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दिहाड़ी मजदूरों से भी बुरी हालत है निजी संस्थाओं के कर्मचारियों की, अच्छे दिनों में अभी और बढ़ेगा शोषण

नई दिल्ली (चरण सिंह राजपूत)। जो लोग यह समझते हैं कि पढ़ा लिखा व्यक्ति (Educated person) इसलिए मजदूरी (wage) नहीं कर सकता क्योंकि मजदूर (labourer) को बहुत काम करना पड़ता है। वे लोग इस सोच में थोड़ा सुधार कर लें। आज की तारीख में निजी संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों मजदूरों से भी अधिक काम करना पड़ रहा है। ये सब एक से एक बढ़कर डिग्रियां हासिल किये हुए हैं। यह हम नहीं कह रहे यह नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (National Sample Survey Organization) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट कह रही है। मतलब निजी संस्थाओं में कर्मचारियों का जमकर शोषण (exploitation of employees,) हो रहा है।

जो लोग यह समझते हैं कि नौकरी पेशा व्यक्ति अपनी जिंदगी को पूरी तरह से एन्जॉय करता है। वे लोग अब अपनी इस गलतफहमी को दूर कर लें। अब ऐसा नहीं रहा है। शासन प्रशासन में भी धंधेबाज लोग बैठ गए हैं। निजी संस्थानों के मालिकों के शासन और प्रशासन में पैठ होने के चलते नौकरीपेशा लोगों से 10-12 घंटे तक की ड्यूटी तक ली जाती है। ऐसा भी नहीं इसका कोई ओवर टाइम मिलता हो। यह सब राजनेताओं ब्यूरोक्रेट और पूंजीपतियों के गठबंधन के चलते हो रहा है।

स्थिति यह है कि अधिकतर ऑफिसों में चपरासी का काम भी स्टाफ से ही लिया जाता है। इस शोषण को अनदेखा कर मीडिया भी इसमें भागीदारी निभा रहा। है यदि कहीं पर थोड़ा बहुत विरोध होता है तो उसे दमन के बल पर दबा दिया जाता है।

NSSO के इस रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ है कि देश में नौकरीपेशा लोगों को सबसे ज्यादा काम करना पड़ता है। हम अब तक यह मानकर चलते थे देश में किसान और मजदूर सबसे अधिक काम करते हैं। नौकरीपेशा लोगों की दुर्गति अब किसान और मजदूर से बदतर हो गई है।

नौकरीपेशा लोगों के शोषण में वृद्धि उस समय हुई जब 1999 में वाजपेयी सरकार बनी और श्रम कानून संशोधन किया गया। 2014 में जब मोदी सरकार बनी तो उद्योगपतियों के हौसले फिर से बुलंद हो गए। मोदी सरकार पिछली बार ही श्रम कानून में संशोधन कर कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती करने वाली थी। क्योंकि राज्य सभा में सरकार अल्पमत थी तो सरकार मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए। पर इतना जरूर हो गया व्यापारियों ने कर्मचारियों का शोषण शुरू कर दिया।

बेरोजगारी और परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से युवाओं की मज़बूरी इस शोषण को झेलनी की हो गई है।

अक्सर यह माना जाता है कि नौकरीपेशा व्यक्ति सप्ताह में 5 दिन ड्यूटी करता है। एक दिन का साप्ताहिक अवकाश सप्ताह में एक दिन की कोई छुट्टी पड़ जाती है। कई ऑफिसों में तो रविवार और शनिवार की छुट्टी होती है। श्रम कानून के हिसाब से 8 घंटे की ड्यूटी होती है। इसमें 40 मिनट का लंच का समय होता है। मतलब ड्यूटी में 7 घंटे काम होता है। ऐसे में सप्ताह में 35 घंटे बैठते हैं। यदि सप्ताह में मात्र एक साप्ताहिक अवकाश ही माना जाये तो सप्ताह में 42 घंटे की ड्यूटी बैठती है।

आज की तारीख में नौकरीपेशा व्यक्ति को सप्ताह में औसतन 60 घंटे काम करना पड़ रहा है। मतलब 10 घंटे प्रति दिन। जबकि मजदूर हर सप्ताह 49 घंटे और स्वरोजगार में लगे शहरी लोग 58 घंटे काम करते हैं। महिलाओं को तकरीबन 52.7 घंटे काम करना पड़ता है।

जो मजदूर गांव की मजदूरी छोड़कर शहरों की आकर्षित हो रहे हैं उनको भी गांव की अपेक्षा ज्यादा काम करना पड़ता है। NSSO ने इस रिपोर्ट में यह भी जानकारी मिली है कि ग्रामीण मजदूर सप्ताह में 48 घंटे काम करता है, जबकि शहरों में यह काम बढ़कर 56 हो जाता है। मतलब गांवों जिंदगी शहरों से सुकून की है। ग्रामीण मजदूरों की तुलना में शहरी मजदूरों से ज्यादा काम लिया जाता है। शहरों में नौकरी पेशा महिलाएं सप्ताह में 50 घंटा काम करती हैं।

समझने की जरूरत यह भी है कि नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के ये आंकड़े वर्ष 2017-18 की चार तिमाहियों के दौरान एकत्रित किए थे। जिस तरह से जानकारियां मिल रही हैं उसके हिसाब से जल्द ही राज्य सभा में भी भाजपा का बहुमत हो जायेगा। उसके बाद मोदी सरकार श्रम कानून में संसोधन करने जा रही है। जिसमें श्रमिकों के अधिकारों में और कटौती करने की बातें सुनने में आ रही हैं।

मतलब नौकरीपेशा लोगों का शोषण अभी और बढ़ेगा। मतलब कर्मचारियों को बंधुआ बनाने की तैयारी है।

CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

हमारे समाज में शिक्षक, पत्रकार और वकील को बुद्धिजीवी माना जाता है। ये लोग देश का मार्गदर्शन करने वाले बताये जाते हैं। यदि आप सर्वे करें तो सबसे अधिक शोषण इन्हीं लोगों का हो रहा है। जहां निजी स्कूलों में 5-6-8 हजार रूपए में शिक्षक नौकरी करने को मजबूर हैं वहीँ मीडिया समूह में 10–12-15-18- 20 हजार रुपए प्रति माह पर अधिकतर पत्रकार परिवार पालने को मजबूर हैं। जिला स्तर पर तो मानदेय के नाम पर 2-4 हजार रुपये प्रति माह पर अनगिनत पत्रकार अपनी जीविका चला रहे हैं। स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया गया।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या फिर समाजवादियों की सरकारों में कर्मचारियों का शोषण नहीं हुआ है। क्योंकि ये दल आंदोलन से निकले हैं इसलिए इनकी नीतियों और एजेंडे में कहीं न कहीं आम आदमी के लिए स्पेस है। क्योंकि देश का संविधान इन लोगों के बड़ों ने बनाया था तो उसके प्रति इन लोगों के मन में सम्मान है। यही वजह है कि ये लोग कहीं न कहीं किसान मजदूर और कर्मचारियों के लिए दिखावे के लिए ही सही कुछ न कुछ करते रहते हैं। नियमों को कुछ टाइट करते रहते हैं।

जो लोग आज की तारीख में देश की सत्ता पर काबिज हैं। इन लोगों का इतिहास शोषण का साथ देने का रहा है। अंग्रेजों हुकूमत में भी ये लोग अंग्रेजों के पैरोकारी कर रहे थे। यह वजह है कि भाजपा बनियों की पार्टी मानी जाती है। जब व्यापारी तबके का पार्टी पर होल्ड है तो शोषण तो होगा ही। वैसे भी आज की तारीख में गुजरात के दो व्यापारी देश पर राज कर रहे हैं।

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