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किसानों की मांग अधिग्रहित भूमि पर श्वेतपत्र जारी करे सरकार

एमआईडीसी,जीआईडीसी,सेज आदि के माध्यम से अधिग्रहित भूमि के संदर्भ में सरकार श्वेतपत्र जारी करे

खेडूत समाज गुजरात द्वारा आयोजित विचार विमर्श सम्मेलन में किसानों की मांग

अहमदाबाद से दयानंद कनकदंडे

गुजरात राज्य के 33 में से 23 जिलों में कार्यरत किसान संगठन खेडूत समाज गुजरात द्वारा 3-5 फरवरी को सूरत में संपन्न किसान सम्मेलन में एमआईडीसी,जीआईडीसी,सेज के माध्यम से अधिग्रहित भूमि के संदर्भ में सरकार द्वारा श्वेतपत्र जारी किए जाने की मांग की गयी। मुंबई-दिल्ली औद्योगिक कॉरिडोर तथा अन्य परियोजना के विरोध में संघर्षरत महाराष्ट्र, गुजरात,राजस्थान,पंजाब,हरियाणा के किसान समुदायो तथा जनसंघटनो के साथ तीन दिवसीय विचार-विमर्श का आयोजन खेडूत समाज गुजरात द्वारा किया गया था।

दिल्ली मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर सहित देश भर में बननेवाले 18 औद्योगिक कॉरिडोर के वजह से बडे पैमाने पर खेत जमीन अधिग्रहित की जाने वाली है। सेज, एमआईडीसी,जीआईडीसी आदि के लिए इसके पहले भी उद्योगों के नाम पर बड़ी मात्रा में भूमि अधिग्रहण किया जा चुका है। अधिग्रहित भूमि के संदर्भ में उस भूमि के उपयोग को लेकर श्वेत पत्र लाने की मांग खेडूतों द्वारा उठायी गयी।

खेती न्यूनतम ऊर्जा के उपयोग के द्वारा अधिकतम उपयुक्त ऊर्जा का निर्माण करती है। प्रकाश संश्लेषण की प्रकिया में सौर ऊर्जा के उपयोग द्वारा यह होता है। औद्योगिक उत्पादन से निर्मित कार्बन उत्सर्जन को सोखने का कार्य भी खेती की वजह से होता है। कार्बन क्रेडिट की राशि तय करते हुए उस राशि को किसानों के हिस्से जमा करने से खेती-किसानी के आधी से ज्यादा समस्याओं की मुक्ति के लिए संसाधन प्राप्त किए जा सकते हैं। बायो-मास के उपयोग के आधार पर मानव विकास निर्देशांक में श्रीलंका,भूटान के भारत से आगे रहने की व्याख्या करते हुए पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ.सागर धारा ने सजीव खेती की तरफ बढ़ने की जरूरत महसूस कराई।

सजीव खेती करने वाले किसान एवं किसान नेता सुखदेव सिंह भूपाल ने सजीव खेती की जरूरत, खेती के लिए 50% बजट प्रावधान,एशिया के बायो-लाईफ को ध्यान में रखते हुए खेती को प्राथमिकता में रखे जाने की जरूरत आदि विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखी।

खेती,ग्रामीण विकास,सहकरिता के आधार पर बाजार आदि के संदर्भ में 21 वीं सदी के रचनात्मक कार्यक्रमों की दिशा औद्योगिक कॉरिडोर विरोधी संघर्ष के साथ-साथ विकसित करने की जरूरत पर बद्रीभाई एवं अशोकभाई चौधरी ने जोर दिया। इस संदर्भ में विस्तार चर्चा में प्रतिनिधियों के बीच हुयी एवं निकट समय में इस संदर्भ में देशभर में समानधर्मी समूहों के बीच संवाद प्रकिया चलाने पर सहमति हुयी।

अर्थशास्त्री एवं गुजरात प्लानिंग कमिशन के सदस्य रहे रोहित शुक्ल एवं आर्थिक मामलों के जानकार, अर्थशास्त्री-पत्रकार हेमंत शाह ने विश्व व्यापार संगठन के खेती पर पड़े प्रभावे की विस्तार से चर्चा की। खेतीबाड़ी के अच्छे भविष्य के लिए विश्व व्यापार संगठन से बाहर निकलना हितकारी कदम होने की बात को भी उन्होंने आगे जोड़ा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का शहरी औद्योगिक व्यवस्था द्वारा शोषण होने संबंधी बात भी दांडेकर-रथ समिति रिपोर्ट के हवाले से कही गयी। खेती की तरफ ध्यान न दिये जाने की स्थिति में स्थायी विनाश की तरफ दुनिया के धकेले जाने की तरफ इशारा करते हुए व्यापक जनसंघर्ष की जरूरत को रेखांकित किया।

शशी सोनवणे, सागर राबरी, कृष्णकांत ने औद्योगिक कॉरिडोर विरोधी संघर्ष तेज करने संबंधी कार्यक्रम प्रस्ताव को रखा। राजू पांढरा, सज्जन कुमार, रूपचंद मखनोत्रा, अरुण करांडे, प्रल्हाद अधिकारी, डॉ.सुनील परहाड, बालाप्रसाद किसवे, दिनेश शांडील्य, जवाहरलाल, मन्नाराम डांगी, दयानंद कनकदंडे आदि आदिवासी एकता परिषद, भूमिसेना, एनएचसीपीएम, शेतकरी संघर्ष समिति, युवा भारत, सगुणा संगठन के महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, जम्मू से आए कार्यकर्ताओं ने विचार विमर्श में हिस्सा लेते हुए कार्यक्रम प्रस्ताव पर अपना मत व्यक्त किया।

दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर के विरोध में महाराष्ट्र,गुजरात राज्य में शुरू संघर्ष को राजस्थान, हरियाणा तक विस्तार देना। 20 से 30 मार्च जनजागृति यात्रा निकालना। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन के भूमिपूजन के बाद अमृतसर-दिल्ली बुलेट ट्रेन घोषणा की गयी है। इस संदर्भ में पहलकदमी के साथ-साथ बंगाल,झारखंड आदि राज्यों को प्रभावित करनेवाले इस्टर्न कॉरिडोर के विरोध संघटित हो रहे संघर्षरत समूहों के साथ समन्वय स्थापित करना, कार्बन क्रेडिट की मांग करना सहित 14 प्रस्तावों पर काम करने का निर्णय लिया गया। संघर्ष के नेता वरिष्ठ आदिवासी नेता काळूराम काका के वक्तव्य से किसान सम्मेलन का समापन हुआ। 

 

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