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क्या है डेरावाद का चौरासी- चक्र

महात्मा बुद्ध और गुरु नानक का सन्देश, सनातन धर्म की छतरी के नीचे समा पाना आसान नहीं था, क्योंकि उन्होंने इस सनातनी धर्म के मौलिक सिद्धांत – वर्ण व्यवस्था पर सीधा वार किया

कंवल धालीवाल

डेरावाद

सब से पहले ‘डेरा’ के शाब्दिक अर्थों का विश्लेषण किया जाए- डेरा का अर्थ है – तंबू/ शिविर/ निवास/ आवास। ये शब्द हिन्द-आर्याई मूल का है। इसी लिए इसे हिंदुस्तानी/ पंजाबी/ नेपाली/ मराठी में तो तो डेरा ही कहते हैं और गुजराती में ढेरो, सिंधी में दड़ो हो जाता है। असल में इस शब्द का हिन्द-आर्याई स्रोत इस से भी प्राचीन हिन्द-यूरोपी मूल के शब्द “द्वेर” से संबंधित है। जिस का सीधा सा अर्थ है – “दुआर”।

संस्कृत में जो दुआर है रुसी में वहीं दवेर और अंग्रेजी (और कई दूसरी यूरोपीय भाषाओँ में) ‘डोर’। ज़ाहिर है कोई निवास होगा तो उसका दुआर भी तो होगा। जैसे गुरुद्वारा में “द्वारा” भी यहीं ‘दुआर’ ही है जो डेरा है। परन्तु आजकल की ये डेरा-विरोधी मानसिकता केवल नानक के धर्म जितनी पुरानी नहीं है बल्कि इसकी उम्र उतनी ही लंबी है जितनी मानवीय चेतना की, जो हमें लाखों वर्ष पीछे जा कर सोचने पर मजबूर करती है।

अपने जीवन के संसाधनों के प्रति चेतन हो जाने के बाद मनुष्य ने हर उस वस्तु पर कब्ज़ा करना चाहा, जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष सबंध उसके जीवित रहने से था। निजी स्वार्थ की पूर्ति किसी समूह में विचरण करने से अपेक्षाकृत सरल होती है। इसी कारण मनुष्य ही नहीं बल्कि प्राणियों की अधिकतर जातियां समूहों में विचरती हैं। परन्तु मनुष्य के लिए जीवित रह सकने का साधारण मसला किसी विचारधारा से कैसे जुड़ जुड़ता है – ये अध्ययन रोचक है।

जब अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य ने समूह में रहना वाजिब समझा तब इन समूहों को एकजुट रखने के लिए किसी मुखिया का होना स्वाभाविक ज़रूरत थी तथा किसी का ज़्यादा से ज़्यादा ताकतवर होना ही उसके मुखिया बनने की कसौटी होती थी।

इतिहास गवाह है कि जंगली कबीलों के यही सरदार आने वाले समय के सामंत, चौधरी, राजा और फिर सम्राटों की सूरत में सामने आए तथा यहीं कबीले ही फैलते-फैलते जनसमूह, इलाकाई जागीरदारियों से होते हुए राज्यों और फिर देशों का रूप धारण कर गए।

महान दार्शनिक इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन के सामाजिक अध्ययन से साफ समझ आता है कि राजाओं की शक्ति पुरोहितों के पास कैसे पहुंची। उनके अनुसार प्राचीन भारत में क्षत्रिय (राजा) और ब्राह्मण ( पुरोहित) सगे भाई थे।

राजसत्ता की प्रथा के अनुसार राजपाट की बागडोर राजा के सभी पुत्रों में से एक (आम तौर पर पहले) पुत्र को ही सौंपी जाती थी। इन हालात में बाकी के बचते शेष भाइयों की ओर से पुरोहित की पदवी धरण कर लेने की प्रथा प्रचलित हुई और राजाओं की छत्र छाया तले ऐसी परवान चढ़ी कि पुरोहित को “भगवन का दूत” की हैसियत मिलने के बाद उसकी शक्ति राजा से भी अधिक हो गई। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में ऐसी अवस्था संसार की अन्य सभ्यताओं में भी विकसित हुई।

राजसी ताकत का अर्थ है – लोगों पर कब्ज़ा

राज्य भले ही राजा का हो या धर्म के ठेकेदार पुरोहित का, राजसी ताकत का अर्थ है – लोगों पर कब्ज़ा। लोगों के दिलो-दिमाग को अपने काबू में रखना। साधारण जनता द्वारा की जाती लहू पसीने की कमाई ही राजा के खजाने भरती है तथा ये खजाना तभी सुरक्षित रह सकता है यदि लोगों को दिमागी तैर पर गुलाम बना कर रखा जा सके ताकि वह कभी भी अपनी सोच पर लगी ज़ंजीरों के विषय में चेतन न होने के कारण अँधाधुंध भेड़चाल चलते हुए अपने परमात्मा स्वरूप स्वामी की सेवा के बहाने दुनियावी शोषणकर्ताओं के हाथों बर्बाद होते रहें। परन्तु इंसानी दिमाग अपने कुदरती स्वभाव के कारण समय समय पर ऐसे मनुष्य पैदा करता रहा है जो गुलामी की ऐसी ज़ंजीरें तोड़ने के लिए विद्रोह का बिगुल बजाता है। ऐसे लोग अपने जीवन काल के दौरान अक्सर भरपूर विरोध का सामना करते हैं पर इतिहास में हम इन्हें किसी न किसी नायक की सूरत में याद करते हैं। कई नायक ऐसे भी होते हैं जिनके विद्रोही विचारों वाली शिक्षा अपने आप में एक नए धर्म के रूप में फलने-फूलने लगती है। समय पाकर यहीं विचारधारा फिर उसी प्रकार के स्थापित धर्म में परिवर्तित हो जाती है जिस के विरोध में इस का जन्म हुआ था। लोग सहज ही भूल जाते हैं कि उस तथाकथित नए धर्म का मकसद क्या था जो बाद में उसी पुराने धर्म की भांति ही जड़ हो गया।

इस लेख का मकसद भी यहीं है कि इस निरंतर चल रहे चौरासी- चक्र के बारे में विचार किया जाए। धर्म का इतिहास जानना इस लेख का मकसद नहीं है।

पंजाब के इतिहास में गुरु नानक का चरित्र ऐसे ही नायक का रूप है जिन्होंने अपने विद्रोही विचारों से लोगों को स्थापित हो चुकी धार्मिक ग़ुलामी से मुक्ति दिलाने की कोशिश की। नानक का विद्रोह भले ही पुरोहित और हाकिम के खिलाफ ऐसी क्रांति थी जो कि “रब्ब की रज़ा” में रहकर ही की जानी वाजिब थी फिर भी अपने समय के अनुसार उनका संदेश और जीवन शैली काफी क्रन्तिकारी थी। परन्तु नानक का क्रान्तिकारी सन्देश भी आखिरकार स्थापित जड़वादी धर्म बन जाने से बच न सका। पांच सौ वर्ष के समय की धूल तले दबता, कड़ी परीक्षाओं से गुज़रता, प्रीत के साथ तलवार की ज़रूरत को जायज़ ठहराने को मजबूर होता नानक का सत्य सन्देश आखिर ऐसे ही रिवायती धर्म के रूप में सामने आया जिसे भारतीय ‘हिन्दू’ (गैर-मुस्लिम) समाज के एक वर्ग ने ‘पृथक् धार्मिक पहचान’ के तौर पर इस्तेमाल किया।

इस ‘पृथक् धार्मिक पहचान’ के साथ भावुक सबंध ही ऐसी मानसिक दशा है जो आखिर एक ही जगह विचरण करने वाले अलग-अलग धर्मों / समुदायों के बीच खून-खराबे का कारण बनती है। मानवीय इतिहास के लम्बे सफर में नए और पुराने धर्मों के बीच यह दुश्मनी अक्सर मनुष्य की सब से वहशी नफरत का प्रदर्शन करती नज़र आती है।

पूर्व स्थापित धर्म हमेशा ये दावा करता है कि नवनिर्मित धर्म उसी का अंग है ( जो कि बहुत हद तक सही भी है ) जबकि नवीन विचारधारा अपनी अलग स्थापित हो चुकी पहचान खोना नहीं चाहती, क्योंकि इस में उसकी अहंकार पूर्ति होना शुरू हो चुकी होती है। नए जन्मे धर्म के नए ठेकेदार, नए पुरोहित पैदा हो चुके होते हैं जो जनता की अज्ञानता से हो रहा मुनाफा किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते। ये व्यवहार कुदरती है और इस लिए सर्वव्यापक भी है। पंजाब या भारत से बाहर के उदाहरण लें तो भी यही तथ्य सामने आते हैं।

यहूदी मत का ही अंग था ईसाई मत

दुनियां में बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि संसार में सब से अधिक फैलने वाला धर्म – ईसाई मत, असल में यहूदी मत का ही अंग था।

ईसा मसीह स्वयं एक यहूदी थे और रोम साम्राज्य की ओर से सूली चढ़ाए जाने तक यहूदी धर्म का ही प्रचार करते रहे थे। परन्तु वह नानक की भांति ही अपने धर्म की अंदरूनी कमियों के खिलाफ विद्रोही सन्देश दे रहे थे, जो कि सदियों से स्थापित यहूदियत के पुरोहित को मंज़ूर नहीं था। ईसा के मरने के आधी सदी बाद तक भी ईसाई नाम का कोई धर्म नहीं था। ईसा की तरफ से दिया गया सन्देश जो सिर्फ यहूदियों के लिए ही था, उसके एक चालाक शिष्य, जिसका असली नाम “सोल” था, ने यूनान में रह रहे यहूदियों को एक यहूदी मत के तथाकथित नए स्वरूप ‘ईसायत’ के नाम से प्रचार करना आरम्भ कर दिया। यहीं सोल बाद में “संत पॉल” के नाम से मशहूर हुआ और इसके नाम पर करोड़ों के खर्च से गिरिजाघर सारे यूरोप में बनाए गए।

सोल की तरफ से यूनान में प्रसारित ईसा का सन्देश, जो आरम्भ में यहूदियों के लिए था, यूनानी मिथिहास पर आधारित स्थानीय धर्म को मानने वालों तक भी पहुँचने लगा जिनको इस सन्देश की नवीनता अच्छी लगी और वह भी धीरे-धीरे इसकी शरण में आने लगे।

यूरोप के अधिकतर भाग पर रोम का राज्य था, जो यूनानी मिथिहास के उपासक थे पर इस नए धर्म का जादू यूरोप में चल चुका था, जो रोम साम्राज्य से मिलीं यातनाओं के बावजूद पहले यूनान फिर रोम साम्राज्य के अन्य हिस्सों में फैलने की जद्दो-जहद उस समय तक करता रहा जब तक कि रोम साम्राज्य के सम्राट कॉन्सेंटटीन ने स्वयं ही ईसाई मत की दीक्षा न ले ली।

इस प्रकार यूनान में रहते यहूदियों के लिए आरम्भ हुए इस नए धर्म का सिक्का ऐसा चला कि समय के सम्राटों का धर्म बनकर यह सारी दुनियां पर छा गया। परन्तु मुख्य धारा के यहूदियों के लिए तो ईसा यहूदी मत के विद्रोही मात्र थे, जो सच भी है। इसी लिए ईसाई धर्म यहूदियों के लिए डेरावाद से अधिक कुछ नहीं था।

पिछले दो हज़ार वर्षों में इसाईओं और यहूदियों के बीच डेरेवाद की इस लड़ाई में मनुष्य द्वारा मनुष्य पर ही होने वाले अत्याचारों की वो मिसालें कायम हुई हैं जो और कहीं नहीं मिलती।

ईसाई धर्म के नए बने पुरोहितों की ओर से सम्राटों को उत्साहित करने के कारण यहूदियों ओर ज़ुल्म की आंधी चलाई गई।

ध्यान से सोचें तो कितना अजीब लगता है कि अपने मिथिहासक धर्म को मानने वाले यूरोपियों का यहूदी ईसा के साथ कोई लेना-देना न था और वहीं यूरोपीय ईसा को अपना खुदा मान कर सारे यहूदियों के इस नए धर्म के दुश्मन घोषित कर दिया। ज़ाहिर है कि नए पुरोहित को पता था कि उसके निजी हित अब किसको मारने और किस को पूजने में सुरक्षित हैं।

पुराने तथा नए इन धर्मों में से यहूदियों को यानि कि पुरानों को मार ज़्यादा पड़ी क्योंकि राजसत्ता नयों के साथ मिल गई थी। परन्तु समय के साथ पुराने होते हुए ईसाई धर्म में भी आगे विभाजन हुआ और ऐसा होना स्वाभाविक भी था।

ऑर्थोडॉक्स, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट तथा इनकी और आगे से आगे शाखाओं की भांति फैले ईसाई मत के बूढ़े वृक्ष का रूप बदलता गया। प्रेम शांति का उपदेश देने वाले धर्म के रूप में जाने जाते इससे धर्म को भी जब इन डेरों के साथ निपटना पड़ा तो और धर्मों की भांति इस ने भी अपनी असली विचारधारा को दरकिनार करके खुल कर हिंसा की। कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों की बीच जो खून की होलियां खेली गयीं, उन्हें यूरोपीय इतिहास की किताबें खोल कर देखा जा सकता है।

इस्लाम की भी हुई यही हालत

यही हालत इस्लाम की भी हुई, बल्कि बड़ी जल्दी हुई। मुख्या धारा का इस्लाम अभी मुश्किल से एक सदी ही पुराना हुआ था कि इस्लाम का पहले डेरा शिया इस्लाम के रूप में आ खड़ा होता है – फिर वहीं कत्लो-गारत, वही नफरत!

शिया धड़े ने भी सरे कष्ट सह कर अपने आप को सुन्नियों के बराबर ला खड़ा किया और अब तो दुनियां में कई पूरे के पूरे देश ही शिया देश माने जाते हैं।

शियाओं ने अपने रस्मो रिवाज़ अलग करते हुए भी अपने आप को मुस्लिम कहना नहीं छोड़ा और यह बात अपने आप को ‘असली मुसलमान’ समझने वाले सुन्नियों के लिए जीने मरने का सवाल बना रहा।

शब्द “शिया” का मूल स्रोत यूनानी भाषा से है जिस का अर्थ है ‘दो-फाड़’। अंग्रेजी में heresy शब्द शिया के अर्थ समझने में सहायक हो सकता है तथा पंजाब के डेरेवाद के लिए भी।

इस्लाम में भी डेरा !

समय बीतने के साथ इस्लाम में और भी डेरे प्रचलित हुए – जैसे सूफी; फिर अलग-अलग देशों में जहां इस्लाम फैला, वहां के लोगों द्वारा और डेरे बना लिए गए जैसे पाकिस्तान में अहमदी, बरेलवी आदि, जो अभी भी कट्टर सुन्नियों के कहर का निशाना बनते रहते हैं।

भारत में सब से पुराना स्थापित धर्म ब्राह्मणवाद ( हिन्दू) है जिसकी प्राचीनता के कारण इसे सनातन धर्म भी कहते हैं। सनातन का अर्थ ही है पुराना या ‘जो सदा से है’। इसकी प्राचीनता को देखते हुए स्वाभविक ही है कि इसने भी बहुत सारे डेरों का सामना किया होगा तथा सनातन और नवीन के युद्धों में मानवी लहू भी बहाया गया होगा।

भले ही जैन मत के अनुयाई महावीर के शिष्य सनातन धर्म के सब से पहले शिया कहे जा सकते हैं, परन्तु इसे असली चुनौती गौतम बुध ने दी। ब्राह्मणवादिओं के हाथों बौद्धों के नरसंहार और बौद्ध मठों को बर्बाद करके उन पर खड़े किए गए हिन्दू मिथिहासक देवी-देवताओं के मंदिरों की व्यथा शायद मानवीय इतिहास में सब से अधिक छिपा कर रखे गए तथ्यों में से एक मानी जा सकती है।

हिन्दू आस्थाओं का मूल भी यूनानी धर्म की तरह मिथिहासक है।

यूनानी मिथ्या विश्वास को ईसाई मत और मिस्री मिथ्या धर्म को इस्लाम ने मिटा दिया, तो ये प्राकृतिक है कि हिन्दू मिथ्या धर्म को भी चुनौती मिलनी ही थी और मिली भी। जैन मत, बुद्ध मत और सिख मत अपने समय की वो मुख्य ‘नवीन’ विचारधाराएं थीं जिन्होंने स्थापित हिन्दू आस्थाओं को ललकारा। इनमें केवल बौद्ध और सिख ही अपनी अलग पहचान बनाने में तो सफल हुए, परन्तु ईसाइयत और इस्लाम की तरह सनातनी आस्थाओं को मिटा न सके, जिन्होंने यूनान और मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं का अंत कर दिया था।

इस तथाकथित सनातन धर्म के पैरोकारों की तरफ से अक्सर ये सुनने में आता है कि यह तो धर्म ही ऐसा है जो सब को अपना बना लेता है, दूसरे शब्दों में अपने में समा लेता है। उनके इस दावे का अर्थ तो ये होता है कि ‘जैनी, बौद्ध सिख आदि सब ‘हिन्दू’ ही हैं ‘परन्तु इस दावे में छुपी एक सच्चाई अपने आप प्रकट हो जाती है वो ये कि “हिन्दू” आस्थाएं असल में भारत में समय-समय पर और विभिन्न जगहों पर पनपीं- विभिन्न प्रकार की मान्यताओं के संग्रह का नाम हैं।

शैव-वाद, वैष्णव-वाद, दैवी-वाद, जैसी अनेक परंपराएं भारत के अलग- अलग भागों में अलग अलग समय पर जन्मीं। ऐसा समय भी रहा है जब इन विभिन्न संप्रदायों के दरम्यान फसाद तक होते रहे। आर्यों का वैदिक फलसफा भी इसी संग्रह का हिस्सा बना तथा वेदों के बहुत बाद रचे जाने वाले महाकाव्य रामायण और महाभारत भी। इस प्रकार इस भारतीय धर्म का स्रोत कोई एक विचारधारा न हो कर बहुत सारी मान्यताओं का सुमेल है। तभी तो डेरावाद से निपटने के लिए इसके पास बढ़िया ढंग है – प्रत्येक नए डेरे को अपनी “हिन्दू” छतरी की छाया तले ले आओ। परन्तु महात्मा बुद्ध और गुरु नानक का सन्देश इस छतरी के नीचे समा पाना आसान नहीं था क्योंकि उन्हों ने इस सनातनी धर्म के मौलिक सिद्धांत – वर्ण व्यवस्था पर सीधा वार किया। यह एक अलग विषय है कि गौतम और नानक की क्रांति भी इस जाति प्रथा जैसे मानवता विरोधी विवहार को नकेल क्यों नहीं डाल सकी। सनातनी धर्म की कुरीतियों के विरोध में, भारतीय समाज में जन्म लेने वाले ये डेरे ही नहीं बल्कि इस्लाम और ईसायत जैसे गैर-भारतीय मूल के धर्मों की शरण लेने वाले सारे भारतीय उप महाद्वीप के लोग आज भी इस बीमार मानसिकता को सहज ही निभाते हैं।

आधुनिक पूर्वी पंजाब में उभर रहे डेरों की कहानी दुनिया के और धर्मों के इतिहास में जो हुआ उस से अलग नहीं है। सिखों की स्थापित हो चुकी विचारधारा को उसी प्रकार की चुनौतियों का सामना है जो कभी यहूदियों, ईसाईयों, हिंदुओं को रहा।

कंवल धालीवाल

सिख धर्म के इतिहास में ऐसे हालात नई बात नहीं हैं। सब से पहले तो नानक के ही पुत्रों द्वारा एक सम्प्रदाय का आरंभ, फिर गुरु तेग बहदुर के समय अपने कुछ शिष्यों की सहायता से गुर-गद्दी पर हक जमाता हुआ राम राय, उसके बाद बंदा बहादुर के उपासकों की ओर से बंदे के नाम पर नई सम्प्रदाय आरम्भ करने की कोशिश आदि कई उदाहरण हैं जब ऐसे डेरे अस्तित्व में आने की कोशिश करते रहे। हमारे समय का “निरंकारी” समुदाय भी इन्हीं डेरों में गिनी जा सकता है।

इन सारे शिया डेरों का सिखों की ओर से तीखा और कई बार हिंसक विरोध भी हुआ पर ये अभी अपनी विचारधाराओं को स्थापित धर्म में तब्दील करने में कामयाब नहीं हुए हैं। परन्तु तथाकथित तौर पर शांतमई ढंग से फ़ैल रहे पंजाब / उत्तर भारत के अन्य डेरे बड़ी कामयाबी के साथ फल फूल रहे हैं जिसका मुख्य कारण है- साधारण जनता को किसी ऐसे बदलाव की मानसिक ज़रूरत जिस से वह अज्ञानता में से उपजी अपनी धार्मिक इच्छाओं की पूर्ति कर सकें। इस के अलावा भारतीय कुष्ठ- जाति-पाति की नफरत, शराबखोरी आदि से बच सकने की उम्मीद कर सके। ये ऐसी कुरीतियां हैं जो सिखों में उतनी ही प्रबल हैं जितनी की बाकी भारतीय समाज में। कारण बहुत से हैं – राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि परन्तु वास्तविक कारण है – लोगों में स्वाभाविक अज्ञानता / अनपढ़ता।

इस लिए जब कोई भी स्थापित धर्म अपनी एक ख़ास उम्र बिता लेता है तो उस के बीच से ही और कई बार उसी की नाम से ही शिया की तरह आरम्भ हो कर स्वयं स्थापित धर्म बन जाते हैं। यह व्यवहार आदि काल से चला आ रहा है और देखे जा सकने वाले भविष्य तक चलता ही रहेगा। वो समय अभी कल्पना से भी दूर है जब धरती पर बसने वाले सभी मनुष्य इतने चेतन हो पाएंगे की वे इस ब्रहमाण्ड की प्राकृतिक घटनाओं / बर्ताव को “भगवान का चमत्कार” समझना बंद कर देंगे और प्रत्येक ना समझ आने वाली बात को अपने प्रश्नात्मक स्वभाव के साथ चुनौती दे कर उत्तर ढूंढ़ने की कोशिश करने का व्यवहार स्वाभाविक बना लेंगे।

कंवल धालीवाल – 2012

अनुवाद – मधु बाला – 2016

(लेखक कंवल धालीवाल चित्रकार व स्तंभकार हैं।)

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