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लोकतांत्रिक ढंग से हो कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव, खत्म किया जाए नामजदगी का कल्चर

राहुल गांधी पद मुक्त हो सकते हैं ज़िम्मेदारी से नहीं, अध्यक्ष न रहें नेता तो सदैव रहेंगे

आम चुनाव 2019 (General election 2019) में हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी (Congress President Rahul Gandhi) ने अपने पद से इस्तीफा दे कर लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन किया है। हालांकि पार्टी ने शुरू में ही उनका इस्तीफ़ा मंज़ूर करने से इंकार कर दिया था और जैसा कि अब तक होता रहा है उन पर इसे वापस लेने का दबाव भी खूब पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी माँ का अनुसरण करते हुए अपना फैसला बदलने से इंकार कर दिया है।

याद कीजिये कैसे सोनिया जी को 2004 में प्रधान मंत्री पद के लिए कांग्रेस संसदीय दल (Congress Parliamentary Party) ने चुना था कैसे सभी सहयोगी दल उनके नाम पर सहमति जता चुके थे, कैसे कांग्रेस के सांसदों से ले कर आम कार्यकर्ता तक सोनिया जी पर पद स्वीकार करने का दबाव डाल रहा था, लेकिन उन्होंने सबकी भावनाओं का आदर तो किया परन्तु अपना फैसला नहीं बदला था। हालांकि उनके इस त्याग को भाजपा (BJP) के धूर्त नेताओं और चाटुकार पत्रकारों ने ज़िम्मेदारी से भागने और बिना ज़िम्मेदारी लिए सत्ता सुख भोगने जैसे बेहूदा इलज़ाम लगाए थे लेकिन आम भारतीय ही नहीं विदेशियों ने भी उनके इस त्याग की सराहना की थी और वह रातों रात ग्लोबल लीडर बन गयी थीं। राहुल गाँधी ने भी अपनी माँ के पदचिन्हों पर चलने का फैसला कर के धूर्तों के प्रोपगंडा को कुंद कर दिया है। उन्होंने पार्टी के आम कार्यकर्त्ता की हैसियत से पार्टी और देश की सेवा करते रहने का वादा किया है पार्टी पर वंशवाद के लगे इलज़ाम को धोने के लिए उन्होंने यह भी साफ़ कर दिया कि उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा भी पार्टी अध्यक्ष नहीं बनेंगी।

अब पार्टी के सामने नया अध्यक्ष चुनने की समस्या है। पार्टी में टैलेंट की कमी नहीं है, लेकिन नए अध्यक्ष के सामने सब से बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रखने और उस काम को कर दिखाने की होगी जो राहुल गाँधी नहीं कर सके। हालांकि इस बात से राहुल के धूर्त विरोधियों को छोड़ कर कोई ईमानदार व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि विगत दो वर्षों में उन्होंने ज़बरदस्त मेहनत की और उस वक़्त मोदी के सामने खड़े हुए जब उनके सामने खड़े होने वाले हर व्यक्ति को ट्रोल किया जाता था उसे देश द्रोही और हिन्दू विरोधी होने का तमगा दे दिया जाता था और उसके चरित्र हनन मे नीचता की सभी सीमायें लांघ दी जाती थीं।

राहुल गाँधी ने बेरोज़गारी, किसानों की समस्याओं, छोटे कारोबारियों की समस्याओं देश में फैलाये जा रहे सामाजिक वैमनस्य आदि के खिलाफ पूरी ताक़त से आवाज़ उठाई लेकिन वह जो कहते हैं न कि सफलता के हज़ार पिता होते हैं, विफलता का केवल एक राहुल गाँधी। और कांग्रेस मोदी-अमित शाह के चुनावी कौशल का मुक़ाबला नहीं कर पाई जिसके आगे देश की सभी उपर्युक्त समस्याएं गौण हो गयीं।

पुलवामा और उसके बाद बालकोट ने सभी समस्याओं को पीछे कर दिया इसके साथ ही संघ के कार्यकर्ताओं की मेहनत लगन और भाजपा (BJP) के पास 3 M (Money, Media,Man power ) का भी कोई सियासी दल मुक़ाबला नहीं कर पाया।

अब तो यह भी सामने आ गया है कि राहुल गाँधी के इनर सर्किल में भी संघ का आदमी बैठा हुआ था जो उन्हें आखिर तक गलत फिगर दे कर गुमराह करता रहा।

ज़ाहिर है जब चुनाव इस अंदाज़ से लड़ा जाए कि अवाम की बुद्धि विवेक और तर्क को समाप्त कर के उनके ज़हनों में केवल उग्र राष्ट्रवाद और धार्मिक उन्माद भर दिया जाए तो किसी के लिए भी चुनाव जीतना और जिता पाना असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर है। कांग्रेस के भावी अध्यक्ष के सामने इस राजनीति की काट भी तलाश करने की ज़िम्मेदारी होगी।

देश की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। भाजपा (BJP) अब अटल अडवाणी वाली नहीं रह गयी। यह मोदी और अमित शाह की पार्टी है, जबकि कांग्रेस समेत सभी अन्य पार्टियां अभी अपने पुराने ढर्रे वाली राजनीति ही कर रही हैं। भाषा की सभ्यता मान मर्यादाओं का ध्यान देश की भावनात्मक एकता की चिंता करते हुए अपनी सियासी रणनीति बनाना यह सब पुरानी बातें हो गयी है।

कांग्रेस के भावी अध्यक्ष को पार्टी को ही नए चैलेंजों का सामना करने के लिए तैयार नहीं करना होगा बल्कि अवाम को भावनात्मक नकारात्मक और उन्मादी मुद्दों से बाहर निकाल कर असल मुद्दों को ध्यान में रख कर वोट देने के लिए शिक्षित करना होगा। ख़ास कर नए मतदाताओं को, जिन्हें मोदी जी की घर में घुस कर मारने की बात तो पसंद आती है, मगर वह यह नहीं समझते कि यह देश को एक अँधेरी गली में ले जाया जा रहा है जहाँ आगे रास्ता बंद है।

यह कोई मामूली बात नहीं है कि विश्व बैंक ने भारत को विकासशील देशों की फंहरिस्त से निकाल दिया है या भारत अंतर्राष्ट्रीय भुखमरी इंडेक्स में और नीचे आ गया है या अंतर्राष्ट्रीय खुशहाली इंडेक्स में पाकिस्तान और बंगला देश से पिछड़ गया है।

बिहार में 200 मासूम बच्चे मामूली दवाओं के अभाव में मौत के मुंह में चले गए और हमारा युवा घर में घुस कर मारने के डायलाग में मस्त है।

कांग्रेस के भावी अध्यक्ष को देश के नवजवानों को इस मदमस्ती से बाहर निकलने की भी ज़िम्मेदारी निभानी होगी। महज़ चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए भी क्योंकि केवल युवा ही राष्ट्र निर्माण की ज़िम्मेदारी निभा सकते हैं जिन्हें एक सोची समझी रणनीति के तहत धर्मांध और कूप मंडूक बनाया जा रहा है।

इसके साथ हीं साथ कांग्रेस को कुछ कटु सच्चाइयों का भी एहसास करना होगा और सब से कटु सच्ची बात यह है कि पार्टी अंदर से खोखली हो चुकी है। उसका सारा दारोमदार नेहरू गाँधी परिवार के करिश्मे और उसकी क़ुर्बानियों पर है। प्रदेशों में जितने बड़े और प्रभावी लीडर हैं उनकी चिंता अपने बाद अपने बेटे-बेटी को सत्ता हस्तान्तरण की है, जिसके कारण वह अपने बाद के किसी अन्य नेता को पनपने नहीं देना चाहते, पार्टी का इससे चाहे जितना नुकसान हो जाये।

पार्टी की दूसरी बड़ी समस्या नामजदगी का कल्चर है चाहे राज्य इकाइयों के अध्यक्ष की नामजदगी हो या वर्किंग कमेटी के सदस्यों की या अन्य किसी पद पर।

बेहतर होगा कि अब नामजदगी का कल्चर खत्म किया जाए और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल किया जाए। नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव AICC का इजलास बुला कर सही मायनों में चुनाव द्वारा किया जाए।

इसी तरह वर्किंग कमेटी के 80 % सदस्यों का चुनाव हो। अध्यक्ष का कार्यकाल केवल दो साल का हो और वह केवल दो टर्म ही अध्यक्ष रहे। वर्किंग कमेटी, संसदीय कमेटी आदि के सदस्य भी लोकतांत्रिक तरीके से चुने जाएँ और वह भी ज़िंदगी भर का ठेका न पाएं जिससे नए और नवजवान कार्यकर्ताओं के लिए संभावनाएं बढ़ें।

पार्टी के नेताओं के बेटे बेटियों को भी राजनीति में आने और चुनाव लड़ने का अधिकार है, लेकिन ऐसा निज़ाम बनाया जाए कि वह अव्वल तो एक निश्चित अवधि तक पार्टी और जनता के बीच काम करने के बाद ही टिकट पाएं। उनकी शुरुआत निचली सतह से हो और बाप या पति की सीट के अलावा अपने लिए खुद क्षेत्र ढूंढें और वहां से चुनाव लड़ें।

आज हालत यह हो गयी है कि कांग्रेस ही नहीं, सभी दलों में सांसद विधायक तो छोड़िये कॉर्पोरेटर प्रधान बीडीसी के सदस्य तक के चुनाव में बाप के बाद बेटे का नंबर आ जाता है और आम कार्यकर्ता केवल दरी बिछाने और ज़िंदाबाद मुर्दाबाद करने के लिए ही रह जाता है। कांग्रेस अगर अपने में से यह सिस्टम समाप्त कर दे तो अन्य पार्टियों को भी इसे अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

पार्टी को अपनी आर्थिक और सामाजिक पॉलिसियों पर भी गौर करना पड़ेगा। सॉफ्ट हिंदुत्व के कांसेप्ट ने पार्टी का बंटाधार कर दिया है। बक़ौल स्व पंडित कमला त्रिपाठी कांग्रेस कांग्रेस बन कर ही जीवित रह सकती है भाजपा (BJP) की बी टीम बन कर नहीं। उसे सेकुलरिज्म और सोशलिज्म अर्थात नेहरुवीयन मॉडल के अपने पुराने ढर्रे पर वापस आना होगा।

मोदी जी को भले ही इस बार 37% वोट मिले हों लेकिन अब भी यह सच है कि देश की जनता धार्मिक उन्माद, उग्र राष्ट्रवाद, कॉर्पोरेट लूट से त्रस्त है और वैकल्पिक राजनीति चाहती है, जो उसे केवल कांग्रेस ही दे सकती है। कांग्रेस के भावी अध्यक्ष को इसी को अपना सरमाया (Asset ) मान कर आगे क़दम बढ़ाना होगा।

राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी कांग्रेस के ओहदेदार रहें या न रहें पार्टी के कार्यकर्ताओं में उनकी नंबर एक की पोज़िशन और लीडरशिप हमेशा रहेगी। यह लोग भले ही अध्यक्ष न हों नेता तो रहेंगे ही। उनकी इस हैसियत को कोई छीन नहीं सकता, जैसे महात्मा गाँधी बक़ौल खुद के कांग्रेस के चवन्नी के मेंबर भी नहीं थे, लेकिन पार्टी उनकी मर्ज़ी के बगैर एक क़दम भी नहीं चल पाती थी, क्योंकि जनता और कांग्रेस जन भावनात्मक तौर से उंनसे जुड़े थे। यही स्थिति राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की होगी। उन्हें पार्टी के भावी अध्यक्ष को पीछे से सहारा भी देना है और खुद जनता के बीच जा कर उन्हें जागृति भी करना है कि देश का संवैधानिक लोकतांत्रिक ढांचा खतरे में है और अगर यह ढांचा टूट गया तो फिर देश को भी टूटने से नहीं बचाया जा सकेगा। राहुल गाँधी पदमुक्त तो हो सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों से मुक्ति नहीं पा सकेंगे।

उबैद उल्लाह नासिर

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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