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द्विराष्ट्र सिद्धांत के गुनाहगार : हिन्दू राष्ट्रवादियों की देन, जिसे जिन्नाह ने गोद लिया

द्विराष्ट्र सिद्धांत के गुनाहगार : हिन्दू राष्ट्रवादियों की देन, जिसे जिन्नाह ने गोद लिया

शम्सुल इस्लाम

प्रस्तावना 

आरएसएस-भाजपा द्वारा पोषित और प्रायोजित उपद्रवी तत्वों ने जिन्नाह की तस्वीर को मुद्दा बना कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (अमुवि) पर बीते दिनों जो हमले किए, उनके बाद दोक़ौम सिद्धांत या द्विराष्ट्र सिद्धांत (इस के अनुसार हिन्दू धर्म और इस्लाम के अनुयायी दो अलग राष्ट्र या क़ौमें हैं) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

विश्वविद्यालय छात्र संघ कार्यालय में मुहम्मद अली जिन्नाह की यह फोटो बीते 80 सालों से लगी है, जिस पर आपत्ति कर हिंदुत्व ब्रिगेड अपनी कुटिल परंपरानुसार मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल खड़े कर रही है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह काम बीएस मुंजे, भाई परमानंद, विनायक दामोदर सावरकर, एमएस गोलवलकर और अन्य हिंदू राष्ट्रवादियों की परंपरा के वारिस कर रहे हैं, जिन्होंने न केवल द्विराष्ट्र सिद्धांत की अवधारणा प्रस्तुत की बल्कि उन्होंने आक्रामक रूप से मांग की कि मुसलमानों को भारत जो हमेशा से हिंदू राष्ट्र रहा है से निकाल दिया जाए। इस टोली का आज भी विश्वास है कि हिंदू व मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं।

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भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर जिन्नाह या मुस्लिम लीग का उद्भव होने से बहुत पहले आरएसएस के लोग, जो आज सत्तासीन हैं, सतत् यह मांग करते आए हैं कि मुसलमानों व ईसाइयों से नागरिक अधिकार छीन लिए जाने चाहिएं। 

द्विराष्ट्र सिद्धांत पर यह निबंध इस उद्देश्य से लिखा गया है कि इस सिद्धांत के जन्म, विकास, मौजूदा चलन और इस से जुड़े पूरे विमर्श को भली-भाँती समझा जा सके और किस तरह हिन्दुत्ववादी शासक टोली इस कुत्सित सिद्धांत को देश बाँटने  के लिए लागू कर रही है, उस साज़िश को जाना जा सके  

झूठ बोलने और साज़िश रचने में माहिर आरएसएस

इस समय दुनिया का कोई भी फासीवादी संगठन दोग़ली बातें करने, उत्तेजना फैलाने और षड्यंत्र रचने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को मात नहीं दे सकता।

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सन् 2002 में गुजरात में किए गए मुसलमानों के जनसंहार पर टिप्पणी  करते हुए भारत के एक मशहूर अंगरेजी दैनिक ने आरएसएस के बारे में प्रख्यात लेखक जॉर्ज ऑरवेल द्वारा दिए गए शब्द 'दो मुंहा' को इस विघटनकारी संगठन के लिए कमतर बताया था, यानि आरएसएस दो मुंहा नहीं बल्कि इस से भी बढ़ कर है।[i]



जहां तक इस संगठन के षड्यंत्रकारी मानस का संबंध है, उसे सबसे पहले किसी और ने नहीं बल्कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भांप लिया था। उन्होंने देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार पटेल का ध्यान इस ओर आकर्षित भी कराया, 

"मुझे बताया गया है कि आरएसएस के लोग अशांति फैलाने के लिए कोई हरकत करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने अपने लोगों को मुसलमानों जैसा भेस बना कर तैयार किया है, जो हिंदुओं पर हमला करेंगे, जिससे हिंदू भड़क जाएं। इसी तरह उन्होंने कुछ हिंदुओं को तैयार किया है, जो मुसलमानों पर हमला कर के उन्हें भड़काएंगे। इस तरह हिंदू मुसलमानों के बीच एक बड़ा झगड़ा पैदा जाएगा।"[ii] 

पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह के माध्यम से हिंदुत्ववादी उपद्रवी तत्वों द्वारा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पर हालिया हमलों में आरएसएस का यही दुष्चरित्र सामने आता है।

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यहां इस हमले का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत हैः

2 मई 2018 को अमुवि छात्र संघ द्वारा भारत के पूर्व उप-राष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी को छात्र संघ की आजीवन सदस्यता प्रदान करने के लिए समारोह आयोजित किया गया था। इस मौके पर पूर्व उप-राष्ट्रपति विद्यार्थियों को संबोधित भी करने वाले थे।

देश के पूर्व उप-राष्ट्रपति के इस कार्यक्रम को प्रोटोकॉल के तहत इंटेलिजेंस एजेंसियों व स्थानीय प्रशासन ने हरी झंडी दे दी थी। 

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अंसारी के मुताबिक उनके इस कार्यक्रम की जानकारी सबको थी और संबंधित अधिकारियों को आधिकारिक रूप से उनके कार्यक्रम के बारे में बता दिया गया था, ताकि समारोह के लिए सुरक्षा सहित अन्य व्यवस्थाएं भी विधिवत की जाएं। इसके बावजूद "विश्वविद्यालय के उस गेस्ट हाउस के पास तक उपद्रवी तत्वों का पहुंच जाना, जहां मैं ठहरा हुआ था समझ से परे है।"[iii]

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हिंदूवादी उग्र तत्व इस हमले को यह कह कर जायज ठहरा रहे हैं कि छात्र संघ कार्यालय में पाकिस्तान के संस्थापक जिन्नाह का फोटो क्यों लगा है? हालांकि जिन्नाह का फोटो वहां सन् 1938 से लगा है, जब उन्हें छात्र संघ की आजीवन सदस्यता प्रदान की गई थी। हिंदुत्ववादी ब्रिगेड को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस बात को 80 बरस होने आए और वे अब इस मुद्दे को उठा रहे हैं।

ऐसे समय, जबकि उत्तरप्रदेश में उनकी सरकार हिंदुओं का समर्थन खोती जा रही है, जिसके बल पर वे सत्ता में आए थे, जिन्नाह की तस्वीर को मुद्दा बनाने का एक तात्कालिक कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही कैराना संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव (मई 28, 2018) का होना भी था, जहाँ एक मुसलमान महिला प्रत्याशी विपक्षी दलों की साझा उमीदवार थीं।

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अंसारी ठीक ही कहते हैं कि अमुवि पर इस हमले का तयशुदा समय और "उसे उचित ठहराने का बहाना खोजना" गंभीर प्रश्न खड़े करता है। हथियारबंद हिंदू उग्र तत्व वहां से जिन्नाह का फोटो हटाने की मांग कर हंगामा खड़ा कर देते हैं, यह सोच कर कि देश की जनता को शायद पता न हो कि पाकिस्तान के संस्थापक जिन्नाह सन् 1942-43 में हिंदू महासभा के साथ मिल कर गठबंधन सरकार चला रहे थे। इसकी बात हम आगे करेंगे। 

जिन्नाह के बारे में कुछ तथ्य, जिन्हें जानना जरूरी है 

बहतर होगा कि मुस्लिम अलगाववाद का ध्वजवाहक बनने से पहले हम जिन्नाह के भूतकाल के बारे में भी कुछ तथ्य जान लें।

कांग्रेस नेता के रूप में जिन्नाह एक प्रतिबद्ध सेक्युलरिस्ट थे और दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, एनी बेसेंट, एमके गांधी, नेहरू (मोतीलाल नेहरू व जवाहरलाल नेहरू), मौलाना आजाद, सरदार पटेल और उन्हीं की तरह के बड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ जिन्नाह ने अंगरेज शासकों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। 

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अंगरेज शासकों के विरुद्ध वे आतंकवादी कार्रवाइयों के समर्थक नहीं थे, लेकिन जब भगतसिंह जेल में थे और उन्हें फांसी की सजा सुनाने की न्यायिक प्रक्रिया उनकी अनुपस्थिति में शुरू कर दी गई तो तात्कालीन संसद, सेंट्रल असेंबली में 12 सितंबर 1929 को जिन्नाह ने इस सुनवाई के विरुद्ध एक प्रभावशाली वक्तव्य दिया। जिन्नाह ने कहाः 

"जो व्यक्ति भूख हड़ताल करता है, उसकी आत्मा होती है। वह उसी आत्मा से प्रेरणा लेता है और वह अपने कर्तव्य के लिए न्याय में विश्वास रखता है। वह सामान्य अपराधी नहीं है, जो निर्ममता से किए गए हिंसक अपराध का जिम्मेदार हो… मैं भगतसिंह द्वारा की गई कार्रवाई का समर्थन नहीं कर रहा… मैं इसे स्वीकार करता हूं कि सही या गलत आज का युवक उद्वेलित है… चाहे आपने उन्हें हद से ज्यादा दुखी कर दिया हो या चाहे आप यह कहें कि उन्हें बहकाया जा रहा है, यह व्यवस्था है, यही शासक वर्ग की निंदनीय व्यवस्था, जिसका लोग प्रतिकार कर रहे हैं।"[iv] 

इससे पहले सन् 1916 में वे बाल गंगाधर तिलक (हिंदुत्ववादियों को अति प्रिय) के खिलाफ चल रहे राजद्रोह के मुकदमे में तिलक की ओर से वकील थे। इसमें तिलक को मौत की सजा भी हो सकती थी, लेकिन जिन्नाह ने इस केस में अंगरेज शासन के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की, जो विदेशी शासकों के लिए बेहद शर्मनाक था। 

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1935 के आसपास लाहौर में एक धर्मस्थल को ले कर सिखों व मुसलमानों के बीच एक गंभीर विवाद खड़ा हो गया। सिखों के मुताबिक यह शहीदी गुरुद्वारा था, जबकि मुसलमान उसे मस्जिद करार दे रहे थे। इस मामले में मुस्लिम पक्ष अपनी ओर से मुकदमा लड़ने के लिए जिन्नाह के पास पहुंचा, लेकिन जिन्नाह ने उनका आग्रह अस्वीकार कर दिया और उस मामले से दूरी बनाए रखी।

1920-21 में वे गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस से अलग हो गए, क्योंकि गांधी आमजन की राजनीति, खासतौर से धार्मिक नेतृत्वकर्ताओं को राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में शामिल करने के खिलाफ थे। कांग्रेस ने जिन्नाह को अलग-थलग करने की कोशिश की। उस कोशिश के खिलाफ खड़े होने के बजाय जिन्नाह ने मुस्लिम लीग का रुख कर लिया, उसी मुस्लिम लीग का, जिसे वे मुस्लिम समुदाय के धनाढ्य सामंतवादी और ऐश्वर्यशाली तबके का प्रतिनिधित्व करने वाली करार दे चुके थे।

धार्मिक आस्था व निजी क्रियाकलापों के आधार पर उन्हें एक धार्मिक मुस्लिम की पंक्ति में नहीं रखा जा सकता। उन्हें सुअर का मांस पसंद था और उनकी शामें शराब के साथ गुजरती थीं। इत्तिफाक से वे उर्दू पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते थे, इसके बजाय अंगरेजी व गुजराती में उन्हें महारत हासिल थी। 

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महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन्नाह जब हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और संयुक्त भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय भागीदारी निभा रहे थे, तब हिंदुत्ववादियों ने उनका तिरस्कार किया। गांधी, मोतीलाल नेहरू, अबुल कलाम आजाद, हिंदुत्ववादियों के अगले निशाना थे। 

द्विराष्ट्र सिद्धांत को हिंदू राष्ट्रवादियों ने स्थापित किया, कि जिन्नाह ने    

मुसलमानों के एक वर्ग द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किए जाने से बहुत पहले हिंदू राष्ट्रवादी इस सिद्धांत को स्थापित कर चुके थे। इसका समर्थन करने वाले मुस्लिम लीगी मुसलमान असल में तो इन हिंदू राष्ट्रवादियों के पदचिन्हों पर चल रहे थे। उन्होंने यह नजरिया हिंदुत्ववादी विचारकों से ही ग्रहण किया था।  

सबसे पहले बंगाली उच्चजाति हिन्दुओं  ने की थी हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना  

बंगाल के हिंदू राष्ट्रवादियों ने उन्नीसवीं सदी के अंत में यह विचार प्रस्तुत किया। वास्तव में तो ऑरबिंदो घोष के नाना राजनारायण बसु (1826-1899) और उनके करीबी साथी नभा गोपाल मित्रा (1840-94) को भारत में द्विराष्ट्र सिद्धांत और हिंदू राष्ट्रवाद का जनक कहा जा सकता है।

राजनारायण बसु ने हिन्दू राष्ट्रीय भावना पैदा करने के लिए एक सोसायटी बनाई थी, जो स्थानीय हिन्दू प्रबुद्ध वर्गों में हिंदू श्रेष्ठता का प्रचार करती थी। वे बैठकें आयोजित करके दावा करते थे कि अपनी जातिवादी व्यवस्था के बावजूद सनातन हिन्दू धर्म एक उच्च स्तरीय आदर्श सामाजिक व्यवस्था प्रस्तुत करता है, जिस तक ईसाई व इस्लामी सभ्यताएं कभी नहीं पहुंच पाईं। 

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बसु दीगर धर्मों की तुलना में न केवल सनातन हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ मानते थे बल्कि वह जाति प्रथा के भी प्रबल समर्थक थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महा-हिंदू समिति की परिकल्पना की और भारत धर्म महामंडल स्थापित करने में मदद की, जो बाद में हिंदू महासभा बन गई। उनका विश्वास था कि इस संस्था के माध्यम से हिंदू भारत में आर्य राष्ट्र की स्थापना करने में समर्थ हो जाएंगे।1 उन्होंने यह कल्पना भी कर ली थी कि एक शक्तिशाली हिंदू राष्ट्र का उदय हो रहा है, जिसका आधिपत्य न सिर्फ पूरे भारत पर बल्कि पूरे विश्व पर होगा। उन्होंने तो यह तक देख लिया कि,

"सर्वश्रेष्ठ व पराक्रमी हिंदू राष्ट्र नींद से जाग गया है और आध्यात्मिक बल के साथ विकास की ओर बढ़ रहा है। मैं देखता हूं कि फिर से जागृत यह राष्ट्र अपने ज्ञान, आध्यात्मिकता और संस्कृति के आलोक से संसार को दोबारा प्रकाशमान कर रहा है। हिंदू राष्ट्र की प्रभुता एक बार फिर सारे संसार में स्थापित हो रही है।"[v]

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