Breaking News
Home / समाचार / देश / घटता हुआ मतदान बाबू समझो इशारे
Kanhmun: An elderly woman shows her inked finger after casting her vote for the Mizoram Assembly elections in Kanhmun, Mizoram on Nov 28, 2018. (Photo: IANS)
Kanhmun: An elderly woman shows her inked finger after casting her vote for the Mizoram Assembly elections in Kanhmun, Mizoram on Nov 28, 2018. (Photo: IANS)

घटता हुआ मतदान बाबू समझो इशारे

लोकसभा चुनावों के दूसरे चरण (Second phase of Lok Sabha elections 2019) में तथाकथित मतदाता जागरूकता अभियानों के बावजूद 95 क्षेत्रों में 68 प्रतिशत ही मतदान हो पाया है, जो 2014 के मुकाबले कई प्रतिशत कम है। कश्मीर घाटी स्थित श्रीनगर लोकसभा सीट पर तो यह न्यूनतम रहकर 25 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच सका। अलबत्ता, कश्मीर घाटी में पहले के चुनावों में भी वोटरों में मतदान के लिए कोई बड़ा उत्साह नहीं दिखता था और उसके लिए प्रोत्साहित किये जाने से ज्यादा खबरें इसकी आती थीं कि सैन्य बलों ने कैसे लोगों से मतदान के लिए जोर-जबरदस्ती की। अक्टूबर, 1947 में कश्मीर के भारत में विलय के बाद हुए पहले चुनाव में तो वहां कई क्षेत्रों में एक ही उम्मीदवार मैदान में उतरा, जो नियमानुसार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो गया था। अभी भी इसके कई मूल्यांकन हैं कि इस राज्य के मतदाताओं में चुनावी जीत-हार के प्रति उत्साह क्यों नहीं पैदा हो रहा है?

लेकिन अन्य 94 चुनाव क्षेत्रों में भी पहले के मुकाबले घटे मतदान से परिलक्षित होती मतदाताओं की उत्साहहीनता को किस रूप में देखा जाये? इसके मद्देनजर परिणामों को किसके अनुकूल और किसके प्रतिकूल आंका जाये? जैसा कि दावा किया जा रहा है, लोग मोदी सरकार से बहुत खुश होते तो अपनी खुशी को अभिव्यक्त करने बढ़ी संख्या में बूथों पर पहुंचते। सरकार बदलने का बड़ा उत्साह होता तो भी मतदान का अनुपात घटने के बजाय बढ़ता ही। 1977 में न सिर्फ प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी बल्कि उनके बेटे तक को चुनाव हराना यानी सबक सिखाना था तो मतदाता अतिरिक्त उत्साह से मतदान केन्द्र तक गये थे। यों, गुलामी के दौर में अंग्रेजी राज के विरोध में केवल 56000 लोगों ने ही जेल यात्राएं की थीं।

मतदाताओं के सामने गठबंधन के प्रति समर्थन मजबूरी ?

Compulsion of voter support to the coalition ?

आज मतदाताओं के सामने जो स्थिति है, उनमें भाजपा, कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों अथवा गठबंधन के प्रति समर्थन को मजबूरी माना जा रहा है। इस तथ्य के मद्देनजर और भी कि राजनीतिक दल ऐसे वर्गीय हितों के आधार पर गठित होते हैं, जिनमें सामंजस्य स्वार्थों में समानता के कारण ही संभव है।

प्रसंगवश, प्रथम आम चुनाव में राजे-महाराजाओं की जमींदार पार्टी बैलगाड़ी चुनाव चिन्ह पर सक्रिय थी। उसकी समझ थी कि उसके मुकाबले दो कौड़ी के लोग ही हैं, जो किसी भी दृष्टि से योग्य और प्रभावशाली नहीं हो सकते, इसलिए रियासतों के प्रमुखों और बड़े भू-स्वामियों का चुना जाना समय की आवश्यकता है। लेकिन वह सर्वथा गलत सिद्ध हुई।

1952 में लोकसभा की 10 सीटें भी नहीं जीत पायीं साम्प्रदायिक नारे देने वाली सारी पार्टियां

1952 में देश में बालिग मताधिकार पर आधारित पहला आम चुनाव हुआ तो अधिकांश मतदाता गैर पढ़े-लिखे यानी अंगूठा छाप ही थे। उनमें से अनेक अपने पुराने मालिकों को भगवान मानते और उनके सामने विनयावनत रहते थे। फिर भी मतदान के नतीजों के फलस्वरूप देश भर में कांग्रेस की सरकारें बनीं। तब विभाजन के फलस्वरूप बड़े पैमाने पर आबादी की अदला-बदली से फैला साम्प्रदायिक उन्माद भी रंग नहीं दिखा सका। भले ही पहली बार राजनीति में शामिल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के राजनीतिक मोर्चे भारतीय जनसंघ ने हिन्दुत्व के साथ अखण्ड भारत का नारा दे रखा था। हिन्दू महासभा पहले से ही हिन्दुत्व को निर्णायक तत्व मानती थी। रामराज्य परिषद भी अस्तित्व में आ गयी थी और बड़े पैमाने पर विशिष्ट साधु-सन्त भी मैदान में उतरे थे।

लेकिन साम्प्रदायिक नारे देने वाली सारी पार्टियां मिलकर भी इस चुनाव में लोकसभा की 10 सीटें नहीं जीत पायीं और धार्मिकता या कि साम्प्रदायिकता निर्णायक भूमिका निभाने में पूरी तरह असमर्थ रही।

हिन्दू कोड बिल पारित कराने के बावजूद 1957 में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में बहुमत मिला

1955 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार हिन्दू कोड बिल पारित कराकर कानून के रूप में लागू करने पर विचार कर रही थी, तो पुरातनवादी साम्प्रदायिक खेमा प्रचार कर रहा था कि वास्तव में यह हिन्दुत्व की मूल मान्यताओं के विपरीत है। उसके लोग इस बिल में महिलाओं को अधिकार देने के लिए किये गये प्रावधानों के खिलाफ  ‘सदियों से चली आ रही परंपरा’ का तर्क देते और कहते थे कि हिन्दुत्व में विवाह संस्कार है, सौदेबाजी नहीं कि उसमें तलाक को भी मान्यता दी जाये। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जैसे ‘विचारक’ और ‘साधु’ भी ऐसे पुरातनवादियों के ही साथ थे। तब दावा किया जाता था कि बहुसंख्यक हिन्दू समाज में उत्पन्न क्रोध के चलते कांग्रेस को आगामी लोकसभा चुनाव में बहुमत नहीं मिल पायेगा। लेकिन अंतत: उसे ही बहुमत मिला।

कैसे बना गैरकांग्रेसवाद का माहौल

1962 आते-आते आर्थिक प्रश्न भी राजनीति का हिस्सा बनने लगे। उन्हें लेकर आन्दोलन चले और मजदूर संगठन मजबूत हुए। इतना ही नहीं, सीमा विवाद को लेकर चीन के साथ मुठभेड़ भी हुई। इन अनेक कारणों से लोगों में सरकार के खिलाफ  बड़े पैमाने पर गुस्सा फैला और राजनीति में गैरकांग्रेसवाद का माहौल बनने लगा। इसके फलस्वरूप विभिन्न छोटे दलों के गठबंधन से सात राज्यों में संविद सरकारें बनीं, जिन्हें राजनीतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि के रूप में देखा जा सकता है। इनके आईने में यह भी देख सकते हैं कि राजनीति में कब और किस प्रकार के परिवर्तन या बदलाव के प्रयत्न हुए और उनके कारण क्या थे। इससे यह परिणाम भी निकाला जा सकता है कि राजनीतिक मुद्दे समय की आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं। भले ही बदलाव की प्रक्रिया हमेशा एक-सी नहीं रहती। इस क्रम में जो सबसे बड़ा है, उसके विरुद्ध भावनाएं भी उसका कद घटने-बढ़ने के अनुसार बदलती रहती है।

इस मूल प्रश्न पर लौटें कि वर्तमान चुनाव में मतदाताओं की उत्साहहीनता का मुख्य कारक तत्व क्या है, तो हम पाते हैं कि 25 साल पहले जिस पार्टी को लोकसभा में केवल दो सीटें ही मिल पायी थीं और उसके सभी बड़े नेता चुनाव हार गये थे, आज वह न सिर्फ सबसे बड़े बल्कि बहुमत प्राप्त दल के रूप में केन्द्र में सत्तारूढ़ है और ज्यादातर राज्यों में उसी की सरकारें हैं। ऐसे में इस उत्साहहीनता की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उसी पर आती है। लेकिन इसके विभिन्न कारणों की खोज हम सबको करनी पड़ेगी।

विपक्षी कांग्रेस और जो क्षेत्रीय दल महागठबन्धन के नाम पर एकजुट हो रहे हैं, उनको भी इस प्रवृत्ति को लेकर अन्वेषण करना और देखना होगा कि यह किन्हीं सिद्धान्तों पर आधारित है या इसके पीछे राजनीतिक मजबूरियां ही प्रमुख हैं? जो भी निष्कर्ष निकलें, उनके आधार पर भविष्य की राजनीति तय करनी हो, तो भी सोचना होगा कि जाति, धर्म व सम्प्रदाय आदि के जो प्रश्न वर्तमान चुनाव में खासतौर से छाये हुए हैं और जिनको विभिन्न रूपों में प्रस्तुत कर लाभ उठाया जा रहा है, वे कितने स्थायी हो सकते हैं?

रुका नहीं है नये स्वार्थों का जन्म

बहरहाल, वर्तमान राजनीतिक स्थिति के मूल कारणों में विभिन्न वर्गीय स्वार्थों पर आधारित बहुदलीय पद्धति भी है ही। नये दलों के, जिनमें ज्यादातर क्षेत्रीय हैं, जन्म व गठन के सिलसिले से अभी भी यही लगता है कि नये स्वार्थों का जन्म रुका नहीं है। इसके चलते हालत यह है कि कई दलों को देश की सकल जनसंख्या के दो प्रतिशत का भी समर्थन प्राप्त नहीं है। इन दलों में संकीर्णता कैसे मिटे और वे वृहत्तर स्वार्थों के लिए कैसे एकजुट हों, इस पर विचार समय की मांग है। ऐसी राष्ट्रीय नीतियां भी, जिनसे स्वार्थों का बिखराव बढ़ने के बजाय घट सके। यह भी सोचना होगा कि जाति व धर्म के आधार पर बना समाज कटुताएं ही बढ़़ायेगा, एकरूपताओं को जन्म नहीं देगा। हां, ऐसे समाज का निर्माण रोकने पर भी ध्यान केन्द्रित करना होगा।

शीतला सिंह

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनमोर्चा के प्रधान संपादक हैं।)

(वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह का यह आलेख मूलतः देशबन्धु में प्रकाशित हुआ है। हस्तक्षेप के पाठकों के लिए साभार प्रकाशन)

About देशबन्धु Deshbandhu

Check Also

BJP Logo

हरियाणा विधानसभा चुनाव : बागियों ने मुकाबला बनाया चुनौतीपूर्ण

हरियाणा में किस करवट बैठेगा ऊंट? 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल 27 अक्तूबर को …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: