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70 सालों में पहरी बार भारत चीन के सामने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के लिए झुका

70 सालों में पहरी बार भारत चीन के सामने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के लिए झुका

अर्थव्यवस्था ‘वेंटिलेटर’ पर है व रोजगार सृजन ‘कोमा’ में : अजय माकन’

लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। 02 नवंबर 2019. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवक्ता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री अजय माकन ने कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था ‘वेंटिलेटर’ पर है व रोजगार सृजन ‘कोमा’ में है। न नौकरी है, न रोजगार, और कृषि क्षेत्र पर तो मंदी का दंश और भी बुरा है।

श्री माकन कल यहां लखनऊ में एक प्रेसवार्ता को संबोधित कर रहे थे।

मोदी सरकार को घेरते हुए श्री माकन ने कहा कि भयंकर बेरोजगारी, बेहाल अर्थव्यवस्था, कृषि संकट एवं आरसेप (RCEP)-एक कड़वा सत्य ‘मंदी और तालाबंदी’ मौजूदा भाजपा सरकार की पहचान बन गए हैं। डूबती अर्थव्यवस्था, घटती बचत, व्यापार की तालाबंदी और बैंक घोटालों में जनता के पैसे की लूट ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था का दीवाला निकाल दिया है।

हर कदम पर देशहित से खिलवाड़ कर रही है भाजपा सरकार

कांग्रेस नेता ने कहा कि भाजपा ने देश की वित्तीय स्वायत्तता एवं आर्थिक स्थिरता को दांव पर लगा दिया है। सच्चाई यह है कि भारत ‘वित्तीय आपातकाल’ की स्थिति में है। जले पर नमक छिड़कते हुए प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर, 2019 में चीन एवं 15 अन्य देशों के साथ एक मेगा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने का निर्णय किया है। ‘आरसेप’- रीज़नल कंप्रेहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (Regional Comprehensive Economic Partnership Agreement) नामक इस समझौते द्वारा भारत चीन एवं अन्य विदेशी उत्पादों व सामान के लिए एक डंपिंग ग्राउंड बन जाएगा।

श्री माकन की प्रेस वार्ता के मुख्. बिंदु इस तरह हैं :-

  1. लुप्त होती नौकरियां एवं भयंकर बेरोजगारी मोदी सरकार ने युवा भारत की शक्ति को बेहाली व बेरोजगारी की कगार पर लाकर ख़डा कर दिया है।नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के मुताबिक तो बेरोजगारी 45 साल में सर्वाधिक है व और तेजी से बढ़ रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ़ इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार बेरोजगारी की दर अक्टूबर, 2019 में बढ़कर 5 प्रतिशत हो गई, जो पिछले कुछ समय में सबसे अधिक है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाईज़ेशन (आईएलओ) के अनुसार दुनिया में बेरोजगारी की दर 4.95 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि भारत में बेरोजगारी की दर दुनिया की औसत के मुकाबले लगभग दोगुनी है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि देश में आप जितने ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, उतने ही ज्यादा बेरोजगार हैं। देश में ग्रेजुएट्स से पीएचडी तक की योग्यता रखने वाले युवाओं में बेरोजगारी की दर 15 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
  2. शिक्षा की स्थिति और ज्यादा दयनीय है। 18 से 23 साल की उम्र के बीच 74 प्रतिशत युवा कॉलेज ही नहीं जा पाते। इससे भी ज्यादा चिंता का विषय यह है कि भारत में केवल ढाई प्रतिशत कॉलेज ही पीएचडी कार्यक्रम चलाते हैं (आठवां एन्युअल ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन 2018-19, मिनिस्ट्री ऑफ़ एचआरडी, भारत सरकार)। सच्चाई तो यह है कि भाजपा सरकार ने भारत के युवाओं के लिए शिक्षा की व्यवस्था एवं रोजगार के अवसरों को ध्वस्त कर दिया है।
  3. गिरती अर्थव्यवस्था –

बेहाल व्यापार भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाए वित्तीय संकट की जिम्मेदार भाजपा सरकार है, जिसने देश को वित्तीय आपातकाल के दरवाजे ला खड़ा किया है। पिछले छः सालों में जीडीपी सबसे निचले पायदान पर है। आंकड़ों की बाजीगरी छोड़ अगर वास्तविकता देखें तो वित्तीय वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी 5 प्रतिशत के निचले स्तर पर रही। आईएमएफ, फिच, वल्र्ड बैंक, मूडी एवं आरबीआई सहित सभी एजेंसियों ने भारत में जीडीपी वृद्धि के पूर्वानुमान में भारी कटौती कर दी है। दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के पायदान से नीचे खिसक कर अब देश सातवें पायदान पर चला गया है।

नया निजी निवेश 16 सालों में सबसे निचले स्तर पर है।

घरेलू बचत 20 साल में सबसे कम हैं। भारत में बचत की संपूर्ण दर गिरकर 34.6 प्रतिशत से 30 प्रतिशत रह गई है। औद्योगिक वृद्धि अगस्त 2019 में सिकुड़कर मात्र 1.1 प्रतिशत रह गई है, जो 7 साल में सबसे कम है। मैनुफैक्चरिंग में वृद्धि की दर गिरकर -1.2 प्रतिशत (नैगेटिव) हो गई है, जो अक्टूबर, 2014 के बाद सबसे कम है। कोर सेक्टर में वृद्धि पिछले चार सालों में सबसे कम है। देश का निर्यात औंधे मुंह गिरा है। अकेले अगस्त 2019 में ही देश का निर्यात 6.6 प्रतिशत गिरा है। निर्यात बिल में 66.4 प्रतिशत का योगदान देने वाली 29 मुख्य कमोडिटीज़ में से 21 में साल दर साल गिरावट हो रही है।

कैपिटल गुड्स की वृद्धि –21 प्रतिशत (नैगेटिव) है, यानि अप्रैल 2012 के बाद सबसे कम।

बिजली के सेक्टर में वृद्धि -0.9 प्रतिशत (नैगेटिव) है, जो फरवरी 2013 के बाद सबसे कम है। यहां तक कि पैसेंजर वाहन की सेल्स भी सितंबर 2019 में 23.7 प्रतिशत गिर गई।

बैंकों का एनपीए, यानि बट्टे-खाते की राशि बढ़कर 8,00,000 करोड़ रु. हो गई है। भाजपा सरकार के पाँच सालों में बैंकों से धोखाधड़ी के लगभग 25,000 मामले सामने आए, जिनमें बैंकों को 1,74,255 करोड़ रु. का चूना लगा। अपराधियों को दंड देने की जगह भाजपा सरकार बैंकों से धोखा करने वालों का बचाव करती नजर आई।

सच्चाई यह है कि भाजपा सरकार में देश के नागरिकों का ‘पैसा लूटो और भाग जाओ’ अब नया नियम बन गया।

गंभीर वित्तीय संकट का सबसे बड़ा प्रमाण है कि साल 2019-20 में केंद्र सरकार के ग्राॅस टैक्स रेवेन्यू में 2,00,000 करोड़ रु. की गिरावट अनुमानित है। 2018-19 में भी ग्रॉस टैक्स रेवेन्यू में 1,90,000 करोड़ रु. की गिरावट हुई। एक तरफ भाजपा सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत -22 प्रतिशत कर दिया, तो दूसरी तरफ जीएसटी कलेक्शन का मासिक आंकड़ा 1,00,000 करोड़ रु. तक भी नहीं पहुंच पा रहा।

इस सबसे साफ है कि भारत का वित्तीय घाटा साल 2019-20 में 4 प्रतिशत रहने वाला है। यदि 10,00,000 करोड़ रु. के अनपेड बिल्स को भी गणना में ले लिया जाए, तो यह वित्तीय घाटा 8 प्रतिशत को पार कर जाएगा। अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने के लिए यह काफी है।

आर्थिक अराजकता की स्थिति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा सरकार अब आरबीआई इमरजेंसी रिज़र्व को खाली करने से भी नहीं चूक रही, जिसे युद्ध या फिर अन्य गंभीर वित्तीय संकटों के दौरान देश की रक्षा करने के लिए सुरक्षित रखा जाता है।

अगस्त 2019 में आरबीआई ने भाजपा सरकार को 1,76,000 करोड़ रु. दिए। इससे पहले 2014-15, 2015-16, 2016- 17 और 2017-18 में भी आरबीआई द्वारा प्रतिवर्ष 2,13,000 करोड़ रु. भाजपा सरकार को दिए गए। इस प्रकार भाजपा शासन के पाँच सालों में अब तक कुल 3,89,000 करोड़ रु. आरबीआई द्वारा भाजपा सरकार को भुगतान किया जा चुका। बात यहीं खत्म नहीं होती।

1990 के बाद पहली बार आरबीआई को खुले बाजार में अपना गोल्ड रिज़र्व बेचना पड़ा। इसका परिणाम यह है कि देश की मुद्रा एवं अर्थव्यवस्था की वित्तीय स्थिरता की रक्षा करने वाले संस्थान, आरबीआई को मोदी सरकार की विफलताओं, वित्तीय कुप्रबंधन तथा राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए देश की आर्थिक स्थिरता को दांव पर लगाना पड़ा है।

  1. अभूतपूर्व कृषि संकट कृषि सेक्टर की जीडीपी वित्तवर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में गिरकर मात्र 2 प्रतिशत रह गई है।
  2. किसानों को लागत $ 50 प्रतिशत मुनाफा समर्थन मूल्य के तौर पर देने की बजाए भाजपा सरकार ने किसानों को बाजारी ताकतों के भरोसे छोड़ दिया है। वर्तमान खरीफ मौसम में ही खरीफ फसलें समर्थन मूल्य से 8 प्रतिशत से 37 प्रतिशत नीचे, यानि औसतन 5 प्रतिशत कम मूल्य पर बिक रही हैं। तुअर, मूंग, उड़द, सोयाबीन, सूरजमुखी, काला तिल, ज्वार, बाजरा, रागी उगाने वाले करोड़ों किसानों को अपनी फसलों का समर्थन मूल्य भी नहीं मिला। यहां तक कि धान के किसानों को भी नमी आदि के बहाने से 1835 रु. प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य से 200 रु. प्रति क्विंटल कम मूल्य मिला। अकेले इससे खरीफ के मौसम में किसानों को लगभग 50,000 करोड़ रु. का नुकसान हुआ।
  3. 2020-21 के लिए भाजपा सरकार द्वारा राबी फसलों के लिए घोषित समर्थन मूल्य में 4 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक की नाममात्र वृद्धि की गई। एक तरफ भाजपा सरकार ने खाद (5 प्रतिशत), ट्रैक्टर एवं कृषि उपकरण (12 प्रतिशत), कीटनाशक दवाई (18 प्रतिशत) पर जीएसटी लगाकर खेती-बाड़ी पर टैक्स लगा दिया, तो दूसरी तरफ सेंट्रल एक्साईज़ ड्यूटी/कस्टम ड्यूटी/प्रांतीय टैक्सेस के चलते डीज़ल के रोज बढ़ते मूल्यों की मार भी किसान पर पड़ी है।
  4. किसान को एक तरफ फसलों का समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा, तो दूसरी तरफ उन्हें कृषि इनपुट पर भारी टैक्सों की मार झेलनी पड़ रही है। कृषि उत्पादों का निर्यात औंधे मुंह गिरा है, जिससे कृषि उत्पादों की स्थिति और ज्यादा दयनीय हो गई है।
  5. आरसेप भारत के किसानों/दुकानदारों/ छोटे व मंझोले व्यवसायों पर हमला

भारत की अर्थव्यवस्था पर भाजपा सरकार का पहला प्रहार नोटबंदी था ।दूसरा आघात त्रुटिपूर्ण जीएसटी से किया। अब तीसरी चोट चीन सहित 15 पूर्व एशियाई देशों के मेगा रीज़नल फ्री ट्रेड एग्रीमेंट-रीज़नल कंप्रेहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (आरसेप) पर भाजपा सरकार के हस्ताक्षर के रूप में लगने वाली है। 72 सालों में पहली बार भारत को चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, क्योंकि भाजपा व प्रधानमंत्री मोदी यह चाहते हैं। इससे भारत के आर्थिक व व्यवसायिक हितों एवं देश की सुरक्षा को खतरा पैदा होगा क्योंकि चीन के उत्पाद सस्ती कीमतों पर भारत के बाजारों में डंप किए जाएंगे तथा भारत के दुकानदार, व्यवसायी व उद्यमी का धंधा बंद हो जाएगा। इससे भारत के किसानों की क्षमता एवं सुरक्षा को भारी खतरा होगा क्योंकि विदेशी दाल, गेहूं एवं दूध जैसे उत्पादों के लिए भारत डंपिंग ग्राउंड बन जाएगा। हमारे किसानों को भारी नुकसान होगा क्योंकि विदेशों के उत्पाद भारी मात्रा में भारत के बाजार में बिकेंगे और खेती और ज्यादा घाटे का सौदा बन जाएगी।

यही संकट अन्य चीजों जैसे मछली उत्पादन, टैक्सटाईल्स एवं कपड़ा उद्योग पर मंडराएगा।

भारत के 5 करोड़ डेयरी किसान, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं, उन्हें न्यूजीलैंड एवं अन्य देशों से आने वाले मिल्क पावडर पर आयात शुल्क घटने से अप्रत्याशित घाटा होगा। 2018-19 में चीन से भारत को आयात 70 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था। चीन के उत्पादों पर टैरिफ खत्म होने (जो आरसेप के तहत हो जाएगा) से भारत चीन के सामान के लिए डंपिंग ग्राउंड बन जाएगा और भारत का व्यापार घाटा और अधिक बढ़ जाएगा।

वित्तीय संकट की गंभीर स्थिति को देखते हुए इस समय आरसेप का एग्रीमेंट भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि सेक्टर एवं रोजगार के निर्माण के लिए जानलेवा साबित होगा।

  1. भाजपा सरकार ने सार्वजनिक उपक्रम एलआईसी का 21हजार करोड़ रूपया घाटे में चल रहे आईडीबीआई बैंक को सौंपा, आम निवेशकों के पैसों का बंदरबांट आईडीबीआई के 51 प्रतिशत शेयर जिनका मूल्य 21 हजार करोड़ रूपये है एलआईसी को गैर कानूनी तरीके से दिये गये जबकि पहले से आईडीबीआई बैंक जून 2019 तक 3800 करोड़ रूपये के घाटे में है और उसका एनपीए बढ़कर 29प्रतिशत हो गया है। इसके बावजूद केन्द्रीय कैबिनेट ने दुबारा एलआईसी के आम निवेशकों का 4743 करोड़ रूपया फिर से आईडीबीआई बैंक को दे दिया। भाजपा सरकार द्वारा उठाये गये इस कदम से आम निवेशकों का सार्वजनिक उपक्रम के प्रति जो विश्वास था वह खतरे में पड़ गया है।
  2. भाजपा सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के चलते वित्तीय वर्ष 2015 से 2018 के बीच पारिवारिक कर्जा 7.4 लाख करोड़ रूपये पहुँचा।हमारे देश की आम जनता जो कि रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बचत करती है और यह हमारे देश की जनता की आदत है। उसे भाजपा सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के चलते छोटी-मोटी जरूरतों के लिए कर्ज में डूबना पड़ा। 18 सितम्बर को एक रिपोर्ट आयी है कि 3 वर्ष में दुगुने से भी ज्यादा लगभग 7 लाख चालीस हजार करोड़ रूपये पारिवारिक कर्ज बढ़ा है आम जनता की बचत 20 प्रतिशत घटी है।
  3. भाजपा सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के चलते देश में आयी भीषण मंदी की वजह से मकानों की बिक्री पूरी तरह से बन्द है जिसका असर यह है कि बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ रहा है। भाजपा सरकार की गलत आर्थिक नीतियों का असर यह है कि मकान बन रहे हैं लेकिन खरीदने वाले कोई नहीं है। जिसकी वजह से 13 लाख 19 हजार से ज्यादा मकान बनकर खड़े हैं कोई खरीदने वाला नहीं है जिसकी कुल लागत लगभग 9 लाख 38 हजार 109 करोड़ रूपये है। बिल्डर्स मकान न बिकने के कारण बैंकों से लिए कर्ज को वापस नहीं कर पा रहे हैं जिसकी वजह से बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है जो कि 5 वर्ष में 8 लाख करोड़ रूपये हो चुका है और लगभग 25 हजार बैंकों में डिफाल्टर पाये गये हैं। हम भाजपा सरकार को चेताते हैं कि वो देश को वित्तीय आपातकाल में धकेलने की बजाए रोजी-रोटी, व्यापार, कृषि को बचाने हेतु ठोस कदम उठाएं तथा देश को विश्वास में लें।

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