शब्द
यह क्रूरता के अद्भुत साधारणीकरण का समय है -  प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल
यह क्रूरता के अद्भुत साधारणीकरण का समय है -  प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल

हिन्दू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान

अतिथि लेखक
2018-09-24 22:36:36
एय मेरी तुलू ए नूर  तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर
एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर ..

एय मेरी तुलू ए नूर .. तू बढ़ और छा जा अबद की काली रवायतों पर .. कर शुरूआत नयी .. लिक्ख उजाले  अपनी लकीरों में .. तू ख़ुशियों का अर्क पी ..

अतिथि लेखक
2018-09-24 20:25:36
रामचंद्र गुहा की नई किताब और किताबों की कीमत का सवाल
रामचंद्र गुहा की नई किताब और किताबों की कीमत का सवाल

यह सच है कि हिंदी की किताबों की कम बिक्री उसकी कीमतों को प्रभावित करती है। लेकिन किताब की अधिक कीमत उसकी बिक्री को भी बाधित करती है।

अरुण माहेश्वरी
2018-09-21 12:14:29
हमारे समय का सच- रूममेट्स
हमारे समय का सच- रूममेट्स

सीत हार गई, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। वह झाँसी वाली भी तो हार गई थी, कुछ लड़ाइयो में लड़ने का हौसला जुटा पाना ही जीत होती है।

अतिथि लेखक
2018-09-20 22:03:38
समीर अमीन  मार्क्सवाद के एक योद्धा का निधन
समीर अमीन : मार्क्सवाद के एक योद्धा का निधन

मार्क्सवाद को नए आयाम देने वाले तथा जनवादी दुनिया के सपने के आशाद्वीप समीर अमीन ने ऐसे समय दुनिया को अलविदा कह दिया जब उनकी बेइम्तहां जरूरत थी

ईश मिश्र
2018-09-08 00:24:49
नए अनुभव संसार की कहानियां हैं पूर्वोत्तर का दर्द
नए अनुभव संसार की कहानियां हैं पूर्वोत्तर का दर्द

उग्रपंथियों का संघर्ष वैसे लोगों का संघर्ष है, जो शहरी जीवन से बेहद दूर पर्वतीय इलाके में सरकारी तंत्र और शोषण का अनाचार सहते रहे हैं।

अतिथि लेखक
2018-09-07 20:54:57
मैं भी नक्सल तू भी नक्सल
मैं भी नक्सल तू भी नक्सल

दवा मंगाओ तो भी नक्सल लिंचिंग का विरोध भी नक्सल बच्चों की ऑक्सीजन नक्सल माँऔं की चीज़ें भी नक्सल ख्वाबों की लाश भी नक्सल

अतिथि लेखक
2018-09-01 19:06:02
ईमानदार पाठक भी वस्तुत बहुत बड़ा कवि होता है - विष्णु खरे
ईमानदार पाठक भी वस्तुत: बहुत बड़ा कवि होता है - विष्णु खरे

कविता पढ़ना बहुत परिश्रम की मांग करता है और इसके लिए विश्व पाठक बनना होगा।

अतिथि लेखक
2018-08-28 19:35:19
यह खुद बेहद डरे हुए हैं इस नंगी औरत से
यह खुद बेहद डरे हुए हैं ....इस नंगी औरत से ....

कौन है ..? किसकी क्या लगती है ? कुछ भी तो नहीं पता ...बद़जात का ... एैसी वैसी ही है  ...यह औरत ... शायद औरत भी नहीं है ... यह तो महज़...

अतिथि लेखक
2018-08-25 18:40:02
तेरी गल्ल्याँ  मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा
'तेरी गल्ल्याँ' : मैं चीजों को ही खुदा समझता रहा

नाटक एकदम समाज के उस वर्ग को अभियुक्त बना देता है जो अपने बच्चों पर धन दौलत उपहारों को लुटाकर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री समझ लेता है.

शमशाद इलाही शम्स
2018-08-20 22:07:47
मैं "राजधर्म" में नहीं-नहीं मैं "लोकधर्म" में जिंदा हूँ - अटल बिहारी वाजपेयी ने मृत्यु-उपरांत लिखी कविता
तुम मनाओ 15अगस्त मैं अफ़सोस मनाऊँगी  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस
तुम मनाओ 15अगस्त..../ मैं अफ़सोस मनाऊँगी..../  इस देश में पैदा होने का अफ़सोस.....

हाँ हमने मान लिया.... हम रिश्ते नहीं..महज़..जिस्म हैं... जिस्म.... बग़ैर फ़र्क़ कि उम्र क्या है... 5..7..12...14...सब चलती हैं......,

अतिथि लेखक
2018-08-14 21:48:46
नायपॉल नहीं रहे विद्वेषी चुप हो गया
नायपॉल नहीं रहे, विद्वेषी चुप हो गया

नायपॉल का कहना था, आप अपनी आत्म-जीवनी में झूठ बोल सकते हैं, लेकिन उपन्यास में नहीं। वहां झूठ की जगह नहीं होती। वह लेखक को पूरी तरह से खोल देता है।

हस्तक्षेप डेस्क
2018-08-14 08:51:48
विश्वनाथ तिवारी  सत्ता की पीड़ा बनाम लेखक का सुख
विश्वनाथ तिवारी : सत्ता की पीड़ा बनाम लेखक का सुख

तिवारीजी का लेखकीय आचरण लेखकों की हत्या के प्रसंग में शून्य है। सवाल यह है विश्वनाथ तिवारी नामक लेखक इस विरोध में सबसे पहले शामिल क्यों नहीं हुआ ॽ

जगदीश्वर चतुर्वेदी
2018-08-09 19:54:23
संवेदनाओं का कब्रिस्तान बन गई है हमारी बुतपरस्त-मुर्दा परस्त अंतरात्मा
संवेदनाओं का कब्रिस्तान बन गई है हमारी बुतपरस्त-मुर्दा परस्त अंतरात्मा

सम्मानित नरभक्षी पशुओं को जो जंगल में नहीं शहर के संभ्रांत बस्तियों में रहते हैं

ईश मिश्र
2018-08-06 09:51:51