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दलित उत्पीड़न : इस रात की सुबह नहीं !

H L Dusadh -एच.एल.दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय आध्यक्ष हैं.)

वैसे तो दलित-उत्पीड़न (Dalit oppression) राष्ट्र के दैनंदिन जीवन का अंग बन चुका है.फिर भी रह-रहकर ऐसी कुछ घटनाएँ हो जाती हैं कि इस समस्या पर नए सिरे से विचार करना लाजिमी हो जाता है. हाल के दिनों में एक दिन : 26 अप्रैल को चुनावी सरगर्मियों के मध्य दो ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जिसे लेकर पूरे देश के दलितों में उबाल आ गया. इसी दिन देहरादून के टिहरी जिले के नैनबाग इलाके (Nainabagh area of Tehri district of Dehradun) के श्रीकोट गाँव में एक शादी पार्टी में कुर्सी पर बैठ कर खाने पर जितेन्द्र नामक एक दलित युवक की सवर्णों ने इस कदर पिटाई कर दी (Dalit youth beaten by the upper caste) कि तीन दिनों बाद उसकी मौत हो गयी. इसी दिन राजस्थान के अलवर जिले के थानागाजी क्षेत्र (Thanagaji area of Alwar district of Rajasthan) में शादी के लिए बाइक से खरीदारी करने जा रहे एक युवा दलित दंपत्ति को 5 लोग सरे राह बाइक से रोककर रेत के टीले पर ले गए. फिर पति की पिटाई कर 18 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की स्तब्धकारी घटना अंजाम दे दिए. बलात्कारियों का दुसाहस देखिये कि वे अपने घिनौने कृत्य का वीडियो भी बनाते रहे. इतना ही नहीं इस वीडियो को नष्ट करने के लिए 9 हजार रूपये की मांग और रुपया नहीं मिलने पर उसे वायरल भी कर दिया. इस पूरी घटना को चुनावी लाभ-नुकसान को ध्यान में रखते पुलिस,नेता और बलात्कारियों के संरक्षकों के सहयोग से कई दिनों छिपाए रखा गया. बाद में घटना के प्रकाश में आने के बाद राजस्थान सहित पूरे देश में दलितों के मध्य आक्रोश की लहर दौड़ गयी. इन पक्तियों के लिखे जाने के दौरान इस घटना को लेकर आंदोलित लोग जयपुर बंद किये हुए हैं.इस बंद के दौरान अबतक किसी अप्रिय घटना की खबर नहीं है.

बहरहाल जब-जब श्रीकोट या थानागाजी जैसे कांड होते हैं तो दलितों के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम व मानवाताबोध संपन्न हिन्दुओं के खेमे में भी चिंता की लहर दौड़ जाती है. वे सभा-संगोष्ठियाँ आयोजित एवं घटनास्थल का मुयायना कर असहिष्णु हिन्दुओं के बर्बरोचित कार्य की निंदा करने एवं उनके विवेक को झकझोरने का अभियान चलाते हैं. लेकिन नतीजा सिफर निकलता है. एक अन्तराल के बाद परवर्तित स्थान पर उनकी दलित-विरोधी भावना का पुनः प्रकटीकरण हो ही जाता है.

हिन्दू विवेक को झकझोरने का अभियान इसलिए निष्प्रभावी होते रहता है क्योंकि दलितों की मानवीय सत्ता हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा अस्वीकृत है. इसलिये शास्त्रों द्वारा मानवेतर रूप में चिन्हित किया गया मानव समुदाय जब आम लोगों की भांति अपने मानवीय अधिकारों के प्रदर्शन की हिमाकत करता है, धर्मनिष्ठ हिन्दू उन्हें उनकी औकात बताने के लिए कुम्हेर, चकवाडा, एकलेरा, नवलपुर, पिन्ट्री देशमुख, सीखरा, बेलछी, पिपरा, भगाणा, श्रीकोट और थानागाजी जैसे कांड अंजाम दे देते हैं.

दलित-उत्पीडन में हिन्दू धर्म की क्रियाशीलता को देखते हुए डॉ.आंबेडकर को कहना पड़ा था-

‘हिन्दू जातिभेद इसलिए नहीं मानते कि वस्तुतः वे क्रूर हैं या उनके मस्तिष्क में कुछ विकार है. वे जाति-भेद इसलिए मानते हैं कि उनका धर्म जो प्राणों से भी प्यारा है, उन्हें जाति-भेद मानने के लिए विवश करता है. अतः कसूर उन धर्मशास्त्रों का है जिन्होंने उनकी ऐसी मनोवृति कर दी है.’

लेकिन हिन्दुओं के शास्त्र ही जब दलित उत्पीड़न के लिए प्रधान रूप से जिम्मेवार हैं तब तो यह क्रम अनंतकाल तक चलता रहेगा, क्योंकि तमाम कमियों के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि हिन्दू आगामी कुछ सौ वर्षो में अपने धर्म-शास्त्रों के प्रति पूरी तरह अनास्थाशील हो जाएँगे. ऐसे में दलित-उत्पीड़न का प्रतिकार कैसे हो?

जहां तक प्रतिकार का प्रश्न है, डॉ.आंबेडकर ने वर्षों पहले उसका मार्गदर्शन कर दिया था. उन्होंने इस समस्या पर दलित समुदाय को समझाते हुए बताया था-

‘ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न हैं. एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय या अत्याचार का प्रश्न नहीं है, बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर जबरदस्ती से किये जा रहे आक्रमण और जुल्म, शोषण तथा उत्पीड़न का प्रश्न है…किस तरह से इस वर्ग कलह से अपना बचाव किया जा सकता है, इसका विचार करना आवश्यक है. इस वर्ग कलह से अपना बचाव कैसे होगा, इस प्रश्न का निर्णय करना मैं समझता हूँ मेरे लिए कोई असंभव नहीं है.यहाँ इकठ्ठा हुए आप सभी लोगों को एक ही बात मान्य करनी पड़ेगी और वह यह कि किसी भी कलह में , संघर्ष में, जिनके हाथ में सामर्थ्य होती, उन्ही के हाथ में विजय होती है. जिनमें सामर्थ्य नहीं उन्हें अपनी विजय की अपेक्षा रखना फिजूल की बकवास है. इसके समर्थन में अन्य कोई आधार खोजने की बात ही फिजूल है. इसलिए तमाम दलित वर्ग को अब अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकट्ठा करना बहुत जरूरी है.’

दलितों पर हो रहे शोषण-उत्पीड़न का प्रतिकार के लिए बल संचित करने का सुझाव देते हुए उन्होंने आगे कहा था-

‘मनुष्य समाज के पास तीन प्रकार का बल होता है. एक है मनुष्य-बल. दूसरा है धन-बल और तीसरा है मनोबल. मनुष्य बल की दृष्टि से आप अल्पसंख्यक ही नहीं, संगठित भी नहीं हैं. धन-बल की दृष्टि से देखा जाय तो आपके पास थोड़ा-बहुत जनबल तो है भी लेकिन धनबल तो बिलकुल ही नहीं है. सरकारी आकड़ों के अनुसार देश की कुल आबादी में 55 प्रतिशत जो जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रही है, उसका 90 प्रतिशत अंश दलित वर्ग का ही है. मानसिक बल की तो उससे भी बुरी हालत है. सैकड़ों साल से हिन्दुओं द्वारा हो रहे जुल्म, छि-थूक, मुर्दों की भांति बर्दाश्त करने के कारण प्रतिकार करने की आदत पूरी तरह नष्ट हो गयी है. आप लोगों के आत्मविश्वास , उत्साह और महत्वाकांक्षा की चेतना का मूलोच्छेद कर दिया गया है. हम भी कुछ कर सकते हैं इसका विचार ही किसी के मन में नहीं आता.’

मतलब साफ़ है बाबासाहेब ने हिन्दुओं के अत्याचार से बचने लिए एकमेव उपाय उन्होंने दलित वर्ग को अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकठ्ठा करना बताया था.

वास्तव में डॉ.आंबेडकर ने दलितों को अपने अत्याचारी वर्ग से निजात दिलाने का जो नुस्खा बाताया था वह सार्वदेशिक है. सारी दुनिया में ही जो अशक्त रहे उनपर ही सशक्त वर्ग का अत्याचार व उत्पीड़न होता रहा. सर्वत्र ही ऐसे लोगों को सशक्त बनाकर सबल वर्गों के शोषण-उत्पीड़न से निजात दिलाई गयी. किन्तु हिन्दुओं के बर्बर अत्याचार से निजात दिलाने के लिए दलितों को सशक्त बनाना अन्य समाजों की अपेक्षा ज्यादा कारगर हो सकता है. कारण, जो हिन्दू समाज अस्पृश्यों के विरुद्ध बराबर ही आक्रमणात्मक रहता है, उसकी एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक कमजोरी भी है. यह समाज सुदूर अतीत से ही सख्त का भक्त रहा है और आज भी है. अपनी इस कमजोरी के कारण वह हाथी, भालू, बाघ, सिंह, गधा, घोड़ा, बन्दर, सूअर, सांप, चूहा इत्यादि तक में देवी-देवताओं को आरोपित कर पूजा करता रहा है. इसी कारण वह विदेशागत लोगों का अनुग्रह जय करने के लिए बराबर दास सुलभ आचरण करता रहा है और आज भी कर रहा है. अपनी स्वभावगत कमजोरी के कारण ही मनुष्येतरों में जो पद –प्रतिष्ठा व धन -बल या अन्य किसी बल से संपन्न हैं, उनके साथ बंधुत्वपूर्ण व्यवहार करने में कोताही नहीं करता. अतः इसमें कोई दो राय नहीं कि अस्पृश्यों को सशक्त बनाकर हिन्दुओं को समतापूर्ण व्यवहार के लिए विवश किया जा सकता है.

अब जहाँ तक दलितों को सशक्ति बनाने का सवाल है आजाद भारत में तमाम सरकारें ही इस काम में लगे रहने का दावा करती रही हैं. पर, बात इसलिए नहीं बनी क्योंकि देश के योजनाकारों ने उनकी अशक्तिकरण के कारणों की ठीक से पहचान ही नहीं किया इसलिए उनकी सशक्तिकरण का सम्यक उपाय भी न कर सके.

काबिलेगौर है कि सारी दुनिया में ही सभ्यता के हर काल में धरती की छाती पर अशक्त समुदायों का वजूद रहा और ऐसा इसलिए हुआ कि जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर रही उन्होंने जाति,नस्ल,धर्म इत्यादि के आधार बंटे विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों-आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक- का असमान बंटवारा कराकर ही अशक्त समूहों को जन्म दिया. परिष्कृत भाषा में शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन कराकर ही अशक्त सामाजिक समूहों को जन्म दिया. जो समूह शक्ति के स्रोतों पर जितना कब्ज़ा जमा सका वह उतना ही सशक्त और जो जितना ही इससे वंचित रहा वह उतना ही अशक्त. सारी दुनिया में अश्वेतों, महिलाओं व अन्य अल्पसंख्यक अशक्त समूहों की समस्या पर ध्यान दे तो पाएंगे कि उनको शक्ति के स्रोतों से दूर रखकर ही अशक्त बनाया गया. सारी दुनिया की पराधीन कौमों के साथ यही समस्या रही कि विजेताओं ने उन्हें शक्ति स्रोतों से वंचित कर उन्हें कष्ट में डाला. यदि सारी दुनिया के विजेता गुलाम बनाए गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब शेयर दिए होते, दुनिया में कही भी स्वतंत्रता संग्राम ही सगठित नहीं होता.

जिन मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों से वंचित कर अशक्त मानव समुदाय में तब्दील किया गया उनमें किसी की भी स्थिति दलितों जैसी बदतर नहीं रही.

मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी कौम को शक्ति के प्रमुख स्रोतों -आर्थिक,राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक- से पूरी तरह वंचित नहीं किया गया. मार्क्स के सर्वहाराओं सहित दुनिया के अधिकांश वंचित कौमों को आर्थिक गतिविधियों से वंचित कर अशक्त बनाया गया पर राजनीतिक और विशेषकर धार्मिक क्रियाकलाप तो उनके लिए पूरी तरह मुक्त रहे.

अमेरिका की नीग्रो स्लेवरी में जिन कालों का दलितों की भांति ही पशुवत इस्तेमाल हुआ, उनके लिए पूजा-पाठ अब्राहम लिंकन के उदय पूर्व भी कभी निषिद्ध नहीं रहा. यही कारण है जिस मार्टिन लूथर किंग (जू.)के मुव्हमेंट ने अश्वेतों की तकदीर बदल दी वे बड़े धर्माधिकारी थे जिससे उनकी आवाज़ बड़ी आसानी से लोगों तक पहुँच गयी. आर्थिक और राजनीति के क्षेत्र से हजारों साल से बहिष्कृत भारत के दलितों के लिए मार्टिन लिथर की भांति धर्माधिकारी बनना तो दूर देवालयों में पहुँच कर सर्वशक्तिमान ईश्वर के सामने अपने कष्टों के निवारण के लिए प्रार्थना करने तक का कोई अवसर नहीं रहा. धार्मिक शक्ति का डॉ. आंबेडकर के अनुसार आर्थिक शक्ति के समतुल्य महत्त्व है, उससे दलितों का बहिष्कार ही उन्हें अस्पृश्यता की खाई में धकेलने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार है. हिन्दुओं ने देख लिया कि जब दलित परमपिता परमेश्वर के घर से ही बहिष्कृत हैं तो हम उन्हें अपने करीब क्यों आने दें.

बहरहाल  मध्ययुग के संतों और भारतीय रेनेसां के असंख्य महानायकों सहित ढेरों अन्य आधुनिक चिंतकों ने दलितों की समस्या पर मगजपच्ची की पर, आंबेडकर की भांति कोई भी उनके अशक्तिकरण के कारणों को सम्पूर्णता में नहीं समझ पाया. इसलिए वे मानवेतरों को शक्ति के स्रोतों में मुक्कमल हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई नहीं लड़ सके.

गुलाम भारत में जहां तमाम स्वतंत्रता संग्रामी अंग्रेजों के कब्जे में पड़ी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति हिन्दुओं के लिए छीनने में व्यस्त रहे, वहीँ डॉ. आंबेडकर बड़ी मुश्किल हालातों में मानव जाति के सबसे अशक्त समूहों को शक्ति के स्रोतों से लैस करने व्यस्त रहे. उनके प्रयासों से सदियों से बंद पड़े शक्ति के कुछ स्रोत दलितों के लिए मुक्त हुए,पर, सारे नहीं. कारण डॉ.आंबेडकर अपने ज़माने में भारत के सबसे असहयाय स्टेट्समैन रहे. यदि वे असहाय नहीं होते, शक्ति के सभी स्रोतों में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करा देते. लेकिन आजाद भारत में उनके बड़े से बड़े अनुसरणकारी क्या दलितों की समस्या समझ पाए?

यदि वे डॉ. आंबेडकर के नजरिये से दलितों की समस्या समझे होते तो शक्ति के शेष बचे स्रोतों में उनको हिस्सेदारी दिलाने का प्रयास करते. पर, आजाद भारत में तो उनकी अधिकतम उर्जा ब्राह्मणवाद के खात्मे जैसे अमूर्त मुद्दे में खर्च होती रही, जिसमें आज इक्कीसवीं सदी में भी कोई फर्क नहीं आया हैं. दलितों को सशक्त व सामर्थ्यवान बनाना कभी इनके एजेंडे में आया ही नहीं. यदि कभी आया भी तो शक्ति के समस्त स्रोतों की बजाय,वे टुकड़ों-टुकड़ों में हिस्सेदारी की लड़ाई रहे.

इक्कीसवीं सदी में दुनिया के क्रान्तिकारी आन्दोलनों तथा खुद भारत में पिछले डेढ़ दशक से चल रहे डाइवर्सिटी अर्थात सर्वव्यापी आरक्षण के वैचारिक आंदोलन से अवगत होने के बावजूद कोई अपनी रणनीति में परिवर्तन नहीं लाया. इसलिए आज भी देखा जा रहा है कि कोई निजी क्षेत्र में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहा है तो कोई प्रमोशन में आरक्षण की लड़ाई में अपनी उर्जा खपा रहा है तो कोई न्यायपालिका में. यही कारण है दलित शक्ति के स्रोतों में मुक्कमल हिस्सेदारी से वंचित हैं.परिणामस्वरूप वे श्रीकोट हो थानागाजी : हर जगह हिन्दू पराक्रम के सामने असहाय व लाचार नजर आ रहे हैं.

बहरहाल आज यदि दलित चिन्तक और एक्टिविस्ट श्रीकोट और थानागाजी की घटनाओं से सचमुच चिंतित तो वर्षों पहले डॉ. आंबेडकर ने हिन्दुओं के अत्याचार से बचने के लिए दलित वर्ग को अपने हाथ में सामर्थ्य और शक्ति इकठ्ठा करने का जो सुझाव दिया था, उस पर पुनर्विचार करें. आज मोदी राज में दलित ही नहीं प्रायः पूरे आरक्षित वर्ग को शक्ति के स्रोतों से दूर धकेल कर बिलकुल उस स्थिति में पहुंचा दिया गया है, जिन स्थितियों में दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, फ़्रांस इत्यादि सहित खुद भारत में अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता की लड़ाई संग्राम संगठित हुआ. इसके लिए कुछ समय के लिए ब्राह्मणवाद के खात्मे जैसे व्यर्थ के भावनात्मक मुद्दों को छोड़कर शक्ति के स्रोतों में हिसीदारी की लड़ाई में जुटना पड़ेगा. यह लड़ाई निजी क्षेत्र, न्यायपलिका, पुलिस-मिलिट्री, प्रमोशन में आरक्षण से आगे बढ़कर सत्ता की सभी संस्थाओ, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग,परिवहन,फिल्म-मीडिया इत्यादि शक्ति के समस्त स्रोतों में संख्यानुपात में हिस्सेदारी तक प्रसारित करनी होगी. बिना इसके दलितों को मुकम्मल रूप से सामर्थ्यवान बनाया ही नहीं जा सकता और बिना सामर्थ्यवान बनाये श्रीकोट और थानागाजी जैसी घटनाओं पर विराम भी नहीं लग सकता. इस कार्य में चंद्रभान प्रसाद द्वारा लिखित ‘भोपाल घोषणापत्र’ और खुद इस लेखक द्वारा तैयार ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का घोषणापत्र’ काफी सहायक हो सकता है.

-एच.एल. दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

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