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Environment and climate change

जलवायु आपातकाल की स्थिति, ग्लेशियर्स पिघलने से दुनिया के जल संतुलन पर खतरा

Glacier melting threatens the water balance of the world, climate emergency situation

हिमनद यानी ग्लेशियर्स पिघलने से समुद्र का स्तर (Sea level) बढ़ रहा है, मूँगा चट्टानें मर रही हैं (Coral reefs are dying) और हम जीवन के लिए घातक इस जलवायु परिवर्तन का असर (The impact of climate change) हीट वेव, वायु प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम के माध्यम से स्वास्थ्य पर देख रहे हैं।

भारतीय शोधकर्ताओं के एक हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव (Side effects of climate change) से भारत का हिमालयी क्षेत्र (Himalayan region) काफी अधिक प्रभावित हो रहा है और यदि इसी तरह जलवायु परिवर्तन जारी रहा तो आशंका है कि वर्ष 2050 तक सतलज घाटी के आधे से अधिक ग्लेशियर्स गायब हो सकते हैं।

एक अन्य नए व्यापक अध्ययन से पता चलता है कि बढ़ते तापमान के कारण हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना 21 वीं सदी की शुरुआत से नाटकीय रूप से तेज हो गया है। भारत, चीन, नेपाल और भूटान में 40 वर्षों के उपग्रह अवलोकन का विश्लेषण बताता है कि वर्ष 2000 के बाद से हर साल ग्लेशियर पिघलने की मात्रा 1975 से 2000 की तुलना में दोगुना है।

हिमालय सहित एशिया की उच्च पर्वत श्रृंखलाओं के ग्लेशियरों का पिघला हुआ पानी, हर साल लगभग 221 मिलियन लोगों की पानी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करता है। लेकिन एक अध्ययन में पाया गया है कि कुछ ही दशकों में मीठे पानी के ये स्रोत सिकुड़ रहे हैं। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से लाखों लोगों की जल सुरक्षा को खतरा है।

वर्तमान समय में लगभग 600 बिलियन टन बर्फ सहेजने वाले हिमालय को कभी-कभी पृथ्वी का “तीसरा ध्रुव” कहा जाता है। हिमालय के ग्लेशियर पर लगभग 800 मिलियन लोग सिंचाई, जल विद्युत और पीने के पानी के लिए निर्भर हैं।

सूखा पड़ने की स्थिति में ग्लेशियर्स की भूमिका अहम हो जाती है। रेन्डॉल्फ ग्लेशियर इन्वेंटरी 5.0 के अनुसार ग्लेशियर सूखे के दुष्प्रभावों से डाउनस्ट्रीम आबादी की रक्षा करने में अल्पकालिक लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

एक ऐसे समय में जब सभी नदी-बेसिन में पानी के भंडार में कमी हो जाती है तब ग्लेशियल बर्फ पिघलकर नदियों में जल की आपूर्ति बढ़ाकर सूखे के दुष्प्रभाव से बचाती हैं।

ग्लेशियर सदियों से बर्फ के रूप में वर्षा के जल का संग्रहण करके जल विज्ञान प्रणाली के माध्यम से जल संतुलन कायम करते हैं।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) World Meteorological Organization (WMO) के अनुसार 2015-2019 के रिकॉर्ड के अनुसार पृथ्वी अपने पांच सबसे गर्म वर्षों का अनुभव करने के लिए तैयार है। वैश्विक उत्सर्जन अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है और इसके किसी बिंदु पर ठहरने के संकेत नहीं हैं।

डब्लूएमओ के अनुसार पिछले चार साल सर्वाधिक गर्म थे और आर्कटिक में सर्दियों का का तापमान वर्ष 1990 को बाद से 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है।

डब्लूएमओ के अनुसार ग्रीनहाउस गैस की सांद्रता बढ़ने से वैश्विक गर्मी बढ़ेगी – और ग्लेशियर पिघलने से समुद्र के स्तर में वृद्धि होगी जिससे समुद्र की गर्मी बढ़ेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए मौसम अपने चरम पर होगा।

डब्लूएमओ के महासचिव पेट्री तालास क्लाइमेट एक्शन समिट के लिए संचालन समिति के सदस्य हैं। वह भारत के ऊर्जा और संसाधन संस्थान (टीईआरआई) स्कूल ऑफ एडवांस स्टडीज की कुलपति लीना श्रीवास्तव के साथ जलवायु विज्ञान सलाहकार समूह के सह-अध्यक्ष हैं। यह समूह दुनिया भर के नेताओं को जलवायु की स्थिति के बारे में और साथ ही परिवर्तनकारी कार्रवाई और प्रमुख क्षेत्रों में महत्वाकांक्षा बढ़ाने के लिए विज्ञान द्वारा संचालित समाधानों के बारे में बताने के लिए अपनी विस्तृत रिपोर्ट क्लाइमेट एक्शन शिखर सम्मेलन में प्रस्तुत करेगा, जो आगामी 21 से 23 सितंबर 2019 को न्यूयॉर्क में आयोजित होना है।

तालास के मुताबिक, वाक्यांश “जलवायु आपातकाल”, केवल जलवायु के बारे में नहीं है। जलवायु परिवर्तन से समुद्र, जल संसाधन, खाद्य सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र और संपूर्ण ग्रह के सतत विकास पर असर पड़ता है।

डब्लूएमओ के एक बयान के मुताबिक वातावरण में ग्रीनहाउस गैस की सांद्रता अभी भी बढ़ रही है। कार्बन डाइऑक्साइड सदियों से वायुमंडल और महासागर में विद्यमान है, और इसलिए भविष्य में तापमान में वृद्धि और महासागर के अम्लीकरण को जारी रखेगा।

कोलंबिया विश्वविद्यालय के लामोंट-डोहर्टी अर्थ वेधशाला में एक पी.एच.डी. स्कॉलर जोशुआ मौरर (Joshua Maurer) के नेतृत्व में हुए अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया है कि सन् 1975 से सन् 2000 तक पूरे क्षेत्र में ग्लेशियर्स गर्मी में मामूली बढ़त के चलते ही हर साल लगभग 0.25 मीटर (10 इंच) बर्फ खो देते हैं।

1990 के दशक में शुरू होने वाले अधिक स्पष्ट ग्लोवल वार्मिंग प्रवृत्ति के बाद, 2000 में शुरू होने वाला नुकसान सालाना लगभग आधा मीटर (20 इंच) तक बढ़ गया।

मौरर कहते हैं कि हाल के वर्षों में ग्लेशियर पिघलने के कारण जल की जो हानि हुई है वह औसतन 8 बिलियन टन पानी की हुई जिसे 3.2 मिलियन ओलंपिक स्विमिंग पूल के जल के बराबर माना जा सकता है।

उन्होंने नोट किया कि अधिकांश ग्लेशियर अपनी संपूर्ण सतह पर समान रूप से नहीं पिघल रहे हैं, बल्कि निचली सतह पर अधिक पिघल रहे हैं और एक वर्ष में पांच मीटर (16 फीट) तक पिघल रहे हैं।

कैम्ब्रिज में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण के ग्लेशियोलॉजिस्ट हैमिश डी. प्रिचर्ड ने एक अलग अध्ययन में पाया है कि पहाड़ों में ग्लेशियर बर्फबारी से जितना जल संग्रहण करते हैं उसके 1.6 गुना तेजी से पिघल रहे हैं। जिस तरह वैश्विक तापमान का बढ़ना जारी है और यह रफ्तार बनी रहती है और गर्मियों में हिमनदों पिघलना इसी तरह जारी रहा तो ग्लेशियर्स बहुत जल्द सिकुड़ जाएंगे। उनका अनुमान है कि अगर देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर लगाम लगाने में विफल रहते हैं, तो वर्ष 2090 के बाद क्षेत्र की नदियों में ग्लेशियर्स के जल बहने में भयंकर कमी हो जाएगी।

हैमिश डी. प्रिचर्ड ने अपने अध्ययन में बताया है कि इन एशियाई हिमालयों के बेसिनों में रहने वाली भारत, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल और चीन की बड़ी आबादी विशेष रूप से पानी की कमी की चपेट में है। पिछली सदी में, सूखा क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा का सबसे हानिकारक रूप रहा है, जिसमें 6 मिलियन से अधिक मौतें हुईं और 1.1 बिलियन लोग प्रभावित हुए।

भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर के दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के जल भंडार के भविष्य में प्रभावित होने की आशंका है। उत्तरी पश्चिमी हिमालय में सतह के वायु तापमान में वृद्धि 1991–2015 के दौरान 0.65 अंश हुयी थी – जो वैश्विक वृद्धि की दर 0.47 अंश से कहीं अधिक है।

इस अध्ययन के मुताबिक सतलज नदी घाटी में ग्लेशियरों का लगभग 55 प्रतिशत 2050 तक लुप्त हो जाने की आशंका है, और 2090 तक कुल ग्लेशियरों का केवल तीन प्रतिशत ही बचा रहेगा।

Amalendu Upadhyaya hastakshep अमलेन्दु उपाध्याय लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं।

भारतीय अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक ग्लेशियरों के निरंतर पिघलने से धीरे-धीरे धारा प्रवाह में कमी आएगी। ग्लेशियर के द्रव्यमान और क्षेत्र में बढ़ती कमी, भाखड़ा जलाशय में जाने वाले पानी को प्रभावित करेगी। इससे ग्लेशियर झील के फटने से बाढ़ जैसी आपदाओं की आशंकाएं भी बढ़ जाएंगी।

डब्ल्यूएमओ के एक बयान के मुताबिक हाल के हफ्तों में भारत, पाकिस्तान और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के देरी से आने के कारण भारत के छठे सबसे बड़े शहर चेन्नई सहित जल संसाधनों पर दबाव पड़ा है।

तो कुल मिलाकर जब हम पड़ोसी देशों को नदियों का पानी रोक देने की धमकी देते हैं, उस समय हमें यह ध्यान भी देना चाहिए कि नदियों का पानी हम रोकेंगे तब, जब नदियों में पानी होगा। हालात यह हैं कि पूरी दुनिया ने मिलकर अगर हिमालय के ग्लेशियर्स को बचाने के प्रयास न किए तो अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना पूरी दुनिया को करना पड़ेगा।

अमलेन्दु उपाध्याय

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, टीवी पैनलिस्ट व राजनैतिक विश्लेषक हैं। )



About अमलेन्दु उपाध्याय

अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वे hastakshep.com के संस्थापक/ संपादक हैं।

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One comment

  1. प्रदीप

    फासीवादी propaganda प्रचार माध्यम बनने के बजाय सही वैज्ञानिक व ऐतिहासिक तथ्य परोसें

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