँनी पुनि जूठा, जूठे बैठि पकाया।

जूठी कड़छी अन्न परोस्या, जूठे जूठा खाया।।

चैका जूठा गोबर जूठा, जूठी का ढोकारा।

कहै कबीर तेई जन सूचे, जे हरि भजि तजहिं विकारा।।

(वही, पृष्ठ 627)

कबीर ने बहुत ही सटीक सवाल ब्राह्मण से पूछा था कि वह कौन सी जगह है, जो शुद्ध है, सारी जगहें जूठी हैं, जहाँ तक कि माता-पिता, अन्न और पानी तक। इसी तरह कबीर ने ‘छोति-विचार’ पर भी ब्राह्मण को फटकारा-

काहे को कीजै पाँडे छोति विचारा।

छोतिही तै उपजा संसारा।।

हमारे कैसे लोहू तुम्हारै कैसे दूध।

तुम्ह कैसे ब्राँम्हण पाँडे हम कैसे सूद।।

छोति छोति करता तुम्ह हीं जाय।

तौ ग्रभवास काहै को आय।।

जनमत छोति मरत ही छोति।

कहै कबीर हरि की विमल जोति।।

(क.स., पृष्ठ 79)

पन्द्रहवीं सदी में कबीर का यह सबसे आधुनिक चिन्तन है। ब्राह्मण अपने ‘छोति-विचार’ में एकदम अवैज्ञानिक और मूढ़ दृष्टिकोण का था। कबीर उसे बता रहे थे कि ‘छूति’ से कोई नहीं बच सकता। गर्भ में आने के समय से ही ‘छूति’ शुरु हो जाती है। ब्राह्मण भी उसी प्रक्रिया से गर्भ से पैदा होता है, जैसे सब पैदा होते हैं। ब्राह्मण को भी दाई ही गर्भ से बाहर निकालती है। तब, क्या यह ‘छूति’ नहीं है? मरने के बाद भी चार लोग उठाकर ही उसे श्मशान लेकर जाते हैं। क्या यह ‘छूति’ नहीं है? इस आधार पर, ब्राह्मण किस आधार पर अपने को इतना पवित्र मानता है कि दूसरों के छूने से अपवित्र हो जाता है। कबीर एकदम वैज्ञानिक बात कह रहे हैं कि क्या ब्राह्मण के शरीर में खून की जगह दूध होता है? यदि नहीं, तो किस आधार पर वह ब्राह्मण है और किस आधर पर हम शूद्र हैं?

पवित्रता का मिथ्या ख्याल ही ब्राह्मण को जाति पूछकर पानी पीने को कहता है। सनातनी ब्राह्मण आज भी इसे अपना पवित्र धर्म मानते हैं। इसी इक्कीसवीं सदी में हिन्दी के कर्म काण्डी पंडित और ‘नवभारत टाइम्स’ के सम्पादक विद्या निवास मिश्र इसी पवित्राता के ख्याल से रसोई की लकडि़यों को भी धोकर इस्तेमाल करते थे। बहरहाल, कबीर अपने समय के ऐसे ब्राह्मणों को अज्ञानी मानते थे, जिनके मस्तिष्क को वेद-शास्त्रों ने इस कदर कुन्द कर दिया था कि उनमें सोचने-समझने की शक्ति ही समाप्त हो गयी थी। ऐसे अज्ञानी ब्राह्मणों को चेताने के लिये कबीर ने उनसे यह संवाद किया था –

पाँड़े बूझि पियहु तुम पानी।

जिहि मिटिया के घर मँह बैठे, तामँह सिस्ट समानी।।

छपन कोटि जादव जहँ भींजे, मुनिजन सहस अठासी।

पैग पैग पैगम्बर गाड़े, सो सब सरि भौ माँटि।।

तेहि मिटिया के भाँडे पाँडे, बूझि पियहु तुम पानी।

मच्छ कच्छ घरियार बियाने, रुधिर नीर जल भरिया।।

नदिया नीर नरक बहि आवै, पसु-मानस सब सरिया।

हाड़ झरी झरि गूद गरी गरि, दूध कहाँ तैं आया।।

सो ले पाँड़े, जेंवन बैठे, मटियहि छूति लगाया।

बेद-कितेब छाँडि़ देऊ पाँड़े, ई सब मन के भरमा।।

कहहिं कबीर सुनहु हो पाँड़े, ई तुम्हरे हैं करमा।

(कबीर, पद 150)

कबीर के तर्क अद्भुत हैं, जिस मिट्टी के घर में हम रहते हैं उसी मिट्टी में, ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर गढ़कर, सड़कर मिट्टी हो गये। उसी मिट्टी के बर्तनों में दिया गया पानी ब्राह्मण को अपवित्र लगता है, जाति पूछ कर पानी पी रहे हो। क्या पानी और बर्तन की भी जाति होती है। जिस नदी को पवित्रा मानते हो, उसी में मछली, कछुवे और घडि़याल बच्चे जनते हैं, उसी में पशु और मनुष्य के शव सड़ते रहते हैं, हाड़-माँस झर-झर कर नदी में मिलते रहते हैं। वह पानी क्या दूध हो गया? उस पानी में तुम ‘छूति-विचार’ करते हो। इसलिये कबीर कहते हैं कि पाण्डे, वेद-शास्त्र में विश्वास करना छोड़ दो- यही तुम्हें भ्रमित करते हैं और तुम्हें ऐसा अवैज्ञानिक कर्म करने को कहते हैं।

कबीर अपने समय के ब्राह्मण के ज्ञान और कर्म को देखकर बहुत हैरान थे। ब्राह्मण को ईश्वर का भी सही ज्ञान नहीं था। वह कर्मकाण्डी बना हुआ था। प्रेम और समता की जगह वह घृणा और विषमता फैला रहा था। वह जनता को अवतारों और देवताओं की पूजा में ही नहीं उलझा रहा था, वरन् उनके नाम पर पशुओं की हत्याएँ भी करवा रहा था। इस पर भी वह स्वयं को कुलीन कहता था और धार्मिक सभाओं में अकड़ कर बैठता था। हर कोई उससे दीक्षा माँगने को आतुर रहता था, जिसे देखकर कबीर को हँसी आती थी। लेकिन कबीर के लिये यह ब्राह्मण ‘निपुन कसाई’ था। यथा-

साधो, पाँड़े निपुन कसाई

बकरी मारि भेडि़ को धाए दिल में दरद न आई।

करि अस्नान तिलक दै बैठे, बिधि सों देवि पुजाई।

आतम मारि पलक में बिनसे, रुधिर की नदी बहाई।

अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माँहि अधिकाई।

इनसे दिच्छा सब कोई माँगे, हँसि आवै मोहि भाई।

(वही, पद 151)

यह पद कबीर ने अपने ‘साधु-संगत’ को सम्बोधित किया है। यह सम्भवतः प्रतिदिन के होने वाले सत्संग में साधुओं द्वारा पूछे गये प्रश्नों को ध्यान में रखकर कहा गया होगा। वे इस बात से भी हैरान थे कि पंडितों पर उनकी कोई बात असर नहीं करती थी। कबीर उन्हें यह समझाने की कोशिश करते थे कि ईश्वर अपिंडी (देहरहित) है, उसे देखा नहीं जा सकता, वह सभी प्राणियों में निवास करता है। कबीर को आश्चर्य होता था कि इतनी सीधी-सी बात भी ब्राह्मणों और सन्तों की समझ में नहीं आती थी। यथा –

पंडित सेती कहि रहे, कह्या न मानै कोइ।

ओ अगाध ए का कहै, भारी अचरज होइ।।

बसै अपिंडी पिंड में, ता गति लषै न कोइ।

कहै कबीर संत हौ, बड़ा अचम्भा मोहि।।

(क.स., पृष्ठ 252)

कबीर ब्राह्मण से अपने वाद-विवाद और संवाद में इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि वह सुधरना नहीं चाहता और शास्त्रों के कूप में ही मेढक बनकर रहना चाहता है। कबीर ब्राह्मण की पोथियों को तीतर का ज्ञान कहते थे। वह तीतर, जो दूसरों का शगुन बताता था, पर अपना पफन्दा नहीं जानता था। वे कहते थे, पोथी लेकर चलने वाला पंडित और मशाल लेकर चलने वाला मशालची दोनों एक जैसे हैं, जिन्हें दिखायी नहीं देता है। वह पोथी पढ़-पढ़ कर पत्थर हो गया है, उसकी संवेदनाएँ मर गयी हैं और लिख-लिख कर चोर हो गया है, क्योंकि उसमें अपना कुछ भी मौलिक नहीं होता है। यही नहीं, कबीर ने ब्राह्मण की तुलना गधे से की। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण संसार का वह गधा है, जो अपने ऊपर तीर्थों को लादे हुए है। वह यजमान को ‘पुण्य’ का पाठ पढ़ाता है और उसी से अपनी जीविका चलाता है। यथा –

पंडित केही पोथियाँ, ज्यों तीतर का ज्ञान।

औरन शकुन बतावहीं, अपना पफंद न जान।।

पंडित और मसालची, दोनू सूझै नाहिं।

औरन को करै चाँदना, आप अंधेरा माँहि।।

पढि़ पढि़ तो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जो चैर।

जिस पढ़ते साहब मिलै, तो पढ़ना कछु और।।

ब्राह्मण गदहा जगत का, तीरथ लादा जाय।

यजमान कहै मैं पुनि किया, वह मिहनत का खाय।।

(वही, पृष्ठ 434-35)

अन्तिम साखी में कबीर का व्यंग्य है कि तीरथों पर बैठा ब्राह्मण सुबह से शाम तक अपने पेट के लिये कितनी मेहरत करता है, जैसे गधा, जिसे दिन-भर भार लादने के बाद ही घास मिलती है। और, व्यवसाय के रूप में तीर्थों की रचना करने वाले ऐसे ब्राह्मणों के बारे में उनका मत हैµ

कबिरा ब्राह्मण की कथा, सो चारों की नाव।

सब अंधा मिलि बैठहीं, भावै तहाँ ले जाव।।

(वही, पृष्ठ 435)

कबीर कहते हैं, ब्राह्मण की कहानी उन चार अन्धों की नाव है, जिसमें सब अंधे मिलकर बैठे हुए हैं और जिधर चाहते हैं, उसे ले जाते हैं। उनका कोई लक्ष्य नहीं है।

क्या यह सम्वाद आज भी प्रासंगिक नहीं है?

संकेत विवरण

क.स.    ( कबीर समग्र, प्रथम खण्ड, सं. डा. युगेश्वर, 1995, हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी )

क.ग्र.    ( कबीर ग्रन्थावली, सं. श्याम सुन्दर दास, 2034 वि., नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी )

वाघमय    ( डा. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघमय, खण्ड-7, 1993, कल्याण मन्त्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली )

दो. को.    ( दोहा कोश- राहुल सांकृत्यायन, 1997, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना )

प्रवर    ( सन्त प्रवर रैदास साहेब-चद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, 1969, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ )

कॅंवल भारती

कँवल भारती, लेखक जाने माने दलित चिंतक और साहित्यकार हैं।

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