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कांशीराम का प्रयोग फेल, बामसेफ को अंबेडकर के आंदोलन में लौटना होगा

Palash Biswas पलाश विश्वास पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना

बहुजन समाज (Bahujan Samaj) का निर्माण ही नहीं होने दिया जाति अस्मिता (Caste asmita) ने… कारपोरेट राज (Corporate Raj) में तब्दील है मनुस्मृति व्यवस्था (Manusmriti system)! …. कार्यकर्ताओं ने उठायी एकीकरण के हक में आवाज… बोरकर भी एकीकरण के पक्ष में….

पलाश विश्वास

इसी साल मार्च में मुंबई में हम लोगों ने बामसेफ (Bamcef) के विभिन्न धड़ों के एकीकरण की मुहिम शुरु की। उस सम्मेलन में दो धड़ों के बड़े नेता हाजिर हुये, बाकी नहीं। हालांकि कार्यकर्ता सभी धड़ों से आये। जो दो बड़े नेता हाजिर हुये उनमें एक ताराराम मैना, भील आदिवासी हैं तो दूसरे बीडी बोरकर साहब कांशीराम खापर्डे के साथ काम करने वाले संगठनात्मक अनुभव के सबसे बड़ दक्ष नेता। जिन्होंने कम से कम बामसेफ के एक धड़े को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में डाला हुआ है, जहाँ मनोनयन नहीं, बाकायदा निर्वाचन होता है। खुद बोरकर पाँच साल तक इस बामसेफ के अध्यक्ष रहने के बाद अब दूसरे चुने हुये अध्यक्षों के मातहत पुरानी निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। अंबेडकरवादी संगठनों में वे एकमात्र अपवाद हैं जो नेतृत्व से हटने के बावजूद संगठन उन्हीं के नाम से जाना जाता है। हम लोगों के आग्रह के बाद बाकायदा संगठन में प्रस्ताव पारित कराकर वे सम्मेलन में हाजिर हुये और एकीकरण के लिये लोकतांत्रिक संगठनात्मक ढाँचा बनाने का वायदा उन्होंने किया।

हम लोग उसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और आगामी आठ सितंबर को नागपुर में कार्यकर्ताओं की महासभा में एकीकृत बामसेफ को अमली जामा पहनाया जायेगा।

परसों बोरकर साहब ने फोन किया कि वे कोलकाता आयेंगे और उन्होंने पूछा कि क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ। उन्होंने बताया कि शनिवार को शाम साढ़े तीन बजे कालेज स्ट्रीट के त्रिपुरा हितसाधनी सभा के हॉल में उनका कार्यक्रम है। मेरे रोजमर्रे की ज़िन्दगी से महानगर कोलकाता एकदम बाहर है। मैं अमूमन कोलकाता की उठपटक से दूर रहता हूँ। अपने लोगों के मुद्दों को उठाने के अलावा मेरे एजेण्डा में अब कुछ नहीं है। इसलिये किसी कार्यक्रम में मैं जाता नहीं। वर्षों बाद अपने अग्रज पत्रकार पी साईनाथ से मिलने के लिये मैंने यह नियम तोड़ा और हफ्ते भर में बोरकर साहेब का फोन आया। वे जिस तरह हमारे मतामत को तरजीह देते हैं और खास तरह जैसे वे हमारे सम्मेलन में चले आये, फिर एकीकरण का उनके संगठन ने बाकायदा कार्यकारिणी और आम सभा में स्वागत किया, उनसे मिलने न जाते तो यह कतई भारी अभद्रता होती।

चूँकि हम एकीकरण प्रक्रिया में हैं तो किसी एक धड़े के खुले कार्यक्रम में शामिल होने पर दूसरे धड़ों से सवाल उठ सकते हैं, यह जोखिम उठाकर भी मैं बोरकर साहेब से मिलने त्रिपुरा हित साधनी सभा में चला गया।

सोदपुर से कालेज स्ट्रीट को बस से ही सीधे पहुँच सकते हैं। ट्रेन या मेट्रो का सहारा लेने पर भी फिर बस यात्रा करनी होती है। रास्ते में मेरी चप्पल फट गयी। तो मैं कार्यक्रम शुरु होने के करीब आधा घंटा बाद पहुँचा। मेरे दाखिल होते ही बोरकर साहब ने मुझे मंच पर बुला लिया। तब वे बोल रहे थे। वे कोई चमत्कारी वक्ता हैं नहीं। तथ्यों और विश्लेषण से भरा होता है उनका वक्तव्य। वे सनसनीखेज कुछ नहीं कहते और न भावनाओं से खेलते हैं। इसलिये आम मसखरों की तरह उनका भाषण किसी को मंत्रमुग्ध नहीं कर सकता। लेकिन इस दिन उन्होंने जो कहा, उससे हमारी आँखें खुल गयीं। पहली बार उन्होंने बामसेफ के मंच से माना कि मान्यवर कांशीराम जी का प्रयोग फेल कर गया है। बामसेफ कार्यकर्ताओं के बीच बामसेफ के किसी नेता का ऐसा कहना कितना खतरनाक है, जो लोग बामसेफ और कम से कम अंबेडकरवादियों के जड़ मतामत को जानते हैं, वे ही समझ सकते हैं। लेकिन बोरकर साहब ने इसका सिलसिलेवार खुलासा किया और कहा कि जिसकी संख्या जितनी भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के तहत सत्ता में हिस्सेदारी से बहुजनों का कोई कल्याण नहीं हुआ है। मजे की बात तो यह है कि इस संदर्भ में उन्होंने पुणे समझौते के बहु उल्लेखित तर्क का हवाला नहीं दिया। बल्कि सीधे सत्ता समीकरण के गणित को खोलते हुये कहा कि यह विचार अब जाति अस्मिता में तब्दील हो गया है और जाति पहचान के आधार पर सत्ता में भागेदारी के लिये जो सोशल इंजीनियरिंग की जाती है, उससे मान्यवर कांशीराम के रास्ते पर चलते हुये सत्ता के लिये जातियाँ उन्हीं वर्चस्ववादी तत्वों के ही हाथ मजबूत कर रही हैं, जिसके खिलाफ पचासी फीसद का यह नारा है।

बोरकार साहब ने चुनिंदा श्रोताओं से सीधे पूछा, आपकी समस्याएं अगर जाति के कारण है और मनुस्मृति व्यवस्था की वजह से अगर आप गुलाम हैं तो मनुस्मृति व्यवस्था को तोड़ने के लिये आप जाति तोड़ने के बजाये जाति से चिपके हुये उसे मजबूत से मजबूत बनाने के लिये हरसंभव कोशिश क्यों कर रहे हैं? इससे अंततः मनुस्मृति व्यवस्था ही बहाल नहीं रहती, बल्कि वह दिनों दिन और मजबूत होती है।

उनका कहा खत्म होने पर कायदे से सभा खत्म हो जानी थी, लेकिन उन्होंने मुझसे वक्तव्य रखने को कहा। मैंने उन्हीं के तर्क को आगे बढ़ाते हुये यह सवाल उठाया कि हम अंबेडकर के अवसान के बाद उनकी जाति उन्मूलन की परिकल्पना (The concept of caste Annihilation) को पीछे छोड़कर उनके आर्थिक सिद्धान्तों को किनारे रखकर सत्ता में हिस्सेदारी के लिये बाबा साहेब के सिद्धान्तों की तिलांजलि दे रहे हैं। मनुस्मृति व्यवस्था आज कारपोरेट राज है और जिनकी वजह से देश के निनानब्वे फीसद लोग अर्थव्यवस्था से बाहर है, हमारी सत्ता में भागेदारी की जाति अस्मिता ने उन्हे खुले बाजार में एकाधिकरवादी वर्चस्व का हकदार बना दिया। राजनीति दरअसल अर्थ व्यवस्था है और इसे बाबा साहेब ने अपने लिखे से सिलसिलेवार तरीके से साबित कर चुके हैं लेकिन बहुजनों ने उस पर ध्यान न देकर अस्मिताओं के पचड़े में पड़कर खुद को हिदुत्व की पैदल सेना में तब्दील कर लिया है और बाबा साहब की जयंती का सालाना कर्मकांड करके उन्हें ईश्वरतुल्य बनाकर उनके विचार और आंदोलन को हमने कबाड़ के मोल बेच दिया है।

बाबासाहेब का नाम लेकर तीस साल की अवधि से खंड-खंड-विखंडित बामसेफ ने उन आर्थिक मुद्दों को कभी स्पर्श करने की भी चेष्टा नहीं कि जो अंबेडकर आंदोलन के आधार और प्रस्थान बिंदु हैं।

बामसेफ कर्मचारियों का संगठन है लेकिन कर्मचारी जिन समस्याओं से रूबरू होते हैं, उनसे बामसेफ का कोई सरोकार नहीं है।

बाबासाहेब ने अपनी सीमित क्षमता और समर्थन के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों पर वंचित जनसमुदाय के हक हकूक बहाल करने के लिये पांचवी और छठी अनुसूची, दारा 3बी व सी के तहत जो रक्षा कवच दे गये, उसे लागू करने में हमने कोई पहल नहीं की।

संविधान की जो रोजना हत्या हो रही है, एक- एक करके जीवन के हर क्षेत्र को जो सांड़ों से नियंत्रित शेयकर बाजार से जिस तरह नत्थी किया जा रहा है, जैसे निजीकरण की आंधी में आरक्षण को बेमतलब किया जा रहा है, उसके खिलाफ हम प्रतिरोध की कोई जमीन बना नहीं सके। जो सामाजिक सास्कृतिक आंदोलन बामसेफ का चरित्र है, वह सत्ता में भागेदारी और निजी महात्वाकांक्षाएं साधने का साधन बनकर रह गया। बहुजनों से उसका कोई सरोकार ही न रहा।

बीच-बीच में हस्तक्षेप करके बोरकर साहब ने खुलकर कहा कि तानाशाही से चलने वाले संगठन, जहाँ बाकी लोग संगठन में सहभागी नहीं होते, सिर्फ अंध भक्त होते हैं, वहाँ लोकतंत्र की कोई गुंजाइश होती नहीं है और ऐसे संगठन से किसी बदलाव की कोई उम्मीद नहीं है। उनका कहना है कि बाबा साहेब के विचारों से बहुजन को नौकरियों में आरक्षण के जरिये निजी फायदे जरूर हुये, बामसेफ आंदोलन की वजह से सत्ता में भी हिस्सेदारी मिल गयी, लेकिन बहुजन समाज आज भी बहिष्कृत है। आज भी अस्पृश्य है। हम लोग एक दूसरे को अस्पृश्य बनाये हुये हैं। हमारी सामूहिक पहचान हमारी मूलनिवासी विरासत की कोई अभिव्यक्ति है ही नहीं। जिस जाति के कारण हमारी यह दुर्गति है, उसी को बनाये रखने में हम जी तोड़ कोशिश में लगे हैं। नतीजतन अंबेडकर आंदोलन से मिलने वाले लाभों से बहुजन समाज वंचित ही रहा और सही मायने में बहुजन समाज का निर्माण हमारी जाति पहचान की वजह से हुआ ही नहीं है।

हम लोग बोल चुके तो बोरकर साहब ने सभा में मौजूद हर शख्स को लाइन से बोलने का मौका दिया। असली बवंडर तब सामने आया। कई कार्यकर्ताओं ने पूछा कि अगर हमारा उद्देश्य और विचार एक हैं तो बामसेफ के इतने धड़े क्यों हैं? अलग-अलग धड़े एक ही रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तमाल क्यों करते हैं? हम जब फील्ड में जाते हैं तो लोग पूछते हैं कि आप किस बामसेफ से हो! अंबेडकर, कांशीराम और खापर्डे साहब के विचारों का हवाला देते रहने के बावजूद आप लोग अलग-अलग क्यों हैं? बामसेफ के सारे कार्यकर्ता एकता चाहते हैं तो नेतागण अलग-अलग दुकान क्यों चलाते हैं? जब बहुजन समाज जल जंगल जमीन से बेदखल हो रहा है, जब खुले बाजार में उसकी नौकरियाँ, आजीविका छीनी जा रही है, जब उसकी नागरिकता डिजिटल बायोमेट्रिक षड्यंत्र में खत्म हो रही है, जब रोजाना संविधान की हत्या हो रही है, तब समता और सामाजिक न्याय का नारा लगाकर आप लोग सत्ता की भाषा क्यों बोल रहे हैं? बहुजन आंदोलन कब निजी महत्वाकाँक्षाओं, निहित हित, संसाधनों के निजी इस्तेमाल और सर्वव्यापी तानाशाही से मुक्त होगा?

बोरकर साहब बोलते इससे पहले मैंने हस्तक्षेप करके कार्यकर्ताओं को यह जानकारी दी कि ये सवाल सिर्फ उनके नहीं हैं, इस देश के निनानब्वे फीसद जनता के सवाल हैं, जिनके हित में कोई नही खड़ा है, जिनके निरंकुश दमन और कॉरपोरेट अश्वमेध, नरसंहार संस्कृति के विरुद्ध प्रतिरोध के बजाय निरंतर विश्वासघात का सिलसिला है विचारधारा और आंदोलन के नाम पर। हर ईमानदार कार्यकर्ता ऐसे सवाल पूछ रहा है और कोई नेता इसे सुनने को तैयार नहीं है।

मैंने बोरकर साहब से कहा कि आप अब जवाब दें।

इसके बाद तो पूरी सभा एकीकरण सभा में तब्दील हो गयी। बोरकर साहब ने फिर दोहराया कि एकीकरण के प्रयासों का वे और उनका संगठन स्वागत करता है। फिर उन्होंने अंबेडकरवादी एक राजनीतिक दल के बारह धड़ों का उदाहरण देकर समझाया कि संगठन क्यों टूटता है। उन्होंने कहा हिसाब मांगने या सवाल खड़ा करने पर अगर किसी भी कार्यकर्ता को कभी भी कहीं भी दरवाजा दिखा दिया जाता हो तो संगठनों के धड़े बनना कोई रोक नहीं सकता। सबके अपने विचार मतामत हो सकते हैं, संगठन, उद्देश्य और मिशन के मद्देनजर उनका समायोजन करके ही संगठन आगे बढ़ता है। आप मजमा चाहे कितना बड़ा खड़ा कर ले, लेकिन जन सरोकार के मुद्दों पर आपकी कोई हलचल न हो और नेता के अलावा किसी की कोई स्वतंत्र आवाज न हो, तो ऐसे संगठन के जरिये पुरखों की विरासत, उनके विचारों और आंदोलन के दोहन से निजी हित तो सध सकते हैं, बहुजनों का कोई हित नहीं सधता।

बोरकर ने खुलकर कहा कि निजी स्वार्थ के कारण ही, नेताओं की तानाशाही के कारण ही संगठन टूटता है। एकीकरण के नाम पर हम स्वार्थी तत्वों के जमावड़े के खिलाफ हैं। एकीकरण संगठनात्मक लोकतांत्रिक तौर तरीके से ही संभव है और उसके लिये बाकायदा ढाँचा बनाना होगा ताकि निरंकुश तानाशाहों पर अँकुश लगाया जा सके और कोई संगठन और आंदोलन का दुरुपयोग न कर सके।

कुल मिलाकर सहमति इस पर हुई कि बामसेफ को अंबेडकर के विचार और आंदोलन के तहत ही पुनर्गठित किया जाना चाहिए।

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