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आधार और नमो ऐप : तो क्या अब भारत की जनता परायों के साथ-साथ अपनों से भी ठगी जाएगी ?

कानून मंत्री जी ये जकरबर्ग आपसे नहीं डरता क्योंकि मोदीजी उससे जी भर कर मन की बात कर चुके

फेसबुक पर डेटा चोरी का इल्जाम लगने से दुनिया में साइबर सुरक्षा पर नया विवाद खड़ा हो गया। आरोप है कि फेसबुक ने अपने उपभोक्ताओं की निजी जानकारियां कैंब्रिज एनालिटिका को दे दीं, जिसने चुनावों में उसका गलत इस्तेमाल किया। दरअसल संचार तकनीकी की इस सदी में लोकतंत्र भी केवल लोक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सोशल मीडिया इसे अपनी उंगलियों पर नचा रहा है। अब वोटर केवल जाति, धर्म, वादों के आधार पर वोट नहीं देते, बल्कि उन्हें मनोवैज्ञानिक तौर पर प्रभावित कर उनके वोट हासिल किए जाते हैं। कैंब्रिज एनालिटिका पर भी यह आरोप है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उसने लोगों की राजनीतिक सोच और मानसिकता को प्रभावित किया, जिसे हम जोड़-तोड़ या जबरदस्ती कह सकते हैं। लोकतंत्र के साथ ऐसा खिलवाड़ करने में फेसबुक ने उसकी मदद की। यह विवाद पश्चिमी देशों का होता, तो हम भारत की महान परंपराओं, ऐतिहासिक गौरव आदि का वास्ता देकर उन्हें उपदेश दे सकते थे। लेकिन डेटा चोरी का यह मामला भारत तक फैला है।



2017 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 24 करोड़ से ज्यादा लोग फेसबुक इस्तेमाल करते हैं। जब 2018 के आंकड़े आएंगे, तो यह संख्या शायद डेढ़-दो गुना बढ़ जाएगी, क्योंकि निजी कंपनियों में सस्ती दरों पर इंटरनेट सुविधा देने की होड़ लगी है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म देने वाली कंपनियों के लिए भारत सबसे बड़ा डेटा बाजार है। और कड़वी सच्चाई यह है कि यहां का उपभोक्ता पश्चिमी देशों के नागरिकों की तरह साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूक भी नहीं है। अधिकतर लोग केवल अपना एकाउंट बनाकर ही खुश हो जाते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि इस एकाउंट के जरिए उनकी निजता को हैक करने का खतरा भी हो सकता है।

भारत में विज्ञान, गणित और तकनीकी शिक्षा का जो हाल है, उसके कारण इनके प्रति एक अनजाना सा भय भी व्याप्त है। जिस तरह हम फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले या किसी गोरी चमड़ी वाले के आगे मनोवैज्ञानिक रूप से पस्त महसूस करने लगते हैं, कुछ इसी तरह तकनीकी के आगे भी थोड़े डरे-सहमे रहते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया साइट पर जो जानकारी हमसे मांगी जाती है, हम दे देते हैं और उसके साथ जुड़े नियमों व शर्तों को पढ़ना भी जरूरी नहीं समझते। हमारे इस आधे-अधूरे ज्ञान का फायदा विदेशी कंपनियां उठाती रही हैं और शायद देश के राजनेता भी। कैबिं्रज एनालिटिका विवाद सामने आया तो भाजपा ने कांग्रेस पर सबसे पहले आरोप लगाया कि वह 2019 के चुनाव के लिए इसके संपर्क में थी।

कांग्रेस ने भी आरोप लगाया है कि भाजपा ने इस कंपनी की मदद बिहार चुनाव में ली थी। वैसे कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तो बाकायदा घोषणा भी कर दी कि फेसबुक और उसके सीईओ मार्क जकरबर्ग साफ-साफ जान लें, भारत में अगर डेटा चोरी की शिकायतें मिलीं या फिर भारत की चुनाव प्रक्रिया में दखल देने की बात सामने आई तो किसी को बख्शा नहीं जाएगा। अच्छी बात है कि भाजपा चुनावी प्रक्रिया में किसी का दखल नहीं चाहती। पर कानून मंत्री यह क्यों भूल गए कि नरेन्द्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री 2015 की अमेरिका यात्रा के दौरान फेसबुक के आफिस पहुंचे थे और वहां जी भर कर मन की बात की थी, सोशल मीडिया का गुणगान किया था।

भाजपा की दिन दूनी, रात चौगुनी लोकप्रियता के जो दावे किए जा रहे हैं, उसमें सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है। नरेन्द्र मोदी तो लोकतंत्र के इस आधुनिक हथियार का महत्व खूब जानते हैं, इसलिए उन्होंने नमो ऐप भी बनवाया, जिसमें दावा किया गया कि जनता इस ऐप के जरिए उनसे सीधे जुड़ सकती है। पर अब यह आरोप भी लग रहे हैं कि इस ऐप को डाउनलोड करने से आपकी निजी जानकारियां भी इसमें चली जाती हैं और आगे इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। ईलिऑइट एल्डर्सन नाम के एक ट्विटर अकाउंट से दावा किया गया कि नमो ऐप डाउनलोड करने पर आपका निजी डेटा बिना आपकी सहमति के किसी अमेरिका स्थिति क्लैवक ट्रैप नाम की कंपनी के पास चला जाता है। कंपनी की वेबसाइट पर बुक माय शो, स्टार टीवी, जोमैटो जैसे ब्रैंड का जिक्र है कि ये सोशल मार्केेटिंग के लिए क्लैवक ट्रैप की सेवाएं लेते हैं।



इस नए खुलासे के बाद अब कांग्रेस और भाजपा के बीच नए तरह का सोशल मीडिया युद्ध छिड़ गया है। कांग्रेस डिलीटनमोऐप कैंपेन चला रही है, तो भाजपा इसे बेबुनियाद बता रही है, साथ ही कुछ सोशल वेबसाइट्स के जरिए यह भी प्रचारित करवा रही है कि कांग्रेस के इस अभियान के कारण नमो ऐप को और भी लोग डाउनलोड कर रहे हैं और प्रधानमंत्री पर लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। कुल मिलाकर कांग्रेस और भाजपा के एक-दूसरे पर आरोपों के बीच फेसबुक, कैैंब्रिज एनालिटिका और नमो ऐप सब पर लगे आरोप कहीं गुम होते दिख रहे हैं और लग रहा है कि लोग फिर आभासी दुनिया से छले जाएंगे। पर हमें याद रखना चाहिए कि इस आभासी दुनिया में खतरे तो वास्तविक ही हैं और डेटा चोरी की घटनाएं भी। हाल ही में आधार के इस्तेमाल के कारण 5 सौ रुपए में आपकी निजी जानकारियां दूसरों तक पहुंचने का आरोप सामने आया था। फेसबुक और कैंब्रिज एनालिटिका तो विदेशी कंपनिया हैं, लेकिन आधार तो सरकार की योजना है और नमो ऐप भाजपा की, तो क्या अब भारत की जनता परायों के साथ-साथ अपनों से भी ठगी जाएगी।

देशबन्धु का संपादकीय

 

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