Breaking News
Home / समाचार / देश / आधी आबादी– दास्ताने मध्यप्रदेश
Javed Anis जावेद अनीस, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

आधी आबादी– दास्ताने मध्यप्रदेश


बीते 13 जून 2014 को मध्य प्रदेश के खंडवा के पिपलोद थाने (Pipolad police station of Khandwa, Madhya Pradesh,) के अंतर्गत आने वाले एक गावं में एक पुरुष ने जमीन विवाद (Land dispute) के चलते अपनी पत्नी को सबक सिखाने के लिए अपने दस साथियों के साथ पहले उसका गैंगरेप (Gang rape) किया फिर उस महिला को पूरे गांव में निर्वस्त्र करके घुमाया, वहशीपन यहीं नहीं रुकता है। पीड़ित महिला जब पानी मांगती है तो उसे मूत्र पिलाया जाता है। इसी दौरान उत्तर प्रदेश में महिलाओं के साथ हो रही पाश्विक घटनाएँ पूरे देश ही नहीं, बल्कि दुनिया का ध्यान अपने और खीच रही थीं और देश का यह सब से बड़ा सूबा मीडिया के लिए “पीपली लाइव” (Pipli Live) बन चुका था, वहीँ मध्य प्रदेश हो रही घटनाओं की चर्चा अपेक्षाकृत रूप से उतनी नहीं हो रही थी। जबकि मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है जो महिलाओं के उत्पीड़न के मामले में देश में बहुत आगे है, दुर्भाग्य से यह देश और प्रदेश दोनों के लिए मुद्दा नहीं बन पाता है। मध्य प्रदेश कई वर्षों से महिलाओं के खिलाफ अपराधों (Crimes against women) में नंबर वन बना हुआ है।


जावेद अनीस


शिवराज सरकार द्वारा “स्वर्णिम मध्यप्रदेश” के तमाम दावों के बीच स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं, सरकार द्वारा विधानसभा के बजट सत्र  (जून – जुलाई 2014) में दी गयी जानकारी से जो तस्वीर सामने आई है वो हताश करती है। इसके अनुसार मध्यप्रदेश में रोजाना बलात्कार की 13 घटनाएं हो रही हैं जिनमें में से ज्यादातर घटनायें नाबालिगों और पिछड़े वर्ग के समुदाय के स्त्रीयों के साथ हुई हैं। इसी तरह से प्रदेश में पिछले सवा पांच माह में 196 सामूहिक बलात्कार की घटनाएं हुईं हैं।


मध्य प्रदेश के गृहमंत्री ने विधानसभा में बताया है कि इस साल 1 जनवरी से 10 जून के बीच प्रदेश में बलात्कार के कुल 2 हजार 152 प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें 529 पीड़ित अनुसूचित जाति से, 624 अनुसूचचित जनजाति से, 692 अन्य पिछड़ा वर्ग से और 313 सामान्य वर्ग से आती हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि सूबे की राजधानी भोपाल में पिछले सवा पांच माह के ज्यादा 99 बलात्कार के प्रकरण दर्ज हुए हैं।दुर्भाग्य से मध्यप्रदेश के लिए यह आंकड़े नए नहीं हैं,

हाल ही में जारी की गयी राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट “भारत में अपराध”-2013 के अनुसार, महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार की सूची में मध्यप्रदेश का नाम सबसे ऊपर है यहाँ पिछले वर्ष रेप की कुल 4,335 घटनायें हुई हैं जिनमें से 2,112 घटनायें नाबालिगों के साथ हुई हैं, जबकि अपहरण की कुल 2,873 वारदातें हुई हैं।

2012 में भी बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले मध्यप्रदेश में हुए थे, राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की ही 2012 की रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान देश भर में बलात्कार के कुल  24,923 मामले सामने आये थे, इनमें से 3,425 मामले अकेले मध्य प्रदेश के थे। इन सब के बीच हाल ही में एमपी के गृहमंत्री का बहुचर्चित बयान आता है जो प्रदेश सरकार के संवेदनहीनता को दर्शाने के लिए काफी है, गृहमंत्री ने कहा था कि– “कोई बताकर तो रेप करने नहीं जाता है, जो हम उसे पकड़ लें। अगर कोई बताकर रेप करने जाता तो हम उसे पकड़ लेते”।


राज्य शासन द्वारा बेटी बचाओ अभियान, लाडली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान जैसी योजनाओं के जोर-शोर से चलाये जाने के बावजूद मध्यप्रदेश ऐसा राज्य है, जहां देश में सर्वाधिक कन्या भ्रूण हत्या के मामले दर्ज होते हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार मध्यप्रदेश भ्रूण हत्या में कई वर्षों से शीर्ष पर है। यहाँ वर्ष 2011 में 38, 2012 में 64 और 2013 में कन्या भ्रूण हत्या 79 मामले दर्ज किए गए है।इसी तरह से सूबे में गर्भपात के मामलों में भी लगातार वृद्धि हुई है।


प्रदेश लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार बीते करीब 8 सालों में ढाई लाख से ज्यादा शिशु विभिन्न कारणों से दुनिया में नहीं आ सके। प्रदेश में वर्ष 2005-6 में कुल 21220 गर्भपात हुए थे, जो वर्ष 2012-13 में बढ़कर 55333 पर आ चुके हैं।

मध्यप्रदेश के जनगणना कार्य निदेशालय द्वारा जनसंख्या 2011 के जारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 2001 से 2011 के दौरान शिशु लिंगानुपात में 14 अंकों की गिरावट आई है। यानी शून्य से छह साल तक के 1000 लड़कों के मुकाबले सिर्फ 918 लड़कियां रह गई हैं। 10 साल पहले यह आंकड़ा 932 का था। यह 1981 से लेकर अब तक का सबसे कम लिंगानुपात है और राष्ट्रीय औसत से भी कम है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा चलाये जा रहे लाड़ली लक्ष्मी योजना और कन्यादान जैसी योजना के चलते समाज में दहेज की मांग बढ़ी है साथ ही साथ प्रदेश में दहेज हत्या के प्रकरणों में वृद्धि हुई है। वर्ष 2003 में 648 दहेज हत्यायें हुईं, वहीं ये ऑकड़ा 2010 में बढ़कर 892 तक पहुंच गया यानी इस दौरान हर दिन तीन महिलाओं की दहेज के लिये हत्या की गई।

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के ही ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2013 में मध्यप्रदेश 776 दहेज हत्याओं के साथ देश में तीसरे स्थान पर है।  कुल मिलकर कर देखें तो कन्या भ्रूण हत्या, कन्या शिशु हत्या, बलात्कार, दहेज़ हत्या आदि के उपरोक्त आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि मध्य प्रदेश महिलाओं के सुरक्षा के लिहाज से देश के चुनिन्दा बदतर राज्यों में से एक है। ऐसे में सवाल उठता है कि यह हालात ऐसे क्यूँ बने हुए हैं ? दरअसल इस समस्या के दो पहलु हैं, पहले का संबंध राज्य यानी कानून– व्यवस्था से है वहीँ दूसरे का संबंध समाज और सिस्टम से है।

पहले बात कानून व्यवस्था की –

मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुलिस-बल पर्याप्त नहीं हैं, प्रदेश में साढ़े छ: करोड़ लोगों पर करीब 76 हजार यानी 809 लोगों की सुरक्षा का जिम्मा एक पुलिसकर्मी पर है। ऊपर से पुलिस के पास अतिरिक्ति जिम्मेदारियों जैसे महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा, धरने और प्रदर्शन को सँभालने आदि का बोझ भी है। स्त्रियों को लेकर पुलिस का रवैया जग-जाहिर है, अगर पीड़ित महिला सामाजिक- आर्थिक रूप से वंचित समुदाय की है तो वह और भी उदासीनता हो जाती है। रेप आदि के मामलों में पुलिस द्वारा प्रकरण की रिपोर्ट समय पर न लिखने, पर्यवेक्षण न करने, आरोपी को लाभ पहुंचाने के लिए साक्ष्य न जुटाने जैसी कोताहियाँ की जाती हैं। इसके चलते अपराध पर रोकथाम और सुरक्षा तो दूर की बात है पीड़िता को समय पर न्याय भी नहीं मिल पाता है।

बदायूं की घटना के बाद से यह बहस चल पड़ी है कि महिलाओं को शौच के लिए घर से निकलना पड़ता है इसलिए भी साथ बलात्कार होता है।

जनगणना निदेशालय, यूनिसेफ और राज्य योजना आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में करीब 5 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं जिसमें बड़ी संख्या महिलाओं की भी है, यह आंकड़े स्वर्णिम मध्यप्रदेश के पोल खोलते हैं।दरअसल मसला, शौचालय, एंटी रेप घड़ी व जींस, कड़े कानूनों और उसके खौफ से और आगे का है।

दिल्ली गैंगरेप के बाद तो कानून भी बदला गया था लेकिन हालत में कोई ज्यादा सुधार देखने को नहीं मिला है। इसके विपरीत हमें इधर एक और ट्रेंड देखने में आ रहा है जो रेप के बाद पीड़िता को जान से मार देने के कोशिशों के रूप में दिखाई देता है, यह ट्रेंड “निर्भया कांड” से लेकर बदायूँ में दो दलित बहनों के साथ बलात्कार और हत्या करके उनके शवों को पेड़ से लटका देने तक की घटनाओं में साफ़ तौर पर देखने को मिल रहा है। ऐसे में यह सोचना जरूरी हो जाता है कि कहीं इसका मकसद सबूत को जड़ से मिटा देने का तो नहीं है ताकि कड़े कानूनी सजाओं से बचा जा सके, हालाँकि अभी समाजविज्ञानियों द्वारा इस बिंदु पर गहनता से अध्यन किया जाना बाकी है।

अब बात इस मसले के सामाजिक और व्यवस्थागत पक्ष की, हमें यह मान लेना चाहिए कि हमारा समाज बीमार है और इसे गंभीर इलाज की जरूरत है, दहेज हत्या, भ्रूण हत्या, बलात्कार करने वाले कहीं बाहर से तो आते नहीं हैं,यह हमारा समाज ही है जो औरतों के खिलाफ हिंसा और क्रूरता को अंजाम देने वाले अपराधियों को न केवल पैदा कर रहा है बल्कि उनको पाल-पोस रहा है, यह समस्या देश के सभी धर्म, जाति संप्रदायों में तकरीबन एक समान है।

हमारा संविधान तो एक व्यक्ति के रूप में देश के सभी नागिरकों (जिसमें औरतें भी शामिल है) को, समान अधिकार देता है लेकिन हमारा समाज गैर-बराबरी पर आधारित हैं, जहां औरत को इंसान नहीं संपत्ति और वंश-वृद्धि का जरिया माना जाता है। लड़कियाँ चाहे जितनी भी पढ़ी लिखी या लड़कों से ज्यादा काबिल हों हमारे भीरु समाज में उनकी शादी के लिए परिवारों को दहेज़ के रूप तगड़ी कीमत चुकानी ही पड़ती है । दूसरी तरफ हम देखते हैं कि इस मुनाफा आधारित पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने बाजार को चमकाने के लिए औरत के जिस्म को एक तिजारती वस्तु में बदल दिया है। मुश्किल से ही कोई ऐसा विज्ञापन देखने को मिलेगा जिसमें में हम स्त्री देह के भोग के वस्तु के रूप में न दर्शाया जाता हो।

हमारे समय में “हनी सिंह” सब से बड़े सिंगर हैं और “कामेडी विथ कपिल” सबसे बड़ा कामेडी शो जिसमें एक तरफ स्त्री विरोधी- अश्लीता से भरे गानों के बोल हैं तो दूसरी तरफ महिलाओं का तरह – तरह से मजाक उड़ा कर हास्य पैदा किया जा रहा है, विडम्बना यह है कि हमें यह गाना और हास्य दोनों ही पसंद आ रहा है।यह मसला केवल उत्तर प्रदेश या मध्यप्रदेश का नहीं बल्कि कमोबेश पूरे देश का है, अब समय आ गया है एक देश और समाज के रूप में हम सब मिलकर इस गंभीर सामजिक और सांस्कृतिक संकट के कारणों की गहराई से पड़ताल करें तभी हम इसका कुछ ठोस और टिकाऊ समाधान निकला जा सके।

जावेद अनीस, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

[ninja_forms id=1]

About हस्तक्षेप

Check Also

Amazon. (Photo: Twitter/@amazon)

अमेज़न मैसेजिंग असिस्टेंट अब हिंदी में

बेंगलुरू, 20 अगस्त, 2019: अमेज़न इंडिया (Amazon India) ने अपने ग्राहकों के लिए ऑटोमेटेड मैसेजिंग …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: