कदमों के निशाँ : आजाद के आजाद साथी       

भारत शर्मा

इतिहास ने कई लोगों के साथ उतना न्याय नहीं किया, जिसके वे हकदार थे। आजादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद भी तमाम ऐसे योद्धा रहे हैं, जिनका इस देश और समाज के लिए अमिट योगदान है, पर उनका जिक्र इतिहास के पन्नों में उतना नहीं मिलता, इसीलिए शायद बृह्द युवा पीढ़ी उनके कामों से अनभिज्ञ नजर आती है। ये अलग बात है, ऐसे योद्धा जनमानस की चेतना में आज भी जिंदा हैं, क्योंकि उनकी लड़ाई आमजन की खुशहाली के लिए थी। कामरेड गुरुदयाल सिंह ऐसी ही शख्सियत थे, वे एक क्रांतिकारी थे, आजादी की लड़ाई के दौरान उनके हीरो चंद्रशेखर आजाद थे, वे उनके साथी थे। क्रांतिकारिता उनके खून में थी, जो जिंदगी के आखिरी सफर तक जारी रही, वे गोरे अंग्रेजों से लेकर काले अंग्रेजों तक से अनवरत लड़ते रहे। वे एक विचारक थे, जो अपने साथियों को लगातार राजनैतिक शिक्षा देते रहते थे, वे एक लेखक भी थे। हमारी कोशिश उनके इन सभी रूपों को सामने लाने की है।

कामरेड गुरुदयाल सिंह के पूरे आंदोलन को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है, पहला गुलामी के दौरान उनकी अंग्रेजों के साथ चलने वाली लड़ाई, आजादी के बाद आगरा में जमींदारी उन्मूलन को लेकर किए गए उनके आंदोलन, फिर मध्य प्रदेश में उनके द्वारा किए गए आंदोलन और राजनैतिक काम। आगरा जिले के शमसाबाद के बड़ोवरा खुर्द, जो कामरेड का मूल गांव है, वहां आकर खुद चंद्र शेखर आजाद रहे थे। इस गांव में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी आकर रहे थे, ये बात उस समय की है, जब देश गुलाम था और नेहरु राजनीति में कदम रख रहे थे, और वे ग्रामीण भारत को समझने की कोशिश कर रहे थे। गुरुदयाल सिंह का पूरा परिवार आजादी के आंदोलन का सहभागी था, उनके दादाजी ठाकुर देवी सिंह आगरा जिले में कांग्रेस के संस्थापकों में से थे। आजादी की लड़ाई में तमाम ऐसे क्रांतिकारी थे, जिनकी शुरुआत कांग्रेस के साथ हुई थी, पर वे अधिक समय तक कांग्रेस के साथ नहीं रहे, क्योंकि उन्हें लगता था, कांग्रेस गरीब और शोषितों को असली आजादी नहीं दिला सकती। आज देखने पर लगता है, कि उनकी सोच सही थी। ऐसे तमाम नेता जेल के दौराम मार्क्सवादी साहित्य पढ़कर कम्युनिस्ट बन गए, गुरुदयास सिंह भी उन्हीं में से थे। गुलाम भारत में कामरेड ने कई क्रांतिकारी आंदोलन किए, वे आगरा षडयंत्र कांड और हार्डी बम कांड के मुख्य आरोपी भी रहे।

कामरेड गुरुदयाल सिंह के कामों का दस्तावेजीकरण सही तरीके से नहीं किया गया। इतिहास के पन्नों में मेरठ षडयंत्र कांड का जिक्र तो काफी मिलता है, पर आगरा का उतना नहीं। आगरा उस समय क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केन्द्र था, और यह एक दौर में साहित्यकारों का भी बड़ा केन्द्र रहा है। आगरा के पत्रकार डोरीलाल अग्रवाल ने अवश्य कुछ दस्तावेजीकरण करने की कोशिश की थी और कई क्रांतिकारियों पर उन्होंने काम भी किया था। रांगेय राघव खुद कामरेड के बड़े घनिष्ठ दोस्तों में से रहे हैं, इसका जिक्र खुद उन्होंने अपनी जेल डायरी में किया है, जब रांगेय राघव की मौत हुई थी, तब वे आर्थिक अभाव के चलते उनके मिलने नहीं जा सके थे, जिसका उन्हें ताउम्र अफसोस रहा।

इस पुस्तक को प्रकाशित करने का जब मन बनाया, तब कोशिश यह थी, कि आगरा के उन तमाम क्रांतिकारियों को जगह दी जाए, जिनकी आजादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका रही है और युवा पीढ़ी उनके बारे में नहीं जानती। तमाम खोजबीन के बाद वह कुछ सामग्री मिली, जो प्रकाशित की गई हैं । आगरा की क्रांतिकारी घटनाओं को लेकर खुद डोरीलाल अग्रवाल ने पुस्तकों का प्रकाशन किया है, इसमें कई क्रांतिकारियों का जिक्र नहीं मिलता, मसलन हार्डी बम कांड में बेताल सिंह । बेताल सिंह ही वे व्यक्ति थे, जिन्होंने बम रखा था, वे एक किसान थे और घटना के वक्त कम उम्र के थे, इसलिए गिरफ्तार नहीं किए जा सके थे,ऐसी जानकारी अमर उजाला में छपे एक साक्षात्कार से मिलता है, हालांकि खुद डोरीलाल अग्रवाल अमर उजाला से ही जुड़े थे। बेताल सिंह के इस साक्षात्कार को हम यहां जस का तस दे रहे हैं। इस पुस्तक में देवीराम शर्मा पर आधारित एक लेख को भी प्रकाशित किया जा रहा है, वे किसान आंदोलन के बड़े नेता थे, बाद में बड़े मूर्तिकार बन गए थे। बड़ोवरा खुर्द में कामरेड की जो मूर्ति लगी है, वह उन्हीं ने बनाई है।

 आजादी के दौरा न किए गए क्रांतिकारी आंदोलन का जिक्र कुछ लेखों में अवश्य मिलता है, पर उसके तरीके और पूरे घटनाक्रम का जिक्र नहीं मिलता। इनमें से एक हार्डी बम कांड की कहानी क्रांतिकारी बेताल सिंह के साक्षात्कार के रुप में अवश्य मिलती है, जो एक अखबार में छपा था। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन के लिए चलाया गया झाड़ी आंदोलन के साथ भी यही समस्या है, इस आंदोलन के लिए इलाके में आज भी कामरेड को याद किया जाता है, पर वह आंदोलन किस तरह चलाया गया, संगठन का क्या स्वरुप था? इसका जिक्र नहीं मिल पाता। उस आंदोलन में जो लोग उनके साथ रहे वे भी अब इस दुनिया में नहीं हैं, खासकर राधाकिशन यादव, जो आजादी के आंदोलन से लेकर झाड़ी आंदोलन तक कामरेड के साथी थे। यह वह दौर था, जब तमाम कहानी किस्से कामरेड के बारे में सुनाए जाते थे, उनके लिए कई लोकगीत बनाए गए, जो सालों तक गाए जाते रहे। उस समय वे भारत सरकार व भारतीय पुलिस के निशाने पर थे । यह आन्दोलन उनकी जीवटता का परिचायक है, जिसमें उन्होंने जमीदारों से जमीनें छीनकर भूमिहीनों में बांट दीं। सत्ता बदलते ही चरित्र भी बदल जाता है, गुलाम भारत में कांग्रेस के जो नेता गुरुदयाल सिहं के साथ राजनीति करते थे, वे ही झाड़ी आंदोलन के दौरान उनके सामने जमींदारों के पक्ष में खड़े नजर आए। इस आंदोलन के दौरान उनके परिवार के कई सदस्य जेल गए, पर वे पकड़ में नहीं आ सके। आगरा मंडल में यह आंदोलन आज भी नजीर की तरह पेश किया जाता है, क्योंकि इसके बाद इस तरह का आंदोलन शायद ही कोई हुआ है। तेलंगाना, तोभागा और नक्सलबाड़ी में हुए आंदोलन इसी तरह के आंदोलन थे, पर झाड़ी आंदोलन संभवतः अपनी तरह का एकमात्र किसान आंदोलन है, जहां जमीन का वितरण बिना किसी हिंसा के हुआ। यह कामरेड गुरुदयाल सिहं की संगठन क्षमता और रणनीति का सर्वोत्तम उदाहरण माना जा सकता है।

मध्यप्रदेश में उनके द्वारा किए गए कामों को ही हम सिलसिलेवार लिपिबद्ध कर सकें, उनकी पत्नी उर्मिला सिंह की वजह से, जो इस पूरे दौर में उनके साथ रहीं और उन्होंने भी आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। यहां वे स्वास्थ्य लाभ लेने आए थे, पर यहां भी शोषितों की लड़ाई लड़ने लगे और अंत तक लड़ते रहे। मध्य प्रदेश में उनके आंदोलन की शुरुआत इटारसी के गल्ला मंडी आंदोलन से मानी जा सकती है। उनकी संगठन क्षमता देखकर मध्य प्रदेश के कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। क्रांतिकारी जहां भी होता है, वह अन्याय सहन नहीं कर सकता, यही गुण कामरेड गुरुदयाल सिहं में थे, शायद इसीलिए वे जनता में तो लोकप्रिय रहे। कामरेड का मानना था, कि क्रांतिकारी परिस्थितियां लगातार आती रहती हैं, जिसे सही समय पर पहचानकर उनसे हिसाब से रणनीति बनाने और जनता को लामबंद करने की जरुरत होती है। ऐसा न करने पर वह मौका निकल जाता है। दूसरा उनका मानना था, कि क्रांति की रुपरेखा किसी भी देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए, ऐसा न करने पर जनता आंदोलन से कटती चली जाती है। शायद यही कारण थे, कि उनके वामपंथी पार्टियों के साथ भी मतभेद हुए। जब पार्टी की विभाजन हुआ, तो वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ गए। वे माकपा की मप्र इकाई को पहले राज्य सचिव रहे, बाद में वर्धमान प्लेनम के दौरान उनके माकपा से मोह भंग हो गया। उस दौरान पार्टी के एक हिस्से ने नेतृत्व पर मध्य मार्ग अपनाने का आरोप लगाया था। उस समय जो नेता माकपा छोड़कर गए, उनमें से कई ने माओवाद ने नाम पर हिंसा को अपनाया। कामरेड गुरुदयाल सिहं पर भी नक्सल होने के आरोप लगे, पर उनके लेखन से साफ हो जाता है, कि वे हिंसा की राजनीति के कितने खिलाफ थे। कामरेड मानते थे, कि क्रांति के लिए जनता नेता का इंतजार नहीं करती, यह भी तय नहीं है, कि क्रांति लाल झंड़े के बैनर तले ही होगी। माकपा के अलग होने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के स्तर पर क्रांतिकारी मजदूर किसान पार्टी का गठन किया था, उन्होंने युवाओं का एक संगठन जनरक्षक दल भी बनाया था, जो आंदोलन की निरंतरता बनाए रखने के लिए जरुरी था। वे चीनी नेता माओ के तरीकों से प्रभावित थे, इसीलिए उन्होंने अपने काम को पूरी तरह किसानों पर केन्द्रित रखा था। जनरक्षक दल का गठन देखने में एक बार को किसी गुरिल्ला संगठन जैसा लगता है, हालांकि हिंसा का कोई स्थान नहीं था, साथ ही इस बात का ध्यान रखा गया था, कि कार्यकर्ताओं की राजनैतिक शिक्षा भी लगातार होती रहे, इसके लिए हर दल के साथ एक ऐसे व्यक्ति को रखा गया था, जो राजनैतिक चेतना का विस्तार करता रहे, जिससे कार्यकर्ता अपने रास्ते से ना भटके। इसी तरह के संगठन कामरेड ने झाड़ी आंदोलन और गल्ला मंडी आंदोलन के दौरान बनाए थे और दोनों सफल आंदोलन में किसी तरह की हिंसा नहीं हुई। कामरेड गुरुदयाल सिंह ने कभी भी ना तो शासन की तरफ से स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों को दी जाने वाली मदद ली, ना ही कम्युनिस्ट पार्टी में काम करते हुए वेज लिया। वे अपना गुजारा अपने द्वारा बनाई हुई पेंटिंग्स को बेचकर किया करते थे।  

लगातार जेल यात्राओं और आंदोलनों ने कामरेड का काफी कमजोर बना दिया थे, वे बीमार भी रहते थे, जब उनका निधन हुआ, उस समय भी वे अपने काडर को तमाम मुद्दों पर शिक्षित करते रहते थे। वे राच-रात भर हाथ से लिखकर बुलेटिन निकाला करते थे और बांटा करते थे। काडर को शिक्षित करने के लिए उन्होंने “लाल मशाल” नामक अखबार का प्रकाशन भी किया, जिसके दो अंक ही निकाल पाए, हालांकि अगले अंक के कुछ लेख भी तैयार उनके दस्तावेजों में मिलते हैं। मध्य प्रदेश की स्थिति को लेकर जिस तरह की जानकारी उनके दस्तावेजों में मिलती है, उससे पता चलता है, कि कोई भी काम करने से पहले वे कितना अध्ययन किया करते थे। मध्य प्रदेश में प्रतिक्रियावादी ताकतों, सामंतों और सांप्रदायिक ताकतों का गठजोड़ जिस तरह आगे बढ़ रहा है उसे आगे बढ़ाने में कांग्रेस किस तरह मदद कर रही है, इसका आंकलन जो उन्होंने आज से ४७ साल पहले ही कर लिया था।

इस पूरी पुस्तक को कई हिस्सों में बांटा है, पहला हिस्सा उनके परिचय को लेकर है, जो तमाम लेखों पर आधारित है। ये लेख तमाम क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों ने समय-समय पर अलग-अलग समाचार पत्रों में लिखे हैं। उन्हें यहां जस का तस छापा जा रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण लेख उनकी पत्नी उर्मिला सिंह का है, जो मध्य प्रदेश की उनकी पूरी यात्रा की रुपरेखा पेश करता है। बाकी पुस्तक उनके कृतित्व पर आधारित है। इसमें कामरेड के कुछ लेखों को लिया गया है, जो उनकी राजनैतिक समझ को जाहिर करते हैं। गांधी को लेकर उन्होंने चार सवाल नामक एक किताब लिखना शुरु की थी, पर वे एक सवाल तक ही लिख सके। उसे इसमें शामिल किया गया है। यह इसलिए भी जरुरी है, क्योंकि वर्तमान दौर में जब फासीवाद तेजी से आगे बढ़ रहा है, तमाम स्थापित प्रतिमाओं को खंडित करने का दौर चल रहा है, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी निशाने पर हैं। संघ परिवार हमेशा व्यक्तिगत हमलों और चरित्र हनन की राजनीति में भरोसा रखता है, क्योंकि वैचारिक विरोध के लिए अध्ययन की जरुरत होती है। गांधी के मार्क्सवादियों से भी मतभेद रहे हैं, पर वे वैचारिक थे। कामरेड गुरुदयाल सिंह ने इसी को उजागर किया है । हिंसा की राजनीति पर भी उनका काफी सटीक लेख है, यह वह दौर था, जब कानू सान्याल और चारु मजूमदार उन्हें अपने साथ लाने की भरसक कोशिश करते थे। बाद में जब कानू सान्याल ने आत्महत्या की, तो उन्होंने हिंसक आंदोलन को लोकर वहीं बातें कहीं, जो कामरेड गुरुदयाल सिंह ने उस समय कहीं थी, जब हिंसक आंदोलन शुरु हो रहा था। इस पुस्तक में उनकी जेल डायरी को भी स्थान दिया गया है, जो सन १९६२ से ६४ के बीच लिखी गई है, यह वह दौर था, जब भारत चीन युद्ध हो रहा था और तमाम वामपंथी नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था। कामरेड का क्रांतिकारी रिकार्ड देखते हुए उनके लिए जेल का पूरा हिस्सा खाली करा लिया गया था। उनके द्वारा बाहर भेजे जाने वाले या उनके पास आने वाले किसी भी पत्र की जांच पहले खुफिया विभाग करता था। जेल डायरी असल में उनकी अपनी पत्नी के नाम लिखे गए पत्र हैं, जो प्रेम पत्र नहीं राजनैतिक पत्र हैं। एक वामपंथी युद्ध के बारे में किस तरह सोचता है, इसे इन पत्रों के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। यह इसलिए जरुरी है, क्योंकि संघ परिवार या उनके प्रचार में आए युवा अक्सर यह बात करते नजर आते हैं, कि कम्युनिस्टों ने चीन युद्ध के दौरान चीन की तरफदारी की, ये डायरी ऐसे युवाओं को जबाव देती नजर आती है। इसी पुस्तक का एक हिस्सा उनकी कविताओं का भी है। जो उन्होंने अलग-अलग जेल यात्राओं के दौरान लिखी हैं, आजादी से पहले और आजादी के बाद। ये कविताएं एक संकलन से ली गई हैं, जो उनके देहान्त के बाद आगरा के कुछ युवाओं ने निकाली थी, जिसका संपादन जितेन्द्र रघुवंशी ने किया, जो बाद में इप्टा के बड़े पदाधिकारी भी रहे। इस संकलन में पाकिस्तान के एक क्रांतिकारी साथी की शुभकामनाएं भी छपी हैं, जो आजादी के आंदोलन के दौरान कामरेड के साथी रहे थे। कामरेड ने खुद इस बात का जिक्र किया है, कि रांगेय राघव खुद उनसे लिखने के लिए कहा करते थे। कविताओं में दोनों दौर को साफ देखा जा सकता है, आजादी के आंदोलन के दौरान जो जोश कविता में नजर आता है, वह आजादी के बाद नजर नहीं आता, तब असली आजादी की बात होती है।

यह किताब एक दस्तावेज के तौर पर पेश करने की हमारी कोशिश है, इस उम्मीद के साथ, कि पाठकों को पसंद आएगी और हमारे युवा आजाद के एक ऐसे साथी से परिचित होंगे, जिसने देश को आजाद कराने और देशवासियों को गरीबी से आजादी दिलाने के संकल्प के साथ अपनी जिंदगी होम कर दी।

लेखक भारत शर्मा देशबन्धु के रोविंग एडिटर हैं।

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