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Kabir कबीर

अपने युग की जन-विरोधी सामाजिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया कबीर ने

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समाज में अपने जीवन का अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है। यह संघर्ष उसे मानव से भी करना पड़ता है और प्रकृति से भी। फल-स्वरूप उसे नाना प्रकार के अनुभव होते हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, सांस लेते हैं, जिस परिवेश को जीते हैं, उससे अनभिज्ञ कैसे रह सकते हैं ? हर व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों के दौर से गुजरता है। ये अनुभव सुखद भी होते हैं और दुखद भी होते हैं। अर्थात जीवन में अच्छाईयों और बुराईयों का समावेश होता है। हमें जो अनुभव होता है वही यथार्थबोध है।

डॉ. विजय विशाल का आलेख समाज के यथार्थबोध में कबीर

Dr. Vijay Vishal’s article Kabir in the realization of society

सामाजिक यथार्थ यानि कि राजनीतिक, धार्मिक, वैयक्तिक, मनोवैज्ञानिक आदि यथार्थों से इतर का यथार्थ और समाज केन्द्रित सत्य (Society centered truth)।

यथार्थ एक ऐसा रूप है जो प्रत्येक युग की वास्तविकाता का बोध कराता है। जिस साहित्य में अपने युग का सत्य चित्रण होता है वही श्रेष्ठ साहित्य बन सकता है। वेद इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

वेदों की ऋचाओं में तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्रण हुआ है। भले ही वह आदर्श न हो। इसलिए आज तक उनका महत्व बना हुआ है। इसी भांति रामायण और महाभारत में जटील मानव जीवन की समस्याओं को सुलझे हुए रूप में चित्रित किया गया है। कालिदास के साहित्य में नारी के अधिकारों के लिए मार्मिक वेदना दृष्टिगत होती है।

इस प्रकार आदिकाल से सामाजिक यथार्थ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। एक यथार्थवादी साहित्यकार मानव जीवन और मानव समाज के आदर्शपरक और कल्पित स्वरूप की उपेक्षा करके अपनी रचनाओं में केवल यथार्थ चित्रण पर बल देता है। भले ही वह यथार्थ कुरूप हो, हीन हो। यथार्थ का अर्थ वस्तुस्थिति के यथा-तथ्य चित्रण से लगाया जाता है जबकि यथार्थ सत्यानुभूति से प्रेरित चित्रण होता है।

हर तथ्य यथार्थ नहीं होता, तथ्य और यथार्थ में भेद होता है।

Every fact is not real, there is a difference in fact and reality.

आकस्मिकता से पैदा हुआ तथ्य वास्तविकाता हो सकती है, पर यथार्थ नहीं। यथार्थ इतिहासजन्य परिस्थितियों की देन है। उसमें आकस्मिकता या घटनात्मकता  का सिर्फ आंशिक योगदान हो सकता है। पर समय की निर्मम सच्चाईयों और चुनौतियों से संघर्ष करना ही यथार्थ है। वह चुनौतियां परम्परागत सत्यों के प्रति अस्वीकृति के रूप में भी उपस्थित हो सकती है और कट्टर विश्वासों एवं रूढि़यों के प्रति अविश्वास की भावना से पूर्ण भी हो सकती है। इसमें व्यक्ति का मूल संघर्ष समकालीन जीवन सत्यों को पूर्ण ईमानदारी के साथ ग्रहण करना होता है।

इस प्रकार यथार्थ में जहां एक ओर पूर्ण ईमानदारी के कारण युगीन सत्यों को ग्रहण करना होता है वहीं दूसरी और उसमें सामाजिक संघर्ष की भावना भी अंतर्निहित होती है।

कबीर भी यथार्थवादी हैं। Kabir is also realistic.

कबीर के साहित्य में भी समाज की वास्तविकता का यथार्थ चित्रण मिलता है। हालांकि कुछ लोग कबीर की भक्ति और सामाजिकता में विरोध देखने के अभ्यस्त रहे हैं। यह ऊपरी और सतही दृष्टिकोण है। वास्तव में वे दोनों उनकी अनुभूतियों में इतनी बारीकी से घुली-मिली हैं कि उन्हें अलग करना बड़ा कठिन है। उनकी आध्यात्मिक या रहस्यवादी कही जाने वाली उक्तियों में सामाजिक यथार्थ का तीव्र बोध है, तो सामाजिक कही जाने वाली उक्तियों में उनकी आध्यात्मिक चिंता है।

कबीर के दोहों, पदों और उलटबाँसियों में कदम-कदम पर सचेत आलोचनात्मक तेवर मिलते हैं। खण्डन-मण्डन की प्रक्रिया में भी उनकी यथार्थ पर पकड़ हमेशा बनी रहती है।

कबीर थे तो रामभक्त ही, पर उनके राम का अर्थ ’आना’ (अन्य) है जिसके आधार पर उन्होंने तुलसी की तरह किसी ’रामराज्य’ का यूटोपिया निर्मित नहीं किया। अपने परम-प्रिय से मिलने की घोर बेचैनी के बावजूद उन्होंने मोक्ष की इच्छा नहीं की। उनकी भक्ति के केन्द्र में उनका देखा-सुना परिवेश है जिसके अन्तर्विरोधों से वे अक्सर जूझते रहते हैं।

कबीर अभाव और दरिद्रता में पले थे। इसलिए उनकी ईश्वरीय चिन्ता में यही सच मौजूद रहता है। उन्होंने कहा, ’अमीरों के पास लाखों घोड़े और हाथी हैं, परन्तु गरीब अपने घर में ’मुरारी’ का निवास समझकर प्रसन्न है। कबीर के लिए मुरारी और राम दूसरे रूप में आये थे- ’गरीबनेवाज’ के रूप में। उन्होंने बार-बार यही जताया कि गरीब ही ईश्वर का रूप है।

गरीब के साथ किसी की सहानुभूति न देखकर कबीर दुःखी थे। मध्ययुग की यह राजनीतिक अवधारणा कि राजा ईश्वर का अवतार है, कबीर को मान्य नहीं थी। वह हैरान थे कि यदि राजा ईश्वर का अवतार है तो समाज में गरीबों का शोषण क्यों होता है।

कबीर ने अपनी खुली आँखों से जिस समाज को देखा था उसमें कई वर्ग और उपवर्ग थे। उसमें प्रमुख थे-सरदार और राजकर्मचारी, गाँव के अमीर, ब्राह्मण और उलेमा। ये वर्ग उसी अन्न पर आश्रित थे जिसकी वसूली किसानों से निर्ममतापूर्वक होती थी।

किसान के दुख दर्द पर कबीर

कबीर शोषण के दुष्चक्र को देखकर आतंकित हैं। जब पटवारी द्वारा उन्हें सताया जा रहा था तो उन्होंने गुरु से त्राण पाने के लिए अपने दोनों हाथ उठाये। उन्होंने ’पंच’, ’पंचे’, ’पंचकिसान’ आदि शब्दों का भी इस्तेमाल किया है जिससे पता चलता है कि उस समय पंचायती व्यवस्था थी, जो पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी थी। गाँवों की जिन्दगी कुछ इस कदर बदहाल हो चुकी थी कि कबीर उसे छोड़ने को विवश हो चले थे-

बाबा अब न रहब इह गाउ।

घरी-घरी का लेखा माँगै काइथु चेतु नाउ।

धर्मराय जब लेखा माँगै बाकी निकसी भारी।

प्ंाच कृसनवा भागि गए लै बाध्यौ जीउ दरबारी।।

इस विवशता में मध्यकालीन ग्रामीण जीवन का त्रासद यथार्थ (Tragic reality of medieval rural life) है, वह आज के गाँव की स्थिति से कुछ भिन्न नहीं है। क्या कारण है कि आज गाँव में सर्वाधिक प्रतिभा-पलायन हो रहा है ? जातिवाद, छूआछूत, सामन्तीय आतंक, बेरोजगारी, आदि समस्याओं ने गाँवों को तबाह कर रखा है। वहाँ के खेतिहर मजदूर, शिक्षित बेरोजगार युवक शहरों की ओर भागने के लिए बाध्य हो रहे हैं। निम्नमध्यवित्तीय परिवारों से सचेतन युवक-युवती अपनी संभावनाओं की तलाश में शहरों की भीड़ बढ़ा रहे हैं।

कबीर एक जगह कहते हैं-’मैं दीवान तक पहुँच नहीं सकता। एक मुझे बांधता है और एक मारता है। गाँव का ठाकुर खेत को बढ़ाकर नापता है और ’काईथ’ ज्यादा लगान वसूल करता है-

गाँई कु ठाकुर खेत कु नेपै, काईथ खरच न पारै।

जोरि जेवरी खेति पसारै, सब मिलि मोकौं मारे हो राम।

खोटो महतौ बिकट बलाही, सिर कसदम का पारै।

बुरौ दीवांन दादि नहिं लागै, इक बाँधै इक मारे हो राम।।

इन पंक्तियों में कबीर ने जैसे किसानों के दुःख को आत्मसात कर लिया है। दुःख-भार से पथराये गूँगे किसानों के आर्त्तनाद को उन्होंने अपनी अन्तर्व्यथा में स्थान दे दिया है। वे बुनकर तो थे ही, उन्हें किसानों के जीवन का भी अच्छा अनुभव था।

कबीर की दुःखानुभूति ही अधिक परिपक्व होकर उनकी रचनाओं में व्यंग्य की सृष्टि करती है। एक पद में वे कपटी और धोखेबाज मन को संबोधित करते हैं। इस संबोधन में व्यावसायिक मनोवृति की जो तस्वीर बनती है, वह बड़ी विश्वसनीय है-

मन बनियाँ बनिज न छोड़ै।

जनम-जनम का मारा बनियाँ, अजहूँ पूर न तोलै।

पासँग के अधिकारी लैले, भूला-भूला डोलै।

घर में दुविधा कुमति बनि है, पल-पल चित तोरै।

कुनबा वाके सकल हरामी, अमृत में विष घोलै।।

व्यावसायिक बुद्धि के प्रपंच और धोखाधड़ी का इससे बढि़या चित्रण उस युग के कवियों में खोजने से भी न मिलेगा। साधारण जनता के दुःख-दर्द से उद्वेलित होकर कबीर ने जो व्यंग्य किया है, वह अत्यंत आक्रमक है। इससे वणिक वर्ग का विद्रूप खुलकर सामने आता है।

इस तरह हम देखते हैं कि कबीर ने अपने युग की जन-विरोधी सामाजिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया है। उस काल की अधिकांश विसंगतियों का ठोस आधार वर्णाश्रम धर्म की मान्यता थी। इसके कारण अनेक सामाजिक-कुरीतियों, धार्मिक पाखण्डों, अंधविश्वासों, जातिवाद, छुआ-छूत, ऊँच-नीच आदि जैसे अगतिशील भावनाओं को ठोस आधार मिल रहा था। समाज का एक विशाल जन-समुदाय वर्ण एवं जाति के आधार पर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से भी सभी अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। इस विशाल जन-समुदाय की मुक्ति का पक्ष लेकर कबीर ने हिन्दू वर्ण-व्यवस्था पर करारी चोट करते हुए कहाः-

’तू बामन बामनि का जाया, आन बाट ह्वै क्यों नहिं आया।’

यही नहीं, उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा फैलायी गयी छूत-अछूत की भावना को चुनौती देते हुए अत्यंत क्षोभ से कहाः-

काहे को कीजै पण्डे छोति विचारा। छोतिहि ते उपना संसारा।।

हमारे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध। तुम कैसे बामन पाण्डे हम कैसे सूद।

छोति छोति करता तुमही जाए। तो गर्भवास काहे को आए।।

वे साफ-साफ शब्दों में पूछते हैं कि अरे, पंडित तू छूत-अछूत की बात क्यों करता है ? छूत अथवा स्पर्श से ही यह संसार पैदा हुआ है। दो के संयोग से ही यह सृष्टि बनी है। सबमें एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है। अतः हमारा शरीर खून से और तुम्हारा दूध से कैसे बना हो सकता है। समान तत्वों से निर्मित शरीर पाकर तुम किस प्रकार ब्राह्मण और हम अछूत हो सकते हैं ? छूत से तुम्हें बचना था तो इतने समय तक गर्भ में क्यों वास किया ? वह तो सबसे अछूत जगह है।

इस प्रकार कबीर ने अनेक तर्कसंगत उक्तियों द्वारा शास्त्र-पुराण मतवादी, ब्राह्मणवाद को पहली बार गम्भीर चुनौती दी। इस ब्राह्मणवाद का आधार शास्त्र और अनेक विध शास्त्रीय कर्मकाण्ड थे, जिन पर कबीर ने खुलकर चोट की है। वेद, स्मृति, पुराण आदि की शास्त्रीय मान्यताओं के छù में जिस वर्णवादी झूठी मर्यादा को लोक जीवन पर थोपा गया था, उसे कबीर ने साहसपूर्वक अस्वीकार किया। संध्या, गायत्री, व्रत, तीर्थ, छापा-तिलक, पूजा-अर्चना आदि धर्म के बाह्य विधानों की निरर्थकता को उन्होंने अत्यंत तर्कसंगत ढंग से रेखांकित किया है। शास्त्र मतवादी तत्कालीन ब्राह्मण वर्चस्व वाले संभ्रांत समाज के सामने उनकी यह गम्भीर चुनौती थी-

मैं कहता आँखिन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।

आत्मानुभूत सत्य के अतिरिक्त किसी भी सत्य को अस्वीकार कर कबीर ने शास्त्र-सम्मत मान्यताओं पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया।

हिन्दू धर्म के पाखण्डों के साथ ही कबीर ने इस्लाम धर्म के बाह्याचारों पर भी जमकर आघात किए। उन्होंने नमाज, रोजा जैसे बाहरी क्रिया-कलापों की आड़ में फैलाए जा रहे हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की निन्दा की है। इसी तरह कबीर ने अपने युग तमाम सारी धार्मिक-सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हुए मनुष्य मात्र की एकता का संदेश दिया है। कबीर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए, अपनी रमैनी, शब्द और साखियों के माध्यम से, भक्ति का एक सर्वसम्मत मार्ग प्रस्तुत किया। यह मार्ग था निर्गुण निराकार की उपासना का जो दीन-हीन और असहाय समझी जाने वाली जनता के लिए बिना किसी भेद-भाव के उन्मुक्त था। तमाम सारी दलित और अछूत जातियों के लिए भक्ति का द्वार खोलना कबीर का एक महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य था। अतः उनके निर्गुण मत में समानता पर आधारित निम्नजातीय धार्मिक जनवाद की घोषणा अपने समय के लिए एक क्रांतिकारी संदेश था, जो व्यक्ति की आध्यात्मिक मुक्ति से लेकर उसकी सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक मुक्ति के साथ ही जुड़ता था।

अपने समय के सामाजिक यथार्थबोध के कारण ही कबीर ने काजी-मुल्ला और पण्डित-पुरोहित दोनों को फटकारते हुए राम-रहीम की एकता के माध्यम से हिन्दू-मुस्लिम की एकता का संदेश दिया। वह ईश्वर को मंदिर-मस्जिद की कैद से बाहर निकालकर, बाहरी कर्मकाण्डों के घेरे से मुक्त कर जीवन के खुले क्षेत्र में ले आए। उनकी यह भावधारा उपेक्षित जनसाधारण में फैली। निम्नजातियों में आत्मविश्वास और आत्मगौरव की भावना का उदय हुआ। परिणामस्वरूप आगे चलकर अनेक संत-महात्मा और कवि-कलाकार सामने आए।

चाहे विवशता में ही सही, अभिजात्य वर्गाें को भी उनकी महत्ता को स्वीकार करना पड़ा। लेकिन सब मिलाकर उच्चवंशीय शासक-शोषक सत्ता को यह सब नागवार गुजरा। इसी क्रम में उत्तर भारत में निर्गुण मत के विरूद्ध सगुण मत का उदय हुआ। दोनों में एक लम्बे संघर्ष के बाद अंततः तुलसीदास के माध्यम से सगुणमत की विजय हुई। निर्गुणमत पराजित हुआ। इस जय-पराजय के आधार पर किसी भावधारा या विचारधारा के सही या गलत अथवा प्रासंगिक या अप्रासंगिक होने का निर्णय नहीं किया जा सकता। सगुणमत को उच्चवंशीय संस्कारशील वर्गों की स्वीकृति प्राप्त हुई। तत्कालीन सामंती सामाजिक संरचना में वह वर्ग ही अधिक प्रभावशाली था।

यह भी एक सामाजिक यथार्थ है कि प्रभावशाली वर्ग की स्वीकृति ही एक युग-विशेष में सामाजिक स्वीकृति बन जाती है। इस तरह अपने पूरे सहीपन और प्रासंगिकता के बावजूद कबीर की भावधारा को मुँह की खानी पड़ी।

लेकिन कहा जा सकता है कि अपनी पराजय के बावजूद कबीर का साहित्य और उनका निर्गुण मत अपने युग के लिए उतना ही प्रासंगिक था जितना प्रासंगिक आज है। कबीर साहित्य की प्रासंगिकता इस बात में है कि उन्होंने अपने समय के सामाजिक यथार्थबोध को आगे बढ़ाया। देश की बहुसंख्यक शोषित-उत्पीडि़त जनता के संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया, उसे आगे बढ़ाया। तत्कालीन परस्पर विरोधी सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियों के संघर्ष में बहुसंख्यक प्रगतिशील शक्तियों का साथ दिया। कबीर ने अपने साहित्य से यह सिद्ध कर दिया कि जो व्यक्ति खुद को बहुसंख्यक साधारण जनता के कष्टों से, उसके वास्तविक हितों से जोड़कर अपने युग के वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेता है, वही श्रेष्ठ और प्रासंगिक साहित्य की रचना कर सकता है।

दरअसल, यथार्थबोधता का सम्बन्ध किसी युग-विशेष की प्रगतिशील चेतना के साथ जुड़ा हुआ है, उस चेतना के साथ जो सामाजिक विकास के मार्ग को प्रशस्त करती है, उसे सही दिशा प्रदान करती है। कबीर-युगीन सामंती समाज दो मुख्य वर्ग-समुदायों में विभक्त था। इनमें एक ओर मुटठीभर भूस्वामी-सामंतों और उनके निजी क्रियाकलापों से जुड़े हुए कुछ थोड़े से लोगों का वर्ग था तो दूसरी ओर किसान-मजदूर और उनके साथ जुड़े हुए कारीगरों तथा तमाम सारी पेशेवर निम्नजातियों का विशाल वर्ग था। देश की उत्पादन प्रक्रिया इन्हीं दो वर्गों की क्रिया-प्रतिक्रिया द्वारा संचालित थी।

इनमें पहला वर्ग उत्पादन-कार्य से पूरी तरह कटकर उपभोक्ता मात्र रह गया था। लेकिन दूसरा वर्ग समाज के भौतिक उत्पादन से पूरी तरह जुड़ा हुआ था। यहाँ यह ध्यान में रखने की बात है कि निर्गुण काव्यधारा के कबीर से लेकर रैदास, दादू, पीपा, दरिया, धना आदि अधिकांश संतकवि सद्गृहस्थ थे। वे बुनकर, मोची, नाई, दर्जी, धुनिया आदि अपने पेशेवर कार्य में पूरी तरह से लगे हुए थे। उसके विपरीत अधिकांश सगुण भक्त गृहस्थ जीवन का परित्याग कर उपासना के क्षेत्र में आए थे।

अतः उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना उत्पादक वर्ग से प्रायः भिन्न थी। फलस्वरूप निर्गुण और सगुण मतावलंबियों की साधारण जनता की मुक्ति से संबंधित परिकल्पनाएँ केवल भिन्न ही नहीं, अपितु सामाजिक स्तर पर परस्पर विरोधी भी थीं। कबीर युगीन सामंती समाज में भौतिक मूल्यों के सृजन की मुख्य शक्ति के रूप में शोषित-पददलित निम्नवर्गीय जन-समुदाय ही सामाजिक प्रगति की आधारभूत शक्ति थी। इस विशाल जन-समुदाय की प्रगति पर ही समाज की वास्तविक प्रगति निर्भर करती थी। अतः इसकी पक्षधरता के माध्यम से कबीर ने अपनी प्रगतिकामी चेतना का परिचय देकर अपने यथार्थबोध साबित किया है।

इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में आज हमारे सामने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की अनेक समस्याएँ अपने समाधान के लिए मुँह बाए खड़ी है। लेकिन ऐसे चुनौती भरे वातावरण में हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद विवाद के मसले ने साम्प्रदायिक कट्टरपंथ और धार्मिक तत्त्ववाद का सहारा लेकर देश को एक ऐसे विस्फोटक बिन्दु पर खड़ा कर दिया है, जहाँ से आगे उसे राह नहीं मिल पा रही है। साम्प्रदायिक विद्वेष की इस गंभीरता को आज से लगभग छः सौ वर्ष पहले रेखांकित करते हुए कबीर ने कहा था-

’अरे इन दोउन राह न पाई………..

हिन्दुन की हिन्दुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।

कहे कबीर सुनो भाई साधो कौन राह ह्वै जाई।।’

कबीर ने परम्परागत हिन्दू और इस्लाम धर्म के बाह्य कर्मकाण्डों का निषेध कर साधारण जनता के लिए सुगम मार्ग की खोज की थी। इसे साधारण जनता के सामने पूरे विश्वास के साथ उन्होंने प्रस्तुत किया थाः-

’संतो राह दुनौ हम दीठा।

हिन्दू-तुरक हटा नहिं मानै स्वाद सबन कौ मीठा।………….

हिन्दू-तुरक की एक राह है सतगुरु इहै बताई।

कहहिं कबीर सुनौ हो संतो राम न कहेउ खुदाई।।’

अपनी इस राह के लिए कबीर ने काजी-मुल्लाओं और पण्डित-पुरोहितों को झाड़-फटकार कर काम चला लिया था। लेकिन हमारे समय का सामाजिक यथार्थ कबीर के समय के सामाजिक यथार्थ से भिन्न है। आज का सामाजिक यथार्थ यह है कि आज ये काजी-मुल्ले और पण्डित-पुरोहित मस्जिद-मंदिर के अखाड़ों को छोड़ कर संसद और संविधान को अपना अखाड़ा बना रहे हैं। अतः कबीर के धार्मिक जनवाद के स्थान पर आज राजनीतिक जनवाद द्वारा ही इस समस्या का समाधान संभव है।

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