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माणिक वर्मा : दर्जी से सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार बनने तक का संघर्षशील सफर

श्रद्धांजलि स्मृति शेष माणिक वर्मा

माणिक वर्मा (Manik Verma) मंचों पर उस दौर के व्यंग्यकारों में शामिल हैं जब छन्द मुक्त व्यंग्य विधा को स्वतंत्र स्थान मिलने लगा था। एक ओर हास्य कविता में काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, गोपाल प्रसाद व्यास रमई काका शैल चतुर्वेदी हुल्लड़ मोरादाबादी आदि थे तो दूसरी ओर देवराज दिनेश, माणिक वर्मा, सुरेश उपाध्याय, ओम प्रकाश आदित्य, गोविन्द व्यास, आदि थे जिनमें माणिक वर्मा जी का विशेष स्थान था। बाद में अशोक चक्रधर, प्रदीप चौबे, मधुप पांडेय आदि जुड़े। इसके बाद की पीढी में तो फूहड़ चुटकलों ने ही कविता की जगह लेना शुरू कर दिया था। सबसे वरिष्ठ श्री मुकुट बिहारी सरोज इन सब में अलग थे जिन्होंने गीत में सार्थक व्यंग्य रचा।

मेरी पद्य और गद्य व्यंग्य रचनाएं 1971 से ही कादम्बिनी धर्मयुग, माधुरी, रंग आदि में प्रकाशित होने लगी थीं इसलिए मैं खुद को इस खानदान का सदस्य मान कर चलता था। व्यवस्था के खिलाफ मुखर रूप से लिखने वाले माणिक वर्मा मेरे पसन्दीदा कवि भी थे और हमविचार भी लगते थे। अनेक समारोहों में उनसे भेंट होती रही थी किंतु अपने संकोची स्वभाव के कारण मैं जल्दी घुल मिल नहीं पाता था, इसलिए रिश्ता दुआ सलाम तक सीमित रहा था। सरोज जी के प्रति उनकी श्रद्धा देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता था जब वे उनसे आशीर्वाद स्वरूप थोड़ा सा पेय पदार्थ मांग रहे होते थे और अपनी तरह से प्रशंसा करने वाले सरोज जी कह रहे होते, कि तुम्हें तब तक एक बूंद नहीं दूंगा जब तक कि तुम वादा नहीं करते कि इतना अच्छा नहीं लिखोगे, आखिर तुम क्यों इतना अच्छा लिखते हो! बहुत भावुक आत्मीयता महसूस होती थी जब माणिक जी उन से कह रहे होते थे कि – बप्पा थोड़ी सी दे दो, आपका आशीर्वाद तो चाहिए ही है मुझे!

इस बीच काफी समय गुजर गया। कवि सम्मेलनों में कवि के रूप में स्थापित होने की मेरी वासना शांत हो चुकी थी व उसी अनुपात में मंच के कवियों के प्रति आकर्षण भी खत्म हो गया था। मैं 2001 में बैंक की नौकरी छोड़ कर भोपाल आकर रहने लगा था और कविता छोड़ कर गद्य लेखन की ओर चला गया था। इसी बीच पता चला कि माणिक वर्मा जी भोपाल में ही रहने लगे हैं और मेरे पड़ोस में ही रहते हैं। पंजाबी बाग की लाजपत राय कालोनी में नीले रंग से पुता हुआ जो मकान है वह उन्हीं का है। मंच के एक कवि श्री दिनेश प्रभात के माध्यम से उनसे पुनः भेंट का मौका मिला और मेरे निकट ही रहने की बात जान कर वे बोले – भैय्या आ जाया करो कभी। पुराने माणिक वर्मा की तुलना में वे बीमार से लगे थे और उम्र का प्रभाव भी दिखा था।

इसी बीच कवि और समाजवादी राजनेता उदयप्रताप सिंह को म.प्र. में समाजवादी पार्टी की ओर से चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया गया। वे मेरे पूर्व परिचित थे इसलिए उन्होंने इस प्रवास के दौरान प्रतिदिन मिलने का आग्रह किया ताकि दिन भर की राजनीतिक उठापटक के बाद शाम को साहित्यिक संवाद हो सके। इसी क्रम में एक दिन माणिक वर्मा जी से मिलने का कार्यक्रम भी बना। हम उनके घर पहुंचे और काफी देर बैठे। उस दिन उनके आते रहने के पुनः आग्रह में मुझे औपचारिकता की जगह सच्चाई नजर आयी।

इसी मुलाकात में पता चला कि उनके प्रिय पुत्र नीरज कैंसर की बीमारी से ग्रस्त हैं जिनकी देख रेख में चिंतित वे कवि सम्मेलनों से भी दूर रहने लगे थे, और ऐसे कार्यक्रमों में ही जाते थे जहाँ वायुमार्ग से जाकर चौबीस घंटे के अन्दर वापिस आ सकें। यही कारण था कि उन्हें सचमुच ही वार्तालाप करने के लिए आत्मीय मित्रों की जरूरत थी। मैंने उनके यहाँ जाना शुरू किया तो उनकी आदत में शामिल होता गया। अंतराल होने पर वे खुद ही फोन करके आने का आग्रह करने लगे। कुछ समय बाद ही उनके पुत्र की मृत्यु हो गयी।

अपनी प्रारम्भिक जीवन संघर्ष कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया था कि वे बचपन में ही बम्बई चले गये थे जहाँ वे टेलरिंग का काम करने लगे थे। जिस दुकान पर वे यह काम करते थे वहीं के टेलर मास्टर ने उनके शायर होने की प्रतिभा को पहचाना था और प्रोत्साहित किया था। वे मूल रूप से गज़लकार ही थे। अभी भी वे लगातार गज़लें कहते थे। कवि सम्मेलनों के आकर्षण ने उन्हें व्यंग्य कवि बना दिया था।

उन्होंने बताया था कि कभी नीरजजी आदि को कवि सम्मेलन में सुनने के लिए वे तीस तीस किलोमीटर साइकिल से जाया करते थे। जब मैंने उन्हें सीपीएम के पाक्षिक पत्र लोकजतन का सदस्य बनाया तो उन्होंने बताया था कि वे कभी कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्य हुआ करते थे और कामरेड शाकिर अली खान हरदा में क्लास लेने के लिए आते थे। उन्होंने कभी सोवियत भूमि पत्रिका के पचासों ग्राहक बनाये थे। बातचीत में पता लगा कि उनके छोटे बेटे इन्दौर में ही एडीजे हैं और दामाद कहीं कलैक्टर के समतुल्य पद पर पदस्थ हैं। उनके मूल निवास हरदा में उनका पैतृक मकान और खेती है। बहू भी स्कूल टीचर है। दिल्ली के एक कवि व प्रकाशक [शायद उनका नाम श्याम निर्मम था] ने उनका समग्र प्रकाशित करने का फैसला किया था किंतु उनके आकस्मिक निधन से वह प्रकाशन स्थगित हो गया था।

बीएचईएल भोपाल में हर वर्ष 26 जनवरी को कवि सम्मेलन होता है।

ज्ञान चतुर्वेदी बीएचईल के ही कस्तूरबा अस्पताल में वरिष्ठ चिकित्सक रहे हैं और संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों के लिए प्रबन्धन उनसे सलाह लेता रहा था। एक किसी वर्ष ज्ञान चतुर्वेदी का फोन मेरे पास आया कि माणिक वर्मा के साथ कवि सम्मेलन सुनने आ जाना। इसके साथ ही यह भी बताया कि उनके स्थानीय होने के कारण पिछले वर्ष प्रबन्धन ने उनके द्वारा चाही गयी पन्द्रह हजार की राशि देना मंजूर नहीं किया था किंतु इस वर्ष मैंने उन्हें बीस हजार देना मंजूर करवा लिया। वे आगे बोले जब प्रबन्धन सुरेन्द्र शर्मा को इक्वायन हजार दे रहा है तो मैंने कहा कि माणिक वर्मा को तो बीस हजार मिलने ही चाहिए। यह ज्ञान चतुर्वेदी का उनके प्रति सम्मान का प्रदर्शन था।

उनके साथ बैठ कर कवि सम्मेलनों और विभिन्न कवियों के बारे में ढेर सारी जानकारियां सुनने को मिलीं। जिस दिन वे भोपाल छोड़ कर जा रहे थे उस दिन उन्होंने मुझे फोन किया था किंतु मैं किसी कार्यक्रम में था और उसे अटैंड नहीं कर पाया था, अगले दिन पता चला कि वे तो भोपाल छोड़ कर चले गये हैं।  मुझे श्रद्धांजलि देने के लिए उनका ही वह शे’र याद आ रहा है-

ज़िन्दगी चादर है धुल कर साफ हो जायेगी कल

इसलिए ही हमने उसमें दाग लग जाने दिये

वीरेन्द्र जैन

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