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वर्ष 2050 तक दुनिया की दस अरब आबादी को स्वास्थ्यपरक भोजन खिलाना एक बड़ी चुनौती होगी

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मानव स्वास्थ्य में सुधार Improvement in human health करने और पृथ्वी को प्रलयंकारी क्षति की आशंका से बचाने के लिये खान-पान और खाद्य उत्पादन में बदलाव अत्यन्त आवश्यक

Food is the single strongest lever to optimize human health and environmental sustainability on Earth.

हाल ही में जारी ईएटी-लांसेट कमीशन के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया की दस अरब आबादी को स्वास्थ्यपरक भोजन खिलाना एक बड़ी चुनौती होगी। खान-पान की आदतों में परिवर्तन करने, खाद्य उत्पादन में सुधार करने और भोजन को बेकार फेंकने पर रोक लगाये बगैर इतनी बड़ी आबादी को बेहतर भोजन उपलब्ध कराना असम्भव होगा।

स्वस्थ खान-पान के लिये निर्धारित प्राथमिक वैज्ञानिक लक्ष्य, जो स्वास्थ्यपरक भोजन के उपभोग को हमारी धरती की सहनक्षमता के दायरे में रखते हैं, उनमें अहम बदलाव की जरूरत है। हालांकि ये परिवर्तन अब भी सम्भव हैं। हमारे रोजमर्रा के भोजन की जो किस्म है, उसमें करीब 35 प्रतिशत कैलोरी तो मोटे अनाज और कंद-मूल के रूप में होती है। मुख्यतः पौधों से मिलने वाला प्रोटीन होता है। साथ ही प्रतिदिन 14 ग्राम लाल मांस और 500 ग्राम सब्जियां और फल शामिल होते हैं।

अध्ययन कहता है कि खान-पान के इस नये पैटर्न को अपनाने के लिये लाल मांस और चीनी जैसे भोज्य पदार्थों के वैश्विक उपभोग में करीब 50 प्रतिशत की कमी लानी होगी। वहीं, मेवे, फल, सब्जियों और फलियों का इस्तेमाल दोगुना करना होगा।

अध्ययन कहता है कि दुनिया में अस्वास्थ्यकर खाना बीमारियों का प्रमुख कारण है और सही खानपान अपनाने से हर साल तकरीबन एक करोड़ 10 लाख लोगों को मौत से बचाया जा सकता है। पृथ्वी पर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता को अनुकूलित करने के लिए भोजन सबसे मजबूत उत्तोलक है।

खाद्य उत्पादन के लिए खानपान धरती की सहन सीमाओं के अंदर रह सकता है जैसे कि भूमि का उपयोग, पोषक तत्व, ताजा पानी जैव विविधता का क्षरण और जलवायु परिवर्तन आदि। वैश्विक खाद्य तंत्र में रूपांतरण की तुरंत आवश्यकता है क्योंकि दुनिया के करीब 3 अरब से ज्यादा लोग कुपोषण का शिकार हैं। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो कुपोषित या आवश्यकता से अधिक पोषित है।

इसके अलावा खाद्य उत्पादन कार्य धरती की सहनशक्ति से अधिक का उपयोग करके किया जा रहा है। इसकी वजह है, जलवायु परिवर्तन जैव विविधता को नुकसान नाइट्रोजन और फास्फोरस उर्वरक के अधिक इस्तेमाल से होने वाला प्रदूषण, पानी तथा भूमि के उपयोग में होने वाले नुकसानदेह बदलाव आदि।

ईएटी-लांसेट कमीशन का यह अध्ययन हमें पृथ्वी की सहनशीलता के दायरे में कार्य करने वाले सतत भोज्य उत्पादन तंत्र से स्वास्थ्य परक खानपान सम्बन्धी प्रथम वैज्ञानिक लक्ष्य उपलब्ध कराता है।

इस रिपोर्ट में कृषि आधारित खाद्य पदार्थों की विभिन्न किस्मों को शामिल किया गया है। इसके अलावा पशु आधारित भोजन की मात्रा में कमी लाई गई है। साथ ही इसमें रिफाइंड अनाज, उच्च प्रसंस्कृत भोजन तथा चीनी को शामिल किया गया है। साथ ही सैचुरेटेड वसा के बजाय अनसैचुरेटेड चिकनाई को सम्मिलित किया गया है।

यह आहार जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के अनुकूल स्तरों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करेगा, जबकि जैव विविधता के नुकसान और फॉस्फोरस के उपयोग को कम करेगा, और भूमि, पानी और नाइट्रोजन की कृषि मांग को सीमित करेगा।

इस आहार को व्यापक रूप से अपनाने से विश्व स्तर पर पोषण में सुधार होगा – स्वस्थ मोनो और पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड का सेवन बढेगा और अस्वास्थ्यकर संतृप्त वसा का  सेवन कम होगा , जबकि आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों का सेवन बढ़ेगा।

मानव द्वारा लिया जाने वाला भोजन स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय सततता को एक दूसरे से जोड़ता है। साथ ही उसमें इन दोनों को पोषित करने की क्षमता भी है। हालांकि मौजूदा खानपान से धरती पर उसकी सहन क्षमता से ज्यादा दबाव पड़ रहा है। साथ ही इससे बीमारियां भी फैल रही हैं। इससे धरती और उस पर रहने वाले लोगों पर जोखिम उत्पन्न होता है।

सतत खाद्य प्रणालियों के जरिये स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराना एक तात्कालिक चुनौती है, क्योंकि आबादी लगातार बढ़ रही है और वर्ष 2050 तक इसके 10 अरब तक पहुंच जाने तथा अधिक (पशु-आधारित भोजन के अधिक उपभोग की अपेक्षा के साथ) धनी हो जाने का अनुमान है।

इस चुनौती से निपटने के लिये खान-पान में बदलावों के साथ-साथ खाद्य उत्पादन में सुधार और भोजन को बेकार फेंकने की प्रवृत्ति में कमी लाये जाने की सख्त जरूरत है। इस अध्ययन के लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि हालात सम्भालने के लिये अभूतपूर्व वैश्विक सहयोग और संकल्प की जरूरत है। साथ ही पोषक तत्वों से भरपूर विविध फसलें उगाने और भू-उपयोग और महासागरों के इस्तेमाल के प्रबन्धन में सुधार लाने जैसे कदम फौरन उठाये जाने चाहिये।

अध्ययन के लेखक मण्डल में शामिल लंदन यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर टिम लैंग ने कहा कि

‘‘हम जो भोजन खाते हैं और हम जिस तरह उसका उत्पादन करते हैं, उससे लोगों की सेहत और पृथ्वी का स्वास्थ्य तय होता है। मगर गम्भीर बात यह है कि इस वक्त हम इसे ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं।‘‘

उन्होंने कहा कि

‘‘हमें आमूल-चूल तरीके से परिवर्तित वैश्विक खाद्य तंत्र की आवश्यकता है, जो प्रत्येक देश की परिस्थितियों के अनुकूल अभूतपूर्व पैमानों और रास्तों के जरिये परिवर्तित किया गया हो। हालांकि यह मुश्किल नीतिगत निर्णय होगा और वर्तमान समस्याओं को हल करना आसान नहीं होगा, मगर इसके बावजूद यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। साथ ही इस सिलसिले में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय, स्थानीय तथा व्यापार सम्बन्धी नीतियों को अपनाने के अवसर भी उपलब्ध हैं। हमने स्वास्थ्यपरक और सतत खान-पान के सम्बन्ध में जो वैज्ञानिक लक्ष्य तय किये हैं वे एक महत्वपूर्ण बुनियाद हैं और उनसे इस बदलाव की शुरुआत की जा सकेगी।”

ईएटी-लांसेट कमीशन क्या है What is The EAT-Lancet Commission on Food, Planet, Health

ईएटी-लांसेट कमीशन तीन साल की एक परियोजना है, जिससे 16 देशों के 37 विशेषज्ञों को जोड़ा गया है। इसमें स्वास्थ्य, पोषण, पर्यावरणीय सततता, खाद्य प्रणालियों, अर्थव्यवस्था तथा राजनीतिक शासन क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हैं।

स्वास्थ्यकर भोजन के लिये निर्धारित वैज्ञानिक लक्ष्य- खाद्य उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है। इससे पिछले 50 वर्षों के दौरान लोगों की उत्तरजीविता (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) में सुधार हुआ है और भुखमरी कम हुई है। साथ ही शिशु तथा बाल मृत्यु दर में भी कमी आयी है। हालांकि वर्तमान में वैश्विक स्तर पर अस्वास्थ्यकर खान-पान की वजह से ये लाभ अब कम हो रहे हैं। भोजन में उच्च कैलोरी, शर्करा, रिफाइंड स्टार्च और पशु आधारित भोज्य पदार्थों की अधिक मात्रा जबकि फलों, सब्जियों, मोटे अनाज, फलियों, मेवे, तिलहन और मछली की कम होती मात्रा के कारण ऐसा हो रहा है।

इस अध्ययन के लेखकों की दलील है कि वैज्ञानिक लक्ष्यों के अभाव के कारण स्वास्थ्यकारी भोजन के लिये खाद्य प्रणाली के रूपान्तरण के प्रयासों में बाधाएं पैदा हुई हैं। उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ सुबूतों के आधार पर कमीशन ने खानपान का एक तौर-तरीका प्रस्तावित किया है, जिसके जरिये पोषण की आवश्यकताओं की पूर्ति होगी, स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलेगा और दुनिया को धरती की सहनक्षमता के दायरे में रहने में मदद मिलेगी।

मौजूदा खान-पान से तुलना करें तो वर्ष 2050 तक इन नयी सिफारिशों को अपनाने के लिये लाल मांस और चीनी के वैश्विक उपभोग में 50 प्रतिशत से ज्यादा की कमी लानी होगी। वहीं, मेवे, फलों, सब्जियों तथा फलियों के उपभोग की मात्रा दोगुनी करनी होगी। वैश्विक लक्ष्यों को स्थानीय स्तर पर लागू करने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर- उत्तरी अमेरिका के विभिन्न देशों में सुझायी गयी मात्रा से करीब साढ़े छह गुना ज्यादा लाल मांस का उपभोग किया जाता है। वहीं, दक्षिण एशिया के देशों में संस्तुत मात्रा की आधी मात्रा में ही लाल मांस का इस्तेमाल होता है।

सभी देशों में स्टार्चयुक्त सब्जियों जैसे कि आलू और कसावा का उपयोग संस्तुत मात्रा से ज्यादा होता है। दक्षिण एशिया में जहां ऐसी सब्जियों का इस्तेमाल डेढ़ गुना ज्यादा होता है, वहीं उपसहारीय अफ्रीकी देशों में इनका उपयोग साढ़े सात गुना अधिक होता है।

हार्वर्ड यूनीवर्सिटी के सह-प्रमुख कमिश्नर डाक्टर वाल्टर विलेट ने कहा कि

‘‘दुनिया के भोजन में नाटकीय परिवर्तन करना ही होगा। विश्व के 80 करोड़ से ज्यादा लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, वहीं बड़ी संख्या में लोग अस्वास्थ्यकर खाना खा रहे हैं, जिसकी वजह से असामयिक मौतें और बीमारियां हो रही हैं। सेहतमंद रहने के लिये भोजन में कैलोरी की समुचित मात्रा ही होना जरूरी है। इसके अलावा भोजन में शाक-भाजी आधारित चीजें, पशु आधारित भोजन की कम मात्रा, सैचुरेटेड के बजाय अनसैचुरेटेड वसा, थोड़ी ही मात्रा में रिफाइंड अनाज, उच्च प्रसंस्कृत भोजन तथा एैडेड शुगर को शामिल किया जाना चाहिये। हमारा सुझाव है कि भोजन के चुनाव में लचीलापन अपनाया जाए ताकि विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थों, कृषि प्रणालियों, सांस्कृतिक परम्परा तथा भोजन सम्बन्धी व्यक्तिगत पसंदगी (सर्वाहारी और शाकाहारी) को शामिल किया जा सके।”

प्रतिदिन 2500 कैलोरी वाली डाइट के लिये निम्नांकित मैक्रोन्यूट्रिएंट की रेंज (ग्राम/प्रतिदिन) में निम्नांकित मात्राएं शामिल हैं-

कैलोरी ग्रहण (कैलोरी/प्रतिदिन)

कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख स्रोत- 0-60 प्रतिशत ऊर्जा

मोटा अनाज (जैसे कि चावल, गेहूं, मक्का), सूखा 232 ग्राम (ऊर्जा लक्ष्यों के हिसाब से समायोजित)-811

स्टार्च वाली सब्जियां (आलू एवं कसावा) 50 (0-100) ग्राम- 39

प्रोटीन- ऊर्जा ग्रहण का करीब 15 प्रतिशत          

बीफ या लैम्ब 7 (0-14) ग्राम- 15                                

पोर्क 7 (0-14) ग्राम- 15                                             

पाल्ट्री 29 (0-58) ग्राम- 62                                        

अंडे 13 (0-25) ग्राम (प्रति सप्ताह करीब डेढ़ अंडा)       19           

मछली (शल्क वाली मछली समेत) 28 (0-100) ग्राम           40              

सूखी बीन्स, दायल या मटर 50 (0-100) ग्राम                 172 

सोया भोज्य, सूखा 25 (0-50) ग्राम               112

मूंगफली 25 (0-75) ग्राम                           142                                    

ट्री नट्स 25 (0-75) ग्राम

दुग्ध उत्पाद (दूध एवं डेयरी उत्पाद, जैसे कि पनीर आदि)    

250 (0-500) ग्राम                                        153

फल एवं सब्जियां-

सब्जियां 300 (200-600) ग्राम। इनमें 100 ग्राम हरी सब्जियां, 100 ग्राम लाल एवं नारंगी सब्जियां तथा 100 ग्राम अन्य सब्जियां

हरी पत्तीदार सब्जियां                   23

लाल एवं नारंगी सब्जियां               30

अन्य सब्जियां                       25

फल 200 (100-300) ग्राम                      126

वसा-

पाम आयल 68 (0-6.8) ग्राम              60

अनसैचुरेटेड तेल (जैतून, सोयाबीन, रैपसीड, सनफ्लावर

और मूंगफली तेल) 40 (20-80) ग्राम            354

डेयरी उत्पाद वसा (जैसे कि मक्खन) 0 ग्राम     00

चर्बी या मेद 5 (0-5) ग्राम               36

सवंर्द्धित शर्करा

सभी प्रकार की मिठास 31 (0-31) ग्राम          120

इस अध्ययन के लेखकों का अनुमान है कि ऐसी डाइट को व्यापक तौर पर अपनाने से ज्यादातर पोषक तत्वों को ग्रहण किया जा सकेगा। इससे मोनो और पालीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड्स अधिक मात्रा में ग्रहण होगी और सेहत के प्रति नुकसानदेह सैचुरेटेड वसा का उपयोग कम होगा। इससे ग्रहण किये जाने वाले जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों (निम्न आय वाले देशों में आयरन, जिंक, फोलेट और विटामिन ए के साथ-साथ कैल्शियम) की मात्रा में बढ़ोत्तरी होगी। सिर्फ विटामिन बी12 को छोड़कर, जिसकी भरपाई के लिये कुछ परिस्थितियों में पूरक आहार देना जरूरी होता है।

रिपोर्ट के लेखकों ने भोजन से सम्बन्धित बीमारियों के कारण होने वाली मौत से बचने के लिये अपनाये जाने वाले आहार के वैश्विक स्तर पर ग्रहण करने से होने वाले प्रभावों का प्रारूपीकरण भी किया है। तैयार किये गये तीन माडलों में से प्रत्येक के जरिये हमें प्रमुख स्वास्थ्य लाभ दिखायी देते हैं।

इन माडलों से पता चलता है कि अगर नयी डाइट को वैश्विक स्तर पर अपनाया जाए तो हर साल एक करोड़ नौ लाख से लेकर एक करोड़ 16 लाख मौतों को रोका जा सकता है। साथ ही भोजन से सम्बन्धित कमियों से होने वाली वयस्क लोगों की मौतों के प्रतिशत में 19 से 23.6 प्रतिशत तक की कमी लायी जा सकती है।

अध्ययन के लेखकों ने भोजन, मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरणीय सततता के प्रमाण लगातर उभर रहे हैं और इसमें अनिश्चितता भी शामिल है। लिहाजा उनके अनुमानों में असमानता भी है लेकिन उभरने वाली सम्पूर्ण तस्वीर को लेकर वे पूरी तरह आश्वस्त हैं।

प्रोफेसर लांग का कहना है कि

‘‘जहां चीन, ब्राजील, वियतनाम और फिनलैंड में 20वीं सदी में भोजन की सम्पूर्ण व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए हैं। इनसे जाहिर हुआ है कि खान-पान को तेजी से बदला जा सकता है लेकिन मानवता ने इस गति और पैमाने पर अपना भोजन बदलने पर कभी ध्यान नहीं दिया। लोग अनपेक्षित परिणामों की चेतावनी दे सकते हैं या यह तर्क दे सकते हैं कि कार्रवाई के लिये यह सही समय से बहुत पहले की बात है। बहरहाल, इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं और इस मामले में अभी फौरन कदम उठाने की जरूरत है और किसी भी तरह की देर होने से स्वास्थ्य तथा जलवायु सम्बन्धी लक्ष्यों को प्राप्त करने में देर होने का खतरा बढ़ जाएगा।”

खाद्य सततता-

1950 के दशक के मध्य से जलवायु परिवर्तन में काफी तेजी आयी है। पर्यावरणीय क्षरण में खाद्य उत्पादन का सबसे बड़ा योगदान है। सततता बनाये रखने के लिये खाद्य उत्पादन को जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि, पानी और जमीन के उपयोग सम्बन्धी आवश्यक प्रतिबंधों और सावधानियों के साथ-साथ नाइट्रोजन और फास्फोरस के चक्रों के दायरे में लाना ही होगा।

हालांकि दुनिया में भोजन की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिये खाद्य उत्पादन में भी समुचित तेजी लानी होगी। इसके लिये जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को समाप्त करके कृषि के डीकार्बनाइजेशन को रोकना और कृषि में भूउपयोग परिवर्तन से होने वाले कार्बन डाई आक्साइड के नुकसान को रोकना होगा।

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