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दुनिया का सबसे बड़ा नशा है ‘विकास’, औद्योगिक क्रांति से आर्थिक विषमता बढ़ी है

Environment and climate change

पर्यावरण, मानव और मानवता को रौंदता विकास, क्या है भारत में जलवायु परिवर्तन को लेकर मिशन

दुनिया का सबसे बड़ा नशा है ‘विकास’

विवेकानंद माथने

‘विकास’ दुनिया की सबसे बड़ा नशा है। जो उसका मजा चख रहे हैं, जो नशा चखने के लिए कतार में लगे हैं और जो दूसरों को नशा चखते देखकर मानते हैं कि भाग्य साथ देगा तो उन्हें भी उस नशे का मजा चखने को मिलेगा, वह सब इस नशे से धुत्त है। जो जितना अधिक नशे में धुत्त होगा वह उतना ही अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है।

यह नशा इतना भयंकर है कि इसका जीवन पर क्या असर पडेगा यह जाने बिना लोग इसके पीछे दौड रहे हैं। दुनिया के दूसरे नशा तो शारीरिक, आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को गिराते हैं, लेकिन इसके विपरीत कुछ पाने, बड़ा होने या प्रतिष्ठित होने की झूठी मानसिकता ही ‘विकास’ नशा का आधार है। यह नशा चखने वालों को वैसे-वैसे चढ़ता है जैसे-जैसे वह कम-कम लोगों के लिए उपलब्ध होता है।

अपनी भोग लोलुपता और कभी न थमने वाली राक्षसी महत्वाकांक्षा पूरी करने वाला ‘विकास’ का नशा ऐसा भयंकर है कि मनुष्य ने अपना तो आत्मनाश किया ही है साथ ही पर्यावरण, सजीव सृष्टि और संपूर्ण मानवता को ही सर्वनाश के निकट लाकर खडा कर दिया है। 

विकास यानी भौतिक विकास

पूरी दुनिया में विकास की होड़ लगी है। विकास यानी भौतिक विकास। घर से लेकर सभी जगह शारीरिक और मानसिक स्तर पर भोगों को भोगने के लिए सारी भौतिक सुविधाएं। उसे प्राप्त करने के लिए भौतिक साधनों का निर्माण, मशीनों का निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण, युद्ध सामग्री का निर्माण अनिवार्य बन जाता है।

क्या है औद्योगिक क्रांति

घरेलू इस्तेमाल की चीजें, बड़ी इमारतें, सड़कें, पुलों का निर्माण, सभी प्रकार के परिवहन के साधन आदि का बडे पैमाने पर निर्माण किया जाता है। इसके लिए जमीन, पानी, जंगल, खनिज, सीमेंट, लोहा, कोयला, गौण खनिज, गैस, खनिज तेल, पेट्रोलियम, लकडी, बिजली, स्पेक्ट्रम, वातावरण आदि की जरूरत पड़ती है और उसे प्राप्त करने के लिए खदानें, बिजली परियोजनाएं, स्टिल परियोजनाएं, बडे बांध और अन्य उद्योंगों का निर्माण किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को औद्योगिक क्रांति नाम दिया गया है।

औद्योगिक उत्पादन प्रक्रिया और उत्पादों का उपयोग दोनों में उर्जा के उपयोग और कोयला, गैस, पेट्रोलियम पदार्थों आदि जीवाश्म ईंधन जलाने से कार्बन डाइ ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। यह गैसें सूर्य की ऊर्जा का शोषण करके पृथ्वी की सतह को गर्म कर देती हैं, इससे वैश्विक तापमान में वृद्धि और पृथ्वी पर मौसम की दशाओं में यानी कि जलवायु परिवर्तन होता है।

पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह व्यापक तौर पर अपरिवर्तनीय है। इसके कारण पर्यावरण का संतुलन बिगडने से मौसम में बदलाव जैसे चक्रीय तूफान, भारी वर्षा, बाढ़, हिमवर्षा, सूखा, तापमान वृद्धि, बर्फ पिघलना, मरुस्थलीकरण, समुद्री जलस्तर वृद्धि, जैव विविधता का ह्रास, कृषि उत्पादकता पर प्रभाव आदि बदलाव हो रहा है। वातावरण में कार्बन प्रति वर्ष 2 पीपीएम दर से बढ़ रहा है। कार्बन स्तर 2013 में 400 पीपीएम से 2017 तक 407 पीपीएम तक बढ़ा है। वैज्ञानिक कहते है कि इसे नहीं रोका गया तो केवल मनुष्य, सजीव सृष्टि ही नहीं कुछ दशकों में पृथ्वी नष्ट हो सकती है।

एक यूनिट बिजली बनाने में लगने वाले संसाधन

एक यूनिट बिजली बिजली में कितना कोयला लगता है

मोटे तौर पर एक यूनिट बिजली के लिए एक किलो कोयला, पांच लीटर पानी की आवश्यकता होती है। एक किलो कोयला जलाने से 400 ग्राम राख, 2700 किलो कैलरी उष्णता और एक किलो ऑक्सीजन खर्च होकर 1.5 किलो कार्बन डाय ऑक्साईड वातावरण में पहुंचता है।

भारत में कोल आधारित उद्योगों में हर साल लगभग 800 मिलियन टन कोयला जलाया जाता है। जितना कोयला उतना ही ऑक्सीजन खर्च होकर 1200 मिलियन टन कार्बन डाई आक्साइड, 320 मिलियन टन राख और 2160 खरब किलो कैलरी उष्णता वातावरण में पहुंचती है। दूसरे उद्योगों से होने वाले प्रभावों को जोडा गया तो यह प्रभाव और अधिक बढ़ेगा।

औद्योगीकरण के इतने भयंकर परिणाम दिखाई देने के बावजूद भारत उसी होड़ में शामिल हो गया है। घरेलू भौतिक उपभोगों की वस्तुओं, वाहनों, इंफ्रास्ट्रक्चर और युद्ध औजार आदि का उत्पादन घरेलू इस्तेमाल और निर्यात के लिए तेजी से बढ़ाया जा रहा है। प्रति व्यक्ति औसत बिजली खपत के आधार पर विकास नापनेवाले देशों का अनुकरण करके भारत में भी औसत बिजली खपत विकसित देशों के बराबरी में पहुंचाने के लिए प्रयास किया जा रहा है।

विकसित देशों ने विकासशील देशों पर मढ़ दी अपनी गंदगी

विकसित देशों ने दो तीन दशक पहले नीति बनाई कि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को विकासशील देशों में स्थानांतरित करना चाहिए। इससे विकसित देशों के उद्योगों के सीधे प्रदूषणकारी प्रभावों से तो मुक्ति मिल सकती है लेकिन राष्ट्र की सीमाएं ग्रीन हाउस इफेक्ट को नहीं रोक सकती और फिर यह प्रभाव केवल उत्पादन प्रक्रिया से नहीं होता, उत्पादित वस्तुओं के उपयोग से भी प्रदूषण और तापमान वृद्धि होती है।

विज्ञान ने हमें बताया है कि ऊर्जा नष्ट नहीं होती वह रूपांतरित होती है। इसका अर्थ यह भी है कि हर भौतिक वस्तु के उपयोग की कीमत के रूप में हमें वातावरण के तापमान वृद्धि और प्रदूषण की कीमत चुकानी पड़ती है। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से जो जितने यूनिट बिजली, उर्जा का उपयोग करता है वह उसी अनुपात में पर्यावरण को हानि पहुंचाता है।

विकास की क्या आवश्यकता

मनुष्य की प्राथमिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक हद तक विकास की जरुरत समझी जा सकती है। उसे नकारा नहीं जा सकता। जैसे बीमारियों में निजात पाने के लिए गुणकारी दवाइयों में अल्कोहोल की या भोजन में स्वाद के लिए नमक की जो भूमिका है उसी हद में इसे स्वीकारा जा सकता है। मनुष्य के श्रम बोझ को कम करने के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना होने वाला भौतिक विकास, जो सबके लिए प्राप्त हो सकता है उसे उपयुक्त माना जा सकता है। लेकिन ऐसी सुविधाएं जो सबको कभी प्राप्त नहीं हो सकती हैं, जो एक विशिष्ट वर्ग के लिए ही पैदा की जाती हैं और जिसके लिए दुनिया के अधिकांश लोगों के जीवन के बुनियादी अधिकार छीनकर ही उपलब्ध किया जा सकता है। ऐसा विकास जिसने मानव जाति को रौंदते हुये सबको सर्वनाश के कगार पर खडा कर दिया है, उसे अनुमति नहीं दी जा सकती।

औद्योगिक क्रांति से आर्थिक विषमता बढ़ी है

प्राकृतिक संसाधन और श्रम ही संपत्ति है। लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के इतने दोहन और श्रम के शोषण के बावजूद ऐसा नहीं है कि औद्योगिक क्रांति के कारण दुनिया के सभी लोगों के जीवन में खुशहाली आई है।

औद्योगिक क्रांति का तीन सौ साल का इतिहास यह बताता है कि इस दौर में आर्थिक विषमता बढ़ी है और वर्तमान में वह चरम सीमा पर पहुंची है। दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत संपत्ति एक प्रतिशत धनी लोगों के पास इकठ्ठा हुई है और 15-20 प्रतिशत उन लोगों को भी उसका लाभ मिला है जो जाने अनजाने में धनी लोगों के लिए समाज को लूटने की प्रक्रिया में शामिल हैं। लेकिन जिन्होंने सबसे बडी कीमत चुकाई है ऐसे 80 प्रतिशत लोगों को इसका कोई लाभ नहीं मिला और लाभ मिल भी नहीं सकता क्योंकि उनके हित एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं।

आम समाज आज भी भूख मिटाने, रोजगार पाने और जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहा है। प्राकृतिक संसाधन जल, जंगल, जमीन, खनिज, गौण खनिज, पेट्रोलियम आदि से समाज का हक छीनकर जबरदस्ती से उद्योगपतियों के हवाले किया गया। उसके लिए किसान को खेती से बेदखल किया गया, पानी लूटा गया, जंगल काटा गया, खनिज का दोहन किया गया और श्रम का शोषण किया गया। यह सब छीनने के लिए कानून का उपयोग काम नहीं आया तो अमानवीय तरीके इस्तेमाल किए गए। अक्सर युद्ध संसाधनों पर अधिकार पाने के लिए ही किए जाते हैं।

औद्योगिक क्रांति की मान्यता

औद्योगिक क्रांति इस मान्यता पर खडी है कि विकास के लिए लोगों के अधिकार छीनने ही पड़ेंगे जिनका उस पर अधिकार है और उसके लिए अगर उन्हें जबरदस्ती हटाना पडे तो उसमें बुराई नहीं है।

पर्यावरण को अपरिवर्तनीय क्षति पहुंचाता है औद्योगिक विकास

औद्योगिक विकास समाज के जीने के साधन छीनकर उन्हें गरीबी का जीवन जीने के लिए मजबूर करता है। भारी उद्योगों में हर साल लाखों कामगारों को दुर्घटनाओं में जान गंवानी पड़ती है।

भारत में हर साल बिजली उद्योगों में मर जाते हैं एक लाख कामगार

एक अध्ययन के अनुसार भारत में बिजली उद्योगों में हर साल एक लाख से ज्यादा कामगारों को दुर्घटनाओं में जान गंवानी पड़ती है। इसलिए यह यह कह सकते हैं कि औद्योगिक विकास खूनी है, क्योंकि वह प्रकृति को रौंदकर और मनुष्य का खून चूसकर किया जाता है।

जलवायु परिवर्तन पर विकास का दुष्प्रभाव

‘विकास’ नशा ने पर्यावरण का नाश और पृथ्वी के अस्तित्व का संकट पैदा किया है। जिसे न रोकने से सबका विनाश होगा। इसलिए हमे उसे पाने की होड में शामिल नहीं होना चाहिए और फिर कुछ लोगों की राक्षसी महात्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अपनी बलि क्यों चढ़ाएं? हम समझ चुके हैं कि इस तरह भौतिक सुविधाएं सभी को देनी हों तो दुनिया की बडी आबादी को उसके लिए बलि चढ़ाया जाएगा और प्रकृति का जितना विनाश आज तक हुआ है उसका छह-सात गुना अधिक विनाश करना होगा और फिर ऐसा नहीं है कि यह संसाधन असीमित है। हो सकता है कि इसके लिए पृथ्वी के सारे संसाधन कम पड़ जाएं और फिर हम यह भी जानते हैं कि मनुष्य की राक्षसी महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं है। मनुष्य जब यह मान लेता है कि उसके और दुनिया के भोग के लिए हिंसा अनिवार्य है तो हम कह सकते हैं कि उस मनुष्य ने अपना आत्मनाश कर लिया है। लेकिन जब सारा समाज इसे अनिवार्य मानने लगता है तब मानवता का नाश होता है।

महात्मा गांधी ने कहा –

मुझे तो ऐसी आशंका है कि उद्योगवाद मानव जाति के लिए अभिशाप सिद्ध होने वाला है। एक राष्ट्र द्वारा दूसरे का शोषण सदा नहीं चल सकता। उद्योगवाद तो पूरी तरह आपकी शोषण की क्षमता, विदेशों में आपके लिए बाजार मिलने और प्रतिस्पर्धियों के अभाव पर ही निर्भर है। .. जिस दिन भारत दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने लगेगा और अगर उसका औद्योगीकरण होता है तो वह शोषण करेगा ही उस दिन वह दूसरे राष्ट्रों के लिए एक अभिशाप बन जाएगा। दुनिया के लिए एक विपत्ति बन जाएगा। फिर दूसरे राष्ट्रों के शोषण के लिए मुझे भारत के औद्योगीकरण की बात क्यों सोचनी चाहिए? .. और अगर उद्योग का भविष्य पश्चिम के लिए अंधकारमय है तो क्या भारत के लिए वह और भी अंधकारमय नहीं होगा?

(ऑक्सफोर्ड, 24 अक्टूबर 1931, खंड 48, पेज 249)  

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