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Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।
Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

कॉरपोरेट जगत के चौकीदार नाकारा मोदी ने देश को भारी संकट में डाल दिया है

चाकर रहसूं, बाग लगासूं नित उठ दर्शन पासूं।

श्याम ! मने चाकर राखो जी !

कॉरपोरेट भक्त सरकार की आर्त विनती

19 सितंबर 2019 के दिन को भारतीय पूंजीवाद के इतिहास के ऐसे स्वर्णिम दिन (Golden days of the history of Indian capitalism) के रूप में याद किया जायेगा जब भारत के कॉरपोरेट जगत ने अपनी ताकत का भरपूर परिचय दिया और 2014 और 2019 में महाबली मोदी के फूल कर कुप्पा हुए व्यक्तित्व में पिन चुभा कर उसे बौना बना के उसे उसकी सही जगह, कॉरपोरेट जगत के चौकीदार वाली जगह पर बैठा दिया, जिस काम के लिये सचमुच बुद्धि की कोई जरूरत नहीं होती है। मोदी कॉरपोरेट के चरणों में पड़े दिखाई दिये। चंद रोज पहले उन्होंने रिजर्व बैंक के हाथ मरोड़ कर उससे जो 1.76 लाख करोड़ झटके थे, लगभग उस पूरी राशि को कॉरपोरेट के चरणों में सौंप कर आज वे धन्य-धन्य हो गये !

दो महीने पहले, जब मोदी की अपनी शान शिखर पर थी, इन्हीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट में कारपोरेट (Corporate in budget) को किसी भी प्रकार की अतिरिक्त छूट न देने का बहादुरी का स्वांग रचा था। लेकिन उसके चंद दिनों बाद ही कॉरपोरेट के दबाव की पैंतरेबाजियां शुरू हो गई। ईश्वर ने भक्त को उसकी औकात में लाने का जाल रचना शुरू कर दिया। अर्थ-व्यवस्था का मूल संकट अपने कारणों से, नोटबंदी और जीएसटी की वजह से आम जनता की बढ़ती हुई कंगाली और मांग की भारी कमी से पैदा होने वाली मंदी के कारण था, लेकिन माहौल ऐसा बनाया जाने लगा जैसे कॉरपोरेट ने इस सरकार के खिलाफ हड़ताल की घोषणा कर दी हो और जो हो रहा है, उनके कोपभवन में जाने की वजह से ही हो रहा है। छोटे-बड़े, सारे औद्योगिक घराने खुले आम निवेश के मामले में फूंक फूंक कर कदम उठाने, बल्कि उससे विरत रहने के संकेत देने लगे।

कॉरपोरेट की यह मामूली बेकरारी ही सेवक मोदी को नाकारा साबित करने के लिये काफी थी। चारों ओर से उनके निकम्मेपन की गूंज-अनुगूंज सुनाई भी देने लगी। कुल मिला कर, अंत में मोदी ने भगवान के सामने समर्पण कर ही दिया, अर्थात् अर्थ-व्यवस्था के सभी क्षेत्रों के संकट का कॉरपोरेट ने अपने हित में भरपूर लाभ उठाया और मोदी को दो महीने पहले के अपने तेवर को त्याग कर कॉरपोरेट के सामने साष्टांग लेट जाने के लिये मजबूर कर दिया।

कॉरपोरेट के नग्न सेवक का यह सेवा भाव बैंकों और एनबीएफसी के मामलों के वक्त से ही टपकने लगा था और बैंकों को कहा गया था कि उन्हें महाप्रभु कॉरपोरेट को संकट से निकालने के लिये दिन-रात एक कर देने हैं। और अब आज, पिछले बजट के सारे तेवर को त्याग कर दास ने अपने को प्रभु के हाथ में पूरी तरह से सौंप देने का अंतिम कदम उठाया है। इसके बाद से भारत का कॉरपोरेट जगत किस प्रकार के अश्लील उल्लास से फट पड़ा है, इसे एक दिन में शेयर बाजार में 2000 प्वायंट के उछाल से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। इसे कहते हैं पूंजीवाद में कारपोरेट की अंतिम हंसी !

निर्मला सीतारमण ने जो घोषणाएं की, उन्हें बिन्दुवार इस प्रकार समेटा जा सकता है —

  1. कॉरपोरेट टैक्स में भारी कटौती ; कंपनियों पर कर की प्रभावी दर 25.17% होगी जो पहले 34.94 प्रतिशत थी ; दूसरी कोई छूट न लेने पर यह दर सिर्फ 22% होगी ; इस पर भी अतिरिक्त और सबसे बड़ी बात यह रही कि कंपनियों पर अब मैट जमा करने की कोई मजबूरी नहीं रही रहेगी।
  2. मैनुफैक्चरिंग में निवेश करने वाली नई कंपनी पर कॉरपोरेट टैक्स सिर्फ 17.01% होगा।
  3. MAT की दर को कम करके 15% कर दिया।
  4. जो कंपनियाँ बाजार से अपने शेयरों को वापस ख़रीदने में निवेश करना चाहती है, अभी तक के नियमों के अनुसार उनकी इस ख़रीद से होने वाले मुनाफ़े पर कोई उन्हें कोई कर नहीं देना पड़ेगा।
  5. जो मोदी सरकार पिछले छ: सालों से औपनिवेशिक शासकों की तरह सिर्फ राजस्व वसूलने में लगी हुई थी जिसके कारण कृषि क्षेत्र की वास्तविक कंगाली के साथ ही कॉरपोरेट क्षेत्र भी अपने को कंगाल बताने लगा था, उसे तक़रीबन सालाना 1.45 लाख करोड़ की राजस्व की राहत दी दी गई।

निर्मला सीतारमण की इन घोषणाओं से इस प्रकार के एक नतीजे पर भी पहुंचा जा सकता है कि मोदी ने एक प्रकार से भारत को कॉरपोरेट दुनिया के लिये आयकर-मुक्त देश बना दिया है। जो लोग उनकी MAT (Minimum Alternative Tax) संबंधी घोषणा के प्रभाव को नहीं समझ रहे हैं, वे शायद हमारी इस बात को पूरी तरह से नहीं समझ पायेंगे।

आयकर कानून में मैट, अर्थात् मिनिमम अल्टरनेट टैक्स 1987 में तब लाया गया था जब कंपनियों में कंपनी लॉ के अनुसार अपने खाते तैयार करके मशीनों पर छीजत का लाभ उठा कर, मुनाफ़े को नये निवेश में दिखा कर टैक्स नहीं देने का रुझान बढ़ गया था। तब एक प्रकार के अग्रिम कर के रूप में ही मैट की व्यवस्था की गई ताकि मुनाफा करने वाली हर कंपनी सरकार के राजस्व में हर साल कुछ न कुछ योगदान करती रहे, भले उसके खातों में पुराना घाटा चल रहा हो अथवा तमाम प्रकार की छूटों का लाभ लेने पर उन्हें आयकर को पूरी तरह से बचाने का मौका मिल जाता हो। सिद्धांततः मैट के रूप में चुकाये गये रुपये का कंपनी आगे के सालों में अपनी आयकर की लागत से समायोजन कर सकती है, लेकिन इसमें समय सीमा आदि की कई बाधाओं के चलते आम तौर पर उसे हासिल करना संभव नहीं होता था। इसीलिये मैट अग्रिम आयकर कहलाने के बावजूद वास्तव में एक प्रकार का अतिरिक्त आयकर का ही हो गया था।

बहरहाल, 1991 में भी, उदारवादी आर्थिक नीति के प्रारंभ में एक बार मैट की बाध्यता ख़त्म कर दी गई थी, लेकिन 1996 में इसे फिर से शुरू कर दिया गया था। अब फिर से एक बार मैट देने की बाध्यता को ख़त्म करके जाहिरा तौर पर पुरानी ज़ीरो टैक्स कंपनी की प्रथा के पनपने की ही जमीन तैयार कर दी गई है।

सीतारमण ने साफ कहा है कि मुनाफे पर 22 प्रतिशत आयकर देने वाली कंपनियों पर मैट देने की बाध्यता ख़त्म हो जायेगी ; अर्थात् वे छीजत आदि का पूरा लाभ उठा कर बाकी के मुनाफे पर आयकर चुका पायेगी। इससे अब एक साथ पुराने जमा घाटे को मुनाफ़े के साथ समायोजित कर ज़ीरो टैक्स कंपनी बनने के नये अवसर पैदा कर दिये गये हैं।

हम यहां फिर से दोहरायेंगे कि भारत के कॉरपोरेट जगत के सामने मोदी जी की सारी हेकड़ी ढीली हो गई है। पिछले कई दिनों से वित्त मंत्रालय में कॉरपोरेट के लोगों का जो ताँता लगा हुआ था, वह असरदार साबित हुआ है। पिछले बजट तक में कॉरपोरेट को कोई छूट नहीं देने का जो रौब गाँठा गया था, वह अब पानी-पानी हो चुका है। और, यह भी साफ हो गया है कि मोदी जी की हेकड़ी का चाबुक सिर्फ ग़रीब किसानों, मज़दूरों और अनौपचारिक क्षेत्र के कमजोर लोगों पर ही चलता है।

ये चले थे कॉरपोरेट के आयकर-चोरों को जेल में बंद करने, लेकिन अब कॉरपोरेट पर आयकर को ही लगभग ख़त्म सा कर दिया है। अब आयकर वस्तुत: सिर्फ मध्यमवर्गीय कर्मचारियों और दुकानदारों के लिये रह गया है। कॉरपोरेट से आयकर वसूलने के सारे लक्ष्य त्याग दिये गये हैं। कहना न होगा, बहुत जल्द हमें कॉरपोरेट से वसूले जाने वाले आयकर के रूप में राजस्व की अकिंचनता और निरर्थकता के पाठ पढ़ाये जायेंगे। एक अर्से से ‘रोज़गार और संपदा पैदा करने वाले’ कॉरपोरेट का सम्मान करने की जो हवा बनाई जा रही थी, आज उस अभियान का वास्तविक मक़सद सामने आ गया है। भारत कॉरपोरेट के लिये वास्तव अर्थों में एक प्रकार का आयकर-मुक्त देश हो गया है।

सीतारमण की घोषणाओं में कॉरपोरेट की सामाजिक सेवा ज़िम्मेदारियों के दायरे को भी जिस तरह सरकारी सेवाओं के क्षेत्र में भी ले जाने की पेशकश की गई है, उससे साफ है कि सरकार ने जन-कल्याण के सारे कामों से अपने को पूरी तरह से अलग कर लेने का निर्णय ले लिया है। यह सरकार आर्थिक मंदी के मूल में कारपोरेट की खस्ता वित्तीय हालत और निवेश के प्रति उसकी कथित बेरुखी को देख रही है, जब कि वास्तव में इसके मूल में जनता की बढ़ती हुई कंगाली और आम आदमी की बाजार-विमुखता है। यही वजह है कि यदि कोई यह कल्पना कर रहा है कि सरकार के इन कदमों से अर्थ-व्यवस्था में जान आएगी तो वह मूर्खों के स्वर्ग में वास कर रहा है। यह कॉरपोरेट जगत को जरूर खुशी देंगे। जब तक बाजार में मांग पैदा नहीं होगी, मैनुफैक्चरिंग और उसी अनुपात में रोजगार में वृद्धि की कोई संभावना नहीं बनेगी। अब यह भी साफ पता चल रहा है कि हमारे देश को इस सरकार ने किस भारी संकट में डाल दिया है, इसका डर अब उसे भी सताने लगा है।

  अरुण माहेश्वरी

About अरुण माहेश्वरी

अरुण माहेश्वरी, प्रसिद्ध वामपंथी चिंतक हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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