वह औरत नहीं महानद थी : गहन जीवन राग की कविताएं

संग्रह की कविताओं में आज के जीवन, समाज और राजनीति का जटिल, बहुस्तरीय यथार्थ सामने आया है...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

‘अंधेरे से प्रतिबद्ध लोग’ कविता में उन लोगों की सच्चाई को सामने लाया गया है जिन्होंने बदलाव और क्रान्ति के नाम पर जनता को बरगला कर उसी व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया जो उनका खून पीने वाली थी। यह कविता इमरजेंसी के बाद हुए सत्ता परिवर्तन की सच्चाई को सामने लाती है, जिसे दूसरी आजादी कह कर गौरवान्वित करने की कोशिश की गई।

पुस्तक समीक्षा

  • वीणा भाटिया

हिंदी कविता में कुछ ऐसे कवि बहुत पहले से सक्रिय रहे हैं, जिन्होंने निस्पृह भाव से साहित्य-साधना में अपना जीवन लगा दिया और कभी भी बदले में कुछ नहीं चाहा। दरअसल, ऐसे रचनाकार आंदोलनों की ऊपज रहे और अपना सारा जीवन उन्होंने सांस्कृतिक-साहित्यिक आंदोलनों की जड़ों को सींचने में लगा दिया। मध्यवर्गीय रचनाकारों की तरह उनके लिए साहित्य व्यक्तिगत उपलब्धियां अर्जित करने का साधन कभी नहीं बना। संभवत: यह भी एक वजह रही हो कि ये अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के प्रति उदासीन रहे, यद्यपि पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं लगातार प्रकाशित होती रहीं। कौशल किशोर ऐसे ही रचनाकारों में हैं जो सतत रचनाशील होते हुए भी अपनी कविताओं के संग्रह के प्रकाशन को लेकर कभी उत्सुक नहीं रहे।

इनका पहला कविता-संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ हाल में ही प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह के दो खंडों एक मुट्ठी रेत और अनन्त है यह यात्रा में कुल चौसठ कविताएं शामिल हैं। कविताओं का रचना-काल 1977 से लेकर 2015 तक है। लगभग चार दशकों की इस रचना-यात्रा से गुजरना उस यथार्थ से होकर गुजरना है जिसका इतिहास बहुत ही हलचलों से भरा रहा है और जिस दौरान देश और जनता की दशा में मूलगामी परिवर्तन हुए हैं। 1975 का कालखंड भारत के राजनीतिक इतिहास में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यह वो वक्त है जब देश में पूंजीवादी राजनीति गहन संकट के दौर में फंस गई थी। पूंजीवादी निजाम का प्रतिरोध व्यापक स्वरूप लेने लगा था। एक तरफ जहां किसानों का प्रतिरोध नक्सलवादी विद्रोह के रूप में फैलता जा रहा था, वहीं सत्ता के खिलाफ छात्रों एवं अन्य तबकों के आंदोलन पूरे देश में होने लगे थे, जिसे कुचलने के लिए इमरजेंसी लगाई गई थी। संग्रह में शामिल उस दौर की कविताओं को पढ़ते हुए वह पूरा राजनीतिक परिदृश्य सामने आ जाता है। इन कविताओं में प्रतिरोध की प्रखर राजनीतिक चेतना दिखाई पड़ती है। ये कविताएं उस दौर के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ को सामने लाने के साथ ही चेतना के धरातल पर होने वाले परिवर्तनों को भी लक्षित करती हैं। 

   यह कविता संग्रह ‘हमारे समाज की आधी आबादी को जो संघर्षरत है पूरी और बेखौफ आजादी के लिए‘ यानी स्त्रियों  को समर्पित है। संग्रह की शुरुआत मे ही कवि ने लिखा है -

उसके हाथ जैसे

जैसे हाथ नहीं

रॉकेट लॉंचर हों

रेत नहीं मिसाइल हों

फिर उठाती है एक मुट्ठी रेत

निशाना साधती है

बार-बार दोहराती है

और हर बार नई ताजगी और जोश से भर जाती है

लगता है इस नन्ही सी छोटी सी बच्ची में

समा गया है सारा देश।

इन पंक्तियों में जो अर्थ-संकेत हैं, वे इस कविता संग्रह में शामिल कविताओं की प्रकृति को बतलाने वाले हैं। इन कविताओं में रोज-ब-रोज के संघर्षों में जूझते लोगों की जीवन गाथा सामने आई है, वहीं वे विडम्बनाएं भी पूरी तरह से उभर कर सामने आई हैं जो वंचना के इस दौर में मनुष्य को खालीपन के अहसास से भर देती हैं।

मैं कैसे कह दूं

चाँद-तारे आज भी बिखेर रहे हैं रोशनी

और वक्त के नक्शे पर से

खून के छींटे गायब हैं पूरी तरह?

यह सब मैं आखिर कैसे कह दूं?

इस मौसम में कौन सा गीत लिखूं

कौन सा नया साज-आवाज गढ़ूं?

यही वह सृजनधर्मी बेचैनी है जो कविताओं में भिन्न मनोदशा संघर्ष, उत्साह, तो कहीं दुख और निराशा के रूप में अभिव्यक्त होती है। पर खास बात यह है कि कविताओं का मूल स्वर आशावादी और संघर्षों में आस्था जगाने वाला है। ‘कारखाने से लौटने पर’ कविता में तमाम दमघोंटू परिस्थितियों के बावजूद कवि अंत में लिखता है –

पर यहां मुट्ठी भर

खुलती हवा भी है

जो पूरे शहर में फैल जाने को युद्धरत है

‘अंधेरे से प्रतिबद्ध लोग’ कविता में उन लोगों की सच्चाई को सामने लाया गया है जिन्होंने बदलाव और क्रान्ति के नाम पर जनता को बरगला कर उसी व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया जो उनका खून पीने वाली थी। यह कविता इमरजेंसी के बाद हुए सत्ता परिवर्तन की सच्चाई को सामने लाती है, जिसे दूसरी आजादी कह कर गौरवान्वित करने की कोशिश की गई।

अंधेरे से प्रतिबद्ध ये लोग

दुहाइयों के नाम पर

अपने ताज की असलियत

छिपा रखना चाहते हैं

नयी-नयी परिभाषाएं गढ़ कर

नकाबें बदल कर

नये-नये अन्दाज से

अंधेरे को पहली या

दूसरी आजादी नाम देते हुए

अपने फन में इस कदर माहिर हैं कि

धोखा और धूर्तता

सारे देश में राज करती है।

1978 में लिखी गई यह कविता उस समय की राजनीतिक सच्चाई का बयान करती है। यह कविता इस संग्रह की सबसे महत्त्वपूर्ण कविताओं में है। इसकी वजह यह है कि इसमें कवि की स्पष्ट और निर्विकार क्रांतिकारी चेतना सामने आती है। संग्रह ही अन्य कविताओं में भी अंधेरे के आवृत में घिरे सच को आरपार देखने और उसे सामने लाने की क्षमता है।

समकालीन जनवादी-प्रगतिशील धारा की कविताओं में एक प्रवृत्ति यह देखने को मिलती है कि उनमें सपाटबयानी होती है और कुछ तो महज नारेबाजी बन कर रह जाती हैं। जनवाद और संघर्ष के नाम पर लिखी जाने वाली कविताओं में गढ़ाऊपन भी देखने को मिलता है, साथ ही शिल्प के स्तर पर अजीबोगरीब प्रयोग भी किए जाते रहे हैं। बहुत-सी कविताएं मध्यवर्गीय संवेदना और भाव-बोध तक सीमित होकर रह जाती हैं, वहीं उनमें सर्वहारा और सामान्य जन के प्रति एक सहानुभूति का भाव परिलक्षित होता है, न कि उनके जीवन और संघर्षों से वास्तविक जुड़ाव का। ऐसा प्राय: उन कवियों की रचनाओं में देखने को मिलता है, जिनका श्रमशील जनता के संघर्षों से ठोस धरातल पर कभी जुड़ाव नहीं रहा और उन्होंने जनवाद को एक फैशन के तौर पर अपना लिया। ऐसे कवि कविता में घिसी-पिटी शब्दावली का इस्तेमाल करते रहे। इससे उनकी कविताएं इकहरी और नकली बन कर रह गईं। कविता में अर्थवत्ता तब आती है जब उसका संबंध वास्तविक जीवनानुभवों से हो। कवि जब तक श्रमशील जनता से भावनात्मक स्तर पर न जुड़ा हो और उसके संघर्षों में उसकी किसी हद तक भागीदारी न हो, कविता में सच्चाई की ताकत नहीं आ सकती। कविता जीवन-सत्य को प्रकट करने का सबसे बड़ा और बहुत ही सूक्ष्म माध्यम है। सिर्फ वैचारिक और सैद्धांतिक मतवाद के सहारे कविता नहीं लिखी जा सकती और अगर लिखी जाती है तो बहुत ही उथली व निष्प्रभावी होती है।

कौशल किशोर की कविताओं की खासियत यह है कि वे बहुत ही सहजता के साथ संघर्षशील जनता की संवेदना से जुड़ती हैं और उनकी जीवन स्थितियों और जटिल भाव दशाओं को अभिव्यक्त करती हैं। उनकी कविताओं में शिल्प के नाम पर बेजा प्रयोग करने की प्रवृत्ति भी नहीं दिखती। इसकी वजह ये है कि उनकी कवितओं का कथ्य, उनकी अंतर्वस्तु ही इतनी वास्तविक है कि उसे शिल्प की अतिरिक्त सज्जा और पच्चीकारी की जरूरत नहीं। एक सहज प्रवाह के साथ उनकी कविताएं सामने आती हैं और जीवन की विकट, विषण्ण और दुर्धष परिस्थितियों की जटिल संरचना में रूपायित होती हैं, लेकिन जब वे पाठक तक पहुंचती हैं तो उसकी भाव दशा से उनका पूरी तरह तादात्म्य स्थापित हो जाता है, क्योंकि वे उनके जीवन से ही निकली होती हैं और उनके जीवन अनुभव ही उनमें पिरोये होते हैं।

कौशल किशोर की कविताएं गहन जीवन राग की कविताएं हैं। उनमें श्रमिक वर्ग का संघर्ष, उस संघर्ष की जटिलता, जीवन की आशा-निराशा, उत्साह और साथ ही पीड़ा की तो अभिव्यक्ति हुई ही है, व्यैक्तिक जीवन की भी बहुत ही सहज दशाओं का चित्रण हुआ है। ‘इन्तजार शीर्षक से चार कविताएं’ इसी श्रेणी की है। ‘सुबह की धूप’ भी एक ऐसी ही कविता है जो अपने भीतर गंभीर अर्थ संजोए है। ‘गौरेया’, ‘चिड़िया’, ‘चिड़िया और आदमी : एक’, ‘चिड़िया और आदमी : दो’ गहन राग से भरी कविताएं हैं। पुस्तक मेले को लेकर संग्रह में दो कविताएं हैं। दोनों ही अपने कथ्य और शिल्प में विलक्षण हैं। ऐसी कविताएं शायद ही हिंदी में पहले कभी लिखी गई हों। ‘रामसेवक की सिसकियाँ’ एक ऐसी कविता है जो आज के जनतंत्र के फरेब में फंसकर बलि चढ़ते सबसे कमजोर आदमी के जीवन की विडम्बना को सामने लाती है।

इस संग्रह में शामिल अधिकांश कविताएं पूरी तरह राजनीतिक कविताएं हैं। उनमें मज़दूर वर्ग की चेतना का सर्वोत्कृष्ट रूप देखने को मिलता है। बहुत कम कविताएं ऐसी हैं जिनका कथ्य राजनीति से हट कर हो, पर वे इकहरी नही, बेहद संशलिष्ट रूप-विधान की कविताएं हैं। ‘मां का रोना’ कविता पढ़ते हुए कुछ संदर्भों में गोरख पांडेय की ‘बुआ के प्रति’ कविता की याद आ जाती है। इस संग्रह की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो उल्लेखनीय न हो, पर ‘वह औरत नहीं महनद थी’ का जिक्र करना खास तौर पर जरूरी लगता है। इसे पढ़ते हुए भी गोरख पांडेय की कविता ‘कैथरकलां की औरतें’ का याद आ जाना स्वाभाविक है। ‘वह औरत नहीं महानद थी’ मज़दूर वर्ग के व्यापक संघर्षों में स्त्री की भागीदारी और नेतृत्तवकारी भूमिका की वह सच्ची गाथा है, जो एक कविता ही नहीं, इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ है। यह कविता हिंदी साहित्य की बड़ी उपलब्धि है। यह एक ऐसी यथार्थपूर्ण रचना है जिसे आने वाली पीढ़ियां संजो कर रखेंगी।

पहाड़ी नदियां उतर रही थीं

चट्टानों से टकरातीं

उछाल लेती

लहराती मचलती बलखाती

बढ़ती उसी की ओर

अब वह औरत नहीं महानद थी।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि संग्रह की कविताओं में आज के जीवन, समाज और राजनीति का जटिल, बहुस्तरीय यथार्थ सामने आया है। 

कविता संग्रह – वह औरत नहीं महानद थी

कवि – कौशल किशोर

प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर

मूल्य - 154 रुपए

प्रकाशन वर्ष – 2017

 

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