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हरियाणा विधानसभा चुनाव : बागियों ने मुकाबला बनाया चुनौतीपूर्ण

हरियाणा में किस करवट बैठेगा ऊंट?

90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल 27 अक्तूबर को समाप्त हो रहा है और चुनाव आयोग द्वारा 21 सितम्बर को की गई हरियाणा विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से प्रदेश की राजनीति में बहुत कुछ बदल चुका है। हरियाणा के बारे में अक्सर कहा जाता रहा है कि यहां की जनता का जनादेश अक्सर चौंकाने वाला होता है। मतदाता यहां कब किसे पलकों पर बैठाकर सत्ता तक पहुंचा दें, कहना मुश्किल होता है। फिलहाल तो भाजपा हो या कांग्रेस अथवा जजपा, सभी पार्टियों में बड़े स्तर पर हुई बगावत ने इन सभी दलों के समीकरण उलझा दिए हैं, जिससे चुनावी मुकाबला बेहद चुनौतीपूर्ण और रोचक हो गया है। बगावत का सबसे ज्यादा असर दोनों प्रमुख दलों भाजपा तथा कांग्रेस में देखने को मिला, जहां अपनी टिकट पक्की मानकर चल रहे नेताओं ने टिकट न मिलने पर या तो दूसरे दल का दामन थाम लेने में देर नहीं लगाई तो कई स्थानों पर वे बतौर निर्दलीय अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ मैदान में कूद गए। बड़े पैमाने पर हुई बगावत के बाद बिगड़े समीकरणों को साधकर माहौल को पूरी तरह अपने पक्ष में कर लेना किसी भी दल के लिए इतना आसान नहीं होता। यही कारण है कि भाजपा हो या कांग्रेस अथवा अन्य कोई भी दल, इस बार कई विधानसभा सीटों पर राजनीति के बड़े-बड़े शूरमाओं के भी पसीने छूट रहे हैं और कई सीटों पर तो बड़ी ही रोचक त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है। सत्तारूढ़ दल भाजपा के कई दिग्गजों को तो अपने ही क्षेत्र के कुछ इलाकों में मतदाताओं के कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है।

जहां तक दोनों दलों के घोषणापत्रों की बात है तो दोनों ही दलों ने करीब-करीब एक जैसे ही लुभावने वायदे किए हैं लेकिन सबसे हैरानी की बात यह रही कि जिस हरियाणा में किसान मतदाताओं की बहुत बड़ी संख्या है, वहां अपने घोषणापत्रों में दोनों में भी किसी ने भी किसानों के हित में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख करना तक जरूरी नहीं समझा। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में रोजगार, शिक्षा तथा किसानों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है, वहीं कांग्रेस ने गरीब महिलाओं को दो हजार रुपये चूल्हा खर्च से लेकर किसानों की कर्ज माफी तथा हर जिले में गौशाला खोलने जैसे वायदे किए हैं। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 2022 तक अन्नदाताओं की आय दोगुनी करने, किसानों के लिए एक लाख सौर पंप, हर फसल की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करने, हर खेत तक पानी पहुंचाने, कार्यशील और दुधारू पशुओं की नियमित स्वास्थ्य जांच करने, उन्हें बीमा के दायरे में लाने तथा आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए जिला स्तर पर पॉलीक्लीनिक स्थापित करने, डेयरी व पशुपालन में महिलाओं के लिए विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रम शुरू करने, गोबर धन योजना का विस्तार करने, राज्य में बड़ी डेरियों को बढ़ावा देने जैसे वायदे किए हैं। वहीं, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में दो एकड़ तक की जमीन वाले किसानों को मुफ्त बिजली और फसल बीमा की एकमुश्त किश्त देने, सूखा, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसल खराब होने पर 12000 रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने, नए मोटर व्हीकल एक्ट में भारी जुर्मानों के कानून को खत्म करने, महिलाओं और किसानों पर विशेष ध्यान देने, हरियाणा सरकार की सभी नौकरियों तथा निजी संस्थानों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने, पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण, महिलाओं को सम्पत्ति हाउस टैक्स में 50 फीसदी की छूट देने, हर विधानसभा क्षेत्र में गौशाला खोलने तथा गौशालाओं को सालाना बजट देने, गौमूत्र और गोबर का प्रसंस्करण कर उससे आयुर्वेदिक दवाएं, जैविक खाद और जैविक कीटनाशक तैयार करने, मॉब लींचिंग को लेकर कड़ा कानून बनाए जाने जैसे कई वायदे किए हैं।

1966 में गठित हरियाणा में शुरूआती दौर में कुल 54 विधानसभा सीटें थी, जिनकी संख्या बढ़ाकर 1967 में 81 की गई और उसके बाद 1977 में यह संख्या बढ़कर 90 हो गई। तभी से हरियाणा विधानसभा में 90 सीटें हैं, जिनमें से 17 आरक्षित हैं। 2004 से 2014 तक लगातार 10 वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही और भूपेन्द्र सिंह हुड्डा राज्य के मुख्यमंत्री रहे लेकिन 2014 में मनोहर लाल खट्टर न केवल उनसे मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने में सफल रहे बल्कि हरियाणा में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी अस्तित्व में आई। 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 47 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी जबकि कांग्रेस को 15 और इनेलो को 19 सीटों पर जीत मिली थी, शेष 9 सीटें छोटे दलों और निर्दलीयों की झोली में गई थी। 2009 में सिर्फ 4 सीटों पर सिमटी भाजपा को 2014 में 33.2 फीसदी मतों के साथ पूरे 43 सीटों का फायदा हुआ था जबकि 2009 में 40 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को 2014 में सिर्फ 20.6 फीसदी मत प्राप्त हुए थे और 25 सीटों का नुकसान हुआ था। इनेलो 2009 में 31 सीटें जीतने में सफल रही थी लेकिन 2014 में उसकी सीटों की संख्या भी 12 घट गई और उसे 24.1 फीसदी मतों से ही संतोष करना पड़ा।

इस बार चुनाव की घोषणा के समय जहां हवा पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में बहती नजर आ रही थी, वहीं अब परिस्थितियां उसके लिए इतनी अनुकूल प्रतीत नहीं हो रही। कई सीटों पर जहां उसका कांग्रेस के साथ सीधा मुकाबला है तो कुछ सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय है। यही कारण है कि कुछ दिनों पहले तक 90 सदस्यीय विधानसभा में 75 सीटें आसानी से जीत लेने का सपना देख रही भाजपा को भी अब जमीन पर खूब पसीना बहाना पड़ रहा है। खासकर, उत्तर तथा दक्षिण हरियाणा के मुकाबले जाटलैंड की करीब 30 सीटों पर भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर हरियाणा की 31 में से 22 और दक्षिण हरियाणा की 29 में से 16 सीटों पर जीत मिली थी जबकि जाटलैंड की 30 में से सिर्फ 9 सीटों पर ही पार्टी अपना परचम लहराने में सफल हुई थी। प्रचण्ड मोदी लहर के बावजूद गढ़ी-सांपला, किलोई, तोशाम, खरखौदा, बड़ौदा, जुलाना, कालांवाली, रानियां, डबवाली, आदमपुर, नलवा, फिरोजपुर झिरका, फतेहाबाद इत्यादि कुल 12 सीटों पर तो भाजपा प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने में भी नाकाम रहे थे। यही कारण है कि इन सीटों पर भाजपा ने इस बार नए चेहरों पर दांव लगाया है।

जाटलैंड की बात करें तो यहां की अधिकांश सीटों पर भाजपा का कहीं कांग्रेस से तो कहीं जजपा के साथ सीधा मुकाबला है। महम, चरखी दादरी, पुंडरी, गुहला इत्यादि कुछ सीटों पर तो बागी ही पार्टी उम्मीदवारों के लिए मुसीबत बन रहे हैं। हालांकि चंद माह पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा हरियाणा में सभी दस सीटें बहुत बड़े अंतर के साथ जीतने में सफल हुई थी लेकिन उसे न तो इस लोकसभा चुनाव में और न ही 2014 के विधानसभा चुनाव में जाटलैंड की सीटों पर विपक्ष के सियासी तिलिस्म को तोड़ने में सफलता मिली थी। दरअसल लोकसभा चुनाव में जाटलैंड की कई विधानसभा सीटों पर भाजपा बढ़त बनाने में नाकाम रही थी। कमोवेश यही हालात इस बार भी नजर आ रहे हैं। स्थिति इतनी चुनौतीपूर्ण है कि बादली, महम, किलाई, बेरी, गढ़ी सांपला, टोहाना इत्यादि कई महत्वपूर्ण मानी जा रही सीटों पर भी भाजपा के कुछ दिग्गज प्रत्याशी कांग्रेस या जजपा के साथ कड़े मुकाबले के फंसे हैं और कहीं-कहीं तो भाजपा प्रत्याशियों के तीसरे स्थान पर रहने तक के कयास लगाए जा रहे हैं।

बात कांग्रेस की की जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर नेतृत्व के चलते देशभर में जनाधार खो रही कांग्रेस के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बना है। हालांकि चुनाव की घोषणा के काफी समय पहले से ही बगावती तेवरों से बुरी तरह जूझ रही कांग्रेस के लिए जीत की राह इतनी आसान नहीं है। बगावती तेवर कितने प्रबल थे, यह तभी साफ हो गया था, जब प्रदेश कांग्रेस के आला नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने बगावती तेवर दिखाए थे और उनके पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने के अनुमान लगाए जाने लगे थे। हालांकि आलाकामान ने स्थिति को संभालते हुए चुनाव से ठीक पहले कुमारी शैलजा को प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त करते हुए भूपेन्द्र हुड्डा को विधायक दल का नेता तथा विधानसभा चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपकर उन्हें मना लिया था लेकिन शैलजा तथा हुड्डा की इन पदों पर ताजपोशी पार्टी के कई नेताओं को रास नहीं आई। हुड्डा को टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रचार सहित पूरी आजादी दिए जाने के बाद पार्टी के भीतर बगावत के सुर और बुलंद होते गए। चुनावी दौर में अशोक तंवर सहित प्रदेश स्तर के कई बड़े नेताओं द्वारा पार्टी को अलविदा कहना कुछ सीटों पर पार्टी के जीत के समीकरण गड़बड़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य निभाएगा। हालांकि बड़ी जिम्मेदारियां मिलने के बाद से ही हुड्डा हरियाणा के अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ खासकर जाटलैंड में कांग्रेस का परचम लहराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं क्योंकि उन पर अब भाजपा को कड़ी टक्कर देते हुए बेहतर परिणाम लाने का दबाव बढ़ गया है।

भाजपाध्यक्ष एवं केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह महम क्षेत्र में तीन विधानसभा क्षेत्रों के प्रत्याशियों के समर्थन में चुनावी महासभा कर चुके हैं, वहीं हुड्डा स्वयं कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए धुआंधार प्रचार में जुटे हैं। बेहद ईमानदार और साफ-सुथरी छवि वाले अपने पुत्र दीपेन्द्र हुड्डा को उन्होंने जाटलैंड में कांग्रेस का परचम लहराने की जिम्मेदारी सौंपी है, जो रोहतक, झज्जर और सोनीपत में बतौर स्टार प्रचारक सक्रिय हैं। अगर 2014 के विधानसभा चुनाव परिणामों की बात करें तो भले ही कांग्रेस तब रोहतक शहर, बहादुरगढ़, बादली तथा सोनीपत शहर की सीटें हार गई थी लेकिन हरियाणा में भी चली मोदी लहर के बावजूद हुड्डा अपना गढ़ बचाने में सफल रहे थे। उनके नेतृत्व में रोहतक में तीन, झज्जर में दो और सोनीपत में पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस विजयी हुई थी और इस बार उनका पूूरा प्रयास है कि कम से कम जाटलैंड में तो कांग्रेस को अच्छी खासी बढ़त दिलाई जाए। हालांकि भाजपा उन सभी सीटों पर भी अपना दांव खेल रही है, जहां पिछली बार कांग्रेस का कब्जा था और इसीलिए इन इलाकों में पार्टी ने अपने कई स्टार प्रचारकों को माहौल बनाने केे लिए मैदान में उतारा है।

अगर बात की जाए जजपा की चुनावी जीत की संभावनाओं की तो इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला के जेल जाने के बाद पार्टी में पारिवारिक कलह इस कदर परवान चढ़ी कि अपने सगे चाचा अभय चौटाला से गंभीर मतभेदों के चलते दुष्यंत चौटाला ने इनेलो से नाता तोड़कर कुछ ही माह पहले जननायक जनता पार्टी (जजपा) नामक नई पार्टी का गठन कर लिया। हालांकि इस बार के चुनाव में जजपा का प्रभाव चंद सीटों तक ही सीमित रहने के आसार हैं।

दरअसल कुछ माह पहले हुई इनेलो की जबरदस्त टूट के कारण पार्टी के मतदाता बिखर गए हैं। हां, इनेलो के बहुत से परम्परागत मतदाता जजपा के साथ अवश्य मजबूती से टिके हैं और उसी का फायदा उसे कुछेक सीटों पर मिल सकता है। फिलहाल एक ओर जहां दुष्यंत पर चुनाव में स्वयं जीतकर विधानसभा में पहुंचने का भारी दबाव है, वहीं हरियाणा में पार्टी को पुनः स्थापित करना भी उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो राज्य की अधिकांश सीटों पर चुनावी बाजी मुख्यतः भाजपा और कांग्रेस के बीच ही देखने को मिलेगी जबकि कुछ सीटों पर बागी निर्दलीय उम्मीदवार और छोटे दल भी करिश्माई भूमिका निभा सकते हैं।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

 

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