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गोविन्द पानसरे के बहाने किसके छत्रपति ?

दिव्यांशु पटेल

यूँ तो 20 फ़रवरी एक सामान्य सी तारीख है लेकिन एक लोकतान्त्रिक देश में धब्बा बन गयी है क्यूंकि इसी दिन एक निहत्थे अहिंसक इंसान को गोलियों से महज इसलिए छलनी कर दिया गया था क्यूंकि वो झूठ के तंत्र के खिलाफ लगातार लिख और बोल रहा था।

ये त्रासदी का चरम ही कहा जाएगा कि जिस शख्सियत को सामाजिक समावेशन के लिए महात्मा फुले ने बहुजन प्रतिपालक की संज्ञा दी, उसी की जयंती के ठीक एक दिन बाद गोविन्द पानसरे की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गयी क्यूंकि वो बीते तीस से भी ज्यादा सालों से शिवाजी की लोक कल्याणकारी और बहुजन हितैषी राजा की असलियत को प्रचारित प्रसारित करने में लगे हुए थे, जोकि उन्मादी और सांप्रदायिक तत्वों को काफी अखर रहा था।

दो साल बाद भी गोविन्द पानसरे के हत्यारों को कोई क़ानूनी प्रक्रिया सजा नहीं दे पायी है, पर इससे भी ज्यादा भयावह स्थिति यह है कि कामरेड पानसरे की हत्या करने वाली विचारधारा के मंसूबे हर रोज मजबूत होते जा रहे हैं।

झूठ का तंत्र भारतीय समाज में अनेक तरह के कारकों के जरिये बनाया और बढ़ाया जाता है जिसमें अन्धविश्वास, धार्मिक विद्वेष, सामाजिक भेदभाव के साथ साथ ऐतिहासिक महापुरुषों के व्यक्तित्व को सुविधानुसार इस्तेमाल करना भी शामिल होता है।

शिवाजी भी एक ऐसी ही संगठित साजिश का शिकार व्यक्तित्व हैं जिनके नाम का इस्तेमाल आक्रामक तरीके से वो लोग कर रहे हैं जिनका शिवाजी महाराज के विचारों या कार्यों से कोई लेना-देना नहीं था।

तिलक के शिवाजी महोत्सव से शुरू हुआ यह झूठ का सिलसिला अब उनके नाम पे करोड़ों की मूर्ति और महंगे आयोजनों पे आ टिका है और यह सब उस देश में हो रहा है, जहाँ खुद शिवाजी महाराज के अपने किसान समुदाय के लोग बदस्तूर आत्महत्याएं कर रहे हैं, कर्जों के बोझ से दबे हुए अपने सपनों का क़त्ल कर रहे हैं।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हिसाब से 2014 किसानों के लिए सबसे ज्यादा हाहाकारी साल रहा और हाल के आंकड़ों में भी किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है।

यहाँ अपने आप यह सवाल उठता है कि जिस शख्स ने अपने समय में जमीन की जोत, साहूकारों के गिरोह, बीज के बंटवारे जैसी समस्यायों पे प्रगतिशील कदम उठाते हुए लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की थी, आज उन्हीं शिवाजी महाराज के नाम पे राजनीति चमकाने वालो को ये किसान क्यूँ नहीं दिख रहे!

कामरेड पानसरे ने जब ये सवाल अपनी चर्चित किताब “शिवाजी कौन होता“ में उठाये तो जाहिर तौर पर वो उस तबके के निशाने पे आ गये जिसे झूठ बेचकर समाज में जहर घोलने में सियासी फायदा होता रहा है।

यूँ तो शिवाजी महाराज की विरासत को लेकर बहुत पहले ही महात्मा फुले ने पोवाडा लिख कर और उनकी समाधी की खोज करके उनके कुनबी वंशावली और बहुजन हितैषी होने के पर्याप्त प्रमाण लिखित रूप में प्रस्तुत कर दिए थे, लेकिन बीते तीन दशक में भारतीय राजनीति में हिन्दुत्ववादी आतंक के उभार में संघ द्वारा फुले,शाहूजी महाराज, बाबा साहब, शिवाजी, भगत सिंह समेत हर उस शख्शियत का इस्तेमाल किया गया या करने की कोशिश की गयी जिसकी पूरी जिंदगी ऐसी विचारों के उलट काम करने में बीती थी।

जिसने भी इस संगठित झूठ के प्रचार का अकादमिक तरीके से पर्दाफाश किया उस पर चरित्र हनन से लेकर प्राण घातक हमले किये गये।

वैसे तो भारत में तर्क और पोंगापंथ दोनों की परम्परा आश्चर्यजनक रूप से साथ साथ चली है लेकिन हाल फिलहाल के दिनों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जोकि हमारे संविधान का एक मौलिक कर्त्वव्य भी है और विपरीत विचारों के प्रति सहिष्णुता सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है।

जैसाकि भारत में संगठित तर्कवाद पर मौलिक शोध करने वाले प्रो जोयंस क्वेक अपनी किताब में कहते हैं कि फुले,शाहूजी महाराज, गोरा, बाबा साहब और पेरियार ये पांच व्यक्तित्व तर्कवादी आन्दोलन के आधार स्तम्भ हैं और इनके देश में दाभोलकर, पानसरे जैसे व्यक्तियों की हत्या यह बतलाती है कि कहीं न कहीं एक समाज के रूप में हम विफल हो रहे हैं।

व्यक्तियों के ऊपर दावा करने वालों का उन्मादी चरित्र दरअसल पूरे समाज के लिए खतरनाक होता है यह किसी भी व्यक्तित्व के साथ हो सकता है। बाबा साहब अम्बेडकर, सरदार पटेल, शिवाजी महाराज समेत एक लम्बी फेहरिस्त हो सकती है गोयबल्स के भारतीय संस्करण द्वारा फैलाये गये झूठों और अफवाहों की जिनकी बुनियाद पर बाकायदा नागरिक समाज को धमकाया जा रहा है, मानसिक उत्पीडन किया जा रहा है और पानसरे की तरह मारा भी जा रहा है।

हाल ही में शिवाजी महाराज के हिन्दू नायक होने के संघी थ्योरी के विपरीत ख्याल फेसबुक पर लिखने पर इलाहाबाद स्थित पत्रकार मोहम्मद अनस को इस हद तक धमकियाँ दी गयीं कि आखिर में उन्हें अपनी पोस्ट डिलीट करनी पड़ी, जबकि उसी पोस्ट में उन्होंने बाबर को भी धरम का सहारा राजनीतिक मंसूबों के लिए लेने वाला शख्स बतलाया था। मगर अनस पर संगठित तरीके से शिवाजी को लेकर हमले उनकी मुस्लिम पहचान को लेकर किये गये।

ऐसा करने वाले अगर शिवाजी के तोपची इब्राहीम, नौ सेना प्रमुख दौलत खान, आगरा के किले से भगाने वाले मदारी मेहतर आदि लोगों और शिवाजी की जीतो में उनके योगदान को जानते तो शायद किसी मोहम्मद अनस को उनकी धार्मिक पहचान के साथ शिवाजी पर लिखने, न लिखने की धमकियाँ न मिलती।

सवाल सिर्फ इतना है कि मरते किसानों, बदहाल खेती, सुस्त अर्थव्यवस्था के बीच सांप्रदायिक उन्माद फ़ैलाने वाले जिस तरह से लोगों को धमका रहे हैं उसका जवाब क्या है ?

शिवाजी किसके हैं? वो महात्मा फुले के बहुजन प्रतिपालक राजा हैं, कामरेड पानसरे के लोक कल्याणकारी राजा हैं या उन्मादियों के नकली राष्ट्रवाद के प्रतीक चिन्ह हैं जिसमे किसानों,मजदूरों, दलितों,आदिवासियों,अल्पसंख्यकों के सवालों और सरोकारों की कोई जगह नहीं होती।

कम से कम कामरेड पानसरे की शहादत के दिन और छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के अवसर पे हमें अपने राज्य से यह सवाल पूछना ही चाहिए कि कब तक झूठ का प्रतिरोध करने पर पानसरे मारे जाते रहेगे ? कब तक किसानों की आत्महत्यायों को मूर्तियों के शोर में दबाया जायेगा ? कब सरकारें लोक कल्याण को अपना प्राथमिक ध्येय बनाएगी ? अगर छत्रपति शिवाजी महाराज किसी के हैं तो वो हाशिये के समाज के हैं,जिनकी आवाज को हर रोज घोंटा जा रहा है, जिनके सरोकारों को नजरंदाज किया जा रहा है, इसलिए यह वक़्त की मांग है कि वो सभी जिन्हें इस देश को बचाने में जरा भी दिलचस्पी है वो ऐसी आवाजों के साथ खड़े हों, वो कामरेड पानसरे की शहादत के साथ खड़े हों।

 

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