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Vidya Bhushan Rawat

देश में आग लगाने का षड़यंत्र : पत्रकार जब चारण हो जाए तो समझ लीजिये देश पर संकट है

अंबेडकरवादी मानवाधिकार कार्यकर्ता (Ambedkarwadi human rights activist) विद्या भूषण रावत (Vidya Bhushan Rawat) का यह आलेख “उत्पीड़न की संस्कृति के विकल्प की जरूरत : पत्रकार जब चारण हो जाए तो समझ लीजिये देश पर संकट है” मूलतः 10 जुलाई 2018 को प्रकाशित हुआ था। यह लेख आज भी प्रासंगिक है। हस्तक्षेप के पाठकों के लिए पुनर्प्रकाशन ….

पिछले दो हफ्तों में तीन बड़ी घटनाएं हुई हैं जिन पर जैसी चर्चा होनी चाहिए वैसे नहीं दिखाई दी क्योंकि गत चार वर्षो में हमारे देश के मीडिया ने मुद्दों से ध्यान भटकाने की ‘कला’ में जो महारत हासिल की है वो दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा होगी। पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में भी मार्शल लॉ, या राजसत्ता के समय मीडिया ने विरोध दर्ज किया और सत्ता पर सवाल खड़े किये, लेकिन भारत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषक इस समय पूरी कोशिश कर रहे हैं कि देश से विपक्ष और विरोध दोनों ही ख़त्म कर दिए जाएँ ताकि वे अपनी मर्जी का मनुवादी राज्य हमारे ऊपर थोप सकें।

जब मीडिया सार्थक बहस से बचता है तो हमारा कर्त्तव्य है उन प्रश्नों को उठायें जो भाड़े के तंत्र इन जानबूझकर छुपा दिए हैं। उन घटनाओं को समझने की कोशिश की जाए तो देश पर मंडराते खतरे दिखाई देते हैं जो किसी भी तथाकथित दुशमन सी ज्यादा खतरनाक और भयावह हैं। पहले घटनाक्रमों को देख लें और फिर उनसे अपने नतीजे निकालें।

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सर्वप्रथम, भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की दो प्रख्यात मंदिरों में हुई यात्राओ के दौरान उनके साथ हुई बदसलूकी पर देश के किसी भी नेता खासकर जो सरकार में है, एक भी बयान नहीं आया। देश के राष्ट्रपति को इन मंदिरों में उनकी जाति की याद दिलाई गई और जब भारत का प्रथम नागरिक इन स्थानों में सुरक्षित नहीं है तो देश के लाखो गैर द्विज इनमें अपना सम्मान प्राप्त करेंगे। देश में समरसता की बात करने वाला संघ परिवार इस मामले में चुप है। देश के नामी गिरामी बाबा जो देश के संस्कृति का बखान करते रहते हैं अचानक से चुप हैं, आखिर क्यों ? जो कहते हैं कि देश से जाति ख़त्म हो गयी है, छुआछूत मिट चुकी है वे सभी चुप हैं या मज़े ले रहे हैं।

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दूसरी घटना उत्तराखंड की राजधानी में मुख्यमंत्री के जनता दरबार में हुई जहाँ एक महिला प्राध्यापक अपने स्थानांतरण के सिलसिले में उनसे मिलने आई थी। मुख्यमंत्री महोदय उस महिला के सवाल पूछने से इतने खफा हुए कि उन्होंने महिला को तुरंत निलंबित करने और उसकी गिरफ़्तारी के आदेश दे दिये। मुख्यमंत्री का कहना था कि उनके जनता दरबार में सरकारी लोगो के स्थानांतरण से सम्बंधित कोई बात नहीं होनी चाहिए और इसके सम्बन्ध में एक नीति बनेगी।

बिलकुल बात सही है इन कहानियो के पीछे की कहानी क्या है ये भी हमें नहीं पता हालाँकि ये भी विदित है कि इन्हीं महिला को एक और भाजपाई मुख्यमंत्री ने जो कुम्भ के मेले में खूब कमाई के लिए बिख्यात हुए, ने निलंबित किया था। दोनों मुख्यमंत्रियों की पत्नियाँ भी अध्यापिकाएँ हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री की पत्नी देहरादून में पिछले 17 वर्षों से कार्यरत हैं और उनका कोई स्थानांतरण कभी नहीं हुआ। वैसे इतने पूरे वर्षों में तो भाजपा की सरकार नहीं थी लेकिन नेताओं की आपसी रिश्तेदारी तो सबको पता है, उनके कोई काम नहीं रुकते।

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तकनीकी तौर पर ट्रान्सफर क्यों नहीं हुआ या महिला पहले भी निलंबित हुई या मुख्यमंत्री या अन्य नेताओं की बीवियों के तबादले क्यों नहीं हुए, इन पर तो अवश्य चर्चा होनी चाहिए और मीडिया को इनका पर्दाफाश भी करना चाहिए, लेकिन जो एक बात मुख्यमंत्री के दरबार से दिखाई दिया वो है हमारा सामंती चरित्र। क्योंकि ऊँची आवाज में बोलना हमारे नेताओं को अखरता है और वह भी जब एक महिला आँख में आँख डाले सवाल पूछे तो अपने आप ही ‘चरित्रहीन’ हो जाती है।

वैसे भी संघ की आदर्श महिला वो है जो नौकरी भी करे तो पहले पत्नी, बहु, बेटी की भूमिका ढंग से निभाये और महीने के आखिर में सैलरी घर पर थमा दे, रोज ऑफिस से आये तो सीधे किचन में घुसे और बिना ऊफ के काम शुरू कर दे ताकि ‘परिवार’ खुश रह सके।

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अब तीसरी घटना को देखिये जहाँ आपको संघी मानसिकता के दर्शन मिलते हैं। सुषमा स्वराज जी संघ परिवार की डिक्शनरी की आदर्श महिला हैं। अभी भी परम्पराओं में ‘पूरी’ तरह से ढली हुई, सुषमाजी ने तो कर्वाचौथ के व्रत को रोमांटिक बनाकर बहुत पॉपुलर बना दिया। तीज पर उनका झूला झूलना और देश भर में हो रहे महिलाओं के अत्याचारों पर बिलकुल चुप्पी साधकर बैठना, ये संघ के अवसरवाद के उदाहरण हैं।

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जब हिंदुत्व के संगठन जम्मू में कठुआ कांड के आरोपियों को बचाने के लिए सड़क पर आ रहे थे और एक मासूम लड़की के पक्ष में लड़ रही एक बहादुर महिला को बायकाट करने की धमकी दे रहे थे, तब भी सुषमाजी चुप थीं, लेकिन पाकिस्तान के कुछ बीमार बच्चो को और लखनऊ में एक हिन्दू मुस्लिम जोड़े को पासपोर्ट बनाने के मामले में जो त्वरित कार्यवाही उन्होंने की, उस पर उनकी पार्टी के ऑनलाइन भक्तों ने उन्हें ही ट्रोल करना शुरू कर दिया।

सुषमा जी जैसी महिला, जिसने हिंदुत्व के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान किया हो, आज उनके ही ऑनलाइन गुंडों की गालियाँ खा रही हैं। अगर उनके ट्विटर हैंडल पर गालियाँ देखें तो उनके पति स्वराज कौशल को लिखा जा रहा है कि अपनी पत्नी की जमकर पिटाई करें, लेकिन सिवाय राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी के एक भी मंत्री ने उनके बचाव में एक शब्द नहीं कहा है, उसमें भी नितिन गडकरी ने केवल यही कहा कि सुषमा जी तो भारत में थी ही नहीं, जब ये निर्णय लिया गया।

मतलब ये कि इन्टरनेट के गुंडों को कुछ भी कहने से डर रहे भारत सरकार के मंत्री और भाजपा के नेता, क्योंकि ये ही अब उसके काडर हैं और इन्हीं की लगातार क्लास अमित शाह लेते हैं। अभी तक इतनी मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुईं हैं, जिसमें इतने मासूम मारे गए हैं महाराष्ट्र से लेकर त्रिपुरा, बिहार, बंगाल, तेलंगाना, आंध्र और ओडिशा तक, लेकिन भारत सरकार का मौन है।

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जब पिछले एक हफ्ते में करीब 21 लोग भीड़ ही हिंसा का शिकार हो गए, जिसमे पांच लोग महाराष्ट्र के धुले में बच्चा उठाने के आरोप में मारे गए तो दुनिया भर में बदनामी से डरने के लिए सरकार के मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि व्हाट्सएप को कुछ करना चाहिए।

व्हाट्सएप या ट्विटर तो कोई भी काम करेंगे अगर सरकार चाहे तो और उससे ज्यादा जो लम्पट काडर है, जिसको सारे नेता आशीर्वाद दे रहे हैं, क्योंकि भाजपा ये मान चुकी है कि सोशल मीडिया का ये लम्पट काडर ही चुनावों में उसकी नैय्या पार लगाएगा।

संघी भूल गए अटल जी के शब्द

राजनीति में मतभेद होते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए, ये अटल जी के शब्द हैं, परन्तु आज जिस तरीके से विरोधियों और आपसे मतभेद रखने वालों से निपटने के तरीके ढूंढे गए हैं वे निहायत निंदनीय और देश को खतरे में डालने वाले हैं। अगर इन घटिया हरकतों के लिए कोई पार्टी अपने कार्यकर्ताओ के खिलाफ कार्यवाही नहीं करती या उसके नेताओं के पास उसकी निंदा के शब्द नहीं है तो इसका साफ़ मतलब है कि ये जानबूझकर प्रोत्साहित किये जा रहे हैं।

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अभी एक महारथी ने जिनके ट्विटर हैंडल पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की धनुर्धारी तस्वीर थी, उन्होंने कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी की बेटी से बलात्कार कर डालने की धमकी खुले तौर उन्हें दे डाली। प्रियंका ने पुलिस में रिपोर्ट करवाई है लेकिन अभी तक सरकारी और संस्कारी पार्टी के एक भी नेता ने इस पर कुछ नहीं बोला है।

भारत में हिन्दुओं का नेतृत्व करने वाले संघ की चुप्पी तो हम सबको पता है कि जिंदगी भर उन्होंने कभी भी जातिप्रथा के खिलाफ बात नहीं की और न ही कभी महिला हिंसा पर कुछ बोला। मुझे इन शब्दों को लिखने में भी अफ़सोस होता है लेकिन क्या करें। यदि हम सब इस दौर में चुप रहे और अन्याय के खिलाफ नहीं बोले तो ये देश किसी का नहीं रहेगा।

बलात्कार का भी भाजपा और संघ परिवार ने संप्रदायीकरण किया

देश भर में बलात्कार की बढ़ती घटनाओं का भी भाजपा और संघ परिवार ने संप्रदायीकरण किया। कठुआ हुआ तो गुंडों के पक्ष में नारे लगवाए। मंदसौर में क्योंकि अपराधी मुसलमान है तो भाजपाई उसे तुरंत फांसी पर लटकाने के लिए कहते हैं और आरोप लगाते हैं कि ‘सेक्युलर’ लोग अब कैंडल लाइट मार्च क्यों नहीं निकालते। मंदसौर की घटना को वे कठुआ की काट मानकर लगे हुए हैं लेकिन मैं तो उनके नेताओं से सवाल करना चाहता हूँ कि उन्नाव के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर अपनी ही राजपूत जाति की लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगा और एक भी नेता कुछ नहीं बोला। शर्मनाक बात तो ये कि नेता के समर्थन में लोग सडको पे आये।

राजपूतों को फर्जी विषयों में तो अपने समुदाय की इज्जत याद आती लेकिन अपने समाज की एक गरीब लड़की का विधायक द्वारा किया गया शोषण उनके समाज के लिए कोई सवाल नहीं बना।

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उन्नाव की घटना को इसलिए दबाया गया है क्योंकि ये हिंदुत्व के राष्ट्रवाद की पोल खोल सकती है। कठुआ और मंदसौर सेकुलरों और हिन्दुत्ववादियों के अपने अजेंडे में फिक्स होने वाली कहानियाँ हैं इसलिए शोर है। सवाल है कि उन्नाव को लेकर क्यों संघ को और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को कटघरे में खडा किया गया जिसने अपराधी को बचाने की पूरी कोशिश की।

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मेरे एक मित्र ने बरसों पहले आर एस एस का मतलब रयुमर स्प्रेअडिंग सोसाइटी रख दिया। लेकिन आज हम जो स्वरूप देख रहे हैं वो बेहद भयावह और डरावना है। व्हाट्सएप पर कोई भी कहानी बनाकर आप किसी के खिलाफ ही जो भीड़ तंत्र के न्याय को केवल अपनी राजनीतिक रोटिया सेंकने के लिए जो आगे बढ़ा रहे हो वो देश के ताने-बाने को नष्ट कर देगा, जो आज़ादी के बाद बेहद मुश्किलों के बाद हमने बनाया था। इतने बड़े देश में व्यापक धार्मिक, भाषाई और जातीय विविधताओं को स्वीकारते हुए हमने सबके लिए एक कानून बनाया ताकि देश एक रहे।

आज़ादी के वक़्त जवाहर लाल नेहरू का प्रदेश और जाति बिलकुल ऐसी थी कि अगर वह चाहते तो भारत को हिन्दू राष्ट्र बना सकते थे, लेकिन उन्हें पता था कि इसके कितने खतरनाक नतीजे हो सकते हैं।

पत्रकार जब चारण हो जाए तो समझ लीजिये देश पर संकट है

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आज सत्ता में रहने वाले लोग पिछले चार वर्षों में उनकी सरकार के लगातार असफलताओं को छुपाने के लिए फिर से उन्हीं मुद्दों को खडा कर रहे हैं, जो केवल इमोशन पर आधारित हैं। धर्म और जाति या इतिहास से गड़े मुर्दों को खोद-खोद कर निकालकर ये लोग अपने झूठे वादे और विकास की आड़ में मनुवादी संस्कृति थोपकर केवल दो चार गुजराती पूंजीपतियों के हाथ हमारे देश की सम्पति को सौंप देना चाहते हैं। देश की उर्जा, सम्पति, संस्थान जब इन व्यक्तिगत मुनाफाखोरो के पास जाता है, बैंक जब डूबने को तैयार बैठे हैं लेकिन ये बड़े बड़े चोर फोर्ड की लिस्ट में आते हैं, मीडिया उनके बच्चों की शादियों को दिखाकर मध्यवर्ग की लालसा को बढाता है, लेकिन उनको सवाल करने को नहीं कहता। पत्रकार जब चारण होते हैं और मालिक का महिमामंडन कर जनता को भ्रमित करते हैं तो समझ लीजिये कि देश पर संकट है।

देश में आग लगाने का षड़यंत्र

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इस देश में जो आग लगाने का आज षड़यंत्र चल रहा है उसका मुकाबला सभी लोगो को एकता से करना होगा। एक समाज को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके, आत्म सम्मान के साथ खड़े लोगो विशेषकर महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन गुंडागर्दी को आगे बढ़ाकर एक सन्देश दिया जा रहा है कि या तो चुप रहिये या मार खाइए और यदि आप फिर भी नहीं डरते तो फिर तंत्र आपको डराएगा। आजकल उसके भी अनेकों तरीके हैं। भाड़े का मीडिया है, खबरें पकाई जायेंगी, तड़का लगेगा और अन्य कई तरीकों से आपकी मौत के इन्तेजाम हैं। ये सब भी झेल लिया तो बदनाम करने के तरीके बहुत से हैं।

स्थिति बहुत गंभीर है और जो लोग आपातकाल चिल्ला रहे हैं वे आज के दौर को बहुत हलके में ले रहे हैं। आपातकाल में एक दूरदर्शन था और मीडिया का अशिकांश हिस्सा झुक चुका था लेकिन फिर भी वो इतने बदतमीज नहीं हुए थे जितना आज का मीडिया हो चुका है। हम लोग ऐसी पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहते हैं जो चरित्र हनन और सेंसेशन पैदा करते हैं लेकिन आज के दौर की पत्रकारिता तो पूरी तरीके से गेरुआ हो चुकी है और आकाओं के आगे नतमस्तक है।

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देश की संस्कृति के ‘रक्षक’ चुप हैं। वो अपने लोगों को हथियार देकर लड़ना सिखा रहे हैं। शायद भूल रहे हैं कि बन्दूक से आप न तो कभी लक्ष्य तक पहुँचेंगे और न ही कोई बदलाव कभी आया। दुनिया में हिंसा के कारण बदलाव लाने वाले मिट गए और मिटा दिए गए। बुद्ध, कबीर, नानक, रैदास, आंबेडकर, फुले, भगत सिंह, राहुल संकृत्यायन का देश और संस्कृति सवाल पूछेगी और वैचारिक क्रांति करेगी। देश में आने वाले बदलाव से जिनके तख़्त ताज हिलेंगे वो ही बन्दूक और हिंसा की बात करते हैं।

देश की सत्ता पर काबिज अल्पसंख्यक आज बहुजन समाज में आ रहे बदलाव और जागरण से घबराये हुए हैं, क्योंकि बाबा साहेब आंबेडकर और तर्क के अन्य योद्धाओं के विचारों की पैनी धार से बहुजन समाज आज राजनीतिक तौर अपनी लड़ाई लड़ रहा है और ब्राह्मणवाद का वैकल्पिक सांस्कृतिक धरातल खड़ा कर रहा है। जिनके पास तर्क नहीं है और दिमाग पर अंधभक्ति का पर्दा पड़ चुका है वे न कोई बदलाव कर सकते और न ही उसको सहन कर सकते। इसलिए तर्क के योद्धाओं को यथास्थितिवादी, सामंतवादी, पूंजीवादी और पुरोहितवादी पितृसत्तातामक ताकतों का जमकर विरोध करना पड़ेगा तभी हम एक नए प्रगतिशील भारत का निर्माण कर पाएंगे।

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