तीन तलाक पर संसद में बहस : ओवैसी और बदरूद्दीन अजमल को भी पछाड़ दिया रंजीत रंजन ने

तीन तलाक पर संसद में बहस : ओवैसी और बदरूद्दीन अजमल को भी पछाड़ दिया रंजीत रंजन ने

चुनाव आने वाले हैं चलो मुफ़्ती-मुफ्ती और इस्लाम-इस्लाम खेलते हैं

तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ। देश की सियासी फ़िज़ा में जब तक फ़तवों का तड़का न लगे मानो देश का कोई भी चुनाव मुकम्मल नहीं होता। इसी के चलते मुफ़्ती-मुफ्ती और इस्लाम-इस्लाम का खेल शुरू हो जाता है। इस काम को अंजाम देने के लिए मुसलमानों के ही कुछ मौक़ा परस्त लोग लग जाते हैं और गोदी मीडिया भी ख़ूब चटकारे लेने लग जाती है। देश के चुनावी मौसम का ध्रुवीकरण करने में किसी हद तक वह कामयाब भी हो जाती है। यह बात तो अपनी जगह है परन्तु सवाल यह उठता है कि क्या उन लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए जो लोग अपने ज़मीर को बेचकर उनकी मदद करते हैं, जो इस देश में सिर्फ़ ध्रुवीकरण की सियासत करते हैं। तीन तलाक़ पर क़ानून बनने का मामला हो या फ़तवों पर अपनी प्रतिक्रिया देना हो, हर मामले में बढ़-चढ़ कर बयानबाज़ी करना ऐसे ज़मीर फरोश लोगों की आदत बन गई है।

आमतौर पर लोगों का मानना है कि किसी भी मुद्दे पर चर्चा करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन जो लोग इस काम को अंजाम दे रहे हैं, उनको उसकी गंभीरता का ज्ञान भी होना ज़रूरी है। आज कल एक फ़ैशन चल रहा है कि किसी भी मसले पर दारूल उलूम देवबन्द या किसी दीनी इदारे से फ़तवा लिया और शुरू हो जाती है उसकी बुराइयों पर प्रकाश डालना। इस्लाम में कोई बुराई नहीं है, बुराई है तो हमारी सोच में, हमारे अमल में। यह बात अभी मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन तलाक़ वाले बिल पर संसद में हो रही बहस में हिस्सा ले रही सांसद रंजेत रंजन द्वारा जिस तरीक़े से तलाक़ जैसे गंभीर मसले पर अपनी दलीलें रखीं, उससे एक बार फिर साबित हो गया कि इस्लाम में कोई बुराई नहीं है। उनका कहना था कि क़ुरान शरीफ़ को पढ़ने के बाद पता चला कि तलाक़ कैसे दी जानी चाहिए और उसको देने के बाद क्या होता है। उन्होंने संसद की पटल पर अपनी ओर से यह माँग भी की कि तलाक़ पर लाए जा रहे क़ानून में क़ुरान शरीफ़ के तरीक़े को इस नए क़ानून में शामिल किया जाए, इसमें बहुत ही ठोस और सबसे अच्छा तरीका मौजूद है।

सांसद रंजीत रंजन ने क़ुरान शरीफ़ की दो आयतों का भी ज़िक्र किया जिसके बाद यह कहने में देर नहीं करनी चाहिए कि संसद में की गई बहस में सबसे अच्छा रंजीत रंजन बोलीं। उन्होंने ओवैसी और बदरूद्दीन अजमल को भी पछाड़ दिया। साथ ही उन्होंने मुसलमानों की नसीहत भी दी कि उन्होंने क़ुरान को सिर्फ़ समझा नहीं या यूँ कहे कि समझाया नहीं गया। लेकिन मोदी सरकार यह तो करेगी नहीं क्योंकि मोदी सरकार की नीयत मुस्लिम बहनों को इन्साफ़ दिलाना नहीं उनको सिर्फ़ इस नाम पर सियासत करनी है।

हम बात कर रहे थे ऐसे ज़मीर फरोश लोगों की जो इस काम में मोदी की भाजपा की मदद कर रहे, अब तो ऐसे भी लोग तैयार कर लिए गए हैं, जो इस काम के लिए अहल नहीं है और उन्होंने न मुफ़्ती का कोर्स किया न कभी किसी मदरसे में गए, लेकिन वह इस तरह की बहसों में हिस्सा ले रहे हैं, जिसके बाद इस्लाम की फ़ज़ीहत होती है और आम मुसलमान टीवी पर देख या अख़बारों में बयान पढ़कर अन्दर ही अन्दर ग़ुस्से से लाल पीला होता है।

अब हम बताते हैं ऐसे लोग क्यों आए और उन्हें क्यों लाया गया। उसकी सबसे बड़ी वजह जो इदारे और उनमें कार्यरत मौलाना साहेबान इसके लायक हैं, वह तो बेकार की ऊल-जलूल बातें करते नहीं, लेकिन टीवी चैनलों व अख़बारों को तो साम्प्रदायिक ख़बरें परोसनी हैं। सही और मान्य मौलाना प्रतिक्रिया देंगे नहीं तो उसका उपाय गोदी मीडिया ने निकाला कि किसी भी ऐरे-गैरे को मुफ़्ती या मौलाना बनाकर जनता के सामने परोसकर जनता को गुमराह किया जाए, जिसे वह करने में कामयाब भी रहे हैं। ऐसा भी देखने में आ रहा है कुछ लोग तो बस इसी लिए यह काम कर रहे हैं, कि मैं टीवी और अख़बारों में आ रहा हूँ वह इसी बात से ख़ुश हैं। जब इसकी सच्चाई खोजने की कोशिश की गई तो बहुत सी जानकारियाँ मिलीं, जिसे सुनकर मुसलमान क्या हिन्दू भी आग बबूला हो जाए।

इस मामले की गम्भीरता को देखते हुए हमने दारूल उलूम देवबन्द के कुछ मौलानाओं से बात की तो उनका कहना था यह सब मीडिया का कुचक्र है, जिसमें हमें फँसना नहीं चाहिए, लेकिन कुछ बुद्धिहीनता के मालिक व ज़मीर फरोश लोग उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं, जिससे समाज और ग़ैर मुस्लिमों में इस्लाम के ख़िलाफ़ माहौल बनाया जा सके। उनका कहना है कि वह चाहे कितना भी प्रयास कर ले इस्लाम वो दीन है जिसको बुरा नहीं साबित किया जा सकता। जो इस्लाम को ग़लत मानते हैं उन्हें हम इस्लाम को जानने की और समझने की दावत देते हैं, वो आएं और इस्लाम को जानें व समझें। किसी के बताए या दिखाने पर इस्लाम को ग़लत न मानें।

बात भी सही है किसी को भी ग़लत कहने से पहले हमें उसकी जानकारी करनी चाहिए तब किसी के बारे में ग़लत या सही कहना चाहिए।

हम यहीं नहीं रूके, हमने अपर पुलिस महानिदेशक अभिसूचना से बात करने की कोशिश की गई लेकिन बात नहीं हो पाई। उनसे बात करने की वजह है क्योंकि कभी-कभी यह मामले तूल पकड़ जाते हैं, जिसकी वजह से प्रदेश का माहौल साम्प्रदायिक हो जाता है। उनसे हमारा सवाल था कि क्या ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए, जिसके पास इस्लाम पर बोलने की डिग्री ही नहीं है ? क्या यह मालूम नहीं करना चाहिए कि किस आधार पर आपने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया दी ? क्या इस तरह के लोग प्रतिक्रिया देते हैं जो अधिकृत ही नहीं हैं, यह तो बहुत ग़लत है समाज को गुमराह कर रहे क्या ऐसा है ? चाहे तीन तलाक का मामला हो या अन्य मामले, यह सब चुनावी चाशनी का हिस्सा हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

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